प्रतीक और मानसी के कदम ठिठक गए। राजेंद्र जी ने अपने कुर्ते की जेब से एक बड़ा सा खाकी रंग का लिफाफा निकाला और प्रतीक के हाथों में थमाते हुए बिल्कुल शांत स्वर में कहा, “बेटियां जब ससुराल जाती हैं तो उन्हें विदाई दी जाती है, आज हमारा बेटा अपनी नई दुनिया बसाने जा रहा है। यह तुम्हारे पिता की तरफ से ‘बेटे की विदाई का शगुन’ है। अभी मत खोलना, जब नए घर में गृहप्रवेश कर लो और थकान उतर जाए, तब फुर्सत से बैठकर इसे पढ़ना। खुश रहो।”
आंगन के एक कोने में रखे तख्त पर बैठी अरुणा जी चुपचाप अपनी बहू की इस चहलकदमी को निहार रही थीं। उनकी आंखों में न तो कोई क्रोध था और न ही कोई शिकायत, बस एक गहरा सूनापन था जो धीरे-धीरे उनके पूरे अस्तित्व को निगलता जा रहा था। कल रविवार था, और कल सुबह ही पैकर्स एंड मूवर्स का बड़ा ट्रक दरवाजे पर आकर खड़ा हो जाने वाला था।
दोपहर के करीब जब अरुणा जी रसोई में सबके लिए अदरक वाली चाय छान रही थीं, तभी मानसी के कमरे से उसकी खिलखिलाहट की आवाज आई। दरवाजा अधखुला था। मानसी अपनी किसी सहेली से फोन पर बात कर रही थी। उसकी आवाज में एक अजीब सा उत्साह था, “अरे नेहा, तुझे क्या बताऊं! पूरे डेढ़ साल से मैं प्रतीक के पीछे पड़ी थी कि किसी मॉडर्न सोसाइटी में अपना अलग फ्लैट लेते हैं। आखिर मेरी मेहनत रंग लाई। राजपुर रोड के पास एक बहुत ही शानदार और पॉश गेटेड कम्युनिटी में चार बेडरूम का पेंटहाउस लिया है। क्लब हाउस, स्विमिंग पूल, जिम—सब कुछ है वहां। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अब मैं अपनी मर्जी की मालकिन रहूंगी। जब मन करेगा उठूंगी, जो मन करेगा पहनूंगी, कोई पूछने-टोकने वाला नहीं होगा।” फोन रखने के बाद मानसी ने अपनी अलमारी से साड़ियां निकालते हुए धीमे से गुनगुनाना शुरू कर दिया—जैसे किसी पिंजरे के पंछी को अचानक खुले आसमान का टिकट मिल गया हो।
रसोई के दरवाजे पर चाय की ट्रे पकड़े खड़ी अरुणा जी के हाथ कांप गए। गर्म चाय की कुछ बूंदें छलक कर उनकी हथेली पर गिर गईं, लेकिन उस जलन से कहीं ज्यादा टीस उनके सीने में उठी थी। उन्हें वह शाम याद आ गई जब ठीक एक हफ्ते पहले प्रतीक ने ऑफिस से लौटकर बिना उनकी आंखों में देखे, जूते के फीते खोलते हुए बड़ी ही साधारण सी आवाज में कहा था, “मम्मी-पापा, कंपनी की तरफ से हाउसिंग लोन की अच्छी स्कीम मिली थी, तो हमने शहर के दूसरे हिस्से में एक फ्लैट ले लिया है। अगले रविवार को हम लोग वहां शिफ्ट हो रहे हैं।”
