नेह की टूटी डोर

नंदिनी के पैरों के नीचे से ज़मीन सरक गई थी। जिस दामिनी के बच्चों की पढ़ाई के लिए उसने अपने आरव के ट्यूशन के ख़र्चों में कटौती की, जिस दामिनी के मायके वालों की आवभगत में उसने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी, और जिस अम्मा जी के घुटनों के ऑपरेशन के लिए उसने अपने गहने तक गिरवी रखने में संकोच नहीं किया था—आज वही दामिनी उसे ‘शहर की मेहमान’ और ‘फ़ोन पर हाल पूछने वाली’ बता रही थी?

सबसे ज़्यादा दुख तो तब हुआ जब देवर नीरज ने भी नज़रें चुरा लीं और अपनी पत्नी को एक शब्द नहीं कहा। सिद्धार्थ के आत्मसम्मान को इतनी गहरी ठेस लगी कि उन्होंने बिना एक भी शब्द बोले अपनी माँ की एक पुरानी तस्वीर उठाई और नंदिनी का हाथ पकड़कर कहा, “चलो नंदिनी, जिस घर में हमारे पैसे की ज़रूरत तो थी पर हमारे जज़्बातों की कोई क़ीमत नहीं, वहाँ अब हमारा कुछ नहीं बचा।”

“मम्मी, मानसी बुआ का कॉल है… काफ़ी देर से बात करना चाह रही हैं आपसे।” बारह साल के आरव ने स्क्रीन चमकता हुआ फ़ोन अपनी माँ नंदिनी के हाथों में थमाया, तो नंदिनी ने सूटकेस की ज़िप खींचते हुए अपने काँपते हाथों को पल्लू से पोंछा और फ़ोन कान से लगा लिया।

“हाँ मानसी, बोलो… पीछे गाँव में सब शांत तो है ना? रस्मों के बाद कोई और बात तो नहीं बढ़ी?” नंदिनी की आवाज़ में थकान से ज़्यादा किसी अपने के हाथों छले जाने की टीस थी।

उधर से मानसी की आवाज़ में चिंता और आक्रोश दोनों एक साथ फूट पड़े, “भाभी, अब भी आप पीछे की ही चिंता कर रही हैं? अब आप दामिनी के लिए रातों की नींद खराब करना छोड़ दीजिए। इस बार तो आपने अपनी आँखों से उसका असली रूप देख लिया ना? मैं तो पिछले पाँच सालों से आपको आगाह कर रही थी, पर आप हर बार मुझे ही देवरानी-जेठानी के रिश्ते की मर्यादा समझाकर चुप करा देती थीं। अम्मा जी भी ना जाने किस मोह में बँधी थीं कि जाते-जाते भी दामिनी और उसके परिवार की ज़िम्मेदारी आपके कंधों पर डाल गईं। भाभी, जब वो इंसान आपसे सिर्फ़ ज़रूरत और पैसों का रिश्ता रखता है, तो आप क्यों अपनी जान जला रही हैं? समय रहते संभल जाइए और बस नाम का रिश्ता रखिए, वरना वो आपको कहीं का नहीं छोड़ेगी।”

नंदिनी ने एक गहरी, ठंडी साँस ली। खिड़की के बाहर चंडीगढ़ की शाम ढल रही थी, ठीक वैसे ही जैसे उसके भीतर के कई भ्रम ढल चुके थे। “कैसे हाथ खींच लूँ मानसी? अम्मा जी ने आख़िरी साँस लेते वक़्त भी मेरी हथेली पर हाथ रखकर कहा था— ‘नंदिनी, दामिनी थोड़ी नादान है, घर की बड़ी बहू होने के नाते तू ही इस टूटे-फूटे कुनबे को बाँधकर रखना।’ अब भला मरने वाले के उस भरोसे को कैसे तोड़ दूँ?” नंदिनी का गला भर आया।

“अम्मा जी तो चली गईं भाभी, पर भैया का क्या हाल है? वहाँ से निकलने के बाद उन्होंने कुछ खाया-पिया या नहीं? और आपके मायके में सब कैसे हैं? वो तो भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि चंडीगढ़ में आपके मम्मी-पापा का घर है और वहाँ से मुंबई की सीधी फ़्लाइट मिल जाती है, वरना हमारे गाँव के रास्ते से तो भैया की इस हालत में सफ़र करना ही मुहाल हो जाता,” मानसी के स्वर में अपने बड़े भाई के लिए गहरी पीड़ा थी।

