“तू बहुत बड़ा मूर्ख है, केदार! तुझे क्या लगा, मुझे तेरी चोरी का पता नहीं चलेगा?” सोमनाथ रुंधे गले से बोला।
केदार भी रोते हुए मुस्कुराया, “और आप? आप कब से इतने चालाक हो गए भैया कि मेरे ही बक्से में सेंध मार दी?”
दोनों भाई एक-दूसरे के गले लगकर बच्चों की तरह रो रहे थे। रेवती और गौरी भी बाहर आ गईं और यह दृश्य देखकर उनकी आँखों से भी स्नेह के आँसू छलक पड़े।
माधोपुर नाम के एक छोटे से कस्बे में हथकरघे की खट-खट की आवाज हर घर से आती थी। यह कस्बा अपने खूबसूरत रेशमी कपड़ों और साड़ियों की बुनाई के लिए पूरे जिले में मशहूर था। इसी कस्बे के एक पुराने, लेकिन बेहद साफ-सुथरे घर में दो भाई रहते थे—सोमनाथ और केदार। सोमनाथ उम्र में केदार से दस साल बड़ा था। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण सोमनाथ ने ही पिता और माँ, दोनों की भूमिका निभाई थी। उसने केदार को कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी।
सोमनाथ का अपना एक परिवार था। उसकी पत्नी रेवती एक बेहद समझदार और सुघड़ महिला थी, और उनकी एक बीस साल की बेटी थी—गौरी। गौरी की शादी तय हो चुकी थी और कुछ ही महीनों में उसकी डोली उठने वाली थी। दूसरी ओर, केदार अभी अविवाहित था। वह शहर जाकर अपना खुद का एक बड़ा कपड़ों का शोरूम खोलना चाहता था, जिसके लिए वह दिन-रात मेहनत करके पैसे जोड़ रहा था। दोनों भाई एक ही छत के नीचे रहते थे, लेकिन दोनों के काम करने के करघे अलग-अलग थे। दोनों अपनी-अपनी बुनाई करते, लेकिन घर का खर्च और सुख-दुख एक ही था।
त्यौहारों का मौसम करीब था और बाजार में रेशमी साड़ियों की माँग अचानक बहुत बढ़ गई थी। शहर के एक बहुत बड़े व्यापारी ने सोमनाथ और केदार को पचास विशेष बनारसी साड़ियों का ऑर्डर दिया। यह कोई मामूली ऑर्डर नहीं था; इसमें बहुत बारीक काम और दिन-रात की मेहनत की जरूरत थी, लेकिन इसका मेहनताना भी इतना था कि सोमनाथ की बेटी गौरी की शादी का खर्च आराम से निकल सकता था और केदार के शोरूम का सपना भी उड़ान भर सकता था।
दोनों भाइयों ने कमर कस ली। दिन की शुरुआत से लेकर आधी रात तक, घर में सिर्फ करघे चलने की आवाज आती। रेवती दोनों भाइयों के लिए समय पर खाना लाती, चाय बनाती और सूत रंगने में उनकी मदद करती। गौरी भी अपने चाचा और पिता का हाथ बँटाती। यह सिर्फ एक व्यावसायिक काम नहीं था, यह इस परिवार के सपनों को पूरा करने का एक यज्ञ था। लगभग डेढ़ महीने की अथक तपस्या के बाद, पचास साड़ियाँ बनकर तैयार हो गईं। जब व्यापारी ने साड़ियाँ देखीं, तो वह उनकी कलाकारी पर मुग्ध हो गया। उसने वादे के मुताबिक पूरी रकम नकद दे दी।
रात का समय था। दोनों भाइयों ने आंगन में बैठकर रुपयों का बँटवारा किया। कुल दो लाख रुपये थे। एक लाख रुपये सोमनाथ के हिस्से में आए और एक लाख रुपये केदार के हिस्से में। दोनों ने अपने-अपने हिस्से के रुपये एक लाल कपड़े में बांधे और अपने-अपने कमरों में चले गए। उस रात घर में एक अजीब सी शांति थी, थकान के साथ-साथ एक बहुत बड़ी उपलब्धि का सुकून था। लेकिन दोनों भाइयों की आँखों में नींद नहीं थी।
अपने कमरे में बिस्तर पर लेटा केदार करवटें बदल रहा था। उसके दिमाग में बार-बार बड़े भाई सोमनाथ का चेहरा आ रहा था। वह सोच रहा था, “भैया ने मुझे बचपन से पाल-पोस कर बड़ा किया। मेरी हर जिद पूरी की। आज जब गौरी की शादी सिर पर है, तो उन्हें कितने पैसों की जरूरत होगी। गहने, कपड़े, मेहमानों का स्वागत, बारात का खर्च… एक लाख रुपये तो शादी के लिए बहुत कम पड़ जाएंगे। और मेरा क्या? मैं तो अभी अकेला हूँ। मुझे कौन सा आज ही शहर में शोरूम खोलना है? मैं तो अगले साल भी अपना काम शुरू कर सकता हूँ। मेरी जरूरतें भैया की जरूरतों के सामने कुछ भी नहीं हैं।”
