गुस्सा एक दिन सब बर्बाद कर देगा – सुदर्शन सचदेवा

“तुमसे एक छोटी-सी बात भी ठीक से नहीं हो सकती!”

अजय की तेज आवाज सुनकर पूरा घर सहम गया।

रसोई में खड़ी उसकी पत्नी नेहा के हाथ रुक गए। कमरे में बैठी सास ने अखबार नीचे रख दिया और दोनों बच्चे चुपचाप एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

बात सिर्फ इतनी थी कि नेहा से अजय की जरूरी फाइल समय पर नहीं मिल पाई थी।

नेहा ने धीमी आवाज में कहा, “मैंने जान-बूझकर नहीं किया। सुबह बच्चों को स्कूल भेजने में देर हो गई और फिर माँजी की दवाई लेने चली गई थी।”

लेकिन अजय का गुस्सा उस समय किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था।

“हर बार तुम्हारे पास कोई न कोई बहाना होता है!”

नेहा की आँखें भर आईं।

माँ ने समझाया, “बेटा, गुस्सा मत करो। घर में सबके सामने इस तरह बोलना ठीक नहीं।”

अजय ने झुँझलाकर कहा, “आप लोग मुझे ही गलत समझते हैं। इस घर में मेरी कोई कद्र नहीं!”

यह कहकर वह घर से निकल गया।

उस दिन पहली बार नेहा ने महसूस किया कि अजय के गुस्से ने केवल एक फाइल का मामला नहीं बिगाड़ा था, बल्कि उनके बीच की शांति को भी चोट पहुँचा दी थी।

अगले कुछ दिनों तक घर का माहौल बदला-बदला रहा। अजय छोटी-छोटी बातों पर नाराज़ हो जाता। कभी खाने में नमक कम होने पर, कभी बच्चों के शोर पर, कभी बिजली का बिल ज्यादा आने पर।

धीरे-धीरे बच्चे भी पिता से डरने लगे।

एक दिन उनका छोटा बेटा आरव स्कूल से आया और सीधे अपनी दादी के पास जाकर बैठ गया।

दादी ने पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

आरव ने मासूमियत से कहा, “दादी, पापा आज घर पर नहीं हैं ना?”

“क्यों?”

“क्योंकि मुझे उनसे एक बात पूछनी थी… लेकिन जब पापा गुस्सा करते हैं तो मुझे डर लगता है।”

दादी का दिल भर आया।

उन्होंने अजय को समझाने की कोशिश की।

“बेटा, घर में सबसे बड़ा होने का मतलब यह नहीं कि सब तुमसे डरें। परिवार वह जगह है जहाँ इंसान अपने डर भूलकर लौटता है। अगर तुम्हारे गुस्से से तुम्हारे बच्चे तुमसे बात करने से डरने लगें, तो सोचो तुम क्या खो रहे हो।”

अजय कुछ नहीं बोला।

लेकिन अगले दिन फिर वही हुआ।

इस बार नेहा से एक गिलास टूट गया।

अजय का गुस्सा फिर भड़क उठा।

“तुम्हें तो किसी चीज की परवाह ही नहीं!”

नेहा ने पहली बार पलटकर कहा, “बस अजय! बहुत हो गया। गिलास टूटने का दुख मुझे भी है, लेकिन तुम्हारे गुस्से ने इस घर के रिश्ते तोड़ने शुरू कर दिए हैं। बच्चे तुमसे डरते हैं, माँ तुम्हारे सामने बोलने से डरती हैं और मैं हर वक्त सोचती हूँ कि न जाने अगली बार किस बात पर तुम्हारा गुस्सा फूट पड़ेगा।”

अजय चुप रह गया।

नेहा की आँखों से आँसू बह रहे थे।

“एक दिन तुम्हारा यह गुस्सा सब बर्बाद कर देगा, अजय। उस दिन शायद तुम्हारे पास पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।”

ये शब्द अजय के मन में गहरे उतर गए।

उसी रात अचानक उसकी माँ की तबीयत खराब हो गई। उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा।

अजय घबरा गया।

वह अस्पताल के गलियारे में अकेला बैठा था। तभी उसकी नजर नेहा और बच्चों पर पड़ी। नेहा पूरी रात उसकी माँ के पास बैठी रही और बच्चे चुपचाप दादी के लिए प्रार्थना कर रहे थे।

अजय की आँखें नम हो गईं।

उसे समझ आया कि जिन लोगों पर वह अपना गुस्सा निकालता रहा, वही लोग उसके मुश्किल समय में उसके साथ खड़े थे।

सुबह डॉक्टर ने बताया कि माँ अब खतरे से बाहर हैं।

अजय ने सबसे पहले नेहा का हाथ पकड़ लिया।

“मुझे माफ कर दो।”

नेहा ने उसकी ओर देखा।

अजय की आवाज भर्रा गई।

“मैंने अपने गुस्से को अपना स्वभाव समझ लिया था। मुझे लगता था कि गुस्सा करना मेरा अधिकार है, लेकिन आज समझ आया कि मेरे गुस्से की सजा मेरा पूरा परिवार भुगत रहा था। मैं तुम्हें, बच्चों को और माँ को खो सकता था।”

तभी आरव दौड़कर अपने पिता से लिपट गया।

“पापा, अब आप गुस्सा नहीं करोगे ना?”

अजय ने बेटे को कसकर गले लगा लिया।

“नहीं बेटा… अब कोशिश करूँगा कि मेरा गुस्सा मेरे परिवार से बड़ा कभी न हो।”

माँ ने मुस्कुराकर कहा, “गुस्सा आए तो कुछ देर चुप रहना, लेकिन अपने अपनों से रिश्ता मत तोड़ना।”

उस दिन अजय ने जाना कि गुस्सा कभी घर नहीं बनाता, वह केवल दीवारें खड़ी करता है।

और सच तो यह है कि रिश्ते टूटने की आवाज नहीं होती… वे धीरे-धीरे दूर होते हैं। इसलिए गुस्से में बोले गए शब्दों से पहले एक बार जरूर सोचिए—कहीं आपका आज का गुस्सा आपके अपनों से आपका कल तो नहीं छीन रहा?

सुदर्शन सचदेवा

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