ढलती उम्र का नया सवेरा

 उनकी आंखों में बरसों से जमा अंगारे अब शब्दों के रूप में फूट पड़े थे।

“और तुम… तुम मेरी बहुएं! तुम कहती हो कि सासु मां सठिया गई हैं? जरा सोचो, कल जब तुम दोनों पचास की दहलीज पार करोगी, तो क्या तुम दोनों अपनी सांसें लेना बंद कर दोगी? क्या पचास साल की होते ही औरत का दिल, दिल नहीं रहता? क्या उसकी भावनाएं, उसकी इच्छाएं, उसके सपने मर जाते हैं? क्या किसी शास्त्र या कानून में लिखा है कि पति के चले जाने के बाद या बाल सफेद हो जाने के बाद एक औरत को सिर्फ सफेद थान ओढ़कर, कमरे में बैठकर तिल-तिल कर घुटने का ही हक है?”

  तीन साल पहले पति हरिशंकर जी के अचानक हार्ट अटैक से चले जाने के बाद, चौवन वर्षीया शैलजा जी के लिए यह घर किसी सूने टापू की तरह बन गया था। जीवन भर एक आदर्श गृहिणी बनकर पति, दो बेटों और पूरे कुटुंब की सेवा में अपनी हर ख्वाहिश को होम कर देने वाली शैलजा जी के हिस्से में अब केवल एक अनकहा सन्नाटा था।

बड़ा बेटा पुलकित शहर के एक प्रतिष्ठित बैंक में चीफ मैनेजर था और छोटा बेटा समर एक सॉफ्टवेयर कंपनी में टीम लीडर। दोनों बहुएं, रोहिणी और शिखा, आधुनिक ख्यालों वाली, पढ़ी-लिखी और अपने-अपने ढर्रे में व्यस्त रहने वाली महिलाएं थीं। घर में सुख-सुविधा का हर साधन था, चमचमाती गाड़ियां थीं, आलीशान फर्नीचर था, पर जिस चीज की सबसे ज्यादा दरकार थी, वह थी—सच्चा अपनापन और दो घड़ी बैठकर बात करने वाला कोई संवेदनशील दिल।

पति के जाने के बाद शुरुआती कुछ महीने शैलजा जी ने एक जिंदा लाश की तरह काटे। पूरा-पूरा दिन कमरे की खिड़की से बाहर गिरते पत्तों को देखते हुए बीत जाता। दोनों बेटे सुबह तैयार होकर दफ्तर निकल जाते, बहुएं अपने कमरों में लैपटॉप पर उलझी रहतीं या सहेलियों के साथ फोन पर बतियातीं। खाने की मेज पर शैलजा जी के आगे प्लेट रख दी जाती, लेकिन किसी ने कभी पलटकर यह नहीं पूछा, “मां, आज आपकी तबीयत कैसी है? आपका जी किस चीज के लिए मचल रहा है?” वे उस आलीशान मकान में एक पुराने, गैर-जरूरी सोफे की तरह बस एक कोने में पड़ी रहती थीं।

फिर एक दिन शैलजा जी के भीतर की स्त्री ने जैसे अंगड़ाई ली। उन्होंने सोचा कि क्या जीवन का यह पड़ाव सिर्फ मृत्यु का इंतजार करने के लिए है? क्या पचास पार होते ही इंसान की सांसें तो चलती हैं, पर उसकी रूह को दफन हो जाना चाहिए?

