दर्पण का सच

  बड़े से शीशे के सामने खड़ी तान्या अपनी लंबी ज़ुल्फ़ों को संवार रही थी। उसकी दूधिया गोरी रंगत, तीखे नैन-नक्श और लंबी कद-काठी किसी को भी पहली नज़र में ठहरकर देखने पर मजबूर कर देती थी। कॉलेज के गलियारों से लेकर मोहल्ले की हर शादी-समारोह तक, तान्या की तारीफ़ों के पुल बंधते थे। इसी तारीफ़ और चापलूसी ने उसके भीतर एक ऐसा अहंकार बो दिया था, जिसने उसके देखने और सोचने का नज़रिया पूरी तरह से दूषित कर दिया था।

कमरे के दरवाज़े पर तान्या की चचेरी बहन अनन्या खड़ी थी। दोनों की उम्र में महज़ चार महीने का फ़र्क था, पर दोनों के स्वभाव और रूप-रंग में ज़मीन-आसमान का अंतर था। अनन्या का रंग गहरा सांवला था, साधारण चेहरा और आंखों पर चढ़ा भारी चश्मा। वह हमेशा सादे लिबास में रहती थी और उसका सारा ध्यान अपनी पढ़ाई और किताबों पर रहता था। दोनों के पिता सगे भाई थे और एक ही पुश्तैनी मकान में दोनों परिवार साथ रहते थे।

“तान्या, गाड़ी की चाबी ले ली तुमने? आज सेमेस्टर की पहली क्लास है, ज़रा जल्दी निकलें तो सीटें आगे मिल जाएंगी,” अनन्या ने संकोच के साथ हाथ में किताबें दबाए हुए पूछा।

तान्या ने आईने से अपनी नज़रें हटाए बिना अपनी लाल लिपस्टिक को होंठों पर फिराया और एक गहरी घृणा भरी सांस छोड़ी। उसने मुड़कर अनन्या को सिर से पैर तक देखा और तिरस्कार से बोली, “दूर हट अनन्या! तू मेरे साथ बैठकर कॉलेज जाएगी? पिछली बार जब तू मेरे साथ कार से उतरी थी, तो मेरे दोस्तों ने पूछा था कि यह नौकरानी जैसी लड़की कौन है। तेरे साथ जाकर मुझे अपनी इज़्ज़त की नीलामी नहीं करानी। अपनी वह पुरानी स्कूटी उठा और चुपचाप निकल यहां से।”

अनन्या के चेहरे पर अपमान का एक रंग आया और चला गया। उसकी आंखें डबडबा गईं, पर उसने खुद को संभाला। यह कोई पहली बार नहीं था। बचपन में जब दोनों एक साथ स्कूल जाती थीं, तब भी तान्या उसके साथ हाथ पकड़कर चलने से कतराती थी। घर के हर पारिवारिक उत्सव में तान्या अपनी मां के साथ मिलकर अनन्या के सांवलेपन का मज़ाक उड़ाया करती थी—’अरे, अनन्या को कोई ब्राइट रंग मत पहनाओ, और काली दिखेगी।’

अनन्या चुपचाप सिर झुकाकर अपने कमरे में लौट आई। उसके पिता एक सीधे-सादे स्कूल शिक्षक थे, जबकि तान्या के पिता एक बड़े ठेकेदार थे। पैसे और बाहरी खूबसूरती के इस दोहरे दंभ ने तान्या और उसकी मां को पूरे परिवार पर हुक्म चलाने की आदत डाल दी थी। अनन्या ने अपने आंसू पोंछे और अपनी मां के पास जाकर बैठ गई।

मां ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, रंग तो ऊपर वाले की दी हुई चमड़ी भर है। असली खूबसूरती तो तेरे संस्कारों में और तेरी बुद्धि में है। तान्या नादान है, तू उसकी बातों को दिल पर मत लगाया कर। तू बस अपनी मेहनत पर भरोसा रख।”