प्रतीक के पीछे खड़ी मानसी ने उस वक्त एक शब्द भी नहीं कहा था। वह बस अपने नाखूनों को देखती रही थी। अरुणा जी और उनके पति राजेंद्र जी को तो जैसे काठ मार गया था। राजेंद्र जी, जो उस वक्त अखबार पढ़ रहे थे, उन्होंने धीरे से अपना चश्मा उतारा, प्रतीक के चेहरे की तरफ एक लंबी नजर डाली और बिना कोई सवाल किए चुपचाप उठकर अपने कमरे में चले गए।
शाम को जब अरुणा जी ने अपने कमरे में राजेंद्र जी के कंधे पर हाथ रखा, तो उनका स्वर भर्राया हुआ था, “सुनिए, हमसे आखिर ऐसी कौन सी चूक हो गई? मानसी को हमने कभी बहू नहीं, अपनी बेटी तृप्ति की तरह ही रखा। इतना बड़ा घर है, बाग-बगीचा है, घर के काम के लिए दो-दो नौकर लगे हैं। आपकी रिटायरमेंट के बाद पैसे-रुपए की भी कोई कमी नहीं रही। मानसी पर न तो कभी रसोई की जिम्मेदारी थोपी, न ही उसके पहनने-ओढ़ने या बाहर आने-जाने पर कभी कोई पाबंदी लगाई। हम दोनों ने तो अपनी जिंदगी का एक ही उसूल बनाया था कि बच्चों की गृहस्थी में कभी दखल नहीं देंगे। फिर भी मानसी को हमारे साथ रहना कैद क्यों लगने लगा? और हमारा प्रतीक… वह तो हमारी रग-रग से वाकिफ है, उसने भी एक बार हमसे राय लेना जरूरी नहीं समझा? फैसले की खबर दी, इजाजत नहीं मांगी।”
राजेंद्र जी खिड़की के बाहर ढलते सूरज को देख रहे थे। उनकी आवाज में एक अजीब सी गंभीरता और ठहराव था, “अरुणा, जब पेड़ की टहनियां खुद को जड़ों से ज्यादा मजबूत समझने लगें, तो उन्हें हवा के झोंकों का सामना करने के लिए छोड़ देना चाहिए। अगर हम आज उन्हें अपने अधिकार या भावनाओं की दुहाई देकर रोक भी लेंगे, तो शरीर तो इस घर में रह जाएगा, लेकिन मन हमेशा उस पेंटहाउस में भटकता रहेगा। जबरन रोके गए रिश्तों में सिर्फ घुटन होती है, प्रेम नहीं।”
अरुणा जी की आंखों से आंसू बह निकले। उन्हें अपनी बेटी तृप्ति और दामाद निखिल की याद हो आई, जो पुणे में एक बड़ी आईटी कंपनी में काम करते थे। उनकी दो जुड़वां बेटियां थीं—आर्या और सिया। निखिल हर हफ्ते फोन करके राजेंद्र जी के घुटनों के दर्द और अरुणा जी की शुगर की दवाइयों का हाल लेता था। वह हमेशा कहता, “पापा, बस दो साल का प्रोजेक्ट और है, फिर मैं देहरादून ट्रांसफर ले लूंगा, आपके पास ही रहेंगे।” कहां एक तरफ पराया होकर भी दामाद माता-पिता की छांव के लिए तरस रहा था, और कहां सगा बेटा उसी छांव को बोझ समझकर दूर भाग रहा था।
अगले दिन शनिवार था। घर का माहौल बेहद भारी था। नन्हा आरव कभी इस कमरे में दौड़ता, कभी उस कमरे में। वह बार-बार अपने खिलौनों का डिब्बा उठाकर दादाजी के पास लाता और अपनी तोतली आवाज में पूछता, “दादू, आप अपना चश्मा और छड़ी पैक क्यों नहीं कर रहे? मम्मी कह रही है कि नए घर में बहुत बड़ा पार्क है। आप और दादी मेरे साथ झूला झूलने चलोगे न? दादी, अपने कपड़े भी इस बड़े से डिब्बे में रख लो न!”
