दूसरी पारी – खुशी

राघव जी एक सीधे साधे ईमानदार आदमी थे। परिवार में पत्नी आरती तीन बच्चे महक,प्रफुल और खुशबू थे।मां पिताजी गांव में रहते थे।बचपन से ही राघव पढ़ाई लिखाई में अव्वल थे।तो जब उनकी 10 वीं की परीक्षा हुई तो ख़ाली समय में वो गांव के बच्चों को पढ़ाते थे।सब कहते राघव भैया ने पढ़ाया तो क्या खूब समझ में आया नहीं तो मास्टरजी क्या बताते हैं

सिर के ऊपर से निकल जाता हैं। पर राघव ने बारहवीं की फिर कॉलेज पढ़ने दिल्ली आ गए।mtnl में नौकरी लग गई और प्रोमोशन मिलता गया पर अपने बच्चों को वो स्वयं ही पढ़ाते थे। जैसे जैसे उमर बढ़ी बच्चे बड़े होने लगे।अपनी मेहनत से अपना चार कमरों का घर बनाया बच्चों को अच्छे स्कूल कॉलेज में शिक्षा दिलवाई जिंदगी अच्छी चल रही थी।

गांव भी माता पिता से मिलने जाते । राघव के माता पिता को शहर में कम अच्छा लगता वो गांव में ही रहते जब कोई त्योहार होता तब आ जाते।महक का बीएससी फाइनल ईयर था और वो मास्टर्स कर टीचिंग करना चाहती थी।आरती चाहती थीं कि नौकरी है तभी तक बेटियों को उनके घर का कर दे।

इसलिए आरती ने महक के लिए रिश्ता देखना शुरू कर दिया।फाइनल ईयर होते होते रवि का रिश्ता महक के लिए आया।पर राघव ने साफ कहा जब तक बेटी का मास्टर्स नहीं होता शादी नहीं होगी।सबने कहा सगाई कर दो।राघव अभी महक को किसी बंधन में नहीं बांधना चाहते थे

पर आरती और माता पिता के कारण वो तैयार हो गए।सगाई हो गई और महक का झुकाव भी धीरे धीरे रवि की  तरफ बढ़ने लगा वो अपना करियर छोड़ शादी के लिए तैयार हो गई।रवि के घर जा कर महक खुश थी तो राघव भी शांत हो गए।बेटा प्रफुल मैथ्स का जीनियस था पापा जैसा उसने बीटेक किया और गूगल कंपनी में हाई पोस्ट पर लग गया

उसका सिलेक्शन US मे हुआ तो वहां चला गया।घर में खुशबू ,आरती और राघव रह गए आज राघव की रिटायरमेंट थी बेटी दामाद ,बेटा सारे रिश्तेदार सब जमा थे जोरदार पार्टी हुई सब हुआ सारे लोग होटल से ही घर चले गए।सिर्फ बच्चे और राघव आरती थे।

अगले दिन से राघव को लगता जिंदगी में कुछ मिस हो रहा है।खुशबू का कॉलेज शुरू हो रहा था वो अहमदाबाद चली गई।महक भी कुछ दिन रह अपने घर चली गई।प्रफुल बोला आप लोग कुछ दिन मेरे साथ चलो मन बदल जाएगा और मैं वहां घर खरीदूंगा तो आप साथ होंगे तो अच्छा है।

राघव आरती के साथ प्रफुल के घर आ गए।घर सुंदर था राघव ने प्रफुल को कुछ मोटी रकम दी ताकि उसे लॉन कम लेना पड़े वो नहीं चाहते थे कि बच्चा अभी से जिम्मेदारी में दब जाए।6 महीने वहां रह वो वापिस आ गए। राघव अब सुबह उठते घूम कर आते चाय नाश्ता करके अब क्या करे ।

आरती तो घर के कामों में लग जाती।एक दिन राघव लॉन में बैठे थे कि शांति जो उनके यहां काम करती थी आरती के साथ सब्जी साफ करवा रही थी।वो बोल रही थी दीदी मेरा बेटा दसवीं में है पर उसे कोई पढ़ाने वाला नहीं है।राघव बोले शांति कल से अपने बेटे को मेरे पास भेज दो मै पढ़ा दूंगा।

सच भैया हा हा सच मै अगले दिन से राघव ने पीयूष को पढ़ाना शुरू किया।घर का एक कमरा उन्होंने ट्यूशन के लिए कर दिया। पीयूष के साथ उसके एक दो दोस्त और आने लगे धीरे धीरे राघव के पढ़ाने के ढंग  से बच्चे इतने प्रभावित हुए कि झुग्गी से और बच्चे भी आने लगे राघव उन्हें फ्री में पढ़ाते थे।

राघव और उन बच्चों की मेहनत रंग लाई और इस बार जिले में टॉप करने वाला बच्चा पीयूष था। सभी बच्चे अच्छे अंकों से पास हुए।सबने मुंह भर कर राघव का धन्यवाद दिया।अब राघव बहुत खुश रहते थे क्योंकि वो अपना पहला सपना पूरा कर पा रहे थे  अब राघव के  पास अच्छे अच्छे घरों के भी बच्चे आते थे

उनसे जो फीस वो लेते वो गरीब बच्चों की पढ़ाई और फीस में लगा देते।उन्होंने अपने घर का ऊपर का हिस्सा बच्चों के लिए पीजी में तब्दील कर दिया जो बच्चे दूर से पढ़ने आते थे ।गरीब बच्चे जो पैसे भरने में अस्मर्थ थे उनको वो फ्री में खाना और रहने की जगह देते।

अपने जीवन की दूसरी पारी में राघव अपनी खुशी का काम कर रहे थे और गरीब बच्चों की मदद कर सबकी दुआएं ले रहे थे उनके इस कदम की सराहना उनके बच्चे रिश्तेदार और पड़ोसी करते थे।प्रफुल भी पिता को कंप्यूटर सिखाने में मदद करता ताकि वो बच्चों को भी टेक्नोलॉजी से अवगत करवा सके।

महक भी पिता की सहायता को आ जाती और खुशबू भी जब आती तो बच्चों को पढ़ा देती।12 करवा कर राघव बच्चों का अच्छे कॉलेज में एडमिशान लेने में मदद करते उन्हें फाइनेंसियल हेल्प भी कर देते।हर कोई  यही कहता राघव तूने अपने जीवन की दूसरी पारी बहुत शानदार खेली है आज पीयूष एक iit रुड़की से निकल रहा था

उसकी ग्रेजुएशन सेरेमनी थी उसने खास तौर पर राघव को बुलाया था वही उसने सबको यह बात बताई और बोला जो भी मैं या मेरे जैसे गरीब बच्चे बन रहे हैं उसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ राघव सर को जाता है।राघव ने भी कहा रिटायर होने पर लोगों का समय नहीं कटता पर इन बच्चों ने मुझे मौका दिया और जीने का मकसद ।

अपने जीवन की पहली पारी मेरे घर परिवार की थी पर दूसरी पारी मैने समाज के लिए जी और सबसे बड़ी बात मेरे शौक का उसमे बहुत बड़ा योगदान था।आज मै बहुत खुश हूं कि मैं अपनी दूसरी पारी में इन बच्चों के काम आ रहा हूं।आप सबका धन्यवाद।

राघव के हाथों ही पीयूष को डिग्री दी गई।पीयूष को नौकरी भी अच्छी जगह मिली।राघव को संतुष्टि थी कि वो बच्चों के काम आ रहा है उसका जीवन सार्थक हो गया।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी

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