अपनत्व का आईना

 आर्यन ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “चाची, हमें माफ कर दीजिए। हम बहुत गंदे हैं। हमने हमेशा आपकी डांट और रोक-टोक को आपकी नफरत समझा। हमने कभी यह देखने की कोशिश ही नहीं की कि उस सख्ती के पीछे एक मां का दिल छिपा है। आज अगर आप न होतीं, तो हम दोनों हार जाते।”

कबीर ने अपनी ट्रॉफी पल्लवी के हाथों में थमाते हुए कहा, “चाची, यह ट्रॉफी मेरी नहीं, आपकी है। आज से हम वादा करते हैं कि आपकी हर बात मानेंगे और कभी आपको शिकायत का मौका नहीं देंगे।”

 वंदना एक सरकारी स्कूल में वरिष्ठ शिक्षिका थीं और जैसे ही वह अपनी स्कूटी खड़ी करके घर के भीतर दाखिल हुईं, उन्हें अपने दोनों बेटों—आर्यन और कबीर—की ऊंची आवाजें सुनाई दीं। बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाला आर्यन और दसवीं में पढ़ने वाला कबीर अपनी चाची पल्लवी से काफी तल्ख लहजे में बहस कर रहे थे।

मां की आहट पाते ही दोनों लड़के एक पल के लिए तो सहम गए, लेकिन अगले ही पल उन्होंने शिकायतों का पिटारा खोल दिया। “मम्मी, आप चाची को समझाती क्यों नहीं? ये हर वक्त हमारे पीछे पड़ी रहती हैं। कभी कहती हैं फोन रखो, कभी कहती हैं बाहर का मत खाओ। हम अब छोटे बच्चे नहीं हैं!” आर्यन ने मुंह फुलाते हुए कहा। पल्लवी चुपचाप रसोई के दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थी, उसकी आंखों में शिकायत का एक कतरा भी नहीं था, बस अपने भतीजों के प्रति एक शांत स्नेह था।

शर्मा परिवार इस कॉलोनी के सबसे आदर्श संयुक्त परिवारों में गिना जाता था। घर के बुजुर्ग हरबंस लाल जी और उनकी पत्नी शांता देवी ने अपने दोनों बेटों—संजय और रोहित—को ऐसे संस्कार दिए थे कि आज के दौर में भी दोनों भाई एक ही छत के नीचे प्रेम से रहते थे। वंदना और पल्लवी में देवरानी-जेठानी से बढ़कर सगी बहनों जैसा रिश्ता था। वंदना सुबह स्कूल चली जाती थीं, इसलिए सुबह के नाश्ते से लेकर दोपहर के खाने और बुजुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारी पल्लवी की होती थी, जो घर से ही अपनी बेकरी और केक बनाने का काम संभालती थीं। शाम को वंदना लौटतीं, तो रसोई और रात का काम वह अपने हाथ में ले लेतीं। दोनों के बीच कभी काम के बंटवारे को लेकर कोई मनमुटाव नहीं हुआ।

लेकिन पिछले एक साल से घर की हवा में एक अजीब सा बदलाव आ गया था। वंदना के दोनों बेटे अब किशोरावस्था की दहलीज पर थे। पल्लवी की अपनी एक पांच साल की बेटी थी, तन्वी। घर के दादा-दादी और खुद वंदना का नन्हीं तन्वी के प्रति विशेष दुलार होना स्वाभाविक था, लेकिन आर्यन और कबीर को यह बात खलने लगी थी। उन्हें लगता था कि चाची जानबूझकर अपनी बेटी को लाड़-प्यार में रखती हैं और उन दोनों पर अपनी हुकूमत चलाती हैं। जब वंदना स्कूल में होतीं, तो पल्लवी ही दोनों लड़कों के खाने-पीने और पढ़ाई-लिखाई पर नजर रखती थीं। यही रोक-टोक दोनों भाइयों को कैद जैसी लगने लगी थी। वे पल्लवी की हर बात का उल्टा जवाब देते, उनके बनाए खाने में नुक्स निकालते और शाम को मां के आते ही चाची को एक खलनायिका की तरह पेश करते।

उस रात जब पूरा घर सो रहा था, वंदना किसी काम से पानी लेने उठीं। बच्चों के कमरे से आ रही फुसफुसाहट सुनकर उनके कदम वहीं ठिठक गए। कबीर अपने बड़े भाई से कह रहा था, “भाई, चाची कितनी मतलबी हैं न! तन्वी सारा दिन कार्टून देखती है और चॉकलेट खाती है, तब तो कुछ नहीं बोलतीं। और हम अगर आधा घंटा भी दोस्तों के साथ वीडियो गेम खेल लें, तो तुरंत मम्मी को फोन लगाने की धमकी देने लगती हैं। ऊपर से रोज शाम को मम्मी के कान भरती हैं।”

आर्यन ने भी हां में हां मिलाते हुए कहा, “सही कह रहा है। मुझे तो लगता है वो चाहती ही नहीं कि हम खुश रहें। बस अपना काम निकलवाने के लिए मम्मी के सामने मीठी बनती हैं।”

