“अरे, वो तो मेरी जान हैं जी! आरव और पलक तो मेरी दोनों आंखें हैं,” अनुराधा ने घबराकर स्पष्ट किया। “पर एक औरत होने के नाते अपनी कोख से संतान को जन्म देने का जो सुख होता है, मेरा मन भी उस सुख को पाने के लिए तड़पता है। हमारा एक और बच्चा आ जाएगा, तो आरव और पलक को भी एक छोटा भाई या बहन मिल जाएगा।”
सिद्धार्थ ने झुंझलाते हुए करवट बदली और बोला, “फालतू की बातें दिमाग से निकाल दो। आज के महंगाई के जमाने में दो बच्चे बहुत हैं। और वैसे भी, मुझे अब इस उम्र में फिर से बच्चों के रोने-धोने का झंझट नहीं पालना है। चुपचाप सो जाओ।”
शाम की चाय के प्याले मेज पर रखे-रखे ठंडे हो चुके थे। पड़ोस में रहने वाली निर्मला बुआ, जिनके बुरे वक्त में कभी मनोहर जी ने अपने गहने गिरवी रखकर मदद की थी, आज एक एहसान चुकाने के नाम पर ऐसा प्रस्ताव लेकर आई थीं जिसने मनोहर जी और उनकी पत्नी शारदा के कलेजे को चीर कर रख दिया था।
“देखिए भाई साहब, बात कड़वी जरूर है, पर सच से मुंह तो नहीं मोड़ा जा सकता न,” निर्मला बुआ ने अपने पल्लू को संभालते हुए कहा। “अनुराधा की उम्र अब सत्ताईस पार कर चुकी है। पिछले चार सालों में न जाने कितने लड़के वाले आए और इसकी सांवले रंगत को देखकर चाय की प्याली खत्म करने से पहले ही ना कर गए। अब जो रिश्ता मैं लाई हूं, वो लोग शहर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी हैं। घर-बार, गाड़ी-बंगला, किसी चीज की कमी नहीं है। बस बात इतनी सी है कि लड़के की पहली पत्नी दो साल पहले बीमारी में चल बसी। दो छोटे बच्चे हैं—एक छह साल की बेटी है पलक, और दस साल का बेटा है आरव। बच्चों को एक मां मिल जाएगी और आपकी अनुराधा को एक भरा-पूरा और अमीर घर। आप लोग एक बार सोच लीजिए, फिर जैसा ठीक लगे।”
निर्मला बुआ तो अपनी बात कहकर चली गईं, लेकिन मनोहर जी के सिर पर जैसे आसमान टूट पड़ा। वे अपनी कुर्सी पर निढाल होकर बैठ गए और छत की ओर देखते हुए भारी आवाज में बोले, “शारदा, काश! हमने समाज के डर से अनुराधा की पढ़ाई न रुकवाई होती। वह तो बी.एड. करके शिक्षिका बनना चाहती थी। अगर आज वह अपने पैरों पर खड़ी होती, तो हमें उसके सांवले रंग के कारण ऐसे समझौते के लिए मजबूर न होना पड़ता।”
अंदर कमरे के दरवाजे के पीछे खड़ी अनुराधा अपने माता-पिता की बेबसी को चुपचाप सुन रही थी। उसने देखा था कि कैसे हर बार लड़के वालों के नकारे जाने के बाद उसके पिता की कमर और झुक जाती थी, और मां रात-रात भर सिसकियां भरती थीं। अनुराधा ने अपने आंसू पोंछे और बाहर आकर अपने पिता के घुटनों के पास बैठ गई। “बाबूजी, आप चिंता मत कीजिए। मैं इस शादी के लिए तैयार हूं। जहां दो मासूम बच्चों को मां की जरूरत हो, वहां जाने में कैसी झिझक? मैं उन बच्चों को अपनी ममता दूंगी, तो भगवान भी मेरे साथ कभी बुरा नहीं करेंगे।”
