पारस पत्थर – गरिमा चौधरी
विनय की आवाज़ में खीझ साफ़ झलक रही थी। उसने हाथ में पकड़ी हुई कलाई घड़ी को झुंझलाहट के साथ टेबल पर पटका। “सृष्टि! अब हद हो रही है। पिछले बीस मिनट से मैं मोज़े ढूंढ रहा हूँ और तुम हो कि उस ‘महारथी’ को दलिया खिलाने में व्यस्त हो। मेरी मीटिंग है आज, तुम्हें … Read more