“हाँ मानसी, मम्मी-पापा के यहाँ सब ठीक है। बस तुम्हारे भैया… उनका हाल तो तुम समझ ही सकती हो। अम्मा जी से उनकी जान बसती थी। माँ के जाने का ग़म कम था क्या, जो दामिनी के तानों ने उनके कलेजे को छलनी कर दिया। जब हम अपनी कार में बैठकर गाँव की पगडंडी छोड़ रहे थे, तो पीछे मुड़कर अपनी पुश्तैनी हवेली को देखते हुए भैया की आँखों से आँसू टपक पड़े। मुझसे कहने लगे— ‘नंदिनी, आज अम्मा के साथ-साथ मेरा घर भी छूट गया। दामिनी के रहते अब शायद ही हम कभी इस दहलीज़ पर हक़ से कदम रख पाएँगे।’ खैर… अभी हम एयरपोर्ट के लिए निकल रहे हैं। मैं मुंबई पहुँचकर तुम्हें इत्मीनान से फ़ोन करती हूँ।”

फ़ोन काटकर नंदिनी ने टेबल पर रखा और अपने पति सिद्धार्थ की ओर देखा, जो बालकनी में गुमसुम खड़े शून्य में ताक रहे थे। नंदिनी ने चुपचाप बाक़ी बचा सामान समेटा, अपने बुज़ुर्ग माता-पिता के पैर छुए और भारी मन से टैक्सी में बैठकर एयरपोर्ट की ओर रवाना हो गई।

एयरपोर्ट के विशाल प्रतीक्षालय में बैठी नंदिनी के हाथों में गरम कॉफ़ी का मग था, जो अब धीरे-धीरे ठंडा हो रहा था। काँच की बड़ी-सी दीवार के उस पार रनवे पर विमानों का आना-जाना लगा हुआ था। वह एकटक उन विशालकाय विमानों को देख रही थी। उसके मन में एक अजीब-सा ख़याल आया— ‘ये विमान भी तो सैकड़ों अजनबियों को अपनी मंज़िल तक सही-सलामत पहुँचाने की कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी उठाते हैं। पायलट हर नियम का पालन करता है, हर पुर्ज़े की जाँच होती है, लेकिन फिर भी कभी-कभी मौसम या किसी अनदेखी ख़राबी की वजह से चूक हो ही जाती है। पर मेरी गृहस्थी की उड़ान में मुझसे कहाँ चूक हुई? मैंने तो अठारह सालों तक अपने ससुराल की हर छोटी-बड़ी ज़िम्मेदारी को बिना किसी शिकायत के, अपने सगे बच्चों की तरह पाला। फिर आज मुझे ही कठघरे में क्यों खड़ा कर दिया गया?’

अतीत की परतें उसके ज़ेहन में पन्नों की तरह पलटने लगीं। चौदह दिन पहले की ही तो बात है। मुंबई के अपने फ्लैट में सुबह की चाय बनाते वक़्त अचानक गाँव से फोन आया था कि सास शारदा देवी को दिल का दौरा पड़ा है और वे अब इस दुनिया में नहीं रहीं। पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी। सिद्धार्थ तो जैसे पत्थर के हो गए थे। आनन-फानन में सबसे पहली फ्लाइट पकड़कर वे लोग मुंबई से चंडीगढ़ पहुँचे, और वहाँ से टैक्सी करके तीन घंटे का सफ़र तय कर हिमाचल की सीमा से सटे अपने पैतृक गाँव पहुँचे थे।

जब तक वे हवेली के दरवाज़े पर पहुँचे, तब तक आँगन में सफ़ेद चादर बिछ चुकी थी और रिश्तेदारों ने अम्मा जी की अंतिम यात्रा की पूरी तैयारी कर ली थी। सिद्धार्थ अपनी माँ के पार्थिव शरीर से लिपटकर बच्चों की तरह फूट-फूटकर रोए थे। उस वक़्त नंदिनी ने ही अपने आँसू पीकर सबको संभाला था—अपनी देवरानी दामिनी को भी, जो दहाड़ें मारकर रो रही थी, और अपने देवर नीरज को भी।

