खोखली बुनियाद – मंजू अग्रवाल

“भाभी, मुझे पता है आज आपको अपने भैया की बहुत याद आ रही होगी। लेकिन आप उदास मत होइए, समर भैया हैं ना, वो भी तो आपके भाई जैसे ही…” विशाखा अपने शब्द पूरे भी नहीं कर पाई थी कि उसे लगा उसने कुछ गलत कह दिया।

लेकिन काव्या ने बहुत ही शांत स्वर में कहा, “नहीं विशाखा, मैं उदास नहीं हूँ। और आज मैंने भी राखी बाँधने की पूरी तैयारी की है।”

काव्या की यह बात सुनकर वहाँ मौजूद हर इंसान थोड़ा हैरान रह गया। समर ने अपनी भौंहें सिकोड़ते हुए पूछा, “राखी बाँधने की तैयारी? किसे बाँधोगी तुम राखी? तुम्हारा तो कोई मुँहबोला भाई भी नहीं है इस शहर में, और न ही तुमने कभी जिक्र किया।”

सावन का महीना अपनी पूरी रंगत पर था। सुबह से ही हल्की-हल्की फुहारें गिर रही थीं, जिससे मौसम में एक अजीब सी ठंडक और ताजगी घुल गई थी। आज रक्षाबंधन का पवित्र त्योहार था। शहर के एक संभ्रांत इलाके में बने दो मंजिला घर ‘शांति निकेतन’ में आज सुबह से ही बड़ी चहल-पहल थी। घर की रसोई से उठती देसी घी की जलेबियों, खीर और पूड़ियों की खुशबू पूरे घर के माहौल को और भी खुशनुमा बना रही थी। घर के मुखिया, पंडित रामनाथ जी और उनकी पत्नी सुशीला देवी के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी, आखिर आज उनकी इकलौती बेटी विशाखा अपने पति और बच्चों के साथ मायके जो आई हुई थी।

पूरा घर ठहाकों और बच्चों की किलकारियों से गूंज रहा था। विशाखा का भाई, समर, जो शहर का एक जाना-माना बिजनेसमैन था, अपनी बहन को चिढ़ाने और उससे लाड़ लड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था। “देख विशाखा, इस बार तेरा नेग पक्का है, लेकिन शर्त ये है कि तुझे मेरे लिए वो बचपन वाली बेसन की बर्फी अपने हाथ से बनानी पड़ेगी,” समर ने सोफे पर लेटते हुए अपनी बहन से कहा। विशाखा ने हँसते हुए पास रखा एक कुशन समर की तरफ फेंका और बोली, “भैया, आप भी ना, बिल्कुल नहीं बदले। आज भी वही बचपन वाली हरकतें।” माता-पिता दूर बैठे अपने बच्चों के इस निश्छल प्रेम को देखकर मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रहे थे कि उनका परिवार कितना सुखी और संपन्न है।

लेकिन इस पूरी चकाचौंध, हँसी-ठिठोली और खुशियों के बीच एक चेहरा ऐसा था जिस पर अजीब सी खामोशी छाई हुई थी—वह थी समर की पत्नी, काव्या। काव्या सुबह चार बजे से उठकर घर के हर छोटे-बड़े काम में लगी हुई थी। उसने अकेले ही रसोई का पूरा मोर्चा संभाला हुआ था। सबके लिए नाश्ता बनाना, विशाखा के बच्चों की पसंद का ध्यान रखना, सास-ससुर की दवाइयाँ देना, ये सब वह एक मशीन की तरह बिना थके कर रही थी। लेकिन उसकी आँखों में एक गहरा सूनापन था। वो आँखें, जो कभी सपनों से भरी होती थीं, आज उनमें सिर्फ एक अनकहा दर्द और खौफ तैर रहा था। काव्या के चेहरे पर एक उदासी की चादर लिपटी थी जिसे इस घर की चकाचौंध भी भेद नहीं पा रही थी।

