तान्या ने माँ के आंसू पोंछते हुए कहा, “माँ, आप गलत नहीं थीं। आपका डर अपनी जगह सही था क्योंकि आप दुनिया की नजरों से मुझे बचाना चाहती थीं। लेकिन पापा और भैया ने जो मुझे उड़ने का हौसला दिया, उसने मुझे कभी कमजोर नहीं बनाया। जब अपनों पर आंच आती है न माँ, तो एक बेटी को सब कुछ खुद-ब-खुद आ जाता है। चूल्हा-चौका सीखना कोई मुश्किल काम नहीं है माँ, वो तो जरूरत पड़ने पर कोई भी सीख सकता है। असली हुनर तो यह है कि इंसान विपरीत परिस्थितियों में घबराए बिना अपनों का सहारा कैसे बने।”
रविवार की सुहानी सुबह थी। खिड़कियों से छनकर आती गुनगुनी धूप पूरे कमरे को सुनहरी आभा से भर रही थी। घड़ी की सुइयों ने जैसे ही सुबह के सवा आठ बजाए, पूरे घर में एक जानी-पहचानी गूंज सुनाई देने लगी।
“माँ! अरे ओ मेरी सुपरमॉम! कहाँ गायब हो गईं आप? सुनिए तो!”
सत्रह साल की तान्या अपने कमरे से बाहर निकली। बिखरे हुए घुंघराले बाल, पाजामे में उलझे पैर और चेहरे पर दुनिया भर की हड़बड़ाहट। उसने अपने दोनों हाथ कमर पर टिकाए और बैठक के सोफे के इर्द-गिर्द चारों तरफ नजरें दौड़ाईं। तकिए उलट-पुलट दिए, मेज के नीचे झाँका और फिर माथे पर हाथ मारते हुए खुद से ही बुदबुदाने लगी।
“हे भगवान! आज तो मेरी जिंदगी का सबसे अहम शो छूट जाएगा। नेशनल वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी का वो स्पेशल एपिसोड शुरू होने वाला है और यह रिमोट हमेशा की तरह गायब है! माँ, कहाँ रख दिया आपने?”
“तेरी आंखें हैं या बटन? जो चीज सामने रखी है, वो कभी नहीं दिखती।”
किचन के दरवाजे से हाथ में चाय की छन्नी लिए सरिता जी मुस्कुराते हुए बाहर निकलीं। उन्होंने साइड टेबल पर रखी किताबों के नीचे से रिमोट निकालकर तान्या की तरफ बढ़ाया।
तान्या की बांछें खिल गईं। उसने लपक कर माँ के गले में बाहें डाल दीं और रिमोट छीनते हुए सोफे पर छलांग लगा दी। “थैंक यू, थैंक यू, थैंक यू माँ! आप दुनिया की सबसे बेहतरीन माँ हो। अगर आप ठीक वक्त पर यह रिमोट नहीं ढूंढतीं, तो आज अफ्रीकी जंगलों वाली वो डाक्यूमेंट्री निकल जाती। मुझे उन घने जंगलों, बहती नदियों और आजाद परिंदों को अपने कैमरे में कैद करने का कितना शौक है, आपको तो पता ही है।”
सरिता जी ने एक गहरी सांस छोड़ी और कमर पर हाथ रखकर अपनी बेटी को घूरने लगीं। चेहरे पर ममता तो थी, लेकिन साथ ही एक पारंपरिक माँ की स्वाभाविक चिंता भी साफ झलक रही थी।
“तान्या, मुझे एक बात बता, इन जंगलों, कैमरों और टीवी के अलावा भी दुनिया में कोई काम बचा है या नहीं? सत्रह की हो चुकी है तू, अगले साल कॉलेज जाएगी। कभी किचन का रुख किया है? कभी देखा है कि चाय की पत्ती कहाँ रखी है और चीनी का डिब्बा कौन सा है? कल को जब अपनी गृहस्थी में जाएगी, तो क्या वहाँ सबको यही वाइल्डलाइफ की तस्वीरें दिखाएगी? ससुराल में ये रिमोट और कैमरे काम नहीं आते लाली, वहाँ हाथ का हुनर और सलीका काम आता है।”
तान्या ने टीवी की आवाज थोड़ी धीमी की और मासूमियत से पलकें झपकाते हुए बोली, “अरे मेरी प्यारी मम्मिया, आप बेकार में इतना टेंशन क्यों लेती हो? और फिर अगर मैंने किचन में जाकर हाथ जला लिया या कोई बर्तन गिरा दिया, तो पापा और भैया आपको क्या कहेंगे, याद है न?”
