दोहरे चेहरे

समीर ने हाथ उठाकर उन्हें बीच में ही रोक दिया। उसकी आंखों में आज गुस्सा नहीं, बल्कि गहरा दुख और पश्चाताप था।

“बस कीजिए मां! भगवान के लिए अब यह अभिनय बंद कीजिए,” समीर की आवाज कांप रही थी। “मैं पिछले दस मिनट से बाहर खड़ा सब सुन रहा हूं। किस तरह आप लोग तन्वी को प्रताड़ित करते हैं और शाम को मेरे सामने भोले बन जाते हैं! बाबूजी, आपने मुझे हमेशा सच बोलना और न्याय के साथ खड़ा होना सिखाया था, और आज आप खुद मेरे ही घर को तोड़ने की साजिश रच रहे हैं?”

  मैं तन्वी शर्मा, इस बड़े से आंगन में पिछले तीन सालों से अपनी जगह तलाश रही थी। जब मेरी शादी समीर से हुई थी, तो मुझे लगा था कि मुझे माता-पिता के रूप में सास-ससुर मिले हैं। राजेंद्र बाबूजी और मालती मां जी समाज में अपनी सादगी और मीठी वाणी के लिए जाने जाते थे।

लेकिन इंसान का असली चेहरा वह नहीं होता जो वह दुनिया को दिखाता है, बल्कि वह होता है जो बंद दरवाजों के पीछे किसी कमजोर पर जाहिर होता है।

शाम के ठीक सात बजे जब दरवाजे की घंटी बजती, तो इस घर का मौसम अचानक बदल जाता। समीर के आते ही मालती मां जी के चेहरे की कठोर रेखाएं एक कोमल मुस्कान में तब्दील हो जातीं।

“अरे, आ गया मेरा बेटा! तन्वी बेटी, देखो समीर आ गया है, जरा ठंडा पानी तो लाओ। और हां, आज मेरी बच्ची ने सुबह से बहुत काम किया है, तू जरा इसके लिए भी बाहर से कुछ मंगवा लेता तो अच्छा रहता,” मां जी इतने लाड़ से कहतीं कि समीर का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता। वह मेरी तरफ देखता और आंखों ही आंखों में कहता—देखा, मेरी मां तुम्हें कितना प्यार करती हैं!

मैं हाथ में पानी का गिलास लिए बस एक फीकी मुस्कान दे पाती। क्योंकि मेरे कानों में अभी भी दोपहर के वो शब्द गूंज रहे होते थे, जब समीर के ऑफिस निकलते ही मां जी ने चाय का कप मेज पर पटकते हुए कहा था, “पता नहीं किस रईसजादी को पल्ले बांध दिया है मेरे बेटे के! सुबह से दस काम पड़े हैं, पर महारानी के हाथ-पैर ही नहीं हिलते। मायके में क्या सिर्फ पलंग तोड़ना ही सीखा था?”

और बाबूजी? वह तो जैसे हर वक्त मेरी गलतियों का हिसाब लिखने के लिए ही बैठक में बैठते थे। समीर के सामने मुझे ‘बेटा-बेटा’ कहकर पुकारने वाले बाबूजी, समीर के पीठ घुमाते ही अपनी आवाज में ऐसा रूखापन ले आते कि रूह कांप जाए। “ए लड़की! ये अखबार यहां किसने रखा? इस घर में नियम-कायदे से रहना है तो हमारी मर्जी से चलना होगा। अपनी मनमानी अपने मायके में जाकर दिखाना।”

घर में एक कुर्सी भी अगर अपनी जगह से हिल जाती, तो घर में महाभारत छिड़ जाती। मुझे न तो अपनी पसंद का खाना बनाने की इजाजत थी, न ही दोपहर में एक घंटे कमर सीधी करने की। मैं दिन भर एक मशीन की तरह काम करती, उनके हर हुक्म को सिर झुकाकर मानती, इस उम्मीद में कि शायद कभी तो उनके दिल में मेरे लिए भी जगह बनेगी।

शुरुआत में जब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा, तो मैंने रात के एकांत में अपने कमरे में समीर से अपने दिल की बात कहने की कोशिश की।

“समीर, मां जी और बाबूजी का व्यवहार मेरे साथ वैसा नहीं है जैसा आपके सामने दिखता है। आप जब ऑफिस चले जाते हैं, तो वे मुझे बात-बात पर ताने देते हैं। मुझे इस घर में अपनापन महसूस नहीं होता,” मैंने बहुत हिम्मत जुटाकर, अपनी आंखों के आंसू रोकते हुए कहा था।

