*चाची* – उषा भारद्वाज

    मोहल्ला भले ही छूट गया हो, लेकिन उसकी यादें आज भी मेरे मन में वैसे ही बसी हैं। आज मां ने दही बड़ा बनाया। मुझे बचपन से बड़े बहुत पसंद हैं। जैसे ही मैंने खाना शुरु किया। अचानक मोहल्ले की चाची याद आ गईं।

पूरा मोहल्ला उन्हें चाची के नाम से ही जानता था। छोटे-बड़े सभी उन्हें “चाची” कहकर बुलाते थे। कोई भी काम हो, किसी को कुछ देना हो या किसी की मदद करनी हो—सबके लिए चाची हमेशा तैयार रहती थीं। वे बहुत अमीर नहीं थीं, लेकिन दिल की इतनी अमीर थीं कि देने से कभी पीछे नहीं हटती थीं। पता नहीं कैसा अनोखा रिश्ता था कि वो मुझे अपने बच्चो जैसा प्रेम करती थीं। और मै भी उनके प्रति बहुत अपनापन महसूस करती थी।

वे जब भी कुछ विशेष पकवान जैसे दाल के फरे,दही बड़े, आदि बनातीं, तो एक प्लेट में बड़े प्यार से सजाकर,  हमारे घर दे जाती और कहतीं—

सविता बिटिया को दे देना, कहना चाची ने भेजे हैं।”

आज भी उनके हाथों के बने दही बड़े का स्वाद मेरी ज़ुबान पर है।

    उनका जीवन आसान नहीं था। दो बेटियाँ और दो बेटे थे। उनके पति मकान बनाने का काम करते थे। दिनभर मेहनत करके जो कमाते, उसमें से थोड़ा-बहुत ही घर तक पहुँच पाता। बाकी पैसा शाम होते-होते शराब में बह जाता। उसी थोड़े से पैसे में चाची घर चलातीं, बच्चों की पढ़ाई करातीं और हर जिम्मेदारी निभातीं।

समय बीतता गया। दोनों बेटियों की शादी हो गई। बेटों की भी शादी हो गई। मुझे लगता था कि अब शायद चाची की ज़िंदगी आसान हो जाएगी। उन्होंने पूरी उम्र पति की मार, तानों, सास की सेवा और बच्चों की जिम्मेदारियों में गुज़ार दी थी। अब शायद वे अपने लिए जी सकेंगी।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

कुछ समय से मैंने महसूस किया कि चाची बदल गई थीं। पहले जैसी हँसमुख नहीं रहीं। सबके बीच बैठतीं तो थीं, लेकिन खोई-खोई रहतीं। अगर कुछ कहतीं भी तो बस इतना—

“पता नहीं भाग्य में क्या लिखा है… इंसान कुछ सोचता है और होता कुछ और है।”

फिर एक सुबह ऐसा हुआ जिसे मैं कभी नहीं भूल सकती।

मेरी आँख अभी ठीक से खुली भी नहीं थी कि पूरे मोहल्ले में चीख-पुकार मच गई। मैं घबराकर बाहर आई और माँ से पूछा—

“माँ, क्या हुआ? सब लोग क्यों इस तरह चिल्ला रहे हैं?”

माँ ने कहा, “तुम परेशान मत हो।”

लेकिन मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

मैंने फिर पूछा, “माँ, बताइए तो सही, हुआ क्या है?”

माँ की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने धीमे से कहा—

“चाची चली गईं।”

मैं घबरा गई।

“कहाँ चली गईं? क्या हुआ उन्हें?”

तब मेरी उम्र दस-ग्यारह साल रही होगी। मुझे लगा, शायद चाची इस दुनिया से चली गईं।

मैंने पूछा, “माँ… कैसे?”

माँ बोलीं, “पता नहीं। सुबह उठे तो देखा, वे घर में नहीं थीं। चप्पल तक पहनकर नहीं गईं।”

मेरे मुँह से अचानक निकला—

“मतलब… वे ज़िंदा हैं? फिर कहां चली गई हैं?”

मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था। मैंने फिर पूछा—

“लेकिन क्यों? वे तो बहुत अच्छी थीं।”

माँ की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने कहा—

“शायद वे बहुत अच्छी थीं… इसलिए ज़्यादा दिन यहां रह नहीं पाईं।”

मैंने पूछा, “कहाँ गई हैं?”

