कुलकलंकिनी – डाॅ संजु झा

जीवन की आपाधापी में  व्यक्ति अपनी इच्छाओं और महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए गलत कदम उठाने से भी नहीं डरता है।परिणामस्वरूप अपनी जिंदगी तो बर्बाद होती ही है, परिवार और समाज में भी बदनामी हो जाती है।उसके कुकृत्यों के कारण समाज उसे कुलकलंक या कुलकलंकिनी का नाम दे देता है।

सोलह वर्षीया रीना बड़ी-बड़ी ऑंखें, दुबली-पतली काया और लंबे बालों व गौर वर्णीय सीधी-सादी लड़की थी।उसकी आवाज बेहद सुरीली,नयन -नक्श बेहद तीखे, नृत्य -गान में भी निपुण थी।जो उसे देखता , अनायास ही कह उठता-“रीना में तो फिल्मी हीरोइन बनने के गुण हैं!”

रीना एक संपन्न परिवार की लड़की थी। दसवीं पास कर आगे की पढ़ाई के लिए उसके माता-पिता उसे शहर भेज देते हैं। माता-पिता उसे परिवार की इज्जत की दुहाई देते हुए कहते हैं -“बेटी! परिवार और समाज से विद्रोह कर हम तुम्हें शहर पढ़ने के लिए भेज रहें हैं।तुम केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना।कुछ ऐसा गलत कदम नहीं उठाना,जिससे कुल पर कलंक लग जाऍं!”

रीना ने स्वीकृति में सिर हिला दिया।

शहर आकर रीना काॅलेज के हाॅस्टल में रहकर तन्मयता से पढ़ाई करने लगी। देखते-देखते एक साल बीत गया।एक साल बाद उसे समझ में आया कि काॅलेज में  कई लड़के उसकी बलखाती हिरणी-सी सुन्दर चाल और सुंदर काया पर फिदा थे।बचपन से ही उसे लोग खुबसूरत बोलते थे, परन्तु अपनी खुबसूरती का एहसास उसे अब होने लगा था।वह काॅलेज के हर प्रोग्राम में भाग लेती थी। नृत्य और गायन के साथ-साथ नाटकों में भी भाग लेती थी।इस बार के काॅलेज के वार्षिक प्रोग्राम में उसे ब्यूटी क्वीन का पुरस्कार मिला था।सभी शिक्षक और दोस्तों ने उसकी काफी तारीफ की।

धीरे-धीरे रीना का मन पढ़ाई से हटने लगा।उसके मन में अभिनय का कीड़ा कुलबुलाने लगा।उसका सहपाठी राज उसके सपनों को हवा देने लगा।अब रीना के दिल में हीरोइन बनने के ख्वाब पलने लगें।उसका दोस्त रमण उसे दिल-ही-दिल में चाहने लगा था।रीना के प्रति राज का रवैया उसे पसन्द नहीं था।एक दिन उसने रीना को समझाते हुए कहा -“रीना!पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर लो, फिर आगे के बारे में सोचना!”

रीना की ऑंखों में उस समय हीरोइन बनने का खुमार छाया हुआ था।उसने रमण से दूरी बनानी शुरू कर दी।

अब रीना पढ़ाई छोड़कर राज के साथ अधिकांश समय बिताने लगी।राज उसे कहता -“रीना! तुममें हीरोइन बनने के सारे लक्षण हैं। मुंबई में मेरी बड़े-बड़े लोगों से पहचान है।एक बार तुम मुंबई चलने का इरादा कर लो,तो तुम्हें हीरोइन बनने से कोई नहीं रोक सकता है।”

धीरे-धीरे रीना राज के झाॅंसे में आ गई। एक दिन ऑंखों में हीरोइन बनने के सुनहरे सपने लिए  रीना राज के साथ चुपचाप मुंबई निकल गई।

रीना के घरवालों को जब इस बारे में पता चली तो माॅं ने उसे जी-भर कोसा।पिता ने दहाड़ते हुए कहा -“आज के बाद उस कुलकलंकिनी का नाम घर में कोई नहीं लेगा। परिवार ने उसे मृत मान लिया है। पुलिस में भी रिपोर्ट दर्ज़ नहीं की जाएगी। हमें अपनी इज्जत और नहीं नीलाम करानी है!”

किस्मत के भरोसे रीना और राज मुंबई पहुॅंच जाते हैं।राज एक छोटे से होटल में एक कमरा लेता है।राज उसे रोज स्टूडियो -स्टूडियो घुमाता है। वहाॅं पहुॅंचकर उन्हें एहसास हो जाता है कि जिस प्रकार ढ़ोल की आवाज दूर से ही कर्णप्रिय होती है, परन्तु नजदीक जाने पर वही आवाज दिल और दिमाग पर हथौड़े चलने-सी प्रतीत होती है।उसी प्रकार यह फिल्मी दुनियाॅं दूर से ही आकर्षक लगती है, नजदीक आने पर हकीकत पता चलती है। धीरे-धीरे राज और रीना के बीच शारीरिक दूरियाॅं भी मिट जाती है। मुंबई की लड़कियों की सुन्दरता और स्टाइल देखकर रीना समझ जाती है कि वह कितने पानी में है!