दरवाजे के बाहर खड़ी वंदना का दिल बैठ गया। जिस देवरानी ने अपने सगे बच्चों से बढ़कर इन दोनों की परवरिश की, आज वही बच्चे उसके बारे में जहर उगल रहे थे। वंदना ने तय किया कि वह कल ही दोनों लड़कों के साथ बैठकर बात करेंगी और उनकी इस गलतफहमी को दूर करेंगी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

अगली सुबह वंदना को स्कूल के किसी जरूरी काम से जल्दी निकलना था। बारिश की वजह से सड़क पर फिसलन थी। घर से कुछ ही दूरी पर एक मोड़ पर वंदना की स्कूटी फिसल गई। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया। गनीमत रही कि सिर में चोट नहीं आई, लेकिन उनके दाहिने हाथ में फ्रैक्चर हो गया और कमर में गंभीर मोच आ गई। डॉक्टर ने साफ शब्दों में कह दिया कि कम से कम तीन हफ्ते तक वंदना को बिस्तर से उठने की मनाही है।

वंदना के बिस्तर पर पड़ते ही पूरे घर की धुरी हिल गई। संजय और रोहित को अपने ऑफिस के काम से शहर से बाहर जाना पड़ा। अब बुजुर्ग सास-ससुर, बीमार जेठानी, तीन बच्चे और खुद का बेकरी का काम—सब कुछ पल्लवी के अकेले कंधों पर आ गया। वंदना को अपराधबोध हो रहा था, लेकिन पल्लवी ने उनके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, “दीदी, आप बस आराम करो। जब तक मैं हूं, इस घर के किसी कोने में कोई कमी नहीं आने दूंगी।”

पल्लवी ने अपने बेकरी के सारे बड़े ऑर्डर कुछ दिनों के लिए टाल दिए। उसकी दिनचर्या सुबह चार बजे से शुरू होकर रात के ग्यारह बजे तक चलने लगी। इसके बावजूद आर्यन और कबीर के व्यवहार में कोई खास नरमी नहीं आई थी। वे अब भी पल्लवी से कटे-कटे रहते और जरूरत पड़ने पर ही बात करते।

इसी बीच एक ऐसा मोड़ आया जिसने सब कुछ बदल दिया। कबीर अपने स्कूल की क्रिकेट टीम में जगह बनाने के लिए पिछले कई महीनों से पसीना बहा रहा था, और दो दिन बाद उसका अंतिम चयन (ट्रायल) था। वहीं दूसरी तरफ, आर्यन को अपने बारहवीं के विज्ञान मेले के लिए एक बेहद जटिल मॉडल जमा करना था, जिस पर उसके प्रैक्टिकल के नंबर टिके थे।

ट्रायल से ठीक एक दिन पहले शाम को जब दोनों भाई घर लौटे, तो दोनों के चेहरे उतरे हुए थे। वंदना के कमरे में जाकर कबीर लगभग रोते हुए बोला, “मम्मी, कल मेरा ट्रायल है और प्रैक्टिस के दौरान मेरे क्रिकेट शूज फट गए हैं। मेरी सफेद जर्सी पर भी मिट्टी के गहरे दाग लग गए हैं। पापा और चाचा भी शहर में नहीं हैं, और आप चल नहीं सकतीं। मैं कल ट्रायल में कैसे जाऊंगा?”

उधर आर्यन को अचानक तेज बुखार चढ़ गया था और उसका विज्ञान का मॉडल अधूरा पड़ा था। वह भी सिर पकड़कर मां के पास बैठ गया, “मम्मी, मेरी तबीयत बहुत खराब हो रही है, हाथ-पैर टूट रहे हैं और मेरा प्रोजेक्ट अभी आधा बाकी है। कल सुबह इसे जमा नहीं किया तो सर फेल कर देंगे।”

वंदना अपनी बेबसी पर आंसू बहाने लगीं। दोनों लड़के भी निराश होकर अपने कमरे में जाने लगे। तभी पल्लवी वहां आई। उसने सब कुछ सुन लिया था, लेकिन उस वक्त कुछ नहीं कहा।

रात के करीब नौ बजे पल्लवी एक ट्रे में अदरक-तुलसी का सूप और दवाइयां लेकर आर्यन के कमरे में आई। आर्यन ने मुंह फेर लिया, लेकिन पल्लवी ने बड़े अधिकार से उसके सिरहाने बैठकर कहा, “चुपचाप उठो और ये सूप पियो। कोई बहाना नहीं चलेगा।” पल्लवी ने अपने हाथों से उसे सूप पिलाया, दवाई दी और फिर उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखने लगी। करीब एक घंटे तक पल्लवी उसके सिर की मालिश करती रही। चाची की उंगलियों में वही गर्माहट और सुकून था जो मां के हाथों में होता है। बुखार और थकान से चूर आर्यन कब पल्लवी की गोद में सिर रखकर सो गया, उसे पता ही नहीं चला।