अनुराधा के इस त्याग और समझदारी के आगे माता-पिता निशब्द हो गए। कुछ ही दिनों में शहनाइयां गूंजीं और अनुराधा लाल जोड़ा पहनकर सिद्धार्थ के आलीशान घर की बहू बनकर आ गई। घर वाकई बहुत बड़ा था, लेकिन उसमें अपनत्व की ठंडक गायब थी।
सुहागरात की सेज के बजाय अनुराधा को एक बड़े से कमरे में बैठाया गया था। अभी वह अपने भारी गहनों को उतारने की सोच ही रही थी कि दरवाजे की ओट से चार छोटी-छोटी आंखें उसे झांकती हुई दिखीं। अनुराधा के चेहरे पर एक कोमल मुस्कान तैर गई। उसने बहुत ही प्यार से अपने हाथ फैलाए और कहा, “अरे, बाहर क्यों खड़े हो? अंदर आओ न मेरे पास।”
छोटी सी पलक धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई उसके पास आई और उसके लहंगे के सुनहरे गोटे को छूते हुए बोली, “भैया कह रहे थे कि आज से आप हमारी नई मम्मी हैं। क्या आप सच में हमारी मम्मी हैं? क्या आप हमें डांटेंगी तो नहीं?”
अनुराधा का दिल उस मासूमियत पर पिघल गया। उसने पलक को अपनी गोद में बिठा लिया और दरवाजे पर सहमे खड़े आरव की तरफ देखकर बोली, “आरव बेटा, आप वहां क्यों खड़े हो? आओ, अपनी मां के पास नहीं आओगे?”
आरव झिझकते हुए आया और बिस्तर के किनारे बैठ गया। अनुराधा ने दोनों बच्चों को अपनी बांहों में भर लिया और उनके माथे को चूमते हुए कहा, “देखो बच्चों, मां कभी नई या पुरानी नहीं होती। मां तो बस मां होती है। आज से मैं तुम्हारी दोस्त भी हूं और मां भी। मैं तुम्हें कभी नहीं डांटूंगी, बस खूब सारा प्यार करूंगी।” मां के आंचल की वह जानी-पहचानी सी गर्माहट पाकर दोनों बच्चे उससे लिपट गए।
उधर कमरे के बाहर हॉल में बैठी सिद्धार्थ की मां कमला देवी और उसकी शादीशुदा बहन मानसी इस दृश्य को खिड़की से देख रही थीं। कमला देवी ने एक गहरी सांस लेते हुए सिद्धार्थ से कहा, “चलो सिद्धू, हमारे सिर से तो बहुत बड़ा बोझ उतरा। जब से तेरी पहली बहू गई थी, इन दोनों बच्चों को संभालते-संभालते मेरी तो हड्डियां ही जवाब दे गई थीं। और यह लड़की तो बड़ी सीधी और समझदार निकली, आते ही बच्चों को पल्लू से बांध लिया।”
मानसी ने अपने नाखूनों को देखते हुए मुंह बनाया, “हां मां, भाभी का रंग-रूप भले ही हमारे खानदान के हिसाब से फीका हो, पर काम की पूरी हैं। अब कम से कम तुम चैन से अपने सत्संग और तीर्थ यात्राओं पर जा सकोगी, और भैया भी अपने शोरूम के काम पर पूरा ध्यान दे पाएंगे।”
सिद्धार्थ ने भी एक संतुष्टि भरी मुस्कान के साथ हामी भरी, “हां मां, मुझे भी यही चिंता खाए जा रही थी कि बच्चों की परवरिश कैसे होगी। चलो, अब सब ठीक हो जाएगा।”
तभी मानसी ने अपनी आवाज धीमी करते हुए एक जहरीला पासा फेंका, “पर भैया, एक बात का ध्यान रखना। अभी तो यह नई-नई आई है, तो बड़ी ममता दिखा रही है। आखिर है तो सौतेली ही न! कल को जब इसकी खुद की कोख भरेगी और इसका अपना बच्चा आ जाएगा, तब यह आरव और पलक को दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देगी। तब कौन गारंटी लेगा इन बच्चों के भविष्य की?”
