पागल भाई

राघव के घर के आंगन में आज सुबह से ही एक उदासी भरा सन्नाटा पसरा हुआ था। आज उसकी माँ की पहली बरसी थी। घर में रिश्तेदारों और पंडितों की आवाज़ें तो गूंज रही थीं, लेकिन वो पुरानी रौनक कहीं खो सी गई थी जो माँ के होने से हुआ करती थी। राघव की बड़ी बहन मीरा भी दो दिन पहले ही दूसरे शहर से इस पूजा में शामिल होने आई थी। माँ के जाने के बाद राघव और मीरा के बीच बातचीत कुछ कम हो गई थी, लेकिन दोनों के बीच कोई कड़वाहट नहीं थी। बचपन में दोनों ने एक ही थाली में खाना खाया था, एक-दूसरे की गलतियों पर पिता की डांट से एक-दूसरे को बचाया था। लेकिन आज कुछ ऐसा होने वाला था जिसकी कल्पना उस घर की दीवारों ने भी नहीं की थी।

पूजा खत्म होने के बाद सब लोग दालान में बैठे थे। माँ की पुरानी अलमारी का सामान निकाला जा रहा था। माँ की एक पुरानी, लाल रंग की बनारसी साड़ी थी, जिसे मीरा बचपन से अपनी शादी में पहनने का सपना देखती थी, लेकिन पहन नहीं पाई। मीरा ने बड़े प्यार से उस साड़ी को अपने हाथों में लिया और कहा कि यह साड़ी वह माँ की आखिरी निशानी के तौर पर अपने साथ ले जाना चाहती है। बात बहुत छोटी सी थी, लेकिन पता नहीं राघव के मन में क्या चल रहा था। शायद माँ के बिना अकेले घर और जिम्मेदारियों को संभालने का तनाव, या शायद कुछ अनकही शिकायतें। राघव ने अचानक से कह दिया, “दीदी, माँ के जाने के बाद उनके गहने और बाकी कीमती साड़ियां तो आप पहले ही ले गई थीं। यह साड़ी नेहा (राघव की पत्नी) को बहुत पसंद है, इसे यही रहने दो। वैसे भी शादी के बाद लड़कियां अपने घर की हो जाती हैं, मायके पर उनका हक़ बस मेहमानों जितना ही रह जाता है।”

‘मेहमान’ शब्द मीरा के कानों में किसी पिघले हुए शीशे की तरह उतरा। जिस घर के कोने-कोने में उसका बचपन बीता था, आज उसी घर में उसका अपना सगा भाई उसे मेहमान बता रहा था। मीरा की आँखों में आंसू आ गए और उसकी आवाज़ तेज़ हो गई। “क्या कहा तुमने? मैं इस घर की मेहमान हूँ? माँ-बाबूजी के जाते ही तुमने मुझे इस घर से बेदखल कर दिया राघव? मैं यहाँ कुछ मांगने नहीं, अपनी माँ की यादें समेटने आई थी। लेकिन शायद तुम सही कह रहे हो, मायका तो माँ-बाबूजी के साथ ही खत्म हो जाता है।”

देखते ही देखते यह बहस इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक-दूसरे को वो सारी बातें कह दीं, जो सालों से उनके दिलों के किसी कोने में दबी हुई थीं। बचपन के वो भाई-बहन आज एक-दूसरे के सामने किसी ज़मीन या जायदाद के लिए नहीं, बल्कि अपने-अपने अहंकार और अहम के लिए लड़ रहे थे। रिश्तेदारों की भीड़ सन्न होकर यह सब देख रही थी। किसी ने भी उन दोनों को कभी ऐसे लड़ते हुए नहीं देखा था। बचपन में अगर वो लड़ते भी थे, तो माँ की एक डांट से या एक चॉकलेट के लिए पल भर में मान जाते थे। लेकिन आज, उनके चेहरों पर वो बचपन वाली मासूमियत नहीं थी; वहाँ सिर्फ परिपक्वता के नाम पर पनपा हुआ एक भयानक अहंकार था।

बहस इतनी कड़वी हो गई कि मीरा ने बिना एक पल गंवाए अपने कमरे में जाकर अपना सामान पैक करना शुरू कर दिया। उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह रही थी, लेकिन चेहरे पर एक कठोरता थी। राघव की पत्नी नेहा दौड़कर मीरा के पास गई। उसने मीरा का हाथ पकड़कर रोते हुए कहा, “दीदी, प्लीज ऐसा मत कीजिए। आज माँ का दिन है, उन्हें कैसा लगेगा? राघव गुस्से में कुछ भी बोल गए हैं, आप उन्हें माफ कर दीजिए।”

राघव के दोनों बच्चे, आरव और पीहू भी दौड़कर आए और अपनी बुआ के पैरों से लिपट गए। “बुआ मत जाओ, बुआ हमारे साथ खेलो ना,” बच्चे अपनी तोतली ज़बान में रट लगाए रहे। लेकिन मीरा का स्वाभिमान इतनी बुरी तरह आहत हो चुका था कि उसने बच्चों के माथे को चूमा, नेहा के हाथ छुड़ाए और अपना बैग लेकर घर के दरवाज़े की तरफ बढ़ गई।