समीर ने लैपटॉप बंद किया और मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।

“तन्वी, तुम क्या बोल रही हो, तुम्हें खुद भी अंदाजा है? मेरी मां, जो तुम्हारे सिर में दर्द होने पर मेरे सामने कितनी परेशान हो जाती हैं? बाबूजी, जो हर रिश्तेदार के सामने तुम्हारी तारीफ करते हैं? तुम्हें शर्म आनी चाहिए ऐसे इल्जाम लगाते हुए! सच तो यह है कि तुम्हारा ही स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया है। मां ने आज शाम को ही मुझे चुपके से बताया था कि तुम आजकल छोटी-छोटी बातों पर बुरा मान जाती हो। वे तो फिर भी तुम्हारी गलती छुपा रही थीं, और तुम उन्हीं की शिकायत कर रही हो?”

मैं सन्न रह गई। मुझे समझ आ गया कि मेरे कमरे में आने से पहले ही मां जी समीर के कानों में अपनी मीठी जहर की पुड़िया घोल चुकी होती हैं। समीर अपनी मां की आंखों से दुनिया देखता था। एक ऐसा बेटा, जिसने कभी अपने माता-पिता की ऊंची आवाज नहीं सुनी, वह भला यह कैसे मान लेता कि उसके आदर्श माता-पिता किसी के साथ इतना दोहरा व्यवहार कर सकते हैं?

एक दिन दोपहर में मेरी तबीयत बहुत खराब थी। तेज बुखार के कारण शरीर तप रहा था। रसोई में आटा गूंथते वक्त मुझे चक्कर आ गया और परात मेरे हाथ से छूटकर नीचे गिर गई। सूखा आटा फर्श पर फैल गया।

आवाज सुनकर मां जी और बाबूजी दौड़े आए। मैंने सोचा शायद मेरी हालत देखकर वे मुझे सहारा देंगे, लेकिन मां जी ने कमर पर हाथ रखकर चिल्लाना शुरू कर दिया, “लो! कर दिया न नुकसान! काम करने का मन न हो तो सीधे बोल दिया करो, यूं अनाज की बर्बादी करने का क्या मतलब है? ये नाटक हमारे सामने मत किया करो!”

उस दिन मेरे सब्र का बांध टूट गया। बुखार और अपमान की तपिश ने मुझे बोलने पर मजबूर कर दिया। मैंने कांपती आवाज में, पर सीधे उनकी आंखों में देखते हुए कहा, “मां जी, मैं नाटक नहीं कर रही हूं। मुझे तेज बुखार है। मैं भी एक इंसान हूं, कोई पत्थर की मूरत नहीं! मेरे भी जज्बात हैं, मुझे भी दर्द होता है। आप लोग समीर के सामने तो मुझ पर इतना प्यार लुटाते हैं, फिर उनके जाते ही मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं? क्या मेरी इस घर में कोई इज्जत नहीं है?”

मेरा इतना कहना था कि घर में भूचाल आ गया। बाबूजी गुस्से से कांपते हुए बोले, “देखा मालती! इसके पर निकल आए हैं! हमसे जुबान लड़ा रही है। हमारे ही घर में रहकर हमें ही आंखें दिखा रही है!”

शाम को जब समीर घर आया, तो बैठक का दृश्य किसी नाटक के मंच जैसा था। मां जी सोफे पर लेटी सिसक रही थीं और बाबूजी उनके सिरहाने बैठे पानी पिला रहे थे। समीर ने घबराकर पूछा, “क्या हुआ मां? आप रो क्यों रही हैं?”

बाबूजी ने भारी आवाज में कहा, “बेटा, अब इस घर में हमारा कोई सम्मान नहीं बचा। आज तेरी पत्नी ने हम पर झूठे इल्जाम लगाए, हमें बुरा-भला कहा। हम बूढ़े लोग अब इसके ताने सुनने के लिए ही जिंदा हैं क्या?”

समीर ने गुस्से से आगबबूला होकर कमरे में कदम रखा और बिना मेरी एक बात सुने मुझ पर बरस पड़ा, “तन्वी! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे माता-पिता से इस तरह बात करने की? मैं कभी उनके सामने आवाज ऊंची नहीं करता और तुमने उन्हें रुला दिया? तुम्हारे अंदर संस्कार नाम की कोई चीज है भी या नहीं?”