कमला देवी की आंखों में अचानक डर और स्वार्थ की चमक आ गई। उन्होंने सिद्धार्थ का हाथ पकड़ते हुए कहा, “मानसी बिल्कुल सोलह आने सच कह रही है सिद्धू। सगी औलाद के आते ही औरत की ममता बंट जाती है। हमें तो बस आरव और पलक के लिए एक मां और घर संभालने वाली नौकरानी जैसी बहू चाहिए थी। तू एक काम करना, थोड़ा वक्त बीतने दे, फिर किसी बहाने से इसका ऑपरेशन करवा देना। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी! जब इसकी अपनी कोई औलाद ही नहीं होगी, तो मजबूरी में सारा प्यार और सारी उम्र इन्हीं दोनों बच्चों पर लुटाएगी।”
मां और बहन की यह खौफनाक साजिश सुनकर सिद्धार्थ एक पल के लिए तो चौंक गया, लेकिन अगले ही पल अपने बच्चों के भविष्य के प्रति अंधे मोह और स्वार्थ ने उसके जमीर को सुला दिया। उसने बिना कुछ कहे चुपचाप वहां से उठकर इस साजिश को अपनी मौन स्वीकृति दे दी।
इस बात से पूरी तरह अनजान अनुराधा ने खुद को उस घर और उन बच्चों की सेवा में पूरी तरह समर्पित कर दिया। सुबह पांच बजे उठने से लेकर रात के ग्यारह बजे तक वह एक मशीन की तरह काम करती। आरव के स्कूल का टिफिन, पलक की चोटी गूंथना, उनका होमवर्क करवाना, सास के घुटनों की मालिश और सिद्धार्थ की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखना—यही उसकी दुनिया बन गई थी। कोई बाहर वाला देखकर यह कह ही नहीं सकता था कि उसने इन बच्चों को अपनी कोख से जन्म नहीं दिया है। बच्चों को जरा सा बुखार भी आता, तो अनुराधा रात-रात भर जागकर उनके माथे पर ठंडी पट्टियां रखती।
उधर घर की सारी जिम्मेदारियां अनुराधा के कंधों पर डालकर कमला देवी निश्चिंत होकर महीनों के लिए हरिद्वार और मथुरा की यात्राओं पर निकलने लगीं। मानसी जब भी मायके आती, अनुराधा से अपनी और अपने बच्चों की फरमाइशें पूरी करवाती। सिद्धार्थ भी अपने व्यापार को बढ़ाने में इतना मशगूल हो गया कि उसे यह याद ही नहीं रहा कि अनुराधा उसकी पत्नी भी है, जिसकी कुछ भावनाएं और अरमान हो सकते हैं।
कभी-कभी जब शाम को अनुराधा छत पर खड़े होकर पड़ोस के जोड़ों को साथ में मुस्कुराते और बाहर घूमने जाते देखती, तो उसके मन में भी एक कसक सी उठती। उसका भी मन करता कि सिद्धार्थ कभी उसके लिए गजरा लाए, कभी उसे किसी बहाने से छू ले, या कभी दोनों बच्चों के साथ उसे किसी बगीचे या सिनेमा हॉल में ही घुमाने ले जाए। लेकिन सिद्धार्थ के पास उसके लिए सिर्फ काम की बातें और बच्चों से जुड़े निर्देश ही होते थे। अनुराधा अपने मन को यह कहकर समझा लेती कि शायद अमीर लोगों के प्यार जताने का तरीका अलग होता होगा।
वक्त पंख लगाकर उड़ता गया और देखते ही देखते पांच साल बीत गए। आरव अब पंद्रह साल का होकर समझदार हो चुका था और पलक भी ग्यारह साल की हो गई थी। दोनों बच्चे अनुराधा के बिना एक निवाला तक नहीं खाते थे। उनके लिए अनुराधा ही उनकी दुनिया थी, उनकी भगवान थी।
एक रात जब घर के सभी लोग सो गए और सिद्धार्थ कमरे में अपनी फाइलें समेट रहा था, तो अनुराधा दूध का गिलास लेकर उसके पास आई। आज उसके चेहरे पर एक अजीब सी झिझक और शर्म की लाली थी। उसने धीरे से सिद्धार्थ के पास बैठकर कहा, “सुनिए जी… आज आपसे एक बात कहनी थी।”
सिद्धार्थ ने बिना फाइल से नजरें हटाए बेरुखी से पूछा, “हां बोलो, आरव की स्कूल फीस देनी है या घर के राशन के लिए पैसे चाहिए?”