अनन्या ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। उसने अपनी पढ़ाई को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया था। कॉलेज में अनन्या की पहचान एक होनहार, शांत और हर किसी की मदद करने वाली छात्रा के रूप में थी। प्रोफेसर उसकी तीक्ष्ण बुद्धि और असाइनमेंट्स की तारीफ़ करते नहीं थकते थे। दूसरी ओर, तान्या का सारा ध्यान सिर्फ़ इस बात पर रहता था कि कॉलेज में कौन से नए कपड़े पहनकर जाने हैं, कौन सा परफ़्यूम लगाना है और लड़कों के बीच कैसे आकर्षण का केंद्र बने रहना है।

एक दिन कॉलेज की कैंटीन में तान्या अपनी सहेलियों के साथ बैठी ज़ोर-ज़ोर से हंस रही थी। तभी अनन्या पास से गुज़री, उसके हाथ में मोटी-मोटी किताबें थीं। तान्या ने उसे देखते ही आवाज़ लगाई, “अरे देखो हमारी पढ़ाकू बहन! दिन-रात किताबें चाटती रहती है। अरे अनन्या, इतना पढ़कर क्या कलेक्टर बनेगी? शादी के बाज़ार में तो सूरत ही बिकती है। मुझ जैसी सुंदर लड़की को तो बिना पढ़े भी कोई राजकुमार मिल जाएगा, तू अपनी चिंता कर कि तुझे कौन पूछेगा!”

तान्या की सहेलियां ठहाका मारकर हंसने लगीं। अनन्या कुछ नहीं बोली। उसने सिर्फ़ पलटकर शांत नज़रों से तान्या को देखा और लाइब्रेरी की ओर बढ़ गई। तान्या को लगता था कि उसकी खूबसूरती ही उसका सबसे बड़ा कवच है और दुनिया की हर चीज़ उसके आगे झुकने के लिए मजबूर है। पर वह यह नहीं जानती थी कि अहंकार इंसान की आंखें इतनी अंधी कर देता है कि उसे अपने सामने का गड्ढा भी नज़र नहीं आता।

वसंत ऋतु की शुरुआत थी। कॉलेज में वार्षिक उत्सव की तैयारियां चल रही थीं। कैंपस में भारी भीड़ थी। तान्या अपनी नई ड्रेस पहनकर कॉरिडोर से गुज़र रही थी, उसके चेहरे पर वही चिरपरिचित घमंड की चमक थी। उसी समय, दूसरे विभाग का एक शांत और सीधा छात्र, रोहन, प्रोजेक्ट के कुछ मॉडल हाथ में लिए तेज़ी से सीढ़ियां उतर रहा था। अचानक मोड़ पर भीड़ के धक्के से उसका संतुलन बिगड़ा और वह तान्या से टकरा गया।

रोहन के हाथ से चार्ट पेपर गिर गए और तान्या की महंगी ड्रेस पर थोड़ी सी धूल लग गई। रोहन बेहद घबरा गया। उसने तुरंत हाथ जोड़कर झुकते हुए कहा, “आई एम सो सॉरी… भीड़ की वजह से धक्का लग गया, मुझे माफ़ कर दीजिए।”

तान्या का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। पूरे कैंपस के लड़के जिस लड़की से बात करने के लिए तरसते थे, उस लड़की से यह साधारण सा लड़का टकराने की हिम्मत कैसे कर बैठा? उसका अहंकार चोट खा गया। बिना एक पल सोचे, तान्या ने अपना हाथ उठाया और पूरे कॉरिडोर के सामने, सैकड़ों छात्र-छात्राओं की मौजूदगी में, रोहन के गाल पर ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया।

‘चटाख़’ की आवाज़ से पूरा कॉरिडोर सन्न रह गया।

“बदतमीज़! गंवार! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे छूने की? अपनी औकात देखी है? रास्ते पर देखकर चलने की तमीज़ नहीं है तो घर बैठा करो!” तान्या ने चीखते हुए उसे बुरी तरह ज़लील किया।