राघव वहीं दालान में एक पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ा रहा। न तो उसने आगे बढ़कर अपनी बहन का हाथ पकड़ा, न ही उसे रुकने के लिए एक शब्द कहा। मीरा भी एक बार बिना पीछे मुड़े उस घर की दहलीज पार कर गई, जिसे वो कभी अपना ‘मायका’ कहती थी।

महीने बीतते गए। सर्दियां आईं और चली गईं, फिर बसंत भी बीत गया। लेकिन राघव और मीरा के बीच फोन की एक घंटी तक नहीं बजी। दोनों की बातचीत पूरी तरह से बंद थी। अब वो छोटे बच्चे नहीं थे कि कोई तीसरा आकर उनकी सुलह करवा दे या कोई खिलौना देकर उनका झगड़ा मिटा दे। दोनों उम्र के साथ परिपक्व तो हो गए थे, लेकिन उनके खून के रिश्तों की डोर बहुत कमज़ोर हो गई थी। बड़े होने का अहसास, दुनियादारी की समझ और सबसे बढ़कर ‘मैं सही हूँ’ का अहंकार उनके उस पवित्र रिश्ते को दीमक की तरह चाट रहा था।

राघव अक्सर रात को अपने बच्चों को सोते हुए देखता तो उसे याद आता कि कैसे वह और मीरा बचपन में एक ही रजाई के लिए लड़ा करते थे। उधर, मीरा भी अपने घर में माँ की पुरानी तस्वीरें देखकर फूट-फूट कर रोती थी। उसे राघव की याद सताती थी। वो रक्षाबंधन का त्योहार कैसे भूल सकती थी, जब राघव अपनी गुल्लक तोड़कर उसके लिए तोहफे लाता था। दोनों अंदर ही अंदर घुट रहे थे। दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत थी। लेकिन दोनों में से कोई भी पहल करने को तैयार नहीं था। ‘मैं क्यों झुकूं?’ यह सवाल उन दोनों के बीच एक अदृश्य और अभेद्य दीवार बन चुका था।

रक्षाबंधन का त्योहार करीब आ रहा था। बाज़ार रंग-बिरंगी राखियों से सज गए थे। राघव जब भी किसी बहन को अपने भाई के लिए राखी खरीदते देखता, तो उसका दिल भारी हो जाता। उसे वो दिन याद आने लगे जब मीरा उसके लिए अपने हाथों से मिठाई बनाती थी। दूसरी तरफ, मीरा ने भी अनजाने में ही बाज़ार से एक सुंदर सी राखी खरीद ली थी, लेकिन उसे भेजने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।

राखी से ठीक एक दिन पहले, राघव के घर में उदासी छाई हुई थी। नेहा समझ रही थी कि उसका पति अंदर से कितना टूट चुका है। उसने राघव के पास आकर कहा, “राघव, क्या वो पुरानी साड़ी आपके लिए मीरा दीदी से ज्यादा कीमती थी? क्या आपका ये अहंकार आपके बचपन के उस प्यार से बड़ा है जो दीदी ने आपको दिया है? बड़े होने का मतलब रिश्तों को तोड़ना नहीं, बल्कि उन्हें झुकाकर सहेजना होता है। माँ होतीं तो क्या वो आपको ऐसे देखने पातीं?”

नेहा की बातों ने राघव के भीतर जमे हुए अहंकार के उस पहाड़ को पल भर में पिघला दिया। उसकी आँखों से आंसू छलक पड़े। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ कि मायका सच में बहन का भी उतना ही होता है, जितना भाई का। उसने बिना एक पल सोचे अपना फोन उठाया और कांपते हाथों से मीरा का नंबर डायल कर दिया।

उधर, फोन की पहली घंटी बजते ही मीरा ने फोन उठा लिया, जैसे वह महीनों से इसी एक कॉल का इंतज़ार कर रही थी।

“दीदी… मुझे माफ कर दो। कल राखी है, क्या तुम अपने इस पागल भाई को राखी बांधने मायके नहीं आओगी?” राघव की रुंधे हुए गले से निकली इस आवाज़ ने महीनों की उस भयानक खामोशी को चीर दिया।

दूसरी तरफ से मीरा के ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ आ रही थी। “मैं सुबह की पहली ट्रेन से आ रही हूँ मेरे भाई।”

उस दिन दोनों को यह समझ में आ गया कि उम्र बढ़ने के साथ भले ही इंसान बड़ा हो जाए, लेकिन अपनों के सामने हार मान लेने में ही रिश्तों की सबसे बड़ी जीत होती है। अहंकार हमेशा रिश्तों की बलि मांगता है, लेकिन प्यार हर टूटे हुए धागे को फिर से जोड़ देता है।

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लेखिका : पुष्पा खंडेलवाल 

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