उस रात मैंने अपनी आंखों से एक आंसू नहीं गिरने दिया। मेरे अंदर कुछ टूट कर हमेशा के लिए शांत हो गया था। मुझे एहसास हो गया कि जब आपका हमसफर ही आपकी ढाल न बने, तो शब्दों को बर्बाद करना बेकार है। मैंने तय कर लिया—अब मैं सास-ससुर से एक दूरी बनाकर ही रखूंगी। कोई उम्मीद नहीं, कोई शिकायत नहीं। बस मौन रहूंगी, अपना काम करूंगी और अपने अस्तित्व को समेट लूंगी।

अगले दिन से मैंने बोलना लगभग बंद कर दिया। सुबह उठती, सबका नाश्ता-खाना बनाती, घर की सफाई करती और चुपचाप अपने कमरे में आ जाती। मां जी कोई ताना मारतीं, तो मैं बिना कोई प्रतिक्रिया दिए वहां से हट जाती। बाबूजी कोई फरमाइश करते, तो चुपचाप पूरी कर देती। मैंने अपने चारों तरफ खामोशी की एक ऐसी दीवार खड़ी कर ली थी जिसे कोई भेद न सके।

लेकिन इस घर में मेरी खामोशी भी एक जुर्म बन गई।

जब मैंने पलटकर जवाब देना या आहत होना बंद कर दिया, तो मां जी को अपनी ताकत कम होती महसूस हुई। उन्हें मेरी चुप्पी खलने लगी। चार दिन बाद ही रात को समीर मेरे पास आया और भड़कते हुए बोला, “तन्वी, तुमने ये क्या नया तमाशा शुरू किया है? मुंह क्यों फुला रखा है? मम्मी कह रही थीं कि तुम किसी बात का जवाब नहीं देती हो, बस गुस्से में बर्तन पटकती रहती हो! इस उम्र में क्यों मेरे माता-पिता को मानसिक रूप से परेशान कर रही हो? तुमसे मुझे यह उम्मीद बिल्कुल नहीं थी!”

समीर गुस्से में पैर पटकते हुए कमरे से बाहर चला गया। मैं बिस्तर के कोने में बैठी बस शून्य में ताकती रही। बोलूं तो बदजुबान और संस्कारहीन, चुप रहूं तो घमंडी और बदतमीज! आखिर एक औरत जाए तो जाए कहां?

उस रात मैं सो नहीं सकी। खिड़की से बाहर अंधेरे आसमान को देखते हुए मैंने खुद से सवाल किया—क्या मैं अपनी पूरी जिंदगी इसी तरह घुट-घुट कर बिता दूंगी? क्या रोना और चुप रहना ही मेरा नसीब है?

तभी मेरे अंतर्मन से आवाज आई—नहीं तन्वी! सच को किसी सहारे की जरूरत नहीं होती, बस उसे सामने लाने का तरीका बदलना पड़ता है। अगर समीर अपने कानों से सुनी बातों पर यकीन करता है, तो अब उसे अपनी आंखों से सच देखना होगा।

मैंने आंसू पोंछे और एक ठोस फैसला लिया। अब मैं न तो शिकायत करूंगी और न ही अपनी चुप्पी से खुद को जलाऊंगी। मैं वही करूंगी जो एक पढ़ी-लिखी, समझदार और आत्मसम्मानी स्त्री को करना चाहिए।

मेरी शादी से पहले मैंने बी.एड. किया था और मैं एक स्कूल में पढ़ाती थी। शादी के बाद घर की जिम्मेदारियों के नाम पर मेरी नौकरी छुड़वा दी गई थी। अगले ही दिन से मैंने दोपहर के खाली समय में, जब मां जी और बाबूजी अपने कमरे में आराम करते थे, ऑनलाइन ट्यूशन पढ़ाना और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कंटेंट लिखना शुरू कर दिया।

साथ ही, मैंने घर के माहौल को बदलने की नहीं, बल्कि खुद को मजबूत करने की ठानी। कुछ महीनों की बचत से मैंने एक छोटा सा वॉयस-एक्टिवेटेड स्मार्ट स्पीकर और एक छोटा सिक्योरिटी कैमरा खरीदा, जिसे मैंने डाइनिंग एरिया के बुकशेल्फ में किताबों के बीच इस तरह रख दिया कि किसी का ध्यान न जाए। मुझे किसी को नीचा नहीं दिखाना था, मुझे बस अपने पति के आंखों पर बंधी उस अंधभक्ति की पट्टी को खोलना था जो मेरे रिश्ते को दीमक की तरह चाट रही थी।