रोहन का चेहरा अपमान और शर्म से लाल हो गया। उसके आंसू निकल आए। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन भीड़ की हिकारत भरी नज़रों और तान्या के ज़हरीले शब्दों ने उसे अंदर तक तोड़ दिया। वह बिना कुछ बोले अपनी गिरी हुई फाइलें समेटकर वहां से भाग गया। तान्या ने अपनी ड्रेस को झाड़ा और अपनी सहेलियों की तरफ़ देखकर गर्व से मुस्कुराई, जैसे उसने कोई बहुत बड़ा बहादुरी का काम किया हो।

दूर खड़ी अनन्या ने यह सब देखा था। उसने आकर तान्या को समझाने की कोशिश की, “तान्या, तुमने यह बहुत ग़लत किया। वह लड़का माफ़ी मांग रहा था, गलती जानबूझकर नहीं हुई थी। किसी के आत्मसम्मान को इस तरह सबके सामने कुचलना ठीक नहीं है।”

“तू अपना यह फ़ालतू ज्ञान अपने पास रख अनन्या! मुझे मत सिखा कि किससे कैसे पेश आना है। अपनी शक्ल की तरह अपनी सोच भी छोटी मत रख,” तान्या ने झिड़क दिया और आगे बढ़ गई।

लेकिन नियति के फ़ैसले बड़े विचित्र होते हैं। अपमान की आग जब किसी के सीने में सुलगती है, तो वह विवेक को भस्म कर देती है। रोहन उस दिन के बाद कॉलेज नहीं आया, लेकिन उसके भीतर बदले की एक भयानक और अंधेरी आग जल रही थी।

तीन दिन बाद, शाम के वक़्त जब तान्या कॉलेज की पार्किंग की तरफ़ अपनी कार की ओर बढ़ रही थी, वहां सन्नाटा था। आसमान में काले बादल छाए हुए थे और हल्की बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। तान्या अपने फोन में मगन थी और कार का दरवाज़ा खोलने ही वाली थी कि तभी पीछे से तेज़ कदमों की आहट हुई।

उसने मुड़कर देखा। सामने एक लड़का खड़ा था, जिसका चेहरा मफ़लर से आधा ढका हुआ था। इससे पहले कि तान्या कुछ समझ पाती या चिल्ला पाती, उस लड़के ने अपनी जैकेट से तेज़ाब की एक बोतल निकाली और पूरी नफ़रत के साथ तान्या के चेहरे की ओर उछाल दी।

एक चीख… ऐसी रूह कंपा देने वाली चीख जो पूरे कैंपस के सन्नाटे को चीरती हुई दूर तक गूंज गई।

तान्या ज़मीन पर गिर पड़ी। जलन इतनी असहनीय थी जैसे किसी ने खौलता हुआ अंगार उसकी त्वचा पर उड़ेल दिया हो। धुएं की तीखी गंध और चमड़ी के जलने की भयंकर पीड़ा से वह तड़प उठी। हमलावर वहां से भाग चुका था। कुछ ही मिनटों में सुरक्षाकर्मी और अन्य छात्र वहां पहुंचे। अनन्या, जो पास की लाइब्रेरी से बाहर निकल रही थी, चीख सुनकर दौड़ी। ज़मीन पर तड़पती अपनी बहन को देखकर उसकी रूह कांप गई। बिना एक पल की देरी किए, अनन्या ने अपने दुपट्टे से उसका चेहरा ढका और चीख-चीखकर एम्बुलेंस बुलवाई।

अस्पताल के आईसीयू के बाहर दोनों परिवारों के लोग बेसुध बैठे थे। तान्या के माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल था। जिस बेटी के रूप पर वे कल तक नाज़ करते थे, आज उसी बेटी की जान सांसों की डोर पर झूल रही थी। पुलिस ने रोहन को अगले ही दिन गिरफ़्तार कर लिया, पर जो नुकसान हो चुका था, उसकी भरपाई किसी सज़ा से मुमकिन नहीं थी।

डॉक्टरों ने कई घंटों की सर्जरी के बाद बाहर आकर कहा, “हम उनकी जान बचाने में तो कामयाब रहे हैं, लेकिन… तेज़ाब बहुत तीव्र था। चेहरे का दाहिना हिस्सा, कान और गर्दन बुरी तरह झुलस चुके हैं। आंख बच गई है, पर चेहरे की पुरानी बनावट वापस नहीं आ सकती।”

