कल्याणी ने आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए समरवीर का चेहरा अपने हाथों में उठाया, “तो फिर यह त्याग कहां हुआ समर? यह तो हमारी उस मोहब्बत की जीत है जो जिस्म और दुनियावी रिश्तों से परे थी। हमने एक-दूसरे को कोई वचन नहीं दिया था, अग्नि के फेरे नहीं लिए थे, फिर भी पैंतीस साल तक एक-दूसरे के प्रति वफादार रहे। अगर यह प्यार नहीं तो फिर प्यार क्या है?”
मेजर समरवीर सिंह को सेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लिए अभी कुछ ही महीने हुए थे। शहर नया था, यह सोसाइटी नई थी और यहां रहने वाले चेहरे भी अजनबी थे। समरवीर स्वभाव से बेहद संकोची, गंभीर और कम बोलने वाले इंसान थे। अपनी निजी दुनिया में किसी का दखल उन्हें कभी गवारा नहीं हुआ। तभी अचानक कमरे की बत्ती जली और उनके पुराने अर्दली और अब सुख-दुख के साथी मंगलू ने आकर कहा, “साहब, कब तक ऐसे अंधेरे में खड़े रहेंगे? ठंड बढ़ रही है, भीतर आ जाइए।”
समरवीर ने एक गहरी सांस भरी और धीमी आवाज में पूछा, “कुछ नहीं मंगलू, बस यूं ही पुराने दिनों की धूल झाड़ रहा था। यह बताओ, आज रात क्या खिलाने का इरादा है?” मंगलू ने उत्साह से कहा, “साहब, आप कहें तो कड़ाही पनीर और गर्मागर्म पराठे बना दूं? या फिर बढ़िया चिकन करी?” समरवीर ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, “नहीं भाई, आज पेट कुछ भारी लग रहा है। एक काम करो, मूंग दाल की एकदम सादी और पतली खिचड़ी बना लो। हम दोनों वही खा लेंगे।” मंगलू का मुंह तुरंत उतर गया। उसने बुदबुदाते हुए कहा, “साहब भी न, जब देखो बीमारों वाला खाना! खुद तो फकीर हैं ही, मुझे भी तपस्वी बना कर छोड़ेंगे।” समरवीर उसकी बड़बड़ाहट सुनकर बस मुस्कुरा दिए।
मंगलू थैला उठाकर बोला, “ठीक है साहब, हरा धनिया और नींबू खत्म है, नीचे सुपरमार्केट से लेकर आता हूं।” फ्लैट का भारी दरवाजा बंद करके जैसे ही मंगलू लिफ्ट की ओर बढ़ा, सामने वाले फ्लैट नंबर 402 की मालकिन कल्याणी जी मुख्य दरवाजे के पास लगे पौधों को पानी दे रही थीं। कल्याणी जी एक शांत, सौम्य और गरिमामयी महिला थीं, जो पास के एक सरकारी स्कूल से हाल ही में प्रधानाध्यापिका के पद से सेवानिवृत्त हुई थीं। सफेद सूती साड़ी, करीने से संवरे बाल और आंखों में अजीब सा ठहराव उनके व्यक्तित्व को एक पवित्र आभा देता था। मंगलू की अक्सर उनसे आते-जाते दुआ-सलाम हो जाती थी।
मंगलू का लटका हुआ चेहरा देखकर कल्याणी जी हंस पड़ीं, “क्यों मंगलू बेटा, आज फिर साहब ने खिचड़ी का फरमान सुना दिया क्या? चेहरा क्यों बारह बजा रहा है?” मंगलू अपनी आदत के मुताबिक तुरंत शुरू हो गया, “अरे क्या बताऊं कल्याणी आंटी! हमारे मेजर साहब भी अजीब इंसान हैं। फौज में न जाने कितने बड़े-बड़े मोर्चे फतह किए, पर खाने के नाम पर वही उबली सब्जियां और बेस्वाद खिचड़ी। खुद तो सूखा जीवन जीते ही हैं, मुझे भी अच्छा-बुरा खाने नहीं देते। अब उनकी वजह से मुझसे भी अकेले बढ़िया खाना हलक के नीचे नहीं उतरता।” कल्याणी जी के चेहरे पर एक वात्सल्य भरी मुस्कान तैर गई। उन्होंने मंगलू के अपने मालिक के प्रति इस निश्छल अपनत्व को महसूस किया।