समय के साथ रीना को टेलीविजन पर छोटे-छोटे रोल मिलने लगते हैं, परन्तु उससे मुंबई जैसे शहर में दोनों का गुजारा मुश्किल था।उनके सामने कुऑं और पीछे खाई वाली स्थिति थी।रीना वापस लौटकर घर भी नहीं जा सकती थी।उसका नाम तो कुल कलंकिनी पड़ चुका था।

किसी तरह समय व्यतीत हो रहा था।एक दिन राज ने खुश होते हुए कहा -“रीना!आज शाम में एक बड़े प्रोड्यूसर ने मिलने के लिए होटल में बुलाया है!”

रीना मन में अच्छे रोल  मिलने की ख्वाहिश लेकर राज के साथ होटल पहुॅंच गई।राज बाहर ही बैठा रहता है। प्रोड्यूसर रीना को कमरे में बुलाकर अपने  सीरियल में बड़े रोल देने का वादा करता है उसके एवज में उसके साथ जबरदस्ती करता है।

 फिर भी रीना को फिल्म या टेलीविजन में कोई खास काम नहीं मिलता है। धीरे-धीरे रीना काॅल गर्ल बन जाती है और राज उसका दलाल बन जाता है।

इन कामों से तंग आकर एक दिन रीना गुस्से से कहती हैं -“राज!अब मैं यह सब नहीं करूॅंगी। मैं यहाॅं हीरोइन बनने आई थी,शरीर बेचने नहीं!”

राज उसे समझाते हुए कहता है -“रीना!हमें मुंबई में रहने के लिए पैसे चाहिए।दूसरी बात अब तुम लौटकर भी वापस नहीं जा सकती हो, क्योंकि तुम्हारी बदनामी काफी हो चुकी है!”

अब रीना को फिल्मी दुनियाॅं की हकीकत समझ में आने लगती है।वह पर्दे के पीछे की सच्चाई समझ चुकी थी।जिस पर्दे के पीछे की चमक-दमक को सोना समझ रही थी,वह उसके लिए पीतल तो क्या कीचड़ भरी गंदगी साबित हो रही थी।राज रीना का दलाल बनकर उसे बड़े -बड़े होटलों में जिस्म व्यापार के लिए भेजता और दलाली से काफी पैसे कमाता।

अब रीना के पास पैसा तो  था, परन्तु वह कुंठित रहने लगी। जिस्मफरोशी के धंधे में हर पल उसकी आत्मा लहूलुहान होती, फिर भी उसे खुद को सजा-सॅंवारकर रखना पड़ता था।रीना पूर्णरूपेण काॅल गर्ल बन चुकी थी।एक दिन वह अपना धंधा पूरा कर होटल से निकलती है कि अचानक से उसका सामना रमण से हो जाता है।वह कन्नी काटकर निकलना ही चाहती थी कि रास्ता रोकते हुए रमण ने पूछा -“रीना! यहाॅं किसी फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में आई हो?”

रमण की बातें सुनकर रीना की ऑंखों में ऑंसू आ जाते हैं।रमण बैंक में बड़ा अफसर बन गया है, मीटिंग के सिलसिले में मुंबई आया था।रमण रीना के ऑंसू पोंछते हुए अपने कमरे में ले जाता है।रीना रमण को अपनी दर्द -भरी दास्तां सुनाकर फूट-फूटकर रोने लगती है।रमण उसे सांत्वना देते हुए कहता है -“रीना!कुछ गलतियाॅं अक्षम्य होतीं हैं,जो तुमने की है। फिर भी धैर्य रखो। वक्त फिर से करवट लेगा।कुछ खट्टे-मीठे  सीख देकर यह वक्त भी बदल जाएगा!”

रीना की विवशता उसके चेहरे पर साफ नजर आ रही थी।रीना ने रमण से अनुनय करते हुए कहा -“कृपया रमण!किसी तरह मुझे इस नर्क भरी जिंदगी से बाहर निकालो। मैं यहाॅं जिन्दा लाश बनकर रह गई हूॅं। मैं यहाॅं गन्दगी के दलदल में पूरी तरह फॅंस चुकी हूॅं।राज पूरी तरह मेरा दलाल बन चुका है।मुझे खुद पर घिन आने लगी है!”

रमण -“कुछ सोचता हूॅं।”

रीना -”  राज!मैं क्या कर सकूॅंगी?”मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी। मैंने तो ग्रेजुएशन भी नहीं पूरी की है!”

रमण -“कुछ बिजनेस कर सकती हो?”

रीना -“हाॅं! यहाॅं रहकर मुझे एक फायदा तो जरूर हुआ है कि मुझे फैशन और कपड़ों की बहुत अच्छी समझ हो गई है।”

रमण -“वापस लौटकर तुम अपना बुटीक खोल सकती हो।”

रीना -” बुटीक खोलने के लिए बहुत अधिक पैसे मेरे पास नहीं हैं!”