“नहीं जी, पैसे नहीं चाहिए,” अनुराधा ने अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में लपेटते हुए धीमी आवाज में कहा। “वो… अब आरव और पलक दोनों बड़े हो गए हैं, अपना ख्याल खुद रखने लगे हैं। मैं सोच रही थी कि… अब मैं भी मां बनना चाहती हूं। मेरी भी इच्छा है कि मैं अपने आंचल में एक नन्हे से शिशु को खिलाऊं, मातृत्व के उस अहसास को जीऊं।”
यह सुनते ही सिद्धार्थ के हाथ रुक गए। उसने फाइल बंद की और तीखी नजरों से अनुराधा को घूरते हुए बोला, “यह तुम कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही हो अनुराधा? मां बनना चाहती हूं का क्या मतलब है? घर में दो-दो बच्चे तो हैं, क्या तुम उनकी मां नहीं हो?”
“अरे, वो तो मेरी जान हैं जी! आरव और पलक तो मेरी दोनों आंखें हैं,” अनुराधा ने घबराकर स्पष्ट किया। “पर एक औरत होने के नाते अपनी कोख से संतान को जन्म देने का जो सुख होता है, मेरा मन भी उस सुख को पाने के लिए तड़पता है। हमारा एक और बच्चा आ जाएगा, तो आरव और पलक को भी एक छोटा भाई या बहन मिल जाएगा।”
सिद्धार्थ ने झुंझलाते हुए करवट बदली और बोला, “फालतू की बातें दिमाग से निकाल दो। आज के महंगाई के जमाने में दो बच्चे बहुत हैं। और वैसे भी, मुझे अब इस उम्र में फिर से बच्चों के रोने-धोने का झंझट नहीं पालना है। चुपचाप सो जाओ।”
सिद्धार्थ तो यह कहकर सो गया, लेकिन उसके चेहरे पर एक कुटिल और निश्चिंत मुस्कान थी। उसे याद आया कि कैसे दो साल पहले जब अनुराधा के पेट में मामूली सी पथरी का दर्द उठा था, तब उसने अपनी मां और बहन के कहने पर अपने एक परिचित डॉक्टर को मोटी रकम देकर पथरी के ऑपरेशन के बहाने अनुराधा की बच्चेदानी ही निकलवा दी थी। तब अनुराधा को बस यही बताया गया था कि पेट में गंभीर इंफेक्शन था, जिसे साफ कर दिया गया है।
सिद्धार्थ के रूखे व्यवहार से अनुराधा का दिल तो टूटा, पर उसने उम्मीद नहीं छोड़ी। पिछले कुछ महीनों से उसे अपने शरीर में कुछ कमजोरी और अनियमितता महसूस हो रही थी। उसने सोचा कि शायद किसी शारीरिक कमी की वजह से वह गर्भधारण नहीं कर पा रही है, क्यों न एक बार किसी अच्छी महिला डॉक्टर से सलाह ली जाए।
अगले दिन दोपहर में जब बच्चे स्कूल गए थे और सास पड़ोस में कीर्तन में गई थीं, अनुराधा अपनी पुरानी मेडिकल फाइल लेकर शहर की एक प्रतिष्ठित स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मीरा के क्लिनिक पहुंची। डॉक्टर मीरा ने जब अनुराधा की जांच की और उसका अल्ट्रासाउंड करवाया, तो उनके माथे पर बल पड़ गए। उन्होंने अनुराधा की दो साल पुरानी सर्जरी की फाइल मांगी और उसे ध्यान से पढ़ने लगीं।