मंगलू जैसे ही मुड़ने लगा, कल्याणी जी ने उसे स्नेह से पुकारा, “रुको बेटा! आज मेरा इकसठवां जन्मदिन है। जीवन में कभी किसी ने याद नहीं रखा, पर आज मन हुआ तो मैंने अपने हाथों से अपने लिए कश्मीरी दम आलू और मखाने की खीर बनाई है। सालों बाद कुछ खास पकाया था, पर अकेले खाते हुए निवाला भारी लगता है। क्या तुम और तुम्हारे साहब थोड़ा सा प्रसाद स्वरूप स्वीकार करोगे?” मंगलू की आंखें चमक उठीं। उसने हाथ जोड़कर कहा, “अरे आंटी जी, आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई! आप बस डिब्बे में डाल दीजिए, मैं धनिया लेकर लौटा और यह सौगात ले गया। आज की रात तो दावत हो जाएगी!” कल्याणी जी का मन भी हल्का हो गया। किसी भूखे या आत्मीय को भोजन कराना हमेशा से उनके संस्कारों में था। उन्होंने झटपट दो बड़े स्टील के टिफिन में दम आलू की महकती तरीदार सब्जी और ऊपर से पिस्ता-बादाम से सजी गाढ़ी मखाने की खीर करीने से पैक कर दी।
कुछ ही देर में मंगलू धनिया लेकर लौटा, कल्याणी जी से टिफिन लिए, आभार जताया और अपने फ्लैट में दाखिल हो गया। उसने तुरंत कुकर में खिचड़ी चढ़ाई, हरी मिर्च और जीरे का छौंक लगाया और डाइनिंग टेबल सजा दी। मंगलू ने अपने लिए एक प्लेट में खिचड़ी निकाली, कटोरी में दम आलू और खीर परोसी और किचन के काउंटर पर बैठकर जैसे ही आलू का पहला टुकड़ा मुंह में डाला, उसके मुंह से अनायास ही निकला, “अरे वाह! लाजवाब!” मसालों की वह खास खुशबू, जिसमें सौंफ और सोंठ का पारंपरिक संतुलन था, पूरे घर में तैर गई।
बैठक में अपनी डायरी लिख रहे समरवीर के नथुनों से जैसे ही वह खुशबू टकराई, उनके हाथ से कलम छूट गई। वह खुशबू बेहद पहचानी, बेहद पुरानी और रूह को हिला देने वाली थी। समरवीर उठकर तेज कदमों से किचन में पहुंचे। मंगलू को मजे से खाते देख बोले, “मंगलू! यह क्या खा रहे हो? यह खुशबू कहां से आ रही है?” मंगलू हड़बड़ा कर खड़ा हो गया, “साहब, वो सामने वाली कल्याणी आंटी हैं न, आज उनका जन्मदिन है। उन्होंने ही यह दम आलू और खीर दी है। बहुत ही स्वादिष्ट है साहब, आप भी चखिए।” मंगलू ने झटपट एक साफ प्लेट में सब्जी और खीर समरवीर के आगे रख दी।
समरवीर ने कांपते हाथों से चम्मच उठाया और जैसे ही दम आलू का रसा अपनी जीभ पर रखा, उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। मसालों का वही खास अनुपात, जो आज से पैंतीस साल पहले जालंधर के उस छोटे से कस्बे में कोई अपने हाथों से उनके लिए बनाया करता था। उस स्वाद में एक खास अपनापन था जिसे दुनिया का कोई बावर्ची दोहरा नहीं सकता था। समरवीर का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उनका गला रुंध गया। उन्होंने मंगलू से पूछा, “मंगलू… सामने जो रहती हैं, उनका पूरा नाम क्या है?” मंगलू ने बर्तन धोते हुए सहजता से कहा, “साहब, कल्याणी शर्मा नाम है शायद, नेमप्लेट पर तो यही लिखा है। रिटायर्ड हेडमिस्ट्रेस हैं।”