आरव की मासूम बातों पर मानसी तुरंत आकर उसका हाथ पकड़ लेती और बहाने से उसे दूसरे कमरे में ले जाती, “आरव बेटा, दादू-दादी को अभी परेशान मत करो, चलो अपने खिलौने समेटो।” अरुणा जी समझ रही थीं कि बेटा-बहू के मन में यह डर बैठा हुआ है कि कहीं पोते के मोह में पड़कर बूढ़े मां-बाप भी साथ चलने की जिद न कर बैठें।
अरुणा जी ने अपने आंसू पोंछते हुए खुद को संभाला और मानसी के पास जाकर बड़े स्नेह से कहा, “बहू, गृहस्थी बसाने में बहुत सी छोटी-बड़ी चीजों की जरूरत पड़ती है। भंडार घर में चांदी के बर्तन, नए डिनर सेट और जो भी सामान तुम्हें अपने नए घर के लिए पसंद हो, बिना किसी संकोच के रख लो।” मानसी ने एक हल्की सी मुस्कान के साथ हामी भरी और अपनी पसंद के कई कीमती शोपीस और बर्तन भी कार्टन में रखवा लिए।
रात के खाने पर रसोई में पनीर की सब्जी और खीर बनी थी—प्रतीक की सबसे पसंदीदा। लेकिन डाइनिंग टेबल पर जैसे मातम पसरा हुआ था। चम्मचों के आपस में टकराने की आवाज के अलावा कोई कुछ नहीं बोला। राजेंद्र जी ने तो सिरदर्द का बहाना बनाकर अपने कमरे का दरवाजा ही बंद कर लिया था। अरुणा जी ने भी बस दो निवाले पानी के साथ निगले और उठ गईं।
रात के करीब दो बजे जब अरुणा जी की आंख खुली, तो उन्होंने देखा कि राजेंद्र जी अपनी पुरानी सागौन की मेज पर टेबल लैंप जलाए कुछ लिख रहे हैं। उनके पास कुछ फाइलें और स्टाम्प पेपर जैसे कागजात रखे थे। पिछले चार-पांच दिनों से वह रोज देर रात तक जागकर कुछ लिखते रहते थे।
अरुणा जी ने उनके पास जाकर धीरे से पूछा, “इतनी रात गए क्या लिख रहे हैं? तबीयत खराब हो जाएगी आपकी।”
राजेंद्र जी ने कलम बंद की और अरुणा जी का हाथ अपने हाथों में लेकर बड़े ही शांत स्वर में पूछा, “अरुणा, जिंदगी के पैंतीस साल हमने एक साथ हर सुख-दुख में बिताए हैं। आज अगर मैं हम दोनों के भविष्य के लिए कोई बड़ा और कड़ा फैसला लूं, तो क्या तुम बिना कोई सवाल किए मेरा साथ दोगी?”