मैं पहले की तरह ही सबका काम करती रही, पर अब मेरे चेहरे पर बेबसी नहीं, बल्कि एक शांत आत्मविश्वास था।

वह मंगलवार का दिन था। समीर किसी जरूरी काम से अपनी एक फाइल घर पर भूल गया था। उसने मुझे फोन करने के बजाय सोचा कि वह खुद आकर चुपके से फाइल ले जाएगा और मुझे सरप्राइज भी दे देगा। दोपहर के करीब दो बज रहे थे। घर का मुख्य दरवाजा खुला था क्योंकि बाहर माली काम कर रहा था।

समीर जैसे ही दहलीज के अंदर कदम रखने वाला था, अंदर से आती मालती मां जी की कर्कश आवाज ने उसके कदम वहीं रोक दिए।

“अरे ओ महारानी! कमरा बंद करके अंदर क्या कलेक्टर की पढ़ाई कर रही हो? सुबह की दाल में नमक कम था, क्या हमें भूखा मारने का इरादा है? मेरे बेटे की कमाई पर ऐश कर रही हो और दो वक्त का खाना भी ढंग से नहीं बनता तुमसे!”

समीर के हाथ से गाड़ी की चाबी छूटते-छूटते बची। उसने आज तक अपनी मां की ऐसी आवाज और ऐसी भाषा कभी नहीं सुनी थी। वह खिड़की के पास रखी जाली के पीछे ठिठक कर खड़ा हो गया।

तभी बाबूजी की आवाज आई, “मालती, तुम क्यों अपना खून जलाती हो? शाम को समीर को आने दो, हम फिर से थोड़ा उदास चेहरा बना लेंगे। वह तो वैसे भी हमारी हर बात को पत्थर की लकीर मानता है। कल ही कह देंगे कि तन्वी ने हमें धक्का दिया या बदतमीजी की, बस वह खुद ही इसे ठीक कर देगा। बहू को तो मुट्ठी में ही रखना पड़ता है, वरना सिर पर बैठ जाती है।”

अंदर से मेरी शांत आवाज आई, “मां जी, बाबूजी, दाल में नमक कम था तो आप मुझे बता देते, मैं अभी ठीक कर देती हूं। और बाबूजी, मैंने हमेशा आप दोनों को अपने माता-पिता की तरह सम्मान दिया है, फिर आप लोग समीर से मेरी झूठी शिकायतें क्यों करते हैं?”

मां जी ताली बजाकर हंसते हुए बोलीं, “ओहो! अब तू हमें सिखाएगी? अरे, बेटा हमारा है, घर हमारा है! हमारी मर्जी हम उसे जो बताएं। तू है कौन हमारे बीच आने वाली? चुपचाप रसोई में जा और हमारे लिए पकौड़े तल, वरना शाम को तेरी खैर नहीं!”

बाहर खड़े समीर के पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी। जिस माता-पिता को वह भगवान का रूप मानता था, जिनके एक आंसू पर वह अपनी पत्नी को कठघरे में खड़ा कर देता था, उनका यह रूप देखकर उसका सिर शर्म से झुक गया। उसे मेरी हर वो बात याद आने लगी जब मैं रोते हुए उससे कहती थी कि ‘समीर, एक बार मेरी बात पर भी यकीन करके देखो।’

समीर धड़धड़ाते हुए अंदर आया। उसे अचानक सामने देखकर मां जी और बाबूजी के चेहरे का रंग उड़ गया। मां जी ने तुरंत पल्लू सिर पर लेते हुए अपनी आवाज बदलने की कोशिश की, “अरे समीर बेटा! तू इस वक्त कैसे? तबीयत तो ठीक है न?”

समीर ने हाथ उठाकर उन्हें बीच में ही रोक दिया। उसकी आंखों में आज गुस्सा नहीं, बल्कि गहरा दुख और पश्चाताप था।

“बस कीजिए मां! भगवान के लिए अब यह अभिनय बंद कीजिए,” समीर की आवाज कांप रही थी। “मैं पिछले दस मिनट से बाहर खड़ा सब सुन रहा हूं। किस तरह आप लोग तन्वी को प्रताड़ित करते हैं और शाम को मेरे सामने भोले बन जाते हैं! बाबूजी, आपने मुझे हमेशा सच बोलना और न्याय के साथ खड़ा होना सिखाया था, और आज आप खुद मेरे ही घर को तोड़ने की साजिश रच रहे हैं?”