समरवीर की आंखों में बरसों पुरानी धुंध छंटने लगी। कल्याणी! वही कल्याणी, जिसे वे अपनी आत्मा तक में बसा चुके थे और जिसे वक्त के एक क्रूर थपेड़े ने उनसे छीन लिया था। समरवीर बिना एक पल गंवाए अपने कमरे में गए। उन्होंने अपनी अलमारी से कश्मीरी पश्मीना शॉल निकाली, जो वे सालों पहले किसी खास के लिए खरीद कर लाए थे और जो आज तक बिना इस्तेमाल के संदूक में महक रही थी। साथ में मेज पर रखा एक ताजा जरबेरा का फूल उठाया और भारी कदमों से फ्लैट नंबर 402 की दहलीज पर जा पहुंचे।
उनकी उंगलियां कांप रही थीं। उन्होंने डोरबेल का बटन दबाया। भीतर से एक हल्की सी घंटी बजी और कुछ पलों बाद दरवाजा खुला। सामने कल्याणी खड़ी थीं। दोनों की नजरें मिलीं। समय जैसे उस चौखट पर आकर पत्थर हो गया। हवा का बहना रुक गया। समरवीर के चेहरे पर सफेद दाढ़ी और बालों में वक्त की चांदी थी, पर वह गहरी आंखें वही थीं। कल्याणी के चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, पर उनकी आंखों का वह भोलापन और दर्द आज भी वही था। दोनों एक-दूसरे को अपलक देखते रहे। न कोई चीख, न कोई शब्द, बस दोनों की आंखों से खामोश आंसुओं की अविरल धारा बह निकली।
कल्याणी के हाथ से पल्लू छूट गया। उनके होंठ थरथराए, “समर… क्या सच में तुम हो?” समरवीर ने शॉल और फूल बगल में रखी मेज पर रख दिया और दोनों हाथों से कल्याणी के कांपते हाथों को अपनी हथेलियों में थाम लिया। वे बोले, “कल्याणी… मेरी रूह, मेरी जिंदगी… तुम यहां? इस हाल में? इतने बरस कहां थीं तुम?” कल्याणी ने रोते हुए उन्हें भीतर खींचा और दरवाजा बंद कर लिया। सोफे पर बैठते ही दोनों के भीतर का बरसों पुराना बांध टूट गया। मेजर समरवीर, जो कभी दुश्मनों की तोपों के आगे नहीं झुके थे, आज एक बच्चे की तरह कल्याणी के घुटनों पर सिर रखकर रो पड़े।
“कल्याणी, मुझे छोड़कर क्यों चली गई थीं? जब मेरी पहली पोस्टिंग सियाचिन की दुर्गम चौकियों पर हुई थी, तुमने वादा किया था कि तुम मेरा इंतजार करोगी। पर जब मैं पहली छुट्टी पर लौटा, तो तुम्हारा घर वीरान था। पड़ोसियों ने कहा कि तुम अपनी मां के साथ कहीं दूर चली गईं और मेरी सौतेली चाची ने मुझे बताया कि तुमने किसी रईस खानदान में शादी कर ली। मैं टूट गया था कल्याणी, बिल्कुल बिखर गया था। फिर भी मेरा दिल कभी यह मानने को तैयार नहीं हुआ कि मेरी कल्याणी बेवफा हो सकती है।” समरवीर की रुलाई थम नहीं रही थी।
कल्याणी ने समरवीर के सफेद बालों में अपनी उंगलियां फेरते हुए एक गहरी और दर्द भरी सांस ली। उन्होंने अपनी भीगी आंखों को पोंछते हुए कहा, “समर, काश वो सच होता जो तुम्हारी चाची ने तुमसे कहा। तुम्हारे जाते ही तुम्हारी सौतेली चाची हमारे टूटे हुए मकान पर आई थीं। उन्होंने मेरी विधवा मां की लाचारी पर हजारों लांछन लगाए। उन्होंने कहा कि एक अनाथ और गरीब लड़की उनके फौजी अफसर भतीजे के भविष्य पर कलंक है। उन्होंने मुझे धमकी दी कि अगर मैं तुम्हारी जिंदगी से हमेशा के लिए नहीं हटी, तो वे अपने खानदानी रसूख का इस्तेमाल करके तुम्हारी नौकरी छीन लेंगी और तुम पर गद्दारी का झूठा कोर्ट-मार्शल करवा देंगी। मैं तो तुम्हारी खातिर जान भी दे सकती थी समर, पर तुम्हारे स्वाभिमान, तुम्हारी वर्दी और तुम्हारे करियर पर आंच आते कैसे देख सकती थी?”