सरिता जी ने हाथ जोड़कर आसमान की तरफ देखा, “हाँ-हाँ, मुझे सब अच्छे से याद है। मुझे रटा हुआ है उनका डायलॉग! तेरे पापा कहेंगे कि मेरी फूल जैसी बच्ची को क्यों चूल्हे के आगे झोंक दिया, क्या घर में काम करने वाले कम हैं? और तेरा बड़ा भाई कहेगा कि माँ, तान्या अभी छोटी है, उसे अपनी पढ़ाई और शौक पूरे करने दो। सच कहूँ तो इन बाप-बेटों ने ही मिलकर तेरा दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ा रखा है। उन्हें लगता है कि उनकी गुड़िया हमेशा इसी घर में खेलती रहेगी। जब डोली उठेगी और पराए घर जाएगी, तब देखना ये दोनों साथ नहीं जाएंगे। वहाँ तो चार बातें मुझे ही सुनने को मिलेंगी कि माँ ने बेटी को कुछ सिखाया ही नहीं!”
अभी सरिता जी की बात खत्म ही हुई थी कि मुख्य दरवाजे से मॉर्निंग वॉक से लौटे हरीश जी दाखिल हुए। हाथ में ताजे अखबार का बंडल था और चेहरे पर सुबह की ताजगी। पत्नी की तीखी आवाज सुनकर उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई।
“लो, शुरू हो गई अदालत! क्या बात है सरिता जी, सुबह-सुबह मेरी बिटिया रानी के पीछे क्यों हाथ धोकर पड़ गई हो? जब देखो तब ससुराल, शादी और चूल्हा-चौका। अरे भाई, अभी तो वह अपने सपनों की दहलीज पर खड़ी है। बिना उसे डांटे तुम्हारी सुबह की शुरुआत नहीं होती क्या? जरा डांट-फटकार रोककर हमें भी एक कप बढ़िया अदरक वाली चाय पिला दो।” हरीश जी ने सोफे पर बैठते हुए तान्या के सिर पर लाड़ से हाथ फेरा।
तान्या ने तुरंत पिता के कंधे पर सिर टिका दिया और चिढ़ाने वाले अंदाज में माँ को जीभ दिखाई।
सरिता जी ने चाय का कप मेज पर रखते हुए झुंझलाकर कहा, “हाँ, आप दोनों बाप-बेटी बस एक दूसरे की तरफदारी करते रहो। जितना बिगाड़ना है, बिगाड़ लो इसे। सिर पर चढ़ा रखा है पूरे घर ने। जब वक्त आएगा और चार लोग नुक्ताचीनी करेंगे, तब मैं देखूंगी कि यह लाड़-प्यार कैसे काम आता है। उस दिन रोते हुए मेरे पास मत आना।”
उसी पल तान्या के फोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर ‘भैया’ का नाम चमकते ही तान्या का चेहरा खिल उठा। उसका बड़ा भाई रोहन, जो भोपाल में एक आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, वीडियो कॉल कर रहा था।
तान्या ने तुरंत फोन उठाया और चिल्लाई, “भैया! ओ मेरे प्यारे भैया! जल्दी से मुझे इस घर से बचा लो। माँ ने सुबह-सुबह फिर से अपना वही पुराना रेडियो बजाना शुरू कर दिया है—ससुराल में क्या करोगी, खाना बनाना कब सीखोगी! आप जब अगली बार घर आओगे न, तो मेरे लिए एक ऐसा रोबोट खरीदकर लाना जो सारे घर की झाड़ू-पोछा और रोटियां बना सके, ताकि मैं आराम से अपने वाइल्डलाइफ के फोटो खींच सकूं!”