“अनुराधा जी, आप मुझसे मजाक कर रही हैं क्या?” डॉक्टर मीरा ने चश्मा उतारते हुए गंभीर स्वर में पूछा। “आप गर्भधारण की दवा लेने आई हैं, जबकि दो साल पहले हुए ऑपरेशन में आपका गर्भाशय यानी बच्चेदानी पूरी तरह से निकाली जा चुकी है। और इस फाइल में तो आपके पति के हस्ताक्षर भी हैं कि वे इस सर्जरी के लिए सहमत हैं। क्या आपको यह बात पता नहीं थी?”
डॉक्टर के शब्द अनुराधा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। कमरा गोल-गोल घूमने लगा। “नहीं डॉक्टर साहिबा… यह झूठ है! तब तो मुझे सिर्फ पथरी का दर्द हुआ था… उन्होंने कहा था मामूली सा ऑपरेशन है…” अनुराधा की आवाज कांप रही थी और आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा था।
डॉक्टर मीरा ने पूरी बात समझते हुए गहरी संवेदना से अनुराधा के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “मुझे बहुत दुख है अनुराधा जी, लेकिन सच यही है कि आपके साथ बहुत बड़ा विश्वासघात हुआ है। आप अब कभी अपनी कोख से मां नहीं बन सकतीं।”
अनुराधा कैसे क्लिनिक से बाहर निकली और कैसे घर पहुंची, उसे कुछ होश नहीं था। उसके सीने में एक ज्वालामुखी दहक रहा था। वह औरत, जिसने इस घर को स्वर्ग बनाने के लिए अपनी जवानी, अपने सपने, अपना स्वाभिमान सब कुछ होम कर दिया, उसके साथ इतना घिनौना खेल खेला गया!
शाम को जब सिद्धार्थ शोरूम से लौटा और कमला देवी व मानसी हॉल में बैठकर चाय पी रहे थे, तभी अनुराधा किसी घायल शेरनी की तरह वहां आई और डॉक्टर की रिपोर्ट सिद्धार्थ के मुंह पर दे मारी। कागज के पन्ने फड़फड़ाते हुए फर्श पर बिखर गए।
“यह क्या बदतमीजी है अनुराधा? दिमाग खराब हो गया है क्या तुम्हारा?” सिद्धार्थ चिल्लाया।
“दिमाग मेरा नहीं, इंसानियत आप लोगों की मर चुकी है!” अनुराधा की आवाज आज इतनी बुलंद थी कि पूरे घर की दीवारें कांप उठीं। ठीक उसी वक्त स्कूल से लौटे आरव और पलक भी दरवाजे पर ठिठक कर खड़े हो गए और अपनी मां का यह रूप देखकर सहम गए।
अनुराधा ने सिद्धार्थ की कॉलर पकड़ने के अंदाज में उसके करीब जाकर कहा, “आपने मेरे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया? पथरी के दर्द की आड़ में आपने मेरी कोख ही उजाड़ दी? मेरी बच्चेदानी निकलवा दी ताकि मैं कभी अपने बच्चे की मां न बन सकूं? किस हक से आपने मेरे शरीर और मेरी आत्मा के साथ यह खिलवाड़ किया?”