अरुणा जी ने अपने पति की आंखों में झांका। वहां दुख तो था, पर कमजोरी बिल्कुल नहीं थी। उन्होंने भीगे नयनों से मुस्कुराते हुए कहा, “आपने आज तक जो भी किया, परिवार की भलाई के लिए ही किया। आपकी परछाई बनकर जीना ही मेरा धर्म रहा है, आप जो भी तय करेंगे, मुझे सिर झुकाकर मंजूर होगा।”
रविवार की सुबह अपने साथ एक अजीब सा सन्नाटा लेकर आई। बाहर ट्रक खड़ा था और मजदूर एक-एक करके सामान लाद रहे थे। राजेंद्र जी बरामदे में अपनी पुश्तैनी आरामकुर्सी पर शांत भाव से बैठे थे। यह वही कुर्सी थी जिस पर कभी उनके पिता बैठा करते थे। घर की दीवारें, जिन पर कभी आरव की किलकारियां और प्रतीक के बचपन की तस्वीरें टंगी थीं, अब सूनी और बेजान नजर आ रही थीं।
दोपहर के बारह बजे तक सारा सामान ट्रक में लद चुका था। प्रतीक और मानसी तैयार होकर बाहर आए। आरव अपनी दादी की साड़ी का पल्लू पकड़कर रोने लगा, “दादी, मैं आपके बिना नहीं जाऊंगा, मुझे रात को कहानी कौन सुनाएगा?” अरुणा जी के सब्र का बांध टूट गया। वह पोते को सीने से लगाकर फूट-फूट कर रो पड़ीं।
प्रतीक और मानसी ने आगे बढ़कर अरुणा जी और राजेंद्र जी के पैर छुए। प्रतीक की नजरें जमीन में गड़ी हुई थीं, उसमें अपने पिता की आंखों में देखने का साहस नहीं था। वह बस इतना ही कह पाया, “पापा, हम निकल रहे हैं। पहुंचकर फोन करूंगा, और हर वीकेंड पर हम लोग आपसे मिलने आया करेंगे।”
जैसे ही वे तीनों मुख्य द्वार की तरफ बढ़े, राजेंद्र जी अपनी आरामकुर्सी से उठे और आवाज लगाई, “प्रतीक, एक मिनट रुको बेटा।”
प्रतीक और मानसी के कदम ठिठक गए। राजेंद्र जी ने अपने कुर्ते की जेब से एक बड़ा सा खाकी रंग का लिफाफा निकाला और प्रतीक के हाथों में थमाते हुए बिल्कुल शांत स्वर में कहा, “बेटियां जब ससुराल जाती हैं तो उन्हें विदाई दी जाती है, आज हमारा बेटा अपनी नई दुनिया बसाने जा रहा है। यह तुम्हारे पिता की तरफ से ‘बेटे की विदाई का शगुन’ है। अभी मत खोलना, जब नए घर में गृहप्रवेश कर लो और थकान उतर जाए, तब फुर्सत से बैठकर इसे पढ़ना। खुश रहो।”
प्रतीक ने कांपते हाथों से लिफाफा लिया और कार में बैठ गया। कार का इंजन स्टार्ट हुआ और देखते ही देखते धूल का एक गुबार छोड़कर गाड़ी कॉलोनी के मोड़ से ओझल हो गई।
अरुणा जी दरवाजे की चौखट पकड़कर वहीं बैठ गईं और बिलख-बिलख कर रोने लगीं, “पूरा घर सूना कर गए जी… हम किसके सहारे इस बड़े से मकान में जिएंगे? हमारी क्या गलती थी?”
राजेंद्र जी ने आगे बढ़कर अरुणा जी को उठाया, उन्हें अंदर ले जाकर पानी पिलाया और उनके आंसू पोंछते हुए बोले, “अरुणा, रोने का वक्त खत्म हो गया। अब जरा हिम्मत से काम लो और जाकर एक कप कड़क चाय बनाओ। उसके बाद हमें भी अपनी तैयारी करनी है।”
अरुणा जी ने चौंक कर देखा, “कैसी तैयारी?”
राजेंद्र जी ने गहरी सांस ली और बोले, “अरुणा, हम इस मकान में घुट-घुटकर और बच्चों के आने का इंतजार करते हुए अपनी बाकी की जिंदगी नहीं गुजारेंगे। मैंने भी हमारे जाने का इंतजाम कर लिया है। तुम अभी के अभी हमारे पहनने के कुछ कपड़े, अपनी जरूरी दवाइयां, गहने और बैंक की पासबुक दो सूटकेस में पैक कर लो। बाकी का सारा फर्नीचर और सामान यहीं रहने दो।”
अरुणा जी हतप्रभ रह गईं, “लेकिन हम जा कहां रहे हैं? और यह इतना बड़ा घर किसके भरोसे छोड़कर जाएंगे?”