स्क्रीन के उस पार से रोहन ठहाका मारकर हंस पड़ा। “अरे मेरी छोटी बहन, तू माँ की बातों को दिल पर मत ले। और माँ, आप भी ना, हर वक्त उसे डराती रहती हो। जमाना बदल गया है। हमारी तान्या कोई आम लड़की थोड़ी है, वो तो देश की सबसे बड़ी वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर बनेगी।”
“हाँ-हाँ, तू भी दूर बैठकर हवा भर ले इसमें,” सरिता जी ने बड़बड़ाते हुए किचन का रुख किया, पर उनके चेहरे पर बच्चों की हंसी देखकर एक सुकून भी तैर गया था।
दिन बीतते गए, लेकिन घर का यह रोजमर्रा का नाटक अपनी रफ्तार से चलता रहा। तान्या बारहवीं की पढ़ाई के साथ-साथ अपने कैमरे से घर, बगीचे और आस-पास के परिंदों की अनगिनत तस्वीरें खींचती रहती। हरीश जी और रोहन हमेशा उसकी पीठ थपथपाते, जबकि सरिता जी की नजरें हमेशा इस बात पर टिकी रहतीं कि उनकी बेटी कब थोड़ा सा सलीका सीखेगी। सरिता जी का डर गलत नहीं था; वह उस पीढ़ी से थीं जहाँ एक औरत की योग्यता उसके पाक-कला और गृहस्थी संभालने के हुनर से आंकी जाती थी। वह चाहती थीं कि उनकी बेटी किसी भी मोड़ पर कमजोर न पड़े, कोई उस पर उंगली न उठाए।
कुछ महीनों बाद एक दिन ऐसा आया जिसने घर के माहौल को पूरी तरह बदल दिया।
रोहन का एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट खत्म हुआ था और वह पंद्रह दिनों की छुट्टी लेकर घर आया हुआ था। पूरा परिवार बेहद खुश था। लेकिन उसी हफ्ते शहर में अचानक मौसम ने करवट ली। मूसलाधार बारिश शुरू हो गई और तीन दिनों तक लगातार पानी बरसता रहा। हरीश जी को अचानक तेज बुखार और सीने में जकड़न महसूस होने लगी।
डॉक्टर को घर बुलाया गया। जांच के बाद डॉक्टर ने बताया कि उन्हें गंभीर वायरल ब्रोंकाइटिस है और साथ ही ब्लड प्रेशर भी काफी बढ़ गया है। उन्हें पूरी तरह से बेड रेस्ट की सख्त हिदायत दी गई। डॉक्टर ने कहा कि किसी भी तरह का तनाव और ठंडा खाना उनके लिए खतरनाक हो सकता है। उन्हें समय पर दवाइयां और बेहद हल्का, पौष्टिक व उबला हुआ खाना मिलना जरूरी था।
मुसीबतें कभी अकेले नहीं आतीं। हरीश जी की तीमारदारी में दो दिन लगातार जागने की वजह से सरिता जी की तबीयत भी अचानक बिगड़ गई। उन्हें पुराना आर्थराइटिस था, जो बारिश की नमी और थकान के कारण बुरी तरह उभर आया। उनके घुटनों और कलाइयों में इतना तेज दर्द था कि उनका बिस्तर से उठना भी दूभर हो गया। घर की पूरी धुरी, जो माँ के इर्द-गिर्द घूमती थी, अचानक चरमरा गई।
रोहन ऑफिस के कुछ इमरजेंसी कॉल्स और बाहर से दवाइयां लाने में उलझा हुआ था। घर का काम करने वाली बाई भी भारी जलभराव के कारण दो दिनों से नहीं आ पा रही थी।