जब तीन हफ़्ते बाद तान्या को होश आया और उसकी पट्टियां खोली गईं, तो उसने आईना मांगने की ज़िद की। डॉक्टरों और नर्सों ने मना किया, पर वह पागलों की तरह चीखने लगी। अंततः जब उसने वार्ड के ड्रेसिंग टेबल के आईने में अपना अक्स देखा, तो उसके मुंह से एक बेआवाज़ चीख निकली और वह वहीं फ़र्श पर ढह गई।

आईने में वह तान्या नहीं थी। वह खूबसूरत, गोरी, मदमस्त तान्या कहीं खो चुकी थी। उसकी जगह एक विकृत, झुलसी हुई, लाल और काली पड़ी बेजान त्वचा वाला चेहरा था।

उस दिन के बाद तान्या ने बात करना बंद कर दिया। उसने कमरे की सारी खिड़कियां बंद करवा दीं, परदे गिरवा दिए और किसी से भी मिलने से साफ़ इनकार कर दिया। जिन तथाकथित दोस्तों और आशिकों की फ़ौज उसके आगे-पीछे घूमती थी, वे एक बार औपचारिकता निभाने के बाद दोबारा कभी मुड़कर नहीं आए। वे सहेलियां जो उसकी हां में हां मिलाती थीं, अब उसके फोन तक नहीं उठाती थीं।

तान्या को महसूस हुआ कि जिस हुस्न पर उसने अपनी पूरी ज़िंदगी का गुरूर टिका रखा था, वह कितना खोखला था। लोग उसके व्यक्तित्व से नहीं, सिर्फ़ उसकी बाहरी त्वचा से जुड़े थे। वह भीतर ही भीतर घुटने लगी, डिप्रेशन के गहरे गर्त में समाने लगी।

एक दोपहर, जब कमरे में घुप्प अंधेरा था और तान्या दीवार की तरफ़ मुंह करके रो रही थी, कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला। कदमों की धीमी आहट हुई। तान्या ने बिना देखे गुस्से में तकिया फेंकते हुए कहा, “निकल जाओ यहां से! कोई मत आओ मेरे पास! मुझे अपनी इस डरावनी शक्ल के साथ अकेला छोड़ दो!”

पर वह शख्स पीछे नहीं हटा। एक नरम, ठंडा हाथ तान्या के कांपते कंधों पर आ टिका।

“तान्या…” एक बेहद शांत और जानी-पहचानी आवाज़ कमरे में गूंजी।

तान्या ने चौंककर देखा। सामने अनन्या खड़ी थी। उसके हाथ में किताबों का एक बस्ता था और चेहरे पर वही पुरानी, असीम ममता और आत्मीयता। पिछले एक महीने से जब पूरी दुनिया ने तान्या को भुला दिया था, अनन्या हर शाम अस्पताल और फिर घर आकर चुपचाप उसकी दवाइयों की पर्चियां संभालती थी, उसके लिए सूप बनाती थी और घंटों दरवाज़े के बाहर बैठकर उसके ठीक होने की प्रार्थना करती थी।

तान्या ने झटके से अपना चेहरा दोनों हाथों से छिपा लिया। उसकी उंगलियों के बीच से आंसुओं की धार बहने लगी। वह हिचकियों के बीच टूटी हुई आवाज़ में बोली, “अनन्या… तू क्यों आई है यहां? मत देख मुझे! देख, मेरा क्या हाल हो गया है। मैं बदसूरत हो गई हूं… एक चुड़ैल की तरह दिखती हूं। तू तो बहुत खुश होगी ना? मैं तुझे रोज़ तेरे सांवले रंग के लिए ताने मारती थी, तुझे नौकरानी कहती थी, तुझे दुत्कारती थी… देख, भगवान ने मुझे मेरे पापों की सज़ा दे दी! मेरे उस खोखले घमंड ने मेरी ज़िंदगी तबाह कर दी!”