नंदिनी ने शादी के बाद से ही कभी दामिनी को देवरानी नहीं, अपनी छोटी बहन समझा था। सिद्धार्थ मुंबई की एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर थे, लेकिन उनका दिल हमेशा अपने गाँव में बसता था। नीरज की नौकरी गाँव के पास ही एक कस्बे में लग गई थी, इसलिए वह और दामिनी अम्मा जी के साथ पुश्तैनी मकान में ही रहते थे। इन अठारह सालों में गाँव के घर की मरम्मत हो, अम्मा जी की महँगी दवाइयाँ हों, नीरज की शादी का ख़र्च हो, या फिर दामिनी के दोनों बच्चों की अंग्रेज़ी स्कूल की फ़ीस—सिद्धार्थ और नंदिनी ने कभी अपने हाथ पीछे नहीं खींचे। नंदिनी ने अपनी कितनी ही ख़्वाहिशों को मारकर हर महीने एक बंधी हुई रक़म गाँव भिजवाई थी। त्योहारों पर वह अपने लिए साड़ी बाद में ख़रीदती, पहले दामिनी और ननद मानसी के लिए तोहफ़े पैक करती थी।

लेकिन तेरहवीं की शाम, जब सारे रिश्तेदार विदा हो गए और आँगन में सिर्फ़ घर के लोग बचे, तो अचानक हवा का रुख़ ही बदल गया। अम्मा जी की अलमारी की चाबियाँ और ज़मीन के काग़ज़ात की बात छिड़ते ही दामिनी के चेहरे पर जो भाव आए, उसने नंदिनी को सन्न कर दिया था।

जब सिद्धार्थ ने बहुत सहज भाव से अपने छोटे भाई से कहा था, “नीरज, अब अम्मा नहीं रहीं, पर यह घर सूना नहीं होना चाहिए। मैं और नंदिनी साल में दो-तीन बार आया करेंगे। अम्मा के कमरे को वैसे ही रहने देना, हम जब भी आएंगे, वहीं रुकेंगे।”

तभी दामिनी ने पल्लू कमर में खोंसते हुए तल्ख़ आवाज़ में कहा था, “भैया, कहने और करने में बहुत फ़र्क होता है। साल में दो बार मेहमानों की तरह आकर हुक्म चलाना आसान है, पर यहाँ रहकर बुढ़ापे की सेवा करना और घर को सींचना हमने किया है। भाभी तो शहर में एसी कमरों में बैठकर बस फ़ोन पर हाल पूछ लेती थीं, कभी दो चार हफ़्ते यहाँ चूल्हा-चौका करना पड़ता तो पता चलता! अब अम्मा जी के जाने के बाद इस घर और ज़मीन पर पहला हक़ उनका है जिन्होंने यहाँ अपनी जवानी खपाई है। आप लोगों को तो अपने मुंबई के फ्लैट से ही फ़ुर्सत नहीं मिलती, फिर यहाँ के कमरों पर ताला डलवाकर क्या करेंगे?”

नंदिनी के पैरों के नीचे से ज़मीन सरक गई थी। जिस दामिनी के बच्चों की पढ़ाई के लिए उसने अपने आरव के ट्यूशन के ख़र्चों में कटौती की, जिस दामिनी के मायके वालों की आवभगत में उसने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी, और जिस अम्मा जी के घुटनों के ऑपरेशन के लिए उसने अपने गहने तक गिरवी रखने में संकोच नहीं किया था—आज वही दामिनी उसे ‘शहर की मेहमान’ और ‘फ़ोन पर हाल पूछने वाली’ बता रही थी?

सबसे ज़्यादा दुख तो तब हुआ जब देवर नीरज ने भी नज़रें चुरा लीं और अपनी पत्नी को एक शब्द नहीं कहा। सिद्धार्थ के आत्मसम्मान को इतनी गहरी ठेस लगी कि उन्होंने बिना एक भी शब्द बोले अपनी माँ की एक पुरानी तस्वीर उठाई और नंदिनी का हाथ पकड़कर कहा, “चलो नंदिनी, जिस घर में हमारे पैसे की ज़रूरत तो थी पर हमारे जज़्बातों की कोई क़ीमत नहीं, वहाँ अब हमारा कुछ नहीं बचा।”

“मम्मी, बोर्डिंग शुरू हो गई है, चलिए ना!” आरव ने नंदिनी का कंधा हिलाया, तो वह वर्तमान में लौट आई।