“मैंने सब सोच लिया है,” राजेंद्र जी ने दृढ़ता से कहा, “मैंने कल ही हमारे वकील और मेरे बचपन के दोस्त केशव से बात करके इस घर को एक ट्रस्ट के जरिए अनाथ और बेसहारा बच्चों के एक छोटे से स्कूल और पुस्तकालय के लिए लीज पर दे दिया है। घर का स्वामित्व हमारे ही नाम रहेगा, लेकिन अब इस आंगन में सन्नाटा नहीं रहेगा, बल्कि उन बच्चों की किलकारियां गूंजेंगी जिन्हें वाकई छत और ज्ञान की जरूरत है। बेटी तृप्ति और दामाद निखिल से भी मैंने फोन पर बात कर ली थी। वे दोनों तो हमें पुणे बुला रहे थे, लेकिन मैंने उन्हें समझा दिया कि हम किसी पर आश्रित नहीं होना चाहते। अपनी जमा-पूंजी से मैंने दोनों नातिनों आर्या और सिया के नाम से फिक्स्ड डिपॉजिट कर दिए हैं, और अपने लिए इतना पैसा रखा है कि हम दोनों किसी के आगे हाथ फैलाए बिना सम्मान से जी सकें।”
अरुणा जी की आंखें फटी की फटी रह गईं, “पर हम रहेंगे कहां?”
राजेंद्र जी के चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान उभरी, “याद है अरुणा, चार साल पहले जब हम हिमाचल की कांगड़ा घाटी के पास पालमपुर गए थे, तो वहां चाय के बागानों के पास हमारे मित्र कर्नल वर्मा के बगल में हमने एक छोटा सा दो कमरों का कॉटेज खरीदा था? जहां से धौलाधार की बर्फीली पहाड़ियां साफ दिखती हैं। कर्नल वर्मा ने वहां की साफ-सफाई करवा दी है और एक भरोसेमंद माली और रसोइए का भी इंतजाम कर दिया है। वहां की शांत वादियों में हम बागवानी करेंगे, किताबें पढ़ेंगे और अपने लिए जिएंगे। आज शाम की ही ट्रेन से हमारा रिजर्वेशन है।”
अरुणा जी ने देखा कि उनके पति ने अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए कितना बड़ा और ठोस कदम उठाया था। माता-पिता का फर्ज उन्होंने बखूबी निभाया था, और अब जब बच्चों को उनकी जरूरत नहीं रही, तो उन्होंने खुद को लाचार बनाने के बजाय एक नई राह चुन ली थी। अरुणा जी ने अपने आंसू पोंछे और उठकर सूटकेस निकालने चल दीं। शाम पांच बजे तक घर के मुख्य द्वार पर ताला लगाकर, चाबी अपने वकील मित्र केशव को सौंपकर और अपने पुराने मोबाइल सिम कार्ड बदलकर, दोनों पति-पत्नी एक नई यात्रा पर निकल पड़े।
उधर, नए पेंटहाउस में दो दिन तक तो मानसी और प्रतीक सामान जमाने और पार्टी करने में व्यस्त रहे। मानसी ने पूरे घर को अपने हिसाब से सजाया, लेकिन तीसरे दिन से ही उसे हकीकत का एहसास होने लगा। सुबह उठते ही न तो मेज पर गर्म चाय मिलती थी, और न ही आरव को स्कूल के लिए तैयार करने में दादी का दुलार। आरव दिन भर गुमसुम रहता और रात को सोते वक्त दादू-दादी को याद करके रोता। कामवाली बाई के नखरे और सोसाइटी के अजनबी माहौल में मानसी को पहली बार पता चला कि जिस व्यवस्था को वह ‘बंधन’ समझ रही थी, वह असल में अरुणा जी का निस्वार्थ परिश्रम और सुरक्षा कवच था।
बुधवार की शाम जब प्रतीक ऑफिस से थका-हारा लौटा, तो उसकी नजर अपनी अलमारी में रखे उस खाकी लिफाफे पर पड़ी, जो पापा ने विदाई के वक्त दिया था। उसने मानसी को पास बुलाया और लिफाफा खोला।
