बहू, 20 लोगों के लिए पूरियां तुम्हें ही तलनी होंगी… और हाँ, जल्दी करना! मेहमान आते ही होंगे।”
मैंने ज़ोर से आवाज़ लगाई।
वो अभी तीन दिन पहले ही ट्रेन से आई थी। रास्ते भर लेटी-लेटी आई थी, क्योंकि उसका अभी-अभी ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टर ने साफ कहा था – “कम से कम एक महीना आराम चाहिए।”
लेकिन उस वक्त मेरे दिल में न जाने कैसी कठोरता भर गई थी। मैंने तंज कसते हुए कहा – “अरे बहू, तुम तो तीन दिन ट्रेन में सोते हुए आई हो। तुम्हें कहाँ थकावट हुई होगी?”
सच तो ये था कि मैं सब जानती थी। मुझे पता था कि उसके पेट पर टांके हैं। चलते समय भी उसे दर्द होता है। फिर भी मैं जानबूझकर उसे काम में झोंक रही थी।
क्यों?
शायद इसलिए क्योंकि वो शहर की पढ़ी-लिखी लड़की थी… और मुझे लगता था कि वो घर के काम से बचने के बहाने ढूंढेगी। मुझे लगता था कि अगर अभी से सख्ती नहीं की, तो आगे सिर पर चढ़ जाएगी।
रसोई में खड़े-खड़े वो आटा गूंथ रही थी। उसके चेहरे पर दर्द साफ दिख रहा था, लेकिन उसने एक शब्द नहीं कहा। बस हल्की सी मुस्कान के साथ बोली – “ठीक है माँजी, मैं बना देती हूँ।”
उसकी वो “ठीक है” मुझे जीत जैसी लगी।
पूरियां तलते समय गर्म तेल की भाप उसके चेहरे से टकरा रही थी। मैं दरवाज़े पर खड़ी सब देख रही थी। एक पल को मन हुआ कि कह दूँ – “छोड़ दे, मैं कर लूँगी।”
लेकिन मेरा अहंकार बीच में आ गया।
करीब आधे घंटे बाद मैंने देखा, उसका चेहरा पीला पड़ गया है। वो एक हाथ से कड़ाही संभाल रही थी और दूसरे हाथ से पेट पकड़ रही थी।
तभी अचानक कड़ाही से एक पूरी उछली और उसके हाथ पर गिर गई। वो हल्का सा चिल्लाई, पर तुरंत खुद को संभाल लिया।
मैं फिर भी चुप रही।
कुछ देर बाद वो दीवार का सहारा लेकर बैठ गई। मैंने गुस्से में कहा – “अब क्या हुआ? नाटक मत करो, मेहमान आने वाले हैं!”
वो कुछ बोलती, उससे पहले ही उसकी आँखें उलट गईं और वो वहीं फर्श पर गिर पड़ी।
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“अरे बहू! अरे उठो!”
मैंने घबराकर उसे उठाया। उसके पेट से खून रिसने लगा था। शायद टांकों पर ज़ोर पड़ गया था।
मैंने तुरंत बेटे को फोन किया। हम उसे अस्पताल लेकर भागे। रास्ते भर मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
डॉक्टर ने जाँच के बाद कहा – “आप लोगों ने इन्हें आराम क्यों नहीं करने दिया? टांके खुल गए हैं। अगर थोड़ा और देर हो जाती तो हालत बिगड़ सकती थी।”
उनकी बात मेरे सीने में तीर की तरह लगी।
मैंने धीरे से पूछा – “अब ठीक हो जाएँगी ना डॉक्टर साहब?”
उन्होंने गंभीर आवाज़ में कहा – “देखिए, हम कोशिश करेंगे। लेकिन इनको पूरी देखभाल और आराम चाहिए। तनाव बिल्कुल नहीं।”
मैं कुर्सी पर बैठ गई। आँखों के सामने उसकी मुस्कुराती सूरत घूमने लगी… वो “ठीक है माँजी” वाला स्वर मेरे कानों में गूंज रहा था।
मुझे याद आया, जब वो पहली बार इस घर में आई थी, तो कितने सपने लेकर आई थी। हर काम सीखने की कोशिश करती थी। मेरी हर बात बिना जवाब दिए मान लेती थी।
और मैं?
मैंने कभी उसे बेटी की तरह अपनाया ही नहीं। हमेशा बहू समझकर दूरी बनाए रखी।
उस रात अस्पताल के बाहर बैठी मैं पहली बार सच में टूटी थी।
सुबह डॉक्टर ने बताया कि अब खतरा टल गया है, लेकिन कमज़ोरी बहुत है।
जब मैं उसके कमरे में गई, वो धीमे से मुस्कुरा दी।
मैंने उसका हाथ पकड़ा और रो पड़ी।
“मुझे माफ कर दो बहू… मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया।”
उसने धीरे से कहा – “माँजी, आप ऐसा क्यों कह रही हैं? आप तो मेरी माँ जैसी हैं।”
उसकी ये बात सुनकर मेरा सिर शर्म से झुक गया।
जिस लड़की को मैं जानबूझकर दर्द दे रही थी, वो आज भी मुझे माँ कह रही थी।
घर लौटने के बाद मैंने खुद रसोई संभाली। पड़ोस की औरतें पूछने लगीं – “अरे भाभी, बहू कहाँ है? आज पूरियां नहीं बन रहीं क्या?”
मैंने गर्व से कहा – “मेरी बहू आराम कर रही है। डॉक्टर ने मना किया है काम करने से।”
उस दिन पहली बार मुझे “मेरी बहू” कहते हुए सुकून मिला।
धीरे-धीरे वो ठीक होने लगी। मैं उसके कमरे में बैठकर उससे बातें करती, उसका मन बहलाती।
एक दिन उसने हँसते हुए कहा – “माँजी, जब मैं ठीक हो जाऊँगी, तो आपके लिए अपने हाथों से पूरियां बनाऊँगी।”
मैंने तुरंत उसके होंठों पर उंगली रख दी – “अब मेरी बेटी आराम करेगी। पूरियां मैं बनाऊँगी।”
उसकी आँखों में आँसू थे… लेकिन इस बार दर्द के नहीं, अपनापन के।
मुझे समझ आ गया था – घर काम से नहीं, रिश्तों से चलता है।
अगर उस दिन वो गिरती नहीं… अगर डॉक्टर की डांट नहीं पड़ती… तो शायद मैं आज भी अपने अहंकार में अंधी रहती।
आज जब भी घर में कोई मेहमान आता है, मैं खुद रसोई में खड़ी होती हूँ। और अगर कोई कह दे – “बहू को बुलाओ ना,”
तो मैं मुस्कुरा कर कहती हूँ – “मेरी बहू आराम कर रही है… और उसकी सेहत मेरे लिए किसी भी मेहमान से ज्यादा जरूरी है।”
कभी-कभी मैं सोचती हूँ, भगवान ने मुझे समय रहते सबक सिखा दिया। मेरे लिए रिश्तों के रंग ही बदल गये।बहू के प्रति सोच ही बदल गयी।
और उस दिन की 20 लोगों की पूरियां… से मेरी जिंदगी का अहम खतम हो गया, बहू को बेटी जो समझ लिया।
स्वरचित मौलिक रचना
अमिता कुचया