रमण -“कोशिश करूॅंगा   बैंक से कुछ लोन की व्यवस्था कराने की।लौटकर जाने के बाद खबर करता हूॅं।”

रमण की बातों से रीना को कुछ तसल्ली मिलती है।

रमण वापस लौटकर अपने शहर आ जाता है, परन्तु होनहार और खुबसूरत रीना के चारित्रिक पतन से वह बहुत आहत हो जाता है।उसे उदास देखकर उसकी पत्नी किरण पूछती है -“क्या बात है?कुछ परेशान लग रहें हों?”

रमण -“अरे नहीं! मुंबई में एक पुरानी दोस्त मिल गई थी।उसी के बारे में सोच रहा हूॅं।”

किरण मुकराते हुए -“कहीं उससे तुम्हें प्यार तो नहीं हो गया है?”

रमण -“किरण! प्यार तो मुझे तुमसे ही है, परन्तु उससे सहानुभूति हो गई है!”

रमण अपनी पत्नी को सारी बातें बताते हुए कहता है-“किरण!अगर तुम मेरा साथ दो तो मैं रीना को उस दलदल से निकाल सकता हूॅं!”

किरण रीना की कहानी सुनकर पहले ही भावुक हो चुकी थी।उसने रमण को वचन देते हुए कहा -“एक मजबूर, असहाय लड़की की जिंदगी सॅंवारने में मैं तुम्हारे साथ हूॅं।”

कुछ दिनों बाद रमण रीना को वापस अपने शहर में बुला लेता है।दो महीने रीना रमण के घर में रहती है, परन्तु सदा आत्मग्लानि में डूबी हुई।रीना की घुटन को किरण अच्छी तरह महसूस करती थी। हमेशा उसे तसल्ली देती हुई कहती -” रीना!बीती हुई कड़वी यादों का बोझ ढोना बुद्धिमानी नहीं है।आनेवाले समय को इतना उज्ज्वल बनाओ कि कुल कलंकिनी का दाग़ तुम्हारे दामन से सदा के लिए मिट जाऍं!”

किरण की बातों से रीना के मन में आत्मविश्वास इस तरह जगने लगता है,जैसे मानो प्रकाश नेअंधेरे को चीरकर अपनी जगह बनानी शुरू कर दी हो। किरण उसे बहन समझकर उसमें आत्मविश्वास जगाते हुए कहती -“किरण!फिल्मी दुनियाॅं की चकाचौंध से प्रत्येक वर्ष काफी संख्या में लड़के-लड़कियाॅं मुंबई की ओर भागते हैं, परन्तु चन्द लोग ही ऐसे किस्मत वाले होते हैं, जिन्हें सफलता मिलती है।बाकी कुछ दूसरे पेशे में चले जाते हैं,कुछ ग़लत धंधे में फॅंस जाते हैं। इसलिए तुम अब गुजरे हुए अतीत को भूलकर वास्तविक दुनियाॅं का सामना करने के लिए तैयार हो जाओ।”

कुछ समय बाद रमण के सहयोग से रीना एक छोटा-सा बुटीक खोल लेती है।अपनी कर्मठता और लगन से उसका बुटीक काफी चलने लगता है।रमण बीच-बीच में यथासंभव उसकी मदद कर देता है।उसका अच्छा काम देखकर रमण के चेहरे पर सुकून आ जाता है और उसकी ओर से निश्चिन्त हो जाता है।

कुछ समय बीतने के बाद रमण बैंक से आने पर टेबल पर पड़े निमंत्रण पत्र देखकर पत्नी से पूछता है -“यह किसने भेजा है?”

किरण मुस्कराते हुए कहती हैं -“खुद ही देख लो!”

रमण कार्ड पढ़कर मुस्करा उठता है। पत्नी को कहता है -“रीना की तपस्या सफल रही।आगामी रविवार को उसके अपने शो रूम का उद्घाटन है। हमें चलना है!”

रमण पत्नी के साथ रीना के शो रूम के उद्घाटन समारोह में पहुॅंचता है।  रीना के अतीत को भूलकर वहाॅं काफी लोग आऍं हुए थे।रीना रमण दम्पत्ति के पैर छूते हुए कहती हैं -“अगर उस कठिन समय में आपलोगों ने मेरा साथ न दिया होता तो मैं आत्महत्या कर चुकी होती!”

रमण -” रीना!अगर सुबह का भूला शाम को अपने घर लौट आऍं,तो उसे भूला नहीं कहते हैं।देखो! तुम्हारे माता-पिता भी तुम्हें माफ कर तुम्हारी खुशी में शामिल होने आऍं हैं!”

रीना दौड़कर माता-पिता के गले लग जाती है।रीना के पिता उसके सर पर हाथ रखते हुए कहते हैं -“बेटी तुमने तो घर से भागकर  खुद कुलकलंकिनी  का दाग़ लगा लिया था,आज अपनी मेहनत और लगन से उस दाग पर पर्दा भी तुमने ही डाल लिया है!”

सभी लोग शो रूम के उद्घाटन पर सम्मिलित स्वर में रीना के लिए तालियाॅं बजाते हैं।रीना खुशियों से भींगे अपनी ऑंखों के कोर को निर्बाध बहने देती है।

समाप्त।

लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित)

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