दोपहर का वक्त था। घर में अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। हरीश जी कमरे में खांस रहे थे और सरिता जी दूसरे कमरे में दर्द से कराह रही थीं।
सरिता जी की आंखों से लाचारी के आंसू छलक पड़े। उन्होंने मन ही मन सोचा, “हे भगवान, यह क्या हो गया? दोनों बीमार पड़े हैं, बेटा बाहर दौड़-धूप कर रहा है और तान्या… मेरी बच्ची तो चाय बनाना भी नहीं जानती। आज सब भूखे रहेंगे।”
तभी अचानक रसोई से बर्तनों की धीमी-धीमी आवाजें आने लगीं।
सरिता जी ने चौंक कर करवट बदलने की कोशिश की, लेकिन दर्द के मारे आह निकल गई। उन्हें लगा कि शायद रोहन कुछ करने की कोशिश कर रहा है और कहीं कोई नुकसान न कर बैठे। उन्होंने आवाज दी, “रोहन बेटा… मत कर, बाहर से कुछ मंगवा ले…”
लेकिन कमरे के दरवाजे पर रोहन नहीं, बल्कि तान्या आकर खड़ी हुई। उसके एक हाथ में डिजिटल थर्मामीटर था और दूसरे हाथ में गर्म पानी की थैली।
“माँ, शांत रहिए और बिल्कुल हिलिए मत,” तान्या की आवाज में वह चंचलता नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा ठहराव और परिपक्वता थी। उसने बहुत नजाकत से माँ के घुटनों पर गर्म पानी की सिकाई शुरू की, उन्हें समय पर दवा दी और उनके माथे पर प्यार से हाथ फेरा।
“तान्या… तू? बेटा, पापा को दवा दी?” सरिता जी ने धीमी आवाज में पूछा।
“हाँ माँ, पापा का बीपी चेक कर लिया है, दवा दे दी है और उनके सिर पर ठंडे पानी की पट्टी भी रख दी है। अब उनका बुखार 101 से उतरकर 99 पर आ गया है। आप बिल्कुल फिक्र मत कीजिए।” तान्या ने मुस्कुराते हुए कहा और वापस तेजी से रसोई की तरफ बढ़ गई।
सरिता जी स्तब्ध थीं।
अगले दो घंटों में जो हुआ, वह पूरे परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। तान्या ने मोबाइल पर रेसिपी देखकर नहीं, बल्कि अपनी सूझबूझ और पिछले कुछ दिनों में माँ को काम करते हुए देखने की यादों के सहारे काम शुरू किया। उसने बिना किसी हड़बड़ाहट के पापा के लिए लौकी और मूंग की दाल की पतली, स्वादिष्ट खिचड़ी तैयार की, जिसमें हींग और जीरे का हल्का सा छौंक लगा था। माँ के लिए उसने अदरक, तुलसी और काली मिर्च का विशेष काढ़ा बनाया और साथ में दलिया पकाया।
जब तान्या लकड़ी की ट्रे में करीने से खाना सजाकर अपने पापा के कमरे में ले गई, तो हरीश जी की आंखें भर आईं।
“मेरी गुड़िया… यह सब तूने बनाया?” हरीश जी ने कांपते हाथों से चम्मच उठाया। खिचड़ी का पहला निवाला मुंह में रखते ही उनके चेहरे पर एक असीम संतोष फैल गया। “सरिता, सुनती हो! मेरी बेटी ने बिल्कुल तुम्हारे जैसा खाना बनाया है, बल्कि नमक तो तुमसे भी ज्यादा सटीक रखा है!”