विमान के भीतर अपनी सीट पर बैठने के बाद भी नंदिनी के मन का तूफ़ान शांत नहीं हुआ था। वह सोच रही थी कि आज वह बिल्कुल खाली हाथ अपने उस मुंबई वाले घर लौट रही है, जिसे वह आज तक सिर्फ़ ‘पति की नौकरी वाला ठिकाना’ समझती थी। उसने तो हमेशा गाँव की हवेली को ही अपना असली घर माना था। पर आज उसे एहसास हो रहा था कि जिसे वह अपना घर समझकर संवार रही थी, वह तो रेत का महल था।

विमान ने जैसे ही बादलों को चीरते हुए ऊँचाई पकड़ी, नंदिनी की आँखों से दो गर्म बूँदें गालों पर लुढ़क आईं। बगल में बैठे सिद्धार्थ ने चुपचाप अपना हाथ नंदिनी के काँपते हाथों पर रख दिया। नंदिनी ने भीगी पलकों से पति की ओर देखा। सिद्धार्थ के चेहरे पर अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी शांति और समझदारी थी।

“खुद को कोसना बंद करो, नंदिनी,” सिद्धार्थ ने बहुत धीमे पर मज़बूत स्वर में कहा, “मैं कल से देख रहा हूँ, तुम बार-बार यही सोच रही हो कि तुमसे कहाँ कमी रह गई। सच तो यह है कि कमी तुम्हारे निभाने में नहीं थी, कमी हमारी समझ में थी। हमने ज़िम्मेदारी और समर्पण के बीच की लकीर को मिटा दिया था। जब आप किसी के लिए बिना माँगे, अपनी हैसियत से बढ़कर करने लगते हैं, तो सामने वाला उसे आपका प्यार नहीं, अपना अधिकार समझने लगता है।”

नंदिनी ने रुँधे गले से कहा, “पर सिद्धार्थ, अम्मा जी ने जो ज़िम्मेदारी दी थी… और आपका वो आँगन जहाँ आपका बचपन बीता, वो सब ऐसे कैसे छूट सकता है? दामिनी के कुछ कड़वे शब्दों की वजह से हम अपनी जड़ों से तो नहीं कट सकते ना?”

सिद्धार्थ हल्का-सा मुस्कुराए और बोले, “जड़ें ज़मीन के किसी टुकड़े या ईंट-पत्थर के मकान में नहीं होतीं नंदिनी, जड़ें हमारे संस्कारों और हमारे अपने लोगों में होती हैं। अम्मा अब हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके संस्कार हमारे साथ हैं। रही बात दामिनी और नीरज की, तो शायद अब वक़्त आ गया है कि उन्हें भी अपनी गृहस्थी का भार खुद उठाने दिया जाए। जब तक बड़ा पेड़ छोटे पौधे को अपनी घनी छाँव में छुपाए रखता है, तब तक छोटे पौधे को धूप की तपिश का अंदाज़ा नहीं होता और न ही वह खुद मज़बूत बन पाता है। हमारा पीछे हटना उनसे नफ़रत करना नहीं है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है।”

पति की बातों ने नंदिनी के मन पर पड़े भारी पत्थर को जैसे पल भर में हटा दिया। वह दंग रह गई कि जिस बात को वह रिश्तों की हार समझ रही थी, सिद्धार्थ ने उसे कितनी ख़ूबसूरती से जीवन की एक नई सीख में बदल दिया था।

मुंबई पहुँचने के बाद शुरुआती कुछ हफ़्ते भारी ज़रूर गुज़रे, लेकिन नंदिनी ने अब अपने जीने का नज़रिया बदल लिया था। उसने अपने तीन कमरों के फ्लैट को अब ‘किराए या नौकरी का पड़ाव’ समझना छोड़ दिया। उसने बालकनी में तुलसी का नया बिरवा लगाया, अम्मा जी की तस्वीर को पूजा घर में स्थान दिया और अपनी अधूरी छूटी पेंटिंग की शौक को फिर से ज़िंदा किया। जो पैसे और समय वह दूसरों को खुश करने की अंधी दौड़ में गँवा रही थी, अब उसने वह अपने बेटे आरव के भविष्य, सिद्धार्थ की सेहत और अपनी खुशी में लगाना शुरू किया। उसने दामिनी से बात करनी बंद नहीं की, लेकिन अब फ़ोन पर सिर्फ़ कुशल-मंगल पूछा जाता था, बिन माँगी सलाह या आर्थिक मदद की पेशकश नहीं होती थी।