पोल खुलते देख कमला देवी और मानसी के चेहरे का रंग उड़ गया, लेकिन सिद्धार्थ ने अपनी गलती मानने के बजाय बेशर्मी की चादर ओढ़ ली। उसने अनुराधा का हाथ झटकते हुए अकड़ कर कहा, “हां, मैंने करवाया ऑपरेशन! तो क्या गलत किया? मैं तुम्हें इस घर में अपने बच्चों की मां बनाकर लाया था। अगर तुम्हारे अपने बच्चे हो जाते, तो तुम मेरे आरव और पलक के साथ सौतेला व्यवहार करतीं। मुझे अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना था, इसलिए मैंने यह कदम उठाया। इसमें मतलब की क्या बात है? तुम्हें इतने बड़े घर की मालकिन बनाया, समाज में इज्जत दी, क्या यह कम है?”
“मालकिन नहीं, आपने मुझे बिना पगार की एक आया और अपने बिस्तर की जरूरत पूरा करने वाली एक कठपुतली बनाकर लाया था!” अनुराधा दहाड़ उठी। “आपने दिल का रिश्ता नहीं, सिर्फ अपने मतलब का सौदा किया था मेरे बाबूजी की गरीबी और मेरे सांवले रंग के साथ! अगर आपको मेरी ममता पर भरोसा नहीं था, तो मुझसे शादी करने का नाटक क्यों किया? रख लेते कोई नौकरानी! कम से कम किसी औरत से उसके मां बनने का भगवान का दिया हुआ हक तो न छिनता!”
कमला देवी ने बीच में टोकते हुए तंज कसा, “बस कर बहू! ज्यादा नाटक मत कर। अगर इतना ही दुख हो रहा है और इस घर में घुटन हो रही है, तो दरवाजे खुले हैं। जा सकती है अपने गरीब बाप के घर!”
अनुराधा ने अपने बहते आंसुओं को अपनी हथेली से सख्ती से पोंछा। उसके चेहरे पर अब बेबसी नहीं, बल्कि एक चट्टानी इरादा था। उसने कमला देवी की आंखों में आंखें डालकर कहा, “नहीं मां जी! मैं यह घर छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। अगर आज मैं चली गई, तो आप लोग फिर किसी मजबूर बाप की बेटी को खरीद कर लाएंगे और उसकी जिंदगी भी इसी तरह तबाह कर देंगे। लेकिन कान खोलकर सुन लीजिए, आज और इसी वक्त से मेरा आप तीनों के साथ हर रिश्ता खत्म होता है!”
उसने अपने गले से मंगलसूत्र उतारा और मेज पर रखते हुए सिद्धार्थ से कहा, “जो रिश्ता विश्वास और सम्मान की नींव पर न टिका हो, उस रिश्ते के इस प्रतीक को ढोने का अब कोई अर्थ नहीं है। आज से मैं आपकी पत्नी नहीं हूं, और न ही इस घर की बहू हूं।”
तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी। दरवाजे पर खड़े पंद्रह साल के आरव और ग्यारह साल की पलक दौड़ते हुए आए और अनुराधा के दोनों हाथों को कसकर पकड़ लिया। आरव की आंखों में आंसू थे और अपने पिता के प्रति गहरा आक्रोश था।
“पापा, आज मुझे खुद को आपका बेटा कहने में शर्म आ रही है!” आरव ने कांपती लेकिन दृढ़ आवाज में कहा। “जब मैं दस साल का था और अपनी सगी मां को खोकर रातों को डर कर रोता था, तब आप अपने बिजनेस टूर पर होते थे और दादी अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लेती थीं। तब इसी मां ने मुझे अपने सीने से लगाकर सुलाया था। इन्होंने हमें कभी अहसास ही नहीं होने दिया कि हम इनकी कोख से पैदा नहीं हुए हैं। और आपने… आपने हमारे नाम पर इनके साथ इतना बड़ा पाप किया? पापा, अगर इनके अपने दस बच्चे भी हो जाते न, तब भी इनकी ममता हमारे लिए एक रत्ती कम नहीं होती, क्योंकि ये आपकी तरह स्वार्थी नहीं हैं!”