कल्याणी की आवाज भर्रा गई, “मेरी मां ने मुझसे कहा कि सच्चा प्रेम वह नहीं जो दूसरे के रास्ते का कांटा बन जाए, बल्कि वह है जो खामोशी से उसके रास्ते से हटकर उसकी सलामती की दुआ करे। हमने उसी रात वह शहर छोड़ दिया। हम पटियाला आ गए। मैंने दिन-रात बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई पूरी की, अध्यापिका की नौकरी पाई। मां कुछ ही सालों में इस दुनिया से चली गईं। लोगों ने रिश्ते भेजे, शादी के दबाव डाले, पर जिस मांग में समरवीर के नाम का सिंदूर मन ही मन सज चुका था, वहां किसी और का नाम कैसे लिख देती? मैंने अपना पूरा जीवन स्कूल के बच्चों को संवारने में गुजार दिया।”
समरवीर स्तब्ध रह गए। उनके सीने में एक भयानक टीस उठी, “इतना बड़ा बलिदान कल्याणी? तुमने अपनी पूरी जवानी, अपनी सारी खुशियां सिर्फ मेरे सम्मान की रक्षा के लिए होम कर दीं? और मैं अभागा तुम्हें ढूंढता रहा, तुम्हारे दिए उस एकतरफा दर्द को सीने से लगाए जिंदगी भर कुंवारा रहा। मैंने भी कभी किसी और को अपनी जिंदगी में आने नहीं दिया। मेरी हर सांस, मेरी हर दुआ में सिर्फ तुम्हारा नाम था।”
कल्याणी ने आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए समरवीर का चेहरा अपने हाथों में उठाया, “तो फिर यह त्याग कहां हुआ समर? यह तो हमारी उस मोहब्बत की जीत है जो जिस्म और दुनियावी रिश्तों से परे थी। हमने एक-दूसरे को कोई वचन नहीं दिया था, अग्नि के फेरे नहीं लिए थे, फिर भी पैंतीस साल तक एक-दूसरे के प्रति वफादार रहे। अगर यह प्यार नहीं तो फिर प्यार क्या है?”
दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। दोनों ने मुड़कर देखा तो मंगलू आंखों में खुशी के आंसू लिए चौखट पर खड़ा था। उसने हाथ जोड़कर कहा, “साहब, भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। आज आंटी का जन्मदिन सच में सफल हो गया। आज दो बिछड़ी हुई रूहें मिल गईं।”
अगले ही हफ्ते, सोसाइटी के पास बने प्राचीन शिव मंदिर में शंख और घंटियों की पावन ध्वनि गूंज रही थी। कोई तड़क-भड़क नहीं थी, कोई झूठा दिखावा नहीं था। मंगलू और सोसाइटी के कुछ नेक पड़ोसियों की मौजूदगी में, पंडित जी के वैदिक मंत्रोच्चार के बीच समरवीर ने कल्याणी की मांग में सिंदूर भरा और दोनों ने सात फेरे लेकर एक-दूसरे का हाथ हमेशा के लिए थाम लिया। उनके सफेद बाल और चेहरे की झुर्रियां इस बात की गवाह थीं कि सच्ची मोहब्बत उम्र, फासलों और साजिशों की मोहताज नहीं होती; वह वक्त के हर इम्तिहान को पार करके अपनी मंजिल पा ही लेती है।
जीवन के इस पड़ाव पर आकर समरवीर और कल्याणी का यह मिलन हमें सिखाता है कि रिश्ते सिर्फ शब्दों और वादों से नहीं, बल्कि आत्मा के अटूट विश्वास और त्याग से निभाए जाते हैं। आज के इस दौर में जहां छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते टूट जाते हैं, क्या आपको लगता है कि ऐसा निस्वार्थ और समर्पित प्रेम आज भी संभव है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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