यह विचार आते ही केदार उठा। उसने अपने लाल कपड़े की पोटली खोली, उसमें से पचास हजार रुपये निकाले और दबे पाँव अपने कमरे से बाहर निकला। सोमनाथ का कमरा पास ही था और दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था। सोमनाथ और रेवती गहरी नींद में सो रहे थे। केदार ने बहुत ही सावधानी से सोमनाथ की पोटली के पास अपने हिस्से के पचास हजार रुपये रख दिए और चुपचाप अपने कमरे में वापस आकर चैन की नींद सो गया। उसके मन में एक असीम शांति थी।
उधर, केदार के जाने के कुछ देर बाद सोमनाथ की आँख खुल गई। उसे भी नींद नहीं आ रही थी। वह अपनी पत्नी रेवती को सोते हुए देख रहा था और मन ही मन सोच रहा था, “मेरा क्या है, मेरी तो गृहस्थी बस चुकी है। गौरी की शादी के लिए मैंने पहले से भी कुछ पैसे जोड़ रखे हैं, और ईश्वर की कृपा से यह एक लाख रुपया भी मिल गया। शादी तो हँसी-खुशी निपट ही जाएगी। लेकिन केदार… उस पागल ने तो अपनी पूरी जवानी करघे के सामने बिता दी। उसका सपना है शहर में एक बड़ा व्यापारी बनने का। उसे दुकान के लिए पगड़ी देनी है, माल भरना है। उसे अपना भविष्य बनाना है, घर बसाना है। अगर उसके पास पैसे कम पड़ गए, तो उसका सपना टूट जाएगा। एक पिता के रूप में मेरा फर्ज गौरी के प्रति है, तो एक बड़े भाई और पिता-तुल्य होने के नाते केदार के प्रति भी मेरा उतना ही फर्ज है।”
यही सोचकर सोमनाथ उठा। उसने अपनी पोटली खोली और बिना गिने अंदाजे से आधी गड्डियाँ (जो लगभग पचास हजार थीं) निकाल लीं। वह दबे पाँव केदार के कमरे की तरफ गया। केदार गहरी नींद में सो रहा था, उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। सोमनाथ ने प्यार से अपने छोटे भाई का माथा चूमा और अपने हिस्से के पैसे केदार के पैसों के बक्से में डाल दिए। वापस आकर सोमनाथ भी एक गहरी, संतुष्ट नींद में सो गया।
अगली सुबह सूरज की किरणें कुछ ज्यादा ही उजली लग रही थीं। घर के आंगन में तुलसी के पास दीया जल रहा था। केदार अपनी अलमारी खोलकर अपने बचे हुए पैसे सहेजने गया। जैसे ही उसने अपनी पोटली खोली, वह हैरान रह गया। उसमें पूरे एक लाख रुपये थे! उसने तो रात को पचास हजार रुपये भैया के पास रख दिए थे, तो फिर यहाँ एक लाख कैसे?
उधर, सोमनाथ जब अपने कमरे में तैयार होकर गौरी की शादी का सामान लिखने के लिए डायरी और अपनी पैसों की पोटली लेकर बैठा, तो उसकी भी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने तो रात को अपने आधे पैसे केदार को दे दिए थे, फिर उसकी पोटली में पूरे एक लाख रुपये कैसे आ गए?
दोनों भाई अपनी-अपनी पोटली लेकर आंगन में दौड़े और एक-दूसरे के सामने आ खड़े हुए। दोनों की आँखों में आँसू थे और होंठ काँप रहे थे। उन्हें पूरी बात समझने में एक पल भी नहीं लगा। सोमनाथ ने अपनी पोटली जमीन पर गिरा दी और आगे बढ़कर केदार को कसकर गले लगा लिया।
“तू बहुत बड़ा मूर्ख है, केदार! तुझे क्या लगा, मुझे तेरी चोरी का पता नहीं चलेगा?” सोमनाथ रुंधे गले से बोला।
केदार भी रोते हुए मुस्कुराया, “और आप? आप कब से इतने चालाक हो गए भैया कि मेरे ही बक्से में सेंध मार दी?”
दोनों भाई एक-दूसरे के गले लगकर बच्चों की तरह रो रहे थे। रेवती और गौरी भी बाहर आ गईं और यह दृश्य देखकर उनकी आँखों से भी स्नेह के आँसू छलक पड़े। पैसे अपनी जगह पर उतने के उतने ही थे, लेकिन उस रात उनके घर में प्रेम, वात्सल्य और त्याग की जो संपत्ति कई गुना बढ़ गई थी, उसकी कोई कीमत नहीं थी। जहाँ ऐसी निस्वार्थ भावना और एक-दूसरे के प्रति ऐसा समर्पण हो, वह घर किसी स्वर्ग से कम नहीं होता।
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