*बस बहुत हो गया* – तोषिका

“*बस बहुत हो गया*। मेरी बेटी अब एक पल भी इस घर में नहीं रहेगी।” माही के पिता रामचरण ने बोला। “अरे पापा, आप ऐसा क्यों बोल रहे है, छोटी सी बात है इसमें घर ले जाने वाली कौन सी बात हो गई। शादी को अभी एक साल भी नहीं हुआ है।” माही के पति … Read more

बेटियाँ दो-दो कुलों का नाम रोशन करती हैं – डॉ आभा माहेश्वरी

एक छोटे से कस्बे में रामप्रसाद नाम का छोटा सा कपड़े का व्यापारी अपनी पत्नी सावित्री और बेटी नंदिनी के साथ रहता था। रामप्रसाद मेहनती तो था, लेकिन उसकी एक ही चिंता थी कि उसके घर बेटा नहीं है। वह अक्सर कहता, “काश! मेरे घर भी एक बेटा होता, जो मेरा नाम आगे बढ़ाता।” उसकी … Read more

ऑंखें खुल जाना – एम. पी. सिंह “मोहि”

राजू के पैदा होते ही उसकी मां गुजर गई थी और जब वो 7 साल का था, उसके पिता भी गुजर गए थे। दादी थी नहीं, इसलिए दादा ने जैसे-तैसे बड़ा किया। 15 साल की उम्र में दादा भी साथ छोड़ गए। पेट भरने के लिए उसने पढ़ाई छोड़ दी और एक स्कूटर रिपेयर की … Read more

*चाची* – उषा भारद्वाज

    मोहल्ला भले ही छूट गया हो, लेकिन उसकी यादें आज भी मेरे मन में वैसे ही बसी हैं। आज मां ने दही बड़ा बनाया। मुझे बचपन से बड़े बहुत पसंद हैं। जैसे ही मैंने खाना शुरु किया। अचानक मोहल्ले की चाची याद आ गईं। पूरा मोहल्ला उन्हें चाची के नाम से ही जानता था। छोटे-बड़े … Read more

वसीयत के पन्ने

मीरा को कहां मालूम था कि इस बार जब वह अपने बाबूजी, रमाकांत जी को लेकर अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ रही है, तो वे सीढ़ियां वापसी का रास्ता कभी नहीं दिखाएंगी। पिछले चौदह महीनों से अस्पताल और घर के बीच मीलों का सफ़र तय करते-करते मीरा की ज़िंदगी एक मशीन बन गई थी। बाबूजी की … Read more

रूप का अहंकार

अनिरुद्ध एक पढ़ा-लिखा और सुलझा हुआ इंसान था। उसने राधिका की इस बद्तमीज़ी पर अपना आपा नहीं खोया, बल्कि बहुत ही गरिमा के साथ जवाब दिया, “मिस राधिका, फोटो स्टूडियो वाले अक्सर तस्वीरों को थोड़ा बहुत एडिट कर देते हैं, लेकिन मैंने कभी अपने रंग को छिपाने की कोशिश नहीं की। मैं एक डॉक्टर हूँ, … Read more

सच्चाई का आईना

इंसानियत और संस्कारों से बड़ी कोई जात नहीं होती। उनके घर में भी वही संस्कार हैं, जो हमारे यहाँ हैं। अगर अद्विका ने कोई गलत रास्ता चुना होता या किसी गलत इंसान का हाथ पकड़ा होता, तो मैं खुद उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता। लेकिन जब मेरी बेटी ने एक नेक और सच्चे इंसान … Read more

ख़ुशियों की पासबुक

पार्वती देवी का जीवन किसी तपस्या से कम नहीं था। शादी के महज पांच साल बाद ही उनके पति का एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया था। उस वक्त उनकी बेटी शिखा बमुश्किल तीन साल की थी। ससुराल वालों ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि पार्वती के भाग्य में ही खोट है। उस … Read more

समझदार पत्नी

शादी को अभी महज़ डेढ़ साल ही बीता था, लेकिन इस छोटे से अरसे में ही नंदिनी  ने विशाल के घर को पूरी तरह से अपना बना लिया था। विशाल के घर की परिस्थितियां आम घरों जैसी नहीं थीं। शादी से करीब एक साल पहले ही विशाल की माँ, सुशीला जी को लकवे का एक … Read more

पछतावा

रात के ग्यारह बज चुके थे। पूरे घर में खामोशी छा गई थी। सास-ससुर को दवाइयां देकर सुलाने, ननद और देवर के नखरे उठाकर उन्हें मनपसंद भोजन कराने, और अंत में पति को खाना परोसने के बाद, मीरा ने रसोई समेटी थी। हमेशा की तरह बर्तन मांजने के बाद जो थोड़ा-बहुत ठंडा खाना बचा था, … Read more

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