तान्या फूट-फूटकर रोने लगी। उसका पूरा शरीर पश्चाताप की आग में थर-थर कांप रहा था।

अनन्या आगे बढ़ी। उसने तान्या के दोनों हाथों को, जिनसे वह अपना झुलसा हुआ चेहरा छुपा रही थी, बड़ी कोमलता से थामा और उन्हें धीरे से नीचे किया। उसने तान्या की आंखों में सीधी नज़रें डालीं। उन नज़रों में न कोई घृणा थी, न कोई उपहास, और न ही कोई झूठी दया। वहां सिर्फ़ और सिर्फ़ एक बहन का निस्वार्थ प्रेम था।

“तान्या, मेरी तरफ़ देख,” अनन्या ने बड़े धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा। “किसने कहा कि तू बदसूरत हो गई है? रूप-रंग तो सिर्फ़ एक लिबास है तान्या, जो आज है और कल किसी भी आंधी में उड़ सकता है। असली इंसान तो उस लिबास के अंदर रहता है। तू मेरी बहन है, और मेरा प्यार तेरे इस चेहरे की वजह से नहीं था। तूने जो किया, वह तेरी नादानी थी, तेरा भ्रम था। लेकिन उस भ्रम की इतनी बड़ी क़ीमत तूने चुका दी है। अब खुद को इस अंधेरे कमरे में क़ैद करके मत मार।”

तान्या ने सुबकते हुए कहा, “पर अब बचा ही क्या है अनन्या? कॉलेज छूट गया, लोग मुझे देखकर मुंह फेर लेते हैं, बच्चे डर जाते हैं… मैं जीकर क्या करूंगी? मेरा तो सब कुछ छिन गया।”

“कुछ नहीं छीना तान्या!” अनन्या ने उसकी आंखों के आंसू पोंछते हुए कहा। उसने अपना बैग खोला और उसमें से दो फॉर्म निकाले। “यह देख। सिविल सर्विसेज़ की कोचिंग का फॉर्म है। मैं जानती हूं कि तू पढ़ाई में कभी कमज़ोर नहीं थी, बस तेरा ध्यान भटक गया था। जब तक तू अपने अंदर की ताक़त को नहीं पहचानेगी, दुनिया तुझे कमज़ोर समझकर डराती रहेगी। तू मेरे साथ पढ़ेगी। हम दोनों मिलकर तैयारी करेंगे। तू अपने कर्मों से, अपनी योग्यता से दुनिया को दिखाएगी कि एक इंसान की पहचान उसके चेहरे के दाग़ नहीं, उसके इरादों की चमक तय करती है।”

तान्या ने अविश्वास से अनन्या को देखा। जिस बहन को उसने हमेशा ज़लील किया था, वही आज उसके टूटे हुए वजूद को तिनका-तिनका जोड़कर नई ज़िंदगी की नींव रख रही थी। तान्या ने आगे बढ़कर अनन्या को अपने सीने से लगा लिया और उसके कंधे पर सिर रखकर खूब रोई। उस दिन तान्या के आंसू सिर्फ़ दर्द के नहीं थे, वे उस मैल के बह जाने के आंसू थे जो बरसों से उसके दिल पर अहंकार बनकर जमा हुआ था।

उस दिन के बाद कपूर निवास की फिज़ाएं बदलने लगीं। कमरे के परदे हटा दिए गए, खिड़कियों से धूप अंदर आने लगी। तान्या ने धीरे-धीरे आईने का सामना करना सीखा। उसने अपने चेहरे के निशानों को अपनी पराजय नहीं, बल्कि अपने पुनर्जन्म का प्रतीक मान लिया। दोनों बहनों ने दिन-रात एक करके पढ़ाई शुरू की। अनन्या तान्या को नोट्स बनाकर देती, दोनों घंटों लाइब्रेरी में बैठतीं और एक-दूसरे से सवाल-जवाब करतीं। जब भी तान्या का हौसला डगमगाता, अनन्या चट्टान की तरह उसके पीछे खड़ी हो जाती।