बाबूजी ने बात संभालने की कोशिश की, “बेटा, तू गलत समझ रहा है, वो तो तन्वी ने…”

“नहीं बाबूजी! आज एक शब्द और नहीं,” समीर ने दृढ़ता से कहा। “गलती आप लोगों से ज्यादा मेरी है। मैंने एक अच्छा बेटा बनने की धुन में एक अच्छा पति बनना ही छोड़ दिया। जिस लड़की ने मेरे भरोसे अपना घर-परिवार छोड़ा, मैंने उसकी एक बात नहीं सुनी। उसकी खामोशी को उसका घमंड समझा और उसके आंसुओं को उसका नाटक।”

समीर मेरी तरफ मुड़ा, उसके दोनों हाथ जुड़े हुए थे और आंखों से आंसू बह रहे थे। “तन्वी, हो सके तो मुझे माफ कर देना। मैं तुम्हारा गुनहगार हूं।”

मैंने आगे बढ़कर समीर के जुड़े हुए हाथ अपने हाथों में थाम लिए। मेरी आंखों में भी आंसू थे, पर वे बेबसी के नहीं, बल्कि मेरे स्वाभिमान की जीत के आंसू थे। मैंने अपने फोन से पिछले कुछ दिनों की वो रिकॉर्डिंग्स डिलीट कर दीं जो मैंने सबूत के तौर पर रखी थीं, क्योंकि आज ईश्वर ने खुद सच को समीर के सामने ला खड़ा किया था।

मैंने शांत स्वर में कहा, “समीर, मैं कभी आपको आपके माता-पिता से अलग नहीं करना चाहती थी। मैं बस इस घर में एक इंसान का दर्जा और थोड़ा सा सम्मान चाहती थी। मां जी, बाबूजी, मैं आज भी आपकी उतनी ही इज्जत करती हूं, बस मेरी आपसे एक ही विनती है कि बहू को बेटी न सही, पर इस घर का एक हिस्सा तो समझिए।”

समीर ने उस दिन घर में कुछ स्पष्ट सीमाएं तय कर दीं। उसने साफ कह दिया कि माता-पिता की सेवा में कोई कमी नहीं होगी, लेकिन तन्वी के आत्मसम्मान के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। उसने मुझे मेरी शिक्षक की नौकरी फिर से शुरू करने के लिए प्रेरित किया।

वक्त बदला। जब मां जी और बाबूजी को यह समझ आ गया कि अब उनका बेटा आंख मूंदकर किसी अन्याय का साथ नहीं देगा, तो धीरे-धीरे उनका व्यवहार भी बदलने लगा। छह महीने बाद, जब बाबूजी को घुटनों के ऑपरेशन के कारण एक महीने तक बिस्तर पर रहना पड़ा, तो मैंने पुरानी सारी कड़वाहट भुलाकर दिन-रात उनकी सेवा की। मेरी उस निस्वार्थ सेवा ने आखिरकार उनके कठोर दिलों को पिघला ही दिया।

जिस घर में कभी मेरे कदमों की आहट भी बोझ समझी जाती थी, आज उसी आंगन में जब मैं स्कूल से लौटती हूं, तो मालती मां जी खुद मेरे लिए चाय का कप लेकर बैठती हैं और सचमुच के प्यार से कहती हैं, “आ गई मेरी बहुरानी! बैठ, आज तुझे अपने हाथों से चाय पिलाती हूं।”

रिश्ते डर या अधिकार से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और भरोसे से चलते हैं। जब पति अपनी पत्नी के सम्मान की ढाल बनता है, तो बड़े से बड़ा पारिवारिक तूफान भी शांत हो जाता है।

दोस्तों, क्या आपके आस-पास या आपके अपने जीवन में कभी ऐसी स्थिति आई है जहाँ अपनों के दोहरे व्यवहार ने आपको अंदर तक तोड़ दिया हो? आपके हिसाब से एक पति को अपनी माँ और पत्नी के बीच संतुलन कैसे बनाना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें, आपके विचार किसी को सही राह दिखा सकते हैं।

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