शैलजा जी ने धीरे-धीरे खुद को समेटना शुरू किया। कॉलेज के दिनों में उन्हें चित्रकारी और लोक-कथाएं लिखने का गहरा शौक था, जो शादी की जिम्मेदारियों तले कहीं दब गया था। उन्होंने अपनी पुरानी डायरियां निकालीं, कुछ ब्रश और रंग खरीदे। समर के पुराने पड़े स्मार्टफोन पर उन्होंने इंटरनेट चलाना, यूट्यूब पर डिजिटल आर्ट की बारीकियां और सोशल मीडिया पर अपनी कहानियां व ब्लॉग साझा करना सीखा। इतना ही नहीं, उन्होंने शहर की एक गैर-सरकारी संस्था ‘उड़ान’ से नाता जोड़ लिया, जो कच्ची बस्तियों की अनाथ और बेसहारा बच्चियों को मुफ्त शिक्षा और सिलाई-कढ़ाई सिखाती थी।

देखते ही देखते शैलजा जी के जीवन में एक अद्भुत बदलाव आ गया। उनके मुरझाए चेहरे पर फिर से एक अनोखी चमक तैरने लगी। उन्होंने अपनी पुरानी, बदरंग सूती साड़ियों को खूंटी पर टांग दिया और हल्के रंगों के आरामदायक कुर्ती-प्लाजो, जींस और ढीले कुर्ते पहनने शुरू किए, जिनमें उन्हें काम करने और भागदौड़ करने में सहूलियत होती थी। अब उनका फोन अक्सर बजता रहता था। फेसबुक और साहित्यिक मंचों पर उनकी लिखी संवेदनशील कहानियों को हजारों पाठक सराहने लगे थे। संस्था की बच्चियां उन्हें ‘शैलजा दीदी’ कहकर पुकारतीं और अपनी हर खुशी-गम उनसे बांटतीं।

लेकिन ‘शांति कुंज’ के बाकी बाशिंदों को शैलजा जी का यह नया रूप फूटी आंख नहीं सुहा रहा था। उन्हें अपनी मां का यूं खिलखिलाना, नए कपड़े पहनना, फोन में मशगूल रहना और घर की चारदीवारी से बाहर कदम रखना अपनी तथाकथित पारिवारिक प्रतिष्ठा पर हमला लगने लगा था।

आज की ही बात थी। शनिवार की ढलती शाम जब शैलजा जी हाथ में एक बड़ा सा फोल्डर और कुछ फाइलें लिए घर की दहलीज पर पहुंचीं, तो मुख्य हॉल में पसरे तनाव को वे पहली नजर में ही भांप गईं। सोफे पर पुलकित और समर दोनों बांहें चढ़ाए गंभीर मुद्रा में बैठे थे। पास ही रोहिणी और शिखा हाथों में कॉफी के मग लिए होठों पर व्यंग्य भरी मुस्कुराहट दबाए खड़ी थीं। चारों की नजरें शैलजा जी पर ऐसे गड़ीं जैसे वे कोई अक्षम्य अपराध करके लौटी हों।

शैलजा जी ने रोज की तरह किसी से कोई उलझन मोल न लेते हुए सीधे अपने कमरे की ओर कदम बढ़ाए। उन्होंने जूते उतारे, हाथ-मुंह धोया और बाहर आकर हॉल का बड़ा स्मार्ट टीवी ऑन कर दिया। वे अपनी थकान मिटाने के लिए धीमी आवाज में 90 के दशक का एक सुरीला गजल-गीत सुनने लगीं।

यह देखकर पुलकित के सब्र का बांध टूट गया। उसके दिमाग का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने झपट्टा मारकर रिमोट उठाया, टीवी को एक झटके में ऑफ किया और शैलजा जी के ठीक सामने आकर हाथ बांधकर खड़ा हो गया।

“मॉम! आखिर यह सब क्या तमाशा बना रखा है आपने?” पुलकित की आवाज में बेटे का आदर नहीं, बल्कि एक हुक्मरान का गुस्सा था।

शैलजा जी ने शांत नजरों से बड़े बेटे को देखा, “क्या हुआ पुलकित? किस बात पर इतना चीख रहे हो?”