वक़्त बीतता गया। घाव भरते गए और मेहनत रंग लाती गई।

चार साल बाद, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) का परिणाम घोषित हुआ। देश भर के हज़ारों परीक्षार्थियों के बीच उस दिन दो नाम सबसे ऊपर चमक रहे थे। अनन्या ने पूरे देश में बारहवीं रैंक हासिल की थी, और तान्या ने अड़तीसवीं रैंक पाकर भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के लिए क्वालिफ़ाई किया था।

प्रेस कॉन्फ्रेंस का दिन था। चंडीगढ़ के मुख्य सभागार में मीडिया के अनगिनत कैमरे और पत्रकार मौजूद थे। जब तान्या मंच पर आई, तो उसने कोई दुपट्टा या मास्क नहीं लगा रखा था। उसके चेहरे का वह जला हुआ हिस्सा साफ़ दिख रहा था, लेकिन उस चेहरे पर जो आत्मविश्वास, गरिमा और आत्मसम्मान का तेज था, उसने हॉल में मौजूद हर शख्स को नतमस्तक कर दिया। पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

एक पत्रकार ने माइक आगे बढ़ाते हुए पूछा, “तान्या जी, इस भयानक हादसे के बाद, जब इंसान पूरी तरह टूट जाता है, आप यहां तक कैसे पहुंचीं? आपकी इस अभूतपूर्व सफलता का राज़ क्या है?”

तान्या ने मुस्कुराते हुए माइक थामा। उसने मंच के कोने में शांत खड़ी अनन्या की तरफ़ देखा। तान्या की आंखें भर आईं, पर उसकी आवाज़ में एक चट्टानी मज़बूती थी।

“मेरी इस सफलता की वजह वह नहीं है जो मैंने पाया, बल्कि वह है जो मैंने खोया,” तान्या ने बोलना शुरू किया। “मैंने अपना वह रूप खो दिया जिस पर मुझे कभी बहुत घमंड था। उस हादसे ने मेरा वह चेहरा छीन लिया जो मुझे दूसरों को नीचा दिखाने का वहम देता था। लेकिन उस राख के ढेर से मुझे मेरी बहन अनन्या ने बाहर निकाला। उसने मुझे सिखाया कि दुनिया में गोरा या सांवला रंग कुछ नहीं होता। किसी का चेहरा सुंदर हो और मन में ज़हर हो, तो वह इंसान समाज के लिए अभिशाप है। और किसी का रंग सांवला हो लेकिन दिल में करुणा और समर्पण हो, तो वह ईश्वर का साक्षात रूप होता है।”

तान्या ने आगे बढ़कर अनन्या का हाथ पकड़ा और उसे मंच के केंद्र में ले आई।

“आज मैं जो कुछ भी हूं, अपनी इस बहन की बदौलत हूं। इसने मुझे सिर्फ़ नई ज़िंदगी नहीं दी, बल्कि मुझे एक सच्चा इंसान बनाया। मैं आज हर उस इंसान से कहना चाहती हूं जो अपने रूप, पैसे या ओहदे के घमंड में चूर होकर दूसरों को कमतर आंकते हैं—साहब, शीशा टूटता है तो सिर्फ़ चेहरा बिखरता है, पर जब घमंड टूटता है तो रूह तक कांप जाती है। अपनी पहचान अपने कर्मों से बनाइए, अपनी चमड़ी से नहीं।”

पूरे हॉल ने खड़े होकर दोनों बहनों के लिए तालियां बजाईं। तान्या के पिता और मां की आंखों से पश्चाताप और गर्व के मिले-जुले आंसू बह रहे थे। आज घर की दोनों बेटियां समाज के लिए एक मिसाल बन चुकी थीं।

सच्ची खूबसूरती चेहरे की चमक में नहीं, बल्कि कर्मों की पवित्रता और दिलों को जोड़ने वाले प्रेम में होती है। बाहरी रंग-रूप तो मौसम की तरह बदल जाता है, लेकिन आत्मा का सौन्दर्य युगों-युगों तक महकता रहता है।

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