अंदर घर के कुछ कानूनी कागजात थे और साथ में राजेंद्र जी के हाथ का लिखा एक लंबा पत्र। प्रतीक ने पढ़ना शुरू किया—
“मेरे प्रिय प्रतीक और मानसी,
जब तुम यह पत्र पढ़ रहे होगे, तब तक तुम दोनों अपनी नई दुनिया में बस चुके होगे। हमारी तरफ से तुम्हें तुम्हारे सपनों के घर की बहुत-बहुत बधाई। बेटे, माता-पिता होने के नाते हमारा कर्तव्य तुम्हें इस काबिल बनाना था कि तुम अपने पैरों पर खड़े हो सको और अपने फैसले खुद ले सको। जब तुमने बिना हमसे चर्चा किए अलग घर लेने का निर्णय सुनाया, तो पहले तो मन को बहुत ठेस पहुंची, लेकिन फिर मुझे समझ आया कि शायद हमारी छत्रछाया अब तुम्हें अपनी आजादी में बाधक लगने लगी है।
हम दोनों ने कभी तुम पर अपनी इच्छाएं नहीं थोपीं, तो आज अपने बुढ़ापे का वास्ता देकर तुम्हारे पंख कैसे काट सकते हैं? लेकिन बेटा, जिस घर की दीवारों में तुम्हारी और आरव की यादें बसी हैं, वहां अकेले बैठकर तुम्हारे लौटने की राह देखना हमारे स्वाभिमान को गवारा नहीं है। जब तुम यह खत पढ़ रहे होगे, मैं और तुम्हारी मां देहरादून से बहुत दूर अपनी एक नई जिंदगी शुरू कर चुके होंगे। हमारे पुराने नंबर अब बंद हैं, हमें ढूंढने की कोशिश मत करना।
देहरादून वाले घर में अब एक बाल-पुस्तकालय और स्कूल चलेगा। घर के कागजात वकील केशव चाचा के पास हैं, हमारे बाद वह मकान तुम्हारा और आरव का ही रहेगा। हमने अपनी जिंदगी का हर फर्ज पूरी ईमानदारी से निभाया है, अब हम अपनी बची हुई उम्र प्रकृति की गोद में और आत्मसम्मान के साथ जीना चाहते हैं। बस एक ही सीख देना चाहता हूं—स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में बहुत बारीक फर्क होता है। अपने बेटे आरव को वो संस्कार जरूर देना कि कल को जब तुम्हारे कंधे झुकें, तो तुम्हें किसी को विदाई का ऐसा लिफाफा न देना पड़े।
तुम्हारे मम्मी-पापा।”
खत खत्म होते-होते प्रतीक के हाथों से कागज छूटकर जमीन पर गिर गया। उसकी आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे। मानसी ने जब वह पत्र पढ़ा, तो उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। जिस आजादी के लिए उसने अपने सास-ससुर के मौन समर्पण को ठुकराया था, आज वही आजादी उसे किसी अभिशाप जैसी डंस रही थी।
वे दोनों तुरंत कार लेकर अपने पुराने घर की तरफ भागे। वहां पहुंचे तो देखा कि आंगन में दर्जनों छोटे-छोटे बच्चे बैठकर किताबें पढ़ रहे थे और बाहर बोर्ड लगा था—’आशीर्वाद बाल विद्या केंद्र’। पास खड़े केशव चाचा ने उन्हें शांत भाव से देखा और कहा, “प्रतीक बेटा, राजेंद्र ने बिल्कुल सही किया। माता-पिता कोई पुराना फर्नीचर नहीं होते कि जब मन किया कोने में रख दिया और जब मन किया छोड़ कर चले गए। वे दोनों बहुत खुश और सुरक्षित हैं, पर उन्होंने अभी तुमसे मिलने से मना किया है।”