आधी रात को जब कबीर की आंख खुली, तो उसने देखा कि ड्राइंग रूम की लाइट जल रही है। उसने बाहर झांककर देखा तो दंग रह गया। पल्लवी जमीन पर बैठकर आर्यन का विज्ञान का मॉडल पूरा कर रही थी। पल्लवी खुद कॉमर्स की छात्रा रही थी, इसलिए वह अपने फोन पर इंटरनेट से वीडियो देख-देखकर बारीकी से तार जोड़ रही थी और चार्ट पेपर पर डायग्राम बना रही थी। मेज के एक कोने में कबीर के लिए बिल्कुल नए क्रिकेट शूज का डिब्बा रखा था और उसकी सफेद जर्सी धुलकर, प्रेस होकर चमक रही थी।

कबीर से रहा नहीं गया। वह दबे पांव बाहर आया और धीमी आवाज में बोला, “चाची, आप अभी तक जागी हैं? और ये नए जूते कहां से आए?”

पल्लवी ने चौंककर पीछे देखा और फिर मुस्कुराते हुए बोली, “अरे कबीर, तू सोया नहीं? वो शाम को जब तू मम्मी को बता रहा था, तभी मैंने सुन लिया था। रात को आठ बजे बाजार जाकर तेरे नाप के जूते ले आई। मुझे पता था मेरे चैंपियन का कल कितना बड़ा दिन है। और देख, तेरे भाई का मॉडल भी बस पूरा होने ही वाला है।”

कबीर की आंखें भर आईं। उसने देखा कि पल्लवी की आंखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे। दिन भर घर का काम, बीमार मम्मी की सेवा, दादा-दादी की दवाई और फिर आधी रात को अपनी नींद खराब करके उन दोनों के सपनों को संवारना—क्या कोई मतलबी इंसान ऐसा कर सकता है?

सुबह जब आर्यन की आंख खुली, तो उसका बुखार उतर चुका था। अपनी मेज पर पूरी तरह तैयार और बेहद खूबसूरत प्रोजेक्ट देखकर वह अवाक रह गया। कबीर ने रात की सारी बात अपने बड़े भाई को बताई। दोनों भाइयों की नजरें शर्म से झुक गईं। उन्हें याद आया कि कैसे पल्लवी उन्हें बाहर का तला-भुना खाने से इसलिए रोकती थीं ताकि कबीर की फिटनेस खराब न हो, और आर्यन को फोन से दूर इसलिए रखती थीं ताकि वह अपनी बारहवीं की परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन कर सके। तन्वी तो अभी महज पांच साल की अबोध बच्ची थी, उसकी तुलना खुद से करके वे दोनों कितने बड़े अज्ञानी बन रहे थे!

उस दिन दोनों भाई स्कूल गए। कबीर का क्रिकेट टीम में चयन हो गया और आर्यन के मॉडल को स्कूल में प्रथम पुरस्कार मिला। शाम को जब दोनों भाई घर लौटे, तो उनके हाथों में एक ट्रॉफी और पल्लवी की पसंदीदा रसमलाई का डिब्बा था।

घर में घुसते ही वे सीधे मम्मी के कमरे में न जाकर रसोई में गए, जहां पल्लवी रात के खाने की तैयारी कर रही थी। दोनों भाइयों ने बिना कुछ कहे पल्लवी के पैर छू लिए और फिर उससे लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगे।

पल्लवी घबरा गई, “अरे! क्या हुआ मेरे बच्चों? रो क्यों रहे हो?”

आर्यन ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “चाची, हमें माफ कर दीजिए। हम बहुत गंदे हैं। हमने हमेशा आपकी डांट और रोक-टोक को आपकी नफरत समझा। हमने कभी यह देखने की कोशिश ही नहीं की कि उस सख्ती के पीछे एक मां का दिल छिपा है। आज अगर आप न होतीं, तो हम दोनों हार जाते।”

कबीर ने अपनी ट्रॉफी पल्लवी के हाथों में थमाते हुए कहा, “चाची, यह ट्रॉफी मेरी नहीं, आपकी है। आज से हम वादा करते हैं कि आपकी हर बात मानेंगे और कभी आपको शिकायत का मौका नहीं देंगे।”

पल्लवी की आंखों से भी खुशी के आंसू छलक पड़े। उसने दोनों को अपने सीने से लगा लिया और उनके माथे चूमते हुए कहा, “पागल हो तुम दोनों! मां और चाची में कोई फर्क होता है क्या? तुम दोनों की कामयाबी ही तो मेरी सबसे बड़ी खुशी है।”

दरवाजे के पास व्हीलचेयर पर बैठी वंदना और पीछे खड़े दादा-दादी की आंखें भी इस दृश्य को देखकर नम हो गईं। घर के आंगन में छाई परायेपन की धूल आज पूरी तरह साफ हो चुकी थी और रिश्तों का आईना पहले से कहीं ज्यादा चमक उठा था। बड़े होते बच्चों को यह अमूल्य सबक मिल चुका था कि जो रिश्ते हमें सही रास्ते पर लाने के लिए कड़वे घूंट पिलाते हैं, असल में वही हमारे सबसे बड़े शुभचिंतक होते हैं।

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मूल लेखिका :  कविता भड़ाना

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