“किस बात पर?” समर भी अपनी जगह से उठकर आगे आ गया, “मॉम, आप अपनी उम्र देख रही हैं? आज-कल आप कुछ ज्यादा ही हवा में उड़ने लगी हैं। चौबीसों घंटे आपका सिर उस मोबाइल की स्क्रीन में घुसा रहता है! कौन हैं ये इतने सारे नए दोस्त? कभी कोई अपरिचित औरतें घर आ धमकती हैं, तो कभी आप घंटों बिना बताए गायब रहती हैं। और ये कपड़े… कुर्ती-जीन्स, चमकीले दुपट्टे! क्या यह सब आपके इस उम्र के पड़ाव पर शोभा देता है? कभी मोहल्ले वालों और हमारे रिश्तेदारों के बारे में सोचा है कि वे क्या सोचते होंगे?”

पुलकित ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कड़वे स्वर में कहा, “और यह लिखने-लिखाने का ढोंग… फेसबुक पर कविताएं और कहानियां डालकर आप क्या साबित करना चाहती हैं? घर-परिवार की हंसी उड़वा रही हैं आप। रोहिणी और शिखा कल किटी पार्टी में गई थीं, वहां आपकी सहेलियां और रिश्तेदार मजाक उड़ा रहे थे कि सासु मां साठ की उम्र में सत्रह की बनने की कोशिश कर रही हैं, लगता है बुढ़ापे में सठिया गई हैं! भजन-कीर्तन करने और भगवान का नाम लेने की उम्र में आप अपनी बहुओं से मुकाबला करने निकली हैं!”

पीछे खड़ी रोहिणी और शिखा ने एक-दूसरे को देखकर दबी हुई हंसी हंसी। उनके चेहरों पर यह साफ झलक रहा था कि उन्हें अपनी सास को इस तरह जलील होते देखकर एक अजीब सा सुकून मिल रहा था।

पुलकित ने उंगली उठाते हुए अंतिम फैसला सुनाने के अंदाज में कहा, “और आज भी आप सुबह दस बजे से घर से गायब थीं। न कोई अता-पता, न आपने तीन बार फोन करने पर कॉल उठाया। आखिर चाहती क्या हैं आप? चुपचाप घर पर बैठिए, दो वक्त का खाना खाइए, अपनी बहुओं को घर संभालने दीजिए और पोते-पोतियों के साथ समय बिताकर माला जपिए। यह आवारागर्दी अब इस घर में बर्दाश्त नहीं होगी!”

हॉल में कुछ पलों के लिए केवल दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई देने लगी। शैलजा जी ने अपनी आंखें मूंद लीं। उनके दिमाग की नसें फटने को हो रही थीं। जिन्हें उन्होंने अपनी छाती का दूध पिलाकर बड़ा किया था, जिनकी एक खरोंच पर वे रात-रात भर जागकर रोती थीं, आज वही बेटे उनके वजूद की धज्जियां उड़ा रहे थे। लेकिन इस बार शैलजा जी टूटी नहीं। बरसों के आंसुओं ने उनके भीतर के आत्मसम्मान को फौलाद बना दिया था।

उन्होंने धीरे से अपनी सांसों को नियंत्रित किया, अपने चेहरे पर एक गहरी, शांत दृढ़ता लाई और अपने बैग से एक सुनहरे अक्षरों वाला निमंत्रण पत्र और एक भारी प्रशस्ति-पत्र निकालकर कांच की टी-टेबल पर रख दिया।

“यह देखो,” शैलजा जी की आवाज इतनी गंभीर और वजनदार थी कि दोनों बेटों के कदम खुद-ब-खुद एक कदम पीछे हट गए।

पुलकित ने अनमने मन से उस कार्ड को देखा। वह राज्य संस्कृति विभाग और महिला सशक्तिकरण मंत्रालय का आधिकारिक निमंत्रण पत्र था।

