आज माँ की बरसी है पूरा एक साल बीत गया
ऐसा लग रहा है कल ही तो माँ मेरे साथ थी वो मुझ से बाते कर रही थी
कभी कभी मेरी किसी बात पर डांट भी देती थी समझा रही थी
इतना गुस्सा नहीं करते बिट्टो, देख पति पत्नि का रिश्ता काँच की तरह नाजुक होता है और पत्थर की तरह कठोर
बस एक दूसरे पर विश्वास और सम्मान कभी खत्म नहीं होने देना चाहिए।
मैं उनकी बातें सुन जरूर रही थी लेकिन मेरे मन में अभी भी
विवेक के लिए गुस्सा इतना भरा हुआ था कि माँ की कही कोई भी बात मेरे मन को शांत नहीं कर रही थी
सब के समझाने का कोई असर मुझ पर हो ही नहीं रहा था विवेक भी एक दो बार आए मुझे मानने के लिए लिकिन मुझे तो अपनी जिद्द मनवानी थी
बोल दिया साफ साफ , अपनी माँ और बहिन से रिश्ता खत्म कर के आओ तब ही साथ चलूँगी
विवेक किसी भी हाल तैयार नहीं था अपना परिवार छोड़ने के लिए, सही भी था आखिर उनकी गलती भी कुछ नहीं थी
मैं ही हर बात को ज्यादा बड़ा चढ़ा कर सोच लेती और फिर उसे हो सच मान लेती सब मेरी इस आदत को जानते थे
उस दिन भी यही हुआ विवेक की बहिन ने मुझसे बिना पूछे मेरी एक साड़ी पहन ली क्यूंकि वो ज्यादा कपड़े नहीं लाई थी और अचानक किसी रिस्तेदार के जाना पड़ गया
बस फिर मेरा गुस्सा फट पड़ा उसे देखते ही मैने बोलना शुरू कर दिया जो मन में आया उसे सुनाया वो बेचारी समझाने की कोशिश करती रही पर गुस्से में इंसान को कुछ सुनाई भी कहा देता है
मुझे भी कुछ सुनाई दिया और ना ही दिखाई दिया
उस पर विवेक ने अपनी बहन का साथ दिया जो मेरे लिए आग में घी का काम कर गया और मै आ गई अपना सामान ले कर मायके।
माँ रोज समझाती,पर मेरे लिए अब यह जिद्द बन गई थी कि विवेक जब तक रिश्ता खत्म नहीं करेगा मैं नहीं जाऊंगी
चार महीने बीत गए अब तो विवेक का आना भी कम हो गया था और फोन भी कभी कभार ही करता था
मेरा गुस्सा और घमंड अंदर ही अंदर दम तोड़ रहा था लेकिन फिर भी मैं झुक तो नहीं सकती थी।
उस दिन माँ ने मुझे एक बार फिर समझाने की कोशिश की
“गुस्सा एक दिन सब बर्बाद कर देता है मेरी बिट्टो”अभी भी समय है दामाद जी से बात कर ले वो बहुत प्यार करते हैं तुझे
सब भूल जायेंगे गलती तेरी ही थी ।
अपनी खुद की मम्मी को विवेक का साथ देते देख मेरा दबा गुस्सा फिर से भड़क गया और मैने बिना कुछ सोचे मम्मी को जवाब दे दिया
“आप को अब मुझसे कोई प्यार नहीं रहा है बोझ हो गई हूँ आप पर , आखिर आप को भी समाज की ज्यादा चिंता है मेरी नहीं”और भी बहुत कुछ कहा और निकल गई घर से …
फोन भी नहीं लाई पूरे दो घंटे एक पार्क में बैठी रही
उधर घर में मेरे निकलते ही माँ को हार्ट अटैक आ गया जैसे तैसे पड़ोसियों ने उनको हॉस्पिटल पहुंचाया मुझे फोन करते रहे पर मेरा फोन तो था ही नहीं मेरे पास,फिर विवेक को फोन किया
वो तुरंत आ गया आधे घंटे का रास्ता ही था उसके ऑफिस से मेरे घर का ,
जब मैं पहुंची तो माँ ने आखिर बार आँखे खोली और बस इतना कहा
“गुस्सा एक दिन सब बर्बाद कर देगा, मैं जा रही हूं पर तू अपना घर बसा, गुस्से को खुद पर इतना हावी मत होने दे बिट्टो।”
बस उस दिन मेरे गुस्से ने भी अंतिम सांस ली
मगर क्या फायदा मेरे गुस्से और थोड़ी सी लापरवाही ने मेरी माँ को मुझ से हमेशा के लिए दूर कर दिया।
उस दिन विवेक ने मुझे गले लगाया तो मैं फिर कभी उन से दूर होने की हिम्मत ही नहीं कर पाई,
माँ चली गई साथ मैं मेरा गुस्सा और घमंड भी अपने साथ ले गई
और दे गई अपनी सहनशीलता और विश्वास।
© रेणु सिंह राधे
कोटा राजस्थान