दिखावा – ज्योति आहूजा

मां! मेरा कोई ऑनलाइन पार्सल आया है क्या| ” नताशा ने मां रेणु जी से पूछा|   “अभी तक तो नहीं आया, क्यों कुछ खास था क्या?” मां ने नताशा से पूछा| “हां मां, मैंने ऑनलाइन ड्रेस ऑर्डर की है| मेरी सहेली का जन्मदिन आ रहा है ना| उसने पार्टी रखी है| वहां सब सहेलियां … Read more

पराए रिश्तों पर हक – पूनम अरोड़ा

शैक्षिक प्रशिक्षण से सेवा निवृत हो चुके अनिल जी ने  कुछ आमदनी प्राप्त  करने के लिए और कुछ अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए अपने घर के एक पोर्शन को किराए पर उठाने का फैंसला किया । जल्दी  ही उन्हें  एक किराएदार मिल भी गया । एक युवा दम्पति  और उनकी ढाई साल की … Read more

सीढ़ी का नियम – आभा अदीब राज़दान

आज पोते ने जब बहू को पलट कर बेतुका सा जवाब दिया तो पूर्णिमा जी को बहुत बुरा लगा । रीमा तो बेटे को घुड़क कर बाहर चली गयी लेकिन पोता सौरभ, लज्जित होने के बजाय अब भी अपने भोंडे क्रोध का प्रदर्शन ही कर रहा था । ” देखिए दादी जी माँ ने मुझे … Read more

जीवन के नए रंग – निभा राजीव “निर्वी”

नंदिता सूनी आंखों से अपने पति की हार चढ़ी तस्वीर को अपलक निहार रही थी। मद्यपान के व्यसन ने आखिर उसके पति की जान ले ही ली। कमरे के बाहर सासू मां का उसे बदस्तूर कोसना जारी था..” मेरे तो कर्म ही फूट गए थे जो इस अभागिन को बहू बनाकर ले आई।पैदा होते ही … Read more

वो एक माँ ही कर सकती है – ज्योति अप्रतिम

********************** “अरे कहाँ हो भाई ।एक पखवाड़ा बीत गया है ,कोई बात नहीं हो पाई।सब ठीक तो है न !” मैंने किरण ,अपनी अभिन्न मित्र से फ़ोन पर पूछा। “हाँ ,सब ठीक ही है।” उदास सा स्वर सुन कर ही समझ आ गया कुछ तो दाल में काला है ! “स्पष्ट बताओ डिअर ! क्या … Read more

खिचड़ी-दलिया—कहानी-देवेन्द्र कुमार

यह आज पाँचवीं बार था जब पापा ने अजीत को मना किया था। कई दिन से अजीत देख रहा है कि जब भी वह घूमने जाने की बात कहता है, पापा मना कर देते हैं। कह देते हैं, “फिर चलेंगे। आज समय नहीं है।” अजीत माँ की ओर देखता है तो वह भी कह देती … Read more

अपने बच्चे भी स्वार्थी हो सकते हैं – के कामेश्वरी

शैलजा कार के हार्न की आवाज़ को सुनते ही रसोई में चाय बनाने चली गई थी । यह रोज का ही सिलसिला था कि शाम होते ही बेटा बहू के ऑफिस से आने से पहले ही वह चाय के लिए पानी चढ़ा देती थी और उनके फ्रेश हो कर आते ही चाय बना देती थी … Read more

तलाक -रिश्ते का अंत,या फिर से शुरुआत – रचना कंडवाल

आस्था कोर्ट से वापस लौटी तो बहुत उदास थी आज कागज के एक टुकड़े पर एक साइन ने उसे और मयंक को हमेशा के लिए लिए अलग कर दिया था।थके कदमों से अपने कमरे में जाकर बेड पर बैठ गई। भैय्या और मां भी उसके पीछे पीछे आ गये। मां तो खामोश थीं, पर भैय्या … Read more

हमने सिर्फ स्वार्थ देखा सम्मान नहीं… – सविता गोयल

दीदी, कल आपके भतीजे का जन्मदिन है। आपलोग बच्चों के साथ आ सको तो बहुत अच्छा लगेगा, ” एकता ने मनुहार करते हुए अपनी ननद मधु को फोन किया। ” देखती हूं भाभी…. वैसे मुश्किल हीं है क्योंकि आपके जीजा जी को कल जरूरी काम है,” मधु ने ठंडी सी प्रतिक्रिया देकर फोन रख दिया। … Read more

“गलती किसकी”  – ऋतु अग्रवाल

दीवाली की सफाई के बाद थकी हारी सुहानी आराम कुर्सी पर अधलेटी सी बैठी थी। तभी गेट खोल कर दफ्तर का चपरासी रामविलास अंदर दाखिल हुआ।         “बहू जी!यह चिट्ठियाँ लेकर आया हूँ।साहब का फोन भी आया था। मुंबई से कोलकाता के लिए चल पड़े हैं। परसों लौट आएँगे।”उसने चिट्ठियाँ देते हुए कहा।       सुहानी स्टडी रूम … Read more

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