कमरे के बाहर खड़ी सरिता जी दीवार का सहारा लेकर धीरे-धीरे चलकर दरवाजे तक आई थीं। उन्होंने देखा कि उनकी सत्रह साल की ‘अल्हड़’ बेटी ने न सिर्फ रसोई संभाली थी, बल्कि पूरे घर को एक कुशल धागे में पिरो दिया था। फर्श पर गिरे पानी को पोंछ दिया गया था, सिंक में जूठे बर्तन नहीं थे और दोनों कमरों में दवाइयों की पर्चियां करीने से रखी हुई थीं।
शाम को जब रोहन भीगा हुआ घर लौटा, तो वह यह देखकर दंग रह गया कि घर में कोई अफरा-तफरी नहीं थी। तान्या ने सबके लिए गरमा-गरम सूप बनाकर रखा था।
रात को जब हरीश जी आराम से सो गए, तो तान्या माँ के कमरे में आई। उसने सरिता जी के पैरों में दर्द निवारक तेल से धीरे-धीरे मालिश करनी शुरू की।
सरिता जी ने रुंधे गले से तान्या का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने सीने से लगा लिया। उनकी आंखों से पश्चाताप और गर्व के मिले-जुले आंसू बह रहे थे।
“मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची,” सरिता जी ने रोते हुए कहा, “मैं हमेशा तुझे ताने देती रही। मुझे लगता था कि तुझे कुछ नहीं आता, तू सिर्फ अपने सपनों में जीती है और कभी जिम्मेदार नहीं बन पाएगी। लेकिन आज जब हम दोनों लाचार पड़े थे, तब तूने जिस तरह पूरे घर को संभाला… मुझे समझ आ गया कि जिम्मेदारी उम्र या चूल्हे-चौके से नहीं आती, वह इंसान के दिल और संस्कारों से आती है।”
तान्या ने माँ के आंसू पोंछते हुए कहा, “माँ, आप गलत नहीं थीं। आपका डर अपनी जगह सही था क्योंकि आप दुनिया की नजरों से मुझे बचाना चाहती थीं। लेकिन पापा और भैया ने जो मुझे उड़ने का हौसला दिया, उसने मुझे कभी कमजोर नहीं बनाया। जब अपनों पर आंच आती है न माँ, तो एक बेटी को सब कुछ खुद-ब-खुद आ जाता है। चूल्हा-चौका सीखना कोई मुश्किल काम नहीं है माँ, वो तो जरूरत पड़ने पर कोई भी सीख सकता है। असली हुनर तो यह है कि इंसान विपरीत परिस्थितियों में घबराए बिना अपनों का सहारा कैसे बने।”
दरवाजे पर खड़े हरीश जी और रोहन यह सब देख रहे थे।
हरीश जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “देखा सरिता, मैंने कहा था ना? पंख फैलाने का मतलब यह नहीं होता कि परिंदा अपनी जड़ों को भूल गया है। हमारी बेटी जब ससुराल भी जाएगी, तो सिर्फ रोटियां बनाकर किसी का दिल जीतने की मोहताज नहीं रहेगी, वह अपने प्यार, अपनी समझदारी और अपने हुनर से पूरे घर को रोशन करेगी।”
उस रात घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। सरिता जी के मन से वह पुराना, अनजाना डर हमेशा के लिए मिट गया था। अब उन्हें अपनी बेटी के भविष्य की चिंता नहीं थी, बल्कि उसके सपनों पर अटूट विश्वास था। अगले ही हफ्ते जब तान्या का दाखिला वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी के प्रतिष्ठित संस्थान में हुआ, तो मिठाई का पहला डिब्बा सरिता जी ने ही पूरे मोहल्ले में बांटा और गर्व से कहा—”यह मेरी लाडली की उड़ान की शुरुआत है!”
क्या आपको भी लगता है कि बेटियों को सिर्फ पारंपरिक जिम्मेदारियों के तराजू में तौलने के बजाय उन्हें अपने सपनों की उड़ान भरने की आजादी और हौसला देना ज्यादा जरूरी है? एक आत्मनिर्भर और संवेदनशील बेटी ही हर घर का असली संबल बनती है। इस विषय पर आपकी क्या राय है, हमें अपनी अनमोल प्रतिक्रिया लिखकर जरूर बताएं।
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