प्रतीक वहीं सीढ़ियों पर बैठकर फूट-फूट कर रो पड़ा। मानसी का घमंड और भ्रम आज चकनाचूर हो चुका था। उसे समझ आ गया था कि घर ईंट-पत्थरों और चार बेडरूम से नहीं, बल्कि बुजुर्गों के आशीर्वाद और आपसी प्रेम से बनता है।
इसके बाद प्रतीक और मानसी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने अहंकार को त्यागकर हर सप्ताहांत पर उस बाल केंद्र में जाकर बच्चों की सेवा करना शुरू किया। मानसी खुद अपने हाथों से उन बच्चों के लिए खाना बनाकर लाती और अरुणा जी की तरह उस आंगन के पेड़-पौधों की देखभाल करती। केशव चाचा के जरिए वे लगातार अपने माता-पिता को क्षमा-याचना के पत्र भेजते रहे।
लगभग छह महीने बाद, जब केशव चाचा ने देखा कि बेटे और बहू का पछतावा दिखावा नहीं बल्कि सच्चा हृदय-परिवर्तन है, तो उन्होंने दुर्गा पूजा के अवसर पर उन्हें पालमपुर का पता दे दिया।
अगले ही दिन सुबह जब कांगड़ा की गुनगुनी धूप में राजेंद्र जी और अरुणा जी अपने कॉटेज के बगीचे में बैठकर चाय पी रहे थे, तभी लकड़ी का छोटा सा गेट खुला। सबसे आगे नन्हा आरव दौड़ता हुआ आया और “दादू-दादी!” चिल्लाते हुए अरुणा जी की गोद में समा गया। पीछे खड़े प्रतीक और मानसी की आंखों में आंसुओं का सैलाब था।
मानसी ने दौड़कर अरुणा जी के चरण पकड़ लिए और सिसकते हुए बोली, “मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं आजादी के झूठे नशे में यह भूल गई थी कि मेरी असली ताकत और सुख तो आपके आंचल की छांव में ही था। हमें अपने से दूर मत कीजिए, हम अपना वो फ्लैट बेचकर वापस आ गए हैं।”
प्रतीक ने भी राजेंद्र जी के पैरों में सिर रख दिया, “पापा, आपकी इस एक चोट ने मेरी बंद आंखें खोल दीं। आप हमें जो सजा देना चाहें दे लीजिए, पर हमें अनाथ मत बनाइए।”
राजेंद्र जी ने झुककर बेटे और बहू को कंधे से पकड़कर उठाया। अरुणा जी ने मानसी को गले से लगा लिया। राजेंद्र जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटे, माता-पिता कभी बच्चों के दुश्मन नहीं होते। हमारा उद्देश्य तुम्हें छोड़ना नहीं, बल्कि तुम्हें परिवार का असली मूल्य समझाना था। आज जब तुम्हें अपनी जड़ों की अहमियत समझ आ गई है, तो हमारी यह दूरी भी खत्म हुई। अब हम सब साथ रहेंगे—कुछ दिन देहरादून की उन बच्चों की मुस्कान के बीच, और कुछ दिन इन पहाड़ों की शांति में।”
धौलाधार की बर्फीली चोटियों पर चमकती सूरज की किरणें उस पूरे परिवार पर पड़ रही थीं, जहां अब न कोई शिकायत थी, न कोई अहंकार—बस अपनों के मिल जाने का अटूट विश्वास और एक नई, सकारात्मक सुबह का उजाला था।
एक सवाल आप सभी पाठकों से:
क्या आपको लगता है कि आज के दौर में राजेंद्र जी और अरुणा जी ने अपने स्वाभिमान के लिए जो कदम उठाया, वह हर माता-पिता को उठाना चाहिए? अगर आप उनकी जगह होते तो क्या करते? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, आपके एक कमेंट से समाज को नई दिशा मिल सकती है!
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