माँ ने कहा, “पता नहीं। सब लोग उन्हें ढूँढ़ रहे हैं।”

उस दिन मेरे आंखों के सामने उनका मुस्कुराता चेहरा, माथे की बड़ी-सी बिंदी, घुँघराले बाल और खिलखिलाती हँसी बार-बार घूम रही थी। मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि वे बिना किसी को बताए क्यों चली गईं?

समय बीत गया।

एक साल… फिर दो साल…

धीरे-धीरे सबने मान लिया कि चाची अब इस दुनिया में नहीं रहीं।

मैं भी बड़ी हो गई थी।

एक दिन माँ कहीं जाने की तैयारी कर रही थीं। मैंने पूछा—

“माँ, कहाँ जा रही हो?”

उन्होंने सहज मगर दर्द भरे स्वरों में कहा—

“चाची से मिलने।”

मैं चौंक गई।

“क्या? चाची ज़िंदा हैं? आपको पता है वे कहाँ हैं?”

माँ जैसे कुछ सोचने लगी फिर एक गहरी सांस भरते हुए बोलीं -हां थी। मतलब हां थी।- सविता व्याकुल होकर बोली – आप सही से क्यों नही बता रहीं?”

 मां को समझ आ गया था कि अब मैं इतनी बड़ी हो चुकी हूँ कि सच जान सकूँ।

उन्होंने धीरे से कहा—

“हाँ बिटिया, चाची ज़िंदा थीं। कई साल बाद एक मंदिर के बाहर फूल-मालाएँ बनाते हुए मुझे मिली थीं। उन्होंने बहुत कोशिश की कि मैं उन्हें पहचान न सकूँ, लेकिन मैं उन्हें पहचान गई। बहुत पूछने पर उन्होंने जो बताया, वह आज तुम्हें बता सकती हूँ।”

अब मेरी उत्सुकता चरम पर थी।

माँ ने कहना शुरू किया—

“उनके पति बहुत शराब पीते थे। रोज़ मारते-पीटते थे। चाची सब कुछ सहती रहीं। लेकिन एक दिन उन्होंने  घर में अपने पति को किसी दूसरी औरत के साथ देखा।”

मैं स्तब्ध रह गई।

माँ आगे बोलीं—

“यह सिर्फ एक बार नहीं हुआ। बार-बार हुआ। जब भी चाची ने विरोध किया, उन्हें पीटा गया, उनका अपमान किया गया। धीरे-धीरे वे चुप होती चली गईं। वे गहरे अवसाद में डूब गईं।”

“और एक दिन उन्होंने अपना घर छोड़ दिया।”

“वे मरने निकली थीं, लेकिन एक लड़की ने उन्हें बचा लिया। वह भी अकेली थी इसलिए उन्हें अपने घर ले गयी। बाद में चाची मंदिर के बाहर फूल-मालाएँ बनाकर बेचने लगीं। उसी से उनका गुज़ारा चलता रहा।”

माँ की आवाज़ भर्रा गई।

“मैं हर दूसरे-तीसरे दिन उनसे मिलने जाती थी। जितनी मदद कर सकती थी, करती थी। लेकिन आज सुबह उसी लड़की का फोन आया… उसने बताया कि चाची अब इस दुनिया में नहीं रहीं।”

माँ चुप हो गईं।

मैं पत्थर-सी बैठी रह गई।

मेरे पास कोई शब्द नहीं थे।

बस एक ही सवाल मेरे मन में बार-बार उठ रहा था—

“चाची ने किसी से कुछ कहा क्यों नहीं?”

शायद इसलिए कि कुछ दर्द इतने गहरे होते होंगे कि उन्हें शब्द भी नहीं मिलते।”

दुनिया के लिए चाची उस दिन ही मर गई थीं, जिस दिन वे घर छोड़कर चली गई थीं।

लेकिन मेरे लिए…

वे आज भी नहीं मरी थीं। जब सच में दुनिया से विदा ले चुकी थीं। बहुत सारे प्रश्नों के रूप में मेरे अन्तर्मन में बस गयी थीं।

लेखिका- उषा भारद्वाज

error: Content is protected !!