मायकेवालों को बुला लो!! –  कनार शर्मा 

बहू दिन चढ़े घंटो बीत गए एक कप चाय की प्याली ना मिली सो गई हो या भूल गई हो… घर में बूढ़े सास ससुर भी हैं और कॉलेज जाते ननंद, देवर भी सभी तुम्हारी राह देख रहे हैं जल्दी करो… विमला देवी बोलते हुए बहू पूजा के कमरे में दाखिल हुई। आंखें मसलते हुए … Read more

दबंग मोहल्ला – शैली गुप्ता

सीमा बैग उठाए स्टेशन से बाहर निकली और बाहर खड़े रिक्शावाले से पूछने लगी, ” भैया शर्मा नगर चलेंगे?” रिक्शावाला ज़ोर से हंसता हुआ बोला,” अच्छा आपको दबंग मोहल्ला जाना है….. बैठो।” रिक्शावाले की बात सुनकर सीमा पुलक कर हंस पड़ी और रिक्शा में बैठ गई और सोचने लगी,” हां!!! दबंग मोहल्ला…..इसी नाम से तो … Read more

विरोध :अब तो मैं करूँगी – सुभद्रा प्रसाद

 “रेणु, चलो, जल्दी तैयार हो जाओ  |आधे धंटे में हम निकलेंगें |” रेणु की सास शोभा देवी ने जोर से कहा और खुद तैयार होने अपने कमरे में चली गई |              रेणु ने सुना पर वह अपने पलंग पर ही बैठी रहीं |उसे जाने का जरा भी मन नहीं था |वह अपनी जगह से जरा … Read more

एलेक्सा – –ऋता शेखर ‘मधु’

पात्र- शुभ्रा-घर की बहू रमेश-शुभ्रा का पति कल्याणी- शुभ्रा की सास उमेश बाबू- शुभ्रा के ससुर आरव- शुभ्रा का पुत्र, उम्र 10 वर्ष आरुषि- शुभ्रा की पुत्री, उम्र 8 वर्ष एक बैठक का दृश्य। बैठक में दो सेट सोफे हैं,एक बड़ा सेट गद्दा वाला। एक लकड़ी का कुशन वाला। वहीं एक आलमीरा के ऊपर एलेक्सा … Read more

मां उच्च शिक्षित ना हो सर्वश्रेष्ठ दोस्त तो हो ! – मीनू झा 

क्या बात है देख रही हूं तेवर चढ़ाए आए हो आप दफ्तर से आज…सब ठीक तो है? किसी से कहा सुनी तो नहीं हो गई? नहीं! फिर?? फिर क्या… जिंदगी में तनाव का कारण क्या सिर्फ दफ्तर ही होता है और बातें नहीं हो सकती क्या? वही तो मैं जानना चाहती हूं कि क्या बात … Read more

भागवान!तुमने अपनी गृहस्थी संभाल ली-अब बहू को अपना घर संभालने दो! – कुमुद मोहन!

सना और रमन की शादी चार महीने पहले ही हुई थी! रमन मुंबई की एक कम्पनी में इंजीनियर था!कंपनी की तरफ से उसे तीन बी एच के का फ्लैट मिला था!सना भी बैंक में जाॅब करती थी! शादी के बाद सना की सास सुमन महीने भर यह कहकर उनके पास रूकी रहीं कि नयी बहू … Read more

आपके लिए ! – रमेश चंद्र शर्मा

 विगत पंख लगाकर फुर्र  हो गया। गुजरे जमाने के सैड सॉन्ग की तरह कुछ स्मृतियां आज अचानक प्रत्यक्ष होने लगी। कॉलेज के दिनों की सीधी-सादी वंदना का चेहरा सामने आ गया ।किसी से बातचीत नहीं । लड़कों से तो बिल्कुल भी नहीं। इक्की दुक्की सहेलियां। सहज आकर्षण सौम्य चेहरा । सादगी दिखाती वेशभूषा। वंदना की … Read more

इस्तीफ़ा – रंजना बरियार

चाँद खिड़की से झाँक रहा है… मानों उसका चाँद उसकी आँखों में झाँक कर कह रहा हो..’उठ सुमी यहाँ क्या कर रही? चलो, चाँद के उस पार चलें’… नहीं , ये तो मेरा चाँद नहीं.. ये मौन है.. शीतलता देता है.. पर साथ चलने को नहीं कहता…पर मेरा चाँद तो शीतलता देता है…अग्नि को तुषार … Read more

“बस अब और नहीं…” – ऋतु गुप्ता

सत्रह बर्ष की सलोनी दो बर्ष की बेटी का हाथ थामे और आठ महीने के पेट के साथ अपने पिता के मरने पर उसके लिए रोने मायके आई है। दिल कहता है बाप था तेरा, जरा तो संवेदना दिखा, इन आंखों से दो आंसू तो इस रिश्ते के लिए गिरा दे, पर दिमाग तो कुछ … Read more

“विरोध नहीं सही का आगाज़” ऋतु अग्रवाल

      “सम्यक! तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है। तू अपनी बड़ी बहन का विरोध कर रहा है। उस बहन का जो तुझे जान से भी प्यारी थी और वह बहन जो तेरे लिए कुछ भी कर गुजरे। आज तुझे अपनी बीवी इतनी प्यारी हो गई कि तू उसके लिए अपनी सगी बहन के खिलाफ … Read more

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