“अरे काव्या भाभी! आप कब तक रसोई में ही घुसी रहेंगी? बाहर आइए ना, देखिए सब आपका ही इंतज़ार कर रहे हैं,” विशाखा ने रसोई के दरवाजे पर खड़े होकर आवाज़ दी। काव्या ने झट से अपने पल्लू से चेहरे का पसीना पोंछा, एक फीकी सी मुस्कान अपने होठों पर चिपकाई और बोली, “बस आई विशाखा, ये खीर लगभग बन ही गई है।”

ड्राइंग रूम में बीचों-बीच एक बड़ी सी मेज पर रेशमी धागों वाली राखियों से सजी थाली रखी थी। उसमें कुमकुम, अक्षत, मिठाई और आरती का दीया जगमगा रहा था। विशाखा ने बड़े ही प्यार और आदर के साथ अपने भाई समर के माथे पर कुमकुम का तिलक लगाया, उस पर चावल के दाने चिपकाए और उसकी कलाई पर एक सुंदर सी राखी बाँध दी। समर ने भी मुस्कुराते हुए अपनी बहन का मुँह मीठा कराया और नेग के तौर पर एक कीमती हार उसे उपहार में दिया। यह दृश्य देखकर सुशीला देवी की आँखें भर आईं। “भगवान मेरे दोनों बच्चों को बुरी नज़र से बचाए, इनका प्यार ऐसे ही बना रहे,” उन्होंने भावुक होते हुए कहा।

तभी विशाखा की नज़र काव्या पर पड़ी, जो एक कोने में चुपचाप खड़ी यह सब देख रही थी। विशाखा को अचानक याद आया कि काव्या का अपना कोई सगा भाई नहीं था। बचपन में ही एक हादसे में उसने अपने माता-पिता और इकलौते भाई को खो दिया था, जिसके बाद वह अपनी बुआ के पास पली-बढ़ी थी। विशाखा को लगा कि शायद अपने भाई की याद में काव्या उदास है।

“भाभी, मुझे पता है आज आपको अपने भैया की बहुत याद आ रही होगी। लेकिन आप उदास मत होइए, समर भैया हैं ना, वो भी तो आपके भाई जैसे ही…” विशाखा अपने शब्द पूरे भी नहीं कर पाई थी कि उसे लगा उसने कुछ गलत कह दिया।

लेकिन काव्या ने बहुत ही शांत स्वर में कहा, “नहीं विशाखा, मैं उदास नहीं हूँ। और आज मैंने भी राखी बाँधने की पूरी तैयारी की है।”

काव्या की यह बात सुनकर वहाँ मौजूद हर इंसान थोड़ा हैरान रह गया। समर ने अपनी भौंहें सिकोड़ते हुए पूछा, “राखी बाँधने की तैयारी? किसे बाँधोगी तुम राखी? तुम्हारा तो कोई मुँहबोला भाई भी नहीं है इस शहर में, और न ही तुमने कभी जिक्र किया।”

काव्या ने समर की बात का कोई सीधा जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप मुड़ी और अपने कमरे की तरफ चली गई। थोड़ी ही देर में वह अपने हाथों में एक छोटी सी पीतल की थाली लेकर लौटी। उस थाली में रोली, चावल और एक बहुत ही साधारण सी सूत की राखी रखी हुई थी।

सबकी नज़रें काव्या पर टिकी थीं। विशाखा, समर, और सास-ससुर सब सोच रहे थे कि काव्या आखिर यह राखी किसे बाँधने वाली है। काव्या की चाल में एक अजीब सा दृढ़ निश्चय था। वह ड्राइंग रूम से गुज़रते हुए आँगन की तरफ बढ़ी। आँगन के एक कोने में घर का पुराना लकड़ी का बना छोटा सा पूजा घर था, जिसके दरवाज़े पर भारी और पुरानी नक्काशीदार चौखट लगी हुई थी।

काव्या उस पूजा घर के सामने जाकर रुक गई। उसने अपने सिर पर पल्लू रखा, थाली नीचे रखी और घुटनों के बल बैठ गई। उसने अपनी अनामिका उंगली से रोली ली और उस निर्जीव लकड़ी की चौखट पर बड़े ही आदर के साथ एक लंबा तिलक लगा दिया। फिर उसने थाली से वह सूत की राखी उठाई और चौखट के किनारे उभरी हुई एक लोहे की कील पर उसे मजबूती से बाँध दिया। राखी बाँधने के बाद उसने उस चौखट के आगे अपना सिर झुकाया और आँखें बंद कर लीं। उसकी बंद आँखों से आँसुओं की दो गर्म बूँदें छलक कर ज़मीन पर गिर पड़ीं।

