नयी उड़ान, नयी पहचान

“दुनिया का काम है कहना, दादी,” आयुष ने मुस्कुराते हुए कहा। “सोचिए, जब कल को मेरी शादी होगी और मेरी पत्नी भी स्नेहा दीदी की तरह नौकरी करके थकी हारी घर आएगी, तो क्या मुझे उसे चाय बनाकर नहीं पिलानी चाहिए? क्या आप नहीं चाहेंगी कि आपके पोते की पत्नी को वो आराम और सम्मान मिले, जो शायद आपके ज़माने में औरतों को नहीं मिल पाया?”

यह सुनकर कावेरी देवी की आँखों में नमी आ गई। उन्हें अपना वो समय याद आ गया जब एक औरत का वजूद सिर्फ चौके-चूल्हे तक सीमित माना जाता था।

सुबह की पहली किरण के साथ ही शर्मा निवास में आज एक अलग ही तरह की हलचल मची हुई थी। सूरज की रोशनी अभी खिड़कियों से छनकर अंदर आ ही रही थी कि रसोई से बर्तनों की खटपट और मसालों की खुशबू पूरे घर में फैलने लगी थी। बरामदे में अपनी आरामकुर्सी पर बैठीं कावेरी देवी के हाथों में रामनामी माला तो चल रही थी, लेकिन उनका ध्यान रसोई से आ रही आवाज़ों और घर में मची आपाधापी पर ही अटका हुआ था।

आज उनकी पोती स्नेहा का एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी का पहला दिन था। स्नेहा ने दिन-रात एक करके इस नौकरी के लिए पढ़ाई की थी और आज जब उसका सपना सच होने जा रहा था, तो घर का हर सदस्य उसकी मदद में जुटा था। स्नेहा अपने कमरे में शीशे के सामने खड़ी होकर बार-बार अपना फॉर्मल सूट ठीक कर रही थी। उसके चेहरे पर घबराहट और उत्साह का मिला-जुला भाव था।

इधर रसोई में कावेरी देवी की बहू, वंदना, जल्दी-जल्दी नाश्ता बनाने में लगी थी। वंदना के माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं, लेकिन उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी क्योंकि आज उसकी बेटी अपने पैरों पर खड़ी होने जा रही थी। तभी अचानक कावेरी देवी की नज़र रसोई के दरवाज़े पर पड़ी और उनका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उनका पोता, आयुष, जो अभी कॉलेज के अंतिम वर्ष में था, अपनी कमर पर एप्रन बाँधे गैस स्टोव के सामने खड़ा था और स्नेहा के टिफिन के लिए सैंडविच बना रहा था। वंदना उसे बता रही थी कि टिफिन में सेब काटकर कैसे रखने हैं।

यह दृश्य देखकर कावेरी देवी से रहा नहीं गया। उनकी माला वहीं रुक गई और उन्होंने अपनी तेज़ आवाज़ में पुकारा, “अरे वंदना! ये क्या हो रहा है मेरे घर में? बहू, ज़रा बाहर आना।”

वंदना घबराते हुए अपने हाथ पोंछती हुई बाहर आई, “क्या हुआ माँ जी? कोई तकलीफ़ है क्या? चाय दूँ आपको?”

कावेरी देवी ने त्यौरियाँ चढ़ाते हुए कहा, “मुझे चाय नहीं चाहिए, मुझे जवाब चाहिए! ये मैं क्या देख रही हूँ? घर का इकलौता चिराग, मेरा पोता रसोई में खट रहा है और वो महारानी अंदर शीशे के सामने सज-संवर रही है? अरे, बेटी है तो क्या हुआ, उसे घर के काम नहीं करने चाहिए क्या? और इस लड़के को तुमने बावर्ची बना दिया है? यही संस्कार दे रही हो तुम अपने बच्चों को?”

उनकी आवाज़ सुनकर आयुष मुस्कुराता हुआ रसोई से बाहर आ गया। उसके हाथ में एक प्लेट थी जिसमें कावेरी देवी की पसंद के बेसन के लड्डू और चाय थी। वह अपनी दादी के पास आया और बड़े प्यार से बोला, “दादी माँ, सुबह-सुबह इतना गुस्सा सेहत के लिए अच्छा नहीं होता। लीजिए, पहले अपनी चाय पीजिए।”

कावेरी देवी ने मुँह फेरते हुए कहा, “मुझे नहीं पीनी तेरे हाथ की चाय। और तू, तुझे शर्म नहीं आती? मर्दों वाले काम कर। ये औरतों की तरह रसोई में घुसकर क्या बर्तन चमका रहा है? कल को तेरी बहु आएगी तो क्या तू ही उसे भी खाना बनाकर खिलाएगा?”

आयुष ने चाय की ट्रे मेज़ पर रखी और दादी के पास ज़मीन पर उकड़ू बैठ गया। उसने बहुत ही शांति से कावेरी देवी के झुर्रियों भरे हाथ अपने हाथों में लिए और बोला, “दादी, आप हमेशा कहती थीं ना कि जब दादा जी बाहर काम पर जाते थे, तो वो घर चलाने के लिए कितनी मेहनत करते थे। लेकिन क्या कभी किसी ने ये सोचा कि जब आप बीमार होती थीं, तब रसोई का काम कौन करता था?”