छोटी पलक भी अनुराधा के कमर से लिपट कर रोते हुए बोली, “दादी, पापा गंदे हैं! हमारी मम्मी सबसे अच्छी हैं। हम अपनी मम्मी को कहीं नहीं जाने देंगे।”
बच्चों के मुंह से यह सच सुनकर सिद्धार्थ, कमला देवी और मानसी के सिर शर्म से झुक गए। जिस औलाद के भविष्य की आड़ लेकर उन्होंने इतना बड़ा गुनाह किया था, आज वही औलाद उन्हें कटघरे में खड़ा कर रही थी।
अनुराधा ने गर्व से अपने दोनों बच्चों के सिर पर हाथ फेरा। फिर उसने सिद्धार्थ की ओर देखकर शांत किंतु दृढ़ स्वर में अपना अंतिम फैसला सुनाया, “सिद्धार्थ जी, आपने मेरी कोख छीनी है, मेरा हौसला और मेरी ममता नहीं। मैं इसी शहर में रहूंगी, लेकिन आपकी दया पर नहीं। मेरी शादी से पहले बाबूजी ने मेरे नाम जो थोड़ी सी जमा-पूंजी की थी, उससे और अपनी पढ़ाई के दम पर मैं अपनी पहचान खुद बनाऊंगी।”
अनुराधा ने उस घर के एक अलग हिस्से में बच्चों के साथ रहना शुरू किया। उसने अपने अधूरे छूटे बी.एड. के कोर्स को पत्राचार से पूरा किया और देखते ही देखते एक प्रतिष्ठित स्कूल में शिक्षिका की नौकरी पा ली। उसने सिद्धार्थ से एक रुपया भी लेना बंद कर दिया। इतना ही नहीं, उसने अपनी तनख्वाह और कुछ सामाजिक संस्थाओं की मदद से अपने ही घर के नीचे के खाली पड़े हॉल में ‘आंचल’ नाम से एक अनाथालय और डे-केयर सेंटर की शुरुआत की।
वक्त बदल चुका था। जिस अनुराधा की कोख को उसके पति ने सूना कर दिया था, आज उसी अनुराधा के ‘आंचल’ में शहर के दर्जनों अनाथ और बेसहारा बच्चे पल रहे थे, जो उसे ‘मां’ कहकर पुकारते थे। आरव और पलक भी अपनी मां के इस नेक काम में कंधे से कंधा मिलाकर साथ देते थे।
उधर सिद्धार्थ और उसकी मां अब उसी बड़े घर में बिल्कुल अकेले पड़ गए थे। बच्चे अपने पिता से सिर्फ जरूरत भर की बात करते थे। सिद्धार्थ जब भी अनुराधा को आत्मनिर्भर, सम्मानित और दर्जनों बच्चों की ममतामयी मां के रूप में मुस्कुराते हुए देखता, तो उसे अपने किए पर गहरा पछतावा होता। उसे समझ आ चुका था कि उसने एक हीरे जैसी पत्नी को खो दिया था, लेकिन अब माफी मांगने का वक्त बहुत पीछे छूट चुका था। अनुराधा ने अपने आंसुओं को अपनी ताकत बनाकर यह साबित कर दिया था कि एक औरत का अस्तित्व और उसका मातृत्व किसी पुरुष के धोखे का मोहताज नहीं होता।
दोस्तों, क्या अनुराधा ने अपने पति को न छोड़ते हुए भी उससे सारे रिश्ते तोड़कर और आत्मनिर्भर बनकर सही फैसला लिया? अगर आप अनुराधा की जगह होते, तो ऐसे धोखेबाज परिवार के साथ क्या करते? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, आपके विचारों का हमें इंतजार रहेगा!
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