ड्राइंग रूम में सन्नाटा छा गया था। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि काव्या ये क्या पागलपन कर रही है। सबसे पहले यह सन्नाटा समर के कड़कते हुए स्वर ने तोड़ा। वह गुस्से से तमतमाता हुआ काव्या के पास आया और ज़ोर से बोला, “काव्या! यह क्या तमाशा है? तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है? एक लकड़ी की चौखट को राखी बाँधकर तुम पूरे परिवार के सामने क्या साबित करना चाहती हो? अगर भाई नहीं है तो इसका मतलब ये थोड़ी है कि तुम घर की ईंट-पत्थर और लकड़ियों को राखी बाँधने लगोगी!”

समर की तेज़ आवाज़ सुनकर विशाखा और सास-ससुर भी दौड़कर आँगन में आ गए। “बहू, ये क्या बचपना है? त्योहार के दिन कैसा अपशगुन कर रही हो तुम?” सुशीला देवी ने भी नाराज़गी जताते हुए कहा।

काव्या अब भी उसी चौखट के पास घुटनों के बल बैठी थी। उसने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। उसकी आँखों में अब कोई डर नहीं था, बल्कि एक ऐसी सच्चाई थी जिसे वह बरसों से अपने सीने में दबाए हुए थी। वह उठी, उसने समर की आँखों में सीधा देखा। समर जो बाहर की दुनिया के लिए एक आदर्श बेटा, एक प्यार करने वाला भाई और एक सफल इंसान था, उसकी असलियत केवल काव्या जानती थी।

“तमाशा?” काव्या की आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी। “तमाशा मैं नहीं कर रही हूँ समर, तमाशा तो आप करते हैं, हर रोज़, इस सभ्य समाज के सामने एक शरीफ इंसान होने का। रही बात इस चौखट को राखी बाँधने की, तो हाँ, मैंने इस लकड़ी की चौखट को राखी बाँधी है, क्योंकि मेरे लिए इस घर में यही मेरा इकलौता और सच्चा रक्षक है।”

विशाखा हैरान थी, “भाभी, आप ये क्या कह रही हैं? एक लकड़ी की चौखट आपकी रक्षक कैसे हो सकती है? और भैया के होते हुए आपको किसी और रक्षक की क्या ज़रूरत है?”

काव्या ने एक सर्द आह भरी और विशाखा की ओर मुड़कर बोली, “तुम्हारे भैया के होते हुए? विशाखा, तुम अपने भाई को सिर्फ दिन के उजालों में जानती हो, जब वह तुम्हारे लिए महंगे तोहफे लाता है और तुमसे प्यार भरी बातें करता है। लेकिन मैंने इस इंसान को रात के उस खौफनाक अँधेरे में देखा है, जब शराब के नशे में इसकी इंसानियत मर जाती है और इसके अंदर का जानवर बाहर आ जाता है।”

काव्या की बात सुनते ही रामनाथ जी और सुशीला देवी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। समर का चेहरा सफेद पड़ गया था, वह कुछ बोलने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसके गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी।

काव्या ने अपनी बात जारी रखी, उसके शब्द अब किसी धारदार हथियार की तरह निकल रहे थे, “तुम लोग जानते हो इस चौखट का मेरे जीवन में क्या मोल है? जब रात के बारह बजे तुम्हारे ये आदर्श बेटे नशे में धुत्त होकर कमरे में आते हैं, और बिना किसी बात के मुझे गालियां देते हैं, मेरे बालों को नोचकर मुझे ज़मीन पर घसीटते हैं, मुझ पर लात-घूँसे बरसाते हैं, तब इस घर का कोई भी इंसान मेरी चीखें नहीं सुनता। मैं दर्द से तड़पती हूँ, रहम की भीख मांगती हूँ, लेकिन इनका गुस्सा शांत नहीं होता। अपनी जान बचाने के लिए, इनके हैवानियत भरे हाथों से बचने के लिए, मैं हर उस रात दौड़कर इसी पूजा घर में आ छिपती हूँ।”