शैलजा जी ने दोनों बहुओं और बेटों की आंखों में सीधे देखते हुए कहा, “आज मैं यहां गई थी। हमारे राज्य के मुख्यमंत्री और राज्यपाल के हाथों शहर के टाउन हॉल में आज मुझे ‘विशिष्ट नारी गौरव सम्मान’ और पचास हजार रुपये की मानद उपाधि से नवाजा गया है। यह सम्मान मुझे पिछले दो वर्षों में उन पचास अनाथ बच्चियों को अपने पैरों पर खड़ा करने, उन्हें हुनरमंद बनाने और समाज में बाल विवाह के खिलाफ अपनी कहानियों के जरिए जागरूकता फैलाने के लिए दिया गया है।”

यह सुनते ही जैसे कमरे में सन्नाटा गिर पड़ा। पुलकित और समर का मुंह खुला का खुला रह गया। रोहिणी और शिखा के चेहरों की रंगत एक ही पल में उड़ गई।

शैलजा जी ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “यह निमंत्रण पत्र चार दिन पहले ही आ गया था। मैंने तुम चारों को डाइनिंग टेबल पर दिखाया था। बड़े मान और उम्मीद से कहा था कि मेरे जीवन की इस सबसे बड़ी खुशी के मौके पर तुम सब मेरे साथ चलो। लेकिन तुम सबने क्या किया? किसी ने सिर उठाकर उस कार्ड को छुआ तक नहीं। किसी के पास ऑफिस की मीटिंग का बहाना था, तो किसी के पास पार्लर और शॉपिंग की फुर्सत नहीं थी। तुम सबके लिए तुम्हारी मां की हर बात, उसकी हर खुशी एक फालतू की बकवास थी। मेरे इस वजूद को तुमने घर के उस पुराने, दीमक लगे बक्से की तरह समझ लिया था जिसे उठाकर कबाड़ में फेंक दिया जाता है। जब तुम में से कोई मेरी खुशी में शामिल नहीं होना चाहता था, तो आज मैं किसको बताकर जाती? और क्यों गिड़गिड़ाती तुम्हारे आगे?”

शैलजा जी ने एक कदम आगे बढ़ाया। उनकी आंखों में बरसों से जमा अंगारे अब शब्दों के रूप में फूट पड़े थे।

“और तुम… तुम मेरी बहुएं! तुम कहती हो कि सासु मां सठिया गई हैं? जरा सोचो, कल जब तुम दोनों पचास की दहलीज पार करोगी, तो क्या तुम दोनों अपनी सांसें लेना बंद कर दोगी? क्या पचास साल की होते ही औरत का दिल, दिल नहीं रहता? क्या उसकी भावनाएं, उसकी इच्छाएं, उसके सपने मर जाते हैं? क्या किसी शास्त्र या कानून में लिखा है कि पति के चले जाने के बाद या बाल सफेद हो जाने के बाद एक औरत को सिर्फ सफेद थान ओढ़कर, कमरे में बैठकर तिल-तिल कर घुटने का ही हक है?”

शैलजा जी ने मुड़कर पुलकित और समर को देखा, “तुम मुझसे हिसाब मांग रहे हो कि मैं फोन में क्यों व्यस्त रहती हूं? अरे नादानों, यह सवाल तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए था! जिस मां ने अपनी पूरी जवानी, अपनी हर सांस तुम्हारे नाम कर दी, जब उसके पति का साया सिर से उठ गया, तो तुम दोनों में से किसी ने कभी पांच मिनट उसके पास बैठकर पूछा कि ‘मां, तुम कैसी हो?’ जब मैं रात को अपने सूने कमरे में अकेले बैठकर रोती थी, तो क्या कभी किसी ने आकर मेरा हाथ थामा? कभी किसी ने मेरे साथ बैठकर प्यार से एक निवाला खाया? हमेशा मुझे उपेक्षित रखा, जैसे मेरा होना न होना बराबर हो!”