कावेरी देवी थोड़ा ठिठकीं। उन्हें याद आया कि एक बार जब उन्हें तेज़ बुखार था, तब भी उन्हें उठकर पूरे परिवार के लिए चूल्हे पर रोटियाँ सेंकनी पड़ी थीं, क्योंकि घर में किसी भी मर्द को एक कप चाय भी बनानी नहीं आती थी।

आयुष उनकी आँखों में झांकते हुए बोला, “दादी, स्नेहा दीदी आज उस दुनिया में कदम रखने जा रही हैं, जहाँ उन्हें खुद को साबित करना है। अगर आज वो अपने काम पर ध्यान देने की बजाय रसोई में उलझी रहतीं, तो क्या वो इतने बड़े पद तक पहुँच पातीं? और रही बात मेरे रसोई में काम करने की, तो दादी, खाना बनाना कोई औरत या मर्द का काम नहीं है, ये ज़िंदा रहने के लिए एक बुनियादी ज़रूरत है। कल को मुझे पढ़ाई के लिए या नौकरी के लिए घर से दूर जाना पड़ा, तो क्या मैं रोज़ बाहर का खाना खाकर बीमार पडूँगा?”

कावेरी देवी चुपचाप आयुष की बातें सुन रही थीं। उनका गुस्सा अब थोड़ा शांत होने लगा था, लेकिन पुरानी सोच की जड़ें इतनी आसानी से नहीं हिलतीं। उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “पर बेटा, दुनिया क्या कहेगी? लोग हँसेंगे कि शर्मा जी का पोता घर के काम करता है और पोती नौकरी।”

“दुनिया का काम है कहना, दादी,” आयुष ने मुस्कुराते हुए कहा। “सोचिए, जब कल को मेरी शादी होगी और मेरी पत्नी भी स्नेहा दीदी की तरह नौकरी करके थकी हारी घर आएगी, तो क्या मुझे उसे चाय बनाकर नहीं पिलानी चाहिए? क्या आप नहीं चाहेंगी कि आपके पोते की पत्नी को वो आराम और सम्मान मिले, जो शायद आपके ज़माने में औरतों को नहीं मिल पाया?”

यह सुनकर कावेरी देवी की आँखों में नमी आ गई। उन्हें अपना वो समय याद आ गया जब एक औरत का वजूद सिर्फ चौके-चूल्हे तक सीमित माना जाता था। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इसी चारदीवारी में निकाल दी थी, बिना किसी शिकायत के। लेकिन आज, जब उनका पोता उनके सामने एक नई दुनिया की तस्वीर रख रहा था, तो उन्हें एहसास हुआ कि शायद बदलाव इतना बुरा भी नहीं है।

तभी स्नेहा अपने फॉर्मल कपड़ों में तैयार होकर बाहर आई। उसके चेहरे पर एक आत्मविश्वास झलक रहा था। वो सीधे अपनी दादी के पास आई और उनके पैर छूकर बोली, “दादी, आशीर्वाद दीजिए। आज मेरा पहला दिन है। मैं जानती हूँ आप नाराज़ हैं कि मैंने आज घर के काम में हाथ नहीं बँटाया, लेकिन मैं वादा करती हूँ, रविवार को आपके पसंद की खीर मैं ही बनाऊँगी।”

कावेरी देवी ने अपनी कांपती हुई उंगलियों से स्नेहा के सिर पर हाथ रखा। उन्होंने अपने पास रखे छोटे से संदूक से चाँदी का एक पुराना सिक्का निकाला, जो उन्हें उनकी सास ने दिया था। उन्होंने वह सिक्का स्नेहा के हाथ में रखते हुए कहा, “ये ले बेटा, शगुन। मेरी सास ने मुझे ये तब दिया था जब मैं पहली बार इस घर की रसोई में गई थी। आज मैं तुझे ये इसलिए दे रही हूँ क्योंकि तू आज अपने पैरों पर खड़ी होने जा रही है। जा, और अपनी मंज़िल हासिल कर।”

स्नेहा और वंदना की आँखें खुशी से छलक पड़ीं। आयुष ने ताली बजाते हुए कहा, “वाह दादी! आपने तो आज सच में कमाल कर दिया। चलिए, अब सब मिलकर नाश्ता करते हैं, जो मैंने अपने हाथों से बनाया है!”

कावेरी देवी भी मुस्कुरा उठीं। उन्होंने आयुष का गाल थपथपाया और बोलीं, “हाँ हाँ, ला अपना बनाया हुआ नाश्ता। देखूँ तो सही कि मेरे पोते के हाथों में जादू है या सिर्फ बातें ही बनानी आती हैं इसे।”

पूरे घर में एक बार फिर से हँसी की लहर दौड़ गई। आज शर्मा निवास में सिर्फ सूरज की धूप ही नहीं आई थी, बल्कि रिश्तों और सोच की एक ऐसी नई धूप खिली थी, जिसने पीढ़ियों से चली आ रही पुरानी रूढ़ियों की बर्फ को पिघला दिया था। आज एक दादी ने समझ लिया था कि घर की ज़िम्मेदारियाँ और बाहर के सपने किसी जेंडर के मोहताज नहीं होते। जब परिवार के सदस्य एक-दूसरे का हाथ बँटाते हैं, तभी एक घर असली मायने में घर बनता है।

आपको क्या लगता है, क्या घर और बाहर की ज़िम्मेदारियों में लड़का-लड़की का भेद अब पूरी तरह से खत्म हो जाना चाहिए? क्या आयुष की तरह हर लड़के को अपने घर की औरतों का इसी तरह साथ देना चाहिए? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ, हम आपके विचारों को जानने के लिए उत्सुक हैं।

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मूल लेखिका : नीरजा कृष्णा

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