काव्या ने उस लकड़ी की चौखट पर अपना हाथ फेरते हुए आगे कहा, “यह सिर्फ एक लकड़ी का टुकड़ा नहीं है विशाखा। नशे में चूर तुम्हारे भाई की हिम्मत कभी इस पूजा घर की चौखट को पार करने की नहीं होती। भगवान के इस घर का डर ही सही, लेकिन जब मैं इस चौखट के अंदर होती हूँ, तो इनके हाथ मुझ तक नहीं पहुँच पाते। बाहर खड़े होकर ये दरवाज़ा पीटते हैं, गालियां देते हैं, लेकिन ये छोटी सी चौखट एक मजबूत ढाल बनकर इनके और मेरे बीच खड़ी रहती है। अनगिनत रातों में, जब मेरे शरीर से खून बह रहा होता है और मेरी आत्मा कांप रही होती है, तब इस निर्जीव चौखट ने ही मेरी रक्षा की है। इसने मेरी इज़्ज़त बचाई है, मेरी जान बचाई है। रक्षाबंधन पर राखी उसे ही तो बाँधी जाती है जो आपकी रक्षा करे, जो आपको हर संकट से बचाए। तो बता विशाखा, जिसने सच में मेरी रक्षा की है, मैं उसे राखी क्यों न बाँधूँ?”

आँगन में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था। हवा भी जैसे रुक सी गई थी। काव्या की हर एक बात किसी जलते हुए अंगारे की तरह समर और उसके माता-पिता के मुँह पर पड़ी थी। सुशीला देवी, जो हमेशा अपने बेटे की तारीफ करते नहीं थकती थीं, आज शर्मिंदगी से ज़मीन में गड़ी जा रही थीं। रामनाथ जी की नज़रें नीची थीं और उनके हाथ कांप रहे थे। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस बेटे पर उन्हें इतना नाज़ था, वह अपनी पत्नी के लिए इतना बड़ा राक्षस बन चुका है।

विशाखा की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वह दौड़कर काव्या के गले लग गई और फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ़ कर दो भाभी, मुझे सच में कुछ नहीं पता था। हम सब कितने अंधे हो गए थे। मैं राखी का त्योहार मना रही थी, लेकिन मुझे नहीं पता था कि मेरी ही भाभी अपनी जान बचाने के लिए हर रात तिल-तिल कर मर रही है।”

समर की आँखों में अब वो झूठा गुरूर और गुस्सा नहीं था। काव्या के सच ने उसकी आत्मा को झकझोर कर रख दिया था। उसके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे। उसका पाखंड सबके सामने नंगा हो चुका था। जिस समाज में वह एक सम्मानित इंसान बनकर घूमता था, आज अपने ही परिवार के सामने वह एक अपराधी बनकर खड़ा था। वह नज़रें नहीं उठा पा रहा था, शर्म से उसका सिर झुक गया था।

काव्या ने धीरे से विशाखा को अपने से अलग किया, उसके आँसू पोंछे और बहुत ही शांत स्वर में बोली, “रो मत विशाखा, त्योहार का दिन है। तुमने अपने भाई को राखी बाँध ली है और मैंने अपने रक्षक को। बस फर्क इतना है कि तुम्हारी राखी धागों की है और मेरी राखी मेरे दर्द और इस चौखट के एहसान की गवाह है।”

काव्या मुड़ी और वापस अपने कमरे की तरफ चल दी। पीछे छूट गया था एक ऐसा परिवार, जिसकी खोखली बुनियाद आज पूरी तरह से दरक चुकी थी। पूजा घर की चौखट पर बँधी वह सूत की राखी हवा में धीरे-धीरे हिल रही थी, मानो वह समाज के दोगलेपन पर खामोशी से हँस रही हो और काव्या की उस मूक पीड़ा की गवाही दे रही हो जिसे उसने अपने भीतर समेट रखा था।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

लेखिका : मंजू अग्रवाल

error: Content is protected !!