शैलजा जी की आवाज भर्रा गई, लेकिन उन्होंने आंसुओं को बहने नहीं दिया, “मुझे उस छोटे से मोबाइल के जरिए उन अनजाने लोगों से अपनापन मिला, जिन्होंने मेरी लिखी बातों को समझा, मेरे दर्द को महसूस किया। वे आभासी दोस्त दिन में दो बार फोन करके मेरा हाल पूछते हैं। दो दिन मेरी कोई पोस्ट न दिखे तो सौ संदेश आते हैं कि ‘दीदी, आप ठीक तो हैं ना?’ अरे, सीखने की कोई उम्र नहीं होती! जीने की कोई उम्र नहीं होती! और दोस्त बनाने का कोई पैमाना नहीं होता! इंसान अपनी आखिरी सांस तक एक इंसान ही रहता है, कोई बेजान पत्थर नहीं बन जाता।”

कमरे में खड़े चारों लोग नजरें झुकाए खड़े थे। उनके पास शैलजा जी के एक भी सवाल का कोई जवाब नहीं था।

शैलजा जी ने अपनी अलमारी से अपना बैंक पासबुक और कुछ कागजात निकाले और मेज पर रख दिए। उनका स्वर अब पूरी तरह अटल था।

“अब मेरी बात कान खोलकर सुन लो,” शैलजा जी ने कहा, “यह मकान तुम्हारे पिता हरिशंकर जी की अपनी गाढ़ी कमाई का है, जो कानूनी तौर पर आज मेरे नाम है। तुम्हारे पिता की पेंशन हर महीने मेरे खाते में आती है, जिससे मेरा गुजारा बहुत शान से हो सकता है। मुझे तुम चारों में से किसी के टुकड़ों पर पलने की जरूरत नहीं है। अगर मेरा अपने तरीके से जीना, मेरा हंसना, मेरे कपड़े और मेरी यह नई जिंदगी तुम लोगों की तथाकथित झूठी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाती है, तो तुम चारों कल सुबह ही इस घर से अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर कहीं और किराए का मकान ले सकते हो।”

“मां… यह आप क्या कह रही हैं?” समर ने घबराकर कहा।

“मैं बिल्कुल होश में कह रही हूं समर,” शैलजा जी ने कड़े शब्दों में कहा, “जब तक मेरे हाथ-पैर चल रहे हैं, मैं सिर उठाकर, अपनी शर्तों पर जिऊंगी। और जब कल को मेरा शरीर साथ नहीं देगा, तो मैं अपनी पेंशन के दम पर किसी अच्छे वृद्धाश्रम में चली जाऊंगी, लेकिन अपने ही बच्चों की दया, तानों और मोहताजी की बैसाखियों पर घिसट-घिसट कर नहीं जिऊंगी। तुमने तय कर लिया था कि मां-बाप अगर नई पीढ़ी के साथ कदम न मिलाएं तो वे गंवार हैं, और अगर अपनी जिंदगी को नए सांचे में ढालकर जीने लगें तो वे बेशर्म हैं! यह दोगलापन अब इस चौखट के भीतर नहीं चलेगा।”

इतना कहकर शैलजा जी ने अपने कदम मोड़े और बालकनी की तरफ बढ़ गईं। उन्होंने दोनों पल्लों वाली खिड़की को पूरी ताकत से खोल दिया। बाहर ढलती शाम की ताजी, ठंडी हवा का एक झोंका कमरे में दाखिल हुआ और दूर क्षितिज पर ढलते सूरज की सुनहरी लालिमा ने शैलजा जी के चेहरे को एक अलौकिक तेज से भर दिया।

पीछे हॉल में खड़े पुलकित और समर की आंखें शर्म से झुक चुकी थीं। रोहिणी और शिखा के हाथों से कॉफी के मग छूटने को थे। उन्हें पहली बार यह अहसास हुआ था कि जिस मां को वे एक कमजोर, बेबस और आश्रित औरत समझ रहे थे, उसके भीतर स्वाभिमान का कितना गहरा समंदर हिलोरे ले रहा था।