वक्त का पहिया अपनी गति से घूमता रहा और देखते-देखते एक साल बीत गया।

अम्मा जी की पहली बरसी से कोई दस दिन पहले की बात है। रात के खाने के बाद नंदिनी रसोई समेट रही थी कि अचानक सिद्धार्थ का फ़ोन बजा। स्क्रीन पर ‘नीरज’ का नाम चमक रहा था। सिद्धार्थ ने स्पीकर ऑन कर दिया।

“भैया… प्रणाम,” नीरज की आवाज़ में वह पुरानी अकड़ नहीं, बल्कि एक अजीब-सी टूटन और झिझक थी।

“खुश रहो नीरज, बताओ सब ठीक तो है?” सिद्धार्थ ने सहजता से पूछा।

उधर से कुछ पल की ख़ामोशी रही, फिर दामिनी के सिसकने की आवाज़ आई। नीरज ने भारी गले से कहा, “भैया, इस एक साल ने हमें और दामिनी को आइना दिखा दिया है। जब तक आप और भाभी हमारे सिर पर छत की तरह थे, हमें पता ही नहीं चला कि घर चलाने, रिश्तेदारी निभाने और मुसीबतों से लड़ने में कितनी ताक़त लगती है। पिछले महीने जब बेटे की स्कूल फ़ीस और घर की छत की मरम्मत एक साथ आ पड़ी, और किसी भी रिश्तेदार ने सीधे मुँह बात नहीं की, तब दामिनी को समझ आया कि भाभी बिना जताए हमारे लिए क्या-क्या कर जाती थीं। अम्मा जी की बरसी आ रही है भैया… आपके और भाभी के बिना यह हवेली काटने को दौड़ती है। घर के बड़े आप हैं, अगर आप लोग नहीं आएंगे तो गाँव में हमारी कोई इज़्ज़त नहीं बचेगी।”

तभी दामिनी ने फ़ोन अपने हाथ में ले लिया और रोते हुए बोली, “भाभी… मुझे माफ़ कर दीजिए। लालच और अहंकार ने मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दी थी। मैंने आपके निस्वार्थ प्यार को कमज़ोरी समझ लिया था। आप प्लीज़ भैया और आरव को लेकर घर आ जाइए। अम्मा जी का कमरा आज भी आपका इंतज़ार कर रहा है भाभी, मैंने उसे हाथ भी नहीं लगाया है।”

नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन ये आँसू दर्द के नहीं, बल्कि उस सुकून के थे जो सत्य की जीत पर मिलता है। उसने सिद्धार्थ की ओर देखा। सिद्धार्थ ने सहमति में सिर हिलाया।

नंदिनी ने अपनी आवाज़ को संयत करते हुए स्नेह से कहा, “रो मत दामिनी। गलतियाँ इंसान से ही होती हैं, और जो समय रहते समझ जाए, वही परिवार को बचा लेता है। हम अम्मा जी की बरसी पर ज़रूर आएंगे। आख़िर वह हमारे भी तो बुज़ुर्गों की धरोहर है। तुम तैयारी शुरू करो, मैं और तुम्हारे भैया परसों की फ़्लाइट से आ रहे हैं।”

फ़ोन रखने के बाद नंदिनी ने महसूस किया कि आज उसके भीतर कोई कड़वाहट नहीं थी। उसने सीख लिया था कि रिश्तों में प्यार और ज़िम्मेदारी ज़रूर होनी चाहिए, लेकिन अपने आत्मसम्मान की क़ीमत पर नहीं। आज उसके पास अपना संवारा हुआ वर्तमान भी था और अपनी जड़ों का सम्मान भी।

कहानी पढ़ने के बाद अपने विचार ज़रूर साझा करें:

क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसा मोड़ आया है जब आपके निस्वार्थ समर्पण को ही आपकी कमज़ोरी समझ लिया गया हो? ऐसे में इंसान को भावनाओं में बहना चाहिए या सिद्धार्थ की तरह आत्मसम्मान का रास्ता चुनना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें!

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

error: Content is protected !!