आग में घी डालना – डॉ कंचन शुक्ला

“प्ररेणा तुम हमेशा किताबों में क्यों घुसी रहती हो??  कभी-कभी घर के कामों में भी हाथ बटा दिया करो दिन भर कॉलेज में रहो और जब घर आओ तो क़िताब लेकर बैठ जाओ, घर के काम के लिए  मैं और तुम्हारी बड़ी बहन तो है ही बस तुम महारानी की तरह बैठ कर राज करो” … Read more

बुढ़ापे का असली सहारा न बेटा न बेटी बल्कि बहू होती है – प्रतिमा श्रीवास्तव

जिस बहू को हमेशा से अपने ही घर में परायों सी जिंदगी गुजारने को मजबूर कर दिया जाता है वही बहू अपनी जिम्मेदारियों को निभाते – निभाते हर कदम पर ये साबित करती है की ये ही उसका परिवार है लेकिन फिर भी उसे वो स्थान या सम्मान कभी नहीं मिलता जो बेटी – बेटा … Read more

अब किसकी शिकायत करोगी….. – रश्मि प्रकाश

“ माँ आज बद्दुआ नहीं दोगी…अब शिकायत नहीं करोगी… ?” जयदेव ने जैसे ही कहा उनकी माँ कलावती ज़ोर ज़ोर से रोते रोते कहने लगी “ चली गई रे इस घर को छोड़कर हमेशा के लिए…अब कौन मोहे सवेरे की चाय देवेगा…. उसे बुला ले रे वापस जय…मत जाने दे।”  “ अब वो कभी नहीं … Read more

बुढ़ापे का असली सहारा ना बेटा ना बेटी बल्कि बहूं होती है – विनीता सिंह

पंडित राम स्वरूप जी और उनकी पत्नी सावित्री देवी उनके  दो बच्चे एक बड़ी बेटी और एक बेटा  दोनों बच्चे पढ़ लिख गए बेटी की शादी कर दी ससुराल चली गई। बेटा की नौकरी लग गई वह भी दूसरे शहर में रहने लग सप्ताह में शनिवार को आता और सोमवार की सुबह वापस लौट जाता … Read more

बुढ़ापे का असली सहारा ना बेटा ना बेटी बल्कि बहू होती है – हेमलता गुप्ता

गुड़िया बेटा.. देख कुछ समय के लिए अगर आना हो जाए तो आ जाना, तेरी मां कल स्टंट डलवाने जा रही है क्या पता अस्पताल से वापस भी आऊं या ना आऊं! क्या मम्मी… आजकल स्टैंड डलवाना कोई बड़ी बात नहीं है और पहले से ही अगर अपने दिनचर्या और खानपान पर ध्यान देती तो … Read more

बद्दुआ – कुमुद मोहन

“मां जी!पापा की बहुत तबियत खराब है भाई का फोन आया है एकबार मुझे देखना चाहते हैं !मै जाऊं?”डरते डरते नीता ने अपनी सास शीला जी को कहा! “क्यूं? तू कोई सिविल सर्जन है क्या जो जाकर अपने बाप को ठीक कर देगी”शीला गुस्से से बड़बड़ाई । तेरे घरवालों का ये रोज रोज का नाटक … Read more

बद्दुआ – प्रतिमा श्रीवास्तव

अम्मा भूखी हूं दो दिन से कुछ खाने को दे दो। मेरे बच्चों ने भी कुछ नहीं खाया है। दरवाजे पर खड़ी एक भिखारिन जो भूख से तड़प रही थी और उसकी आवाज भी धीमी सी पड़ने लगी थी।बार – बार पूकार रही थी तभी घर की मालकिन सरोजा जी बाहर आईं और उस पर … Read more

एक मुक्का – लतिका श्रीवास्तव

अन्ततः दांत के डॉक्टर के पास मुझे जाना ही पड़ा .. बकरे की मां कब तक खैर मनाती..!डेंटिस्ट के यहां से घर वापिस आकर बैठा ही था कि पड़ोसी श्यामलाल टपक पड़े।पत्नी से बर्फ लेकर दांत की सिंकाई के लिए तत्पर होता मैं असमय आए श्यामलाल को देख चिढ़ गया।आ गया घाव पे नमक छिड़कने। … Read more

बद्दुआ – दीपा माथुर

शहर के एक छोटे मोहल्ले में, चमचमाती इमारतों के बीच, एक टूटी-फूटी झोपड़ी थी। वहीं रहता था सद्दू — बारह साल का दुबला-पतला बच्चा। माँ पहले ही गुजर चुकी थी और पिता रिक्शा चलाकर जैसे-तैसे पेट पालते थे। घर में चार छोटे भाई और दो बहनें… ज़िम्मेदारी का पहाड़ उस नन्हे कंधे पर था। बच्चा … Read more

रिटायरमेंट – दीपा माथुर

लोग रिटायरमेंट के बाद बीमार क्यों होने लगते है? गार्डन में बोल उछालते हुए अवि ने धीरज से पूछा धीरज ;” हु मेरे दादा जी भी बीमार रहते है दादी दिनभर काम करती है मेरी हर जरूरत का ख्याल रखती है मम्मी,पापा सर्विस पर जाते तो पीछे सारा काम करती है तो व्यस्त रहती है। … Read more

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