पुलकित धीरे-धीरे कदमों से चलकर बालकनी की ओर बढ़ा। उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बह रहे थे। उसने पीछे से जाकर शैलजा जी के कांपते हाथों को थाम लिया।

“मां… हमें माफ कर दीजिए,” पुलकित का गला रुंध गया, “हम इतने अंधे हो गए थे कि अपनी झूठी दुनिया में यह भूल ही गए कि आपकी भी कोई पहचान है, आपका भी कोई दिल है। हमने आपके अकेलेपन को कभी नहीं समझा मां। हमने आपको सिर्फ अपनी जरूरत समझा, कभी एक जीता-जागता इंसान नहीं माना। आज आपने हमारे मुंह पर जो तमाचा मारा है, उसने हमारी अंधी आंखों के सारे पर्दे फाड़ दिए हैं।”

समर भी रोते हुए मां के पैरों में बैठ गया, “मां, हमें छोड़कर वृद्धाश्रम जाने की बात मत कहिए। अगर कोई इस घर के तौर-तरीके बदलेगा, तो वो हम हैं। हमें गर्व है आप पर मां… हमें गर्व है कि आप सिर्फ हमारी मां नहीं, बल्कि सैकड़ों बच्चियों का सहारा हैं। आज के बाद कोई आपको नहीं टोकेगा। आप जैसे जीना चाहें, वैसे जिएंगी।”

रोहिणी और शिखा भी नम आंखों से आगे आईं। रोहिणी ने हाथ जोड़कर कहा, “मां जी, हमें अपनी छोटी सोच पर बेहद शर्मिंदगी है। हम खुद औरत होकर एक औरत के दर्द और उसके सपनों को नहीं समझ सकीं। हमें अपनी बेटी समझकर माफ कर दीजिए।”

शैलजा जी ने मुड़कर अपने दोनों बेटों और बहुओं को देखा। उनकी आंखों में भरा गुस्सा अब वात्सल्य की नमी में पिघल चुका था। उन्होंने झुककर समर को उठाया और पुलकित के सिर पर हाथ रख दिया।

“मैं तुमसे नफरत नहीं करती बच्चों,” शैलजा जी ने भरे गले से कहा, “बस मैं यह चाहती थी कि तुम समझो कि बूढ़े होते मां-बाप को सिर्फ दो वक्त की रोटी और छत नहीं चाहिए होती, उन्हें थोड़ा सा सम्मान, थोड़ा सा वक्त और अपने तरीके से सांस लेने की खुली हवा चाहिए होती है। उम्र ढलने का मतलब जिंदगी खत्म होना नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत होना है।”

उस रात ‘शांति कुंज’ के आंगन में बरसों बाद एक साथ बैठकर सबने खाना खाया। उस डाइनिंग टेबल पर आज किसी का फोन नहीं बजा, कोई औपचारिक दीवार नहीं थी। वहां सिर्फ एक परिवार था, जो अपनी गलतियों से सीखकर एक-दूसरे के वजूद का सम्मान करना सीख चुका था। खिड़की से छनकर आती चांदनी जैसे गवाही दे रही थी कि जब आत्मसम्मान की लौ जलती है, तो ढलती उम्र की सांझ भी एक सुनहरे सवेरे में तब्दील हो जाती है।

आपके विचार हमारे लिए बेहद अनमोल हैं:

क्या हमारे समाज में आज भी यह गलत धारणा नहीं बनी हुई है कि एक उम्र के बाद, खासकर विधवा या बुजुर्ग माताओं को अपनी सारी खुशियां और शौक मारकर केवल एक कोने में बैठ जाना चाहिए? क्या शैलजा जी का अपने स्वाभिमान और सपनों के लिए खड़े होना हर उस बुजुर्ग के लिए एक प्रेरणा नहीं है जो अपने ही घर में उपेक्षित महसूस कर रहा है? अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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