संस्कार- यात्रा – कमलेश राणा

मैं शायद उस समय छः महीने का था जब मेरे पापा मुझे और माँ को लेकर मुंबई आ गये थे क्योंकि उत्तराखंड के पहाड़ों पर जीवन यापन करना बहुत ही मुश्किल कार्य है। उनके एक मित्र मुंबई में टैक्सी ड्राइवर थे। जब वो गाँव आये तो पापा उनके साथ इस महानगर में भाग्य आजमाने चले … Read more

मिन्नू के संस्कार – दीक्षा शर्मा

‘ आप क्यूं उस छोटे बच्चे को मार रहे हैं अंकल!’ मिन्नू चिल्लाकर बोला। ‘ तुझसे क्या, तू कौन होता है बोलने वाला, छ्टांग भर का लड़का!’ उस आदमी ने अपनी भारी आवाज़ में मिन्नू को डराकर कहा। मिन्नू छोटा था। वह रोने लगा।पर फिर पता नहीं क्या हुआ वह दौड़कर उस नन्हे पिल्ले के … Read more

वारिस – कमला अग्रवाल

बच्चे का मुख चूमते हुए सुधीर ने आवाज दी , ” रुपा मैं चला ,सलोने का ख्याल रखना “। ” अरे ! आज तो चाय पी के जाइए “   ” नहीं रुपा ! तुम जानती हो ,घर पर सुप्रिया मेरा इन्तजार कर रही होगी ,चाय उसी के साथ पिऊंगा ।” रुपा के चेहरे पर … Read more

हीरा पन्ना – सारिका चौरसिया

बहनें दोनों एक दूसरे को बहुत प्यार करती थी,, छोटी बड़ी के बगैर सोती नहीं थीऔर बड़ी ! छोटी को कहीं से आने में जरा सी देर पर परेशान हो जाती थी,, बेटियों ने मां को बचपन से ही अनेकों संघर्षों से जूझ कर भी उनके लिये उत्तम व्यवस्था बनाने की हर संभव कोशिश करते … Read more

संस्कार  – पूनम अरोड़ा

आज फिर काशी अब तक नहीं आई थी। नीता को ऑफिस जाने में देर हो रही थी, वो खुद ही बड़बड़ाती जा रही थी “कितनी बार उससे कहा है कि मेरे जाने से पहले आ जाया कर, बाद में आने से अभय को दरवाजा खोलने उठना पड़ता है और उसकी नींद खराब होती है लेकिन … Read more

मां के संस्कार ने बेटी को बेहतर बनाया, – सुषमा यादव

 बच्चों को शिष्टाचार, तहज़ीब और संस्कार बहुत छोटी सी अवस्था में ही सिखाया जाये,, उन्हें भले बुरे की पहचान कराई जाये,, और किसी भी चीज़ के लिए ज़िद करने की आदत को सुधारा जाए, उन्हें प्यार से, तथा मनोवैज्ञानिक तरीके से समझाया जाये,,तो बच्चे बाद में सिरदर्द नहीं बनते, उनके कारण हमें किसी के सामने … Read more

मुहब्ब्त – आरती झा”आद्या”

हैलो.. मोबाइल पर पापा फ्लैश होता देख अभिनव बोलता है। क्या.. कब.. कैसे.. अभी आता हूँ मैं.. किस हॉस्पिटल में हैं.. अभिनव बोलता हुआ लगभग दौड़ता हुआ अपने बॉस की कैबिन में पहुँचता है। सर मेरी माँ का एक्सीडेंट हो गया है.. मैं हॉस्पिटल के निकल रहा हूँ… बदहवास सा अभिनव बॉस को सूचित करता … Read more

संभालों अपने संस्कारों को…!! – भाविनी केतन उपाध्याय 

“जब मैंने कोई गलती नहीं की तो क्यों बर्दाश्त करूं? आप को पता था कि मेरे माता पिता गरीब हैं और कुछ देने में सक्षम नहीं है फिर भी आप ने मांजी अपना स्वार्थ ही देखा मेरे माता पिता ने आप को इस बात से अवगत भी कराया था कि आप लोगों में और हमारे … Read more

अब सर्दियों में ठंड से नहीं पर अपनेपन और प्यार से कंपकपी सी लगती है…… – भाविनी केतन उपाध्याय 

” प्रणाम मौसी जी,कैसी है आप और मौसम कैसा है ? “ ” अरे वाह..!! आज तो मेरे भाग खुल गए भई, बड़े दिनों बाद इस बुढ़ी मौसी को कैसे याद किया ? मौसम का तो क्या कहने कभी ठंड तो कभी गर्म जैसा अपना मिजाज .!!” ” मौसी जी, अगर आप को कोई आपत्ती … Read more

संस्कारी दिव्यांग – विनोद प्रसाद 

अस्पताल के बेंच पर अकेला बैठा अरूण बार-बार ऑपरेशन थियेटर के बंद दरवाजे के खुलने की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा था। भीतर उसकी पत्नी को प्रसव हेतु ले जाया गया था। बैठे-बैठे वह अतीत की गहराइयों में डूबता गया। दुनिया वाले भले ही उसे दिव्यांग मानते थे, लेकिन अरूण ने शारीरिक अपंगता को कभी … Read more

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