बचपन से जानती थी सुषमा मधु को।मधु ,सुषमा की सहेली की इकलौती बेटी थी।सुषमा और सविता(मधु की मां)का मायका एक ही कस्बे में था।दोनों ने बारहवीं कक्षा तक साथ में ही पढ़ाई की थी।सुषमा का ब्याह कॉलेज पूरा होते ही शहर में रहने वाले सरकारी नौकरी में कार्यरत एक क्लर्क से हो गई।सविता ज्यादा पढ़ नहीं पाई थी,उसके बापू की तबीयत खराब रहने की वजह से पास ही के गांव में मोहन से शादी करवा दी गई।खेती किसानी थी,जमीन अच्छी खासी थी मोहन के पास।
शादी के बाद जब भी सुषमा मायके जाती,या तो सविता आ जाती मिलने ,या सुषमा जाकर मिल आती थी।सुषमा के दो बच्चे थे।एक बड़ा बेटा सुयश और बेटी सुधा।सुयश पढ़ाई में अव्वल था।अपने पापा के लाड़ प्यार की वजह से जिद्दी हो गया था।सुधा समझदार बेटी थी।इस साल राखी में मायके जाते हुए सुयश ने भी ननिहाल जाने की इच्छा जताई।कई सालों बाद जा रहा था अपनी मां के मायके।सुधा,सुयश के साथ सुषमा जब अपने मायके पहुंची,तो आस -पड़ोस के लोगों का तांता लग गया।नवासे -नवासी को बहुत दिनों बाद अपने साथ पाकर , पड़ोस की काकी, ताई, मौसी सब जम गई घर पर।मानो त्योहार आज ही हो रहा था।मायके के बड़े से आंगन में शामियाना लगवाकर कीर्तन का आयोजन किया गया।शहर से आए हुए बच्चों के स्वागत में साफ दिल के लोगों ने दिल खोलकर आवभगत की।
सुयष के लिए तो यह अप्रत्याशित था।रात को खाने में छप्पन पकवान देखकर खुश होकर बोला”मां,तुम्हारे मायके के लोग इतने अच्छे हैं।कितना बढ़िया स्वागत किया हमारा।अरे , इन्हें देखकर तो लगता है,कंगाल होंगें ये।पर दिल खोलकर जश्न मनाया इन्होंने हमारे स्वागत में।मुझे पता होता तो मैं हर साल ही आता तुम्हारे साथ।यहां तो ऐश ही ऐश है।”
सुयष की बात सुनकर सुषमा का भी सीना चौड़ा हो गया।ये गांव के लोग ऐसे ही होते हैं। मोहल्ले की बेटी को अपनी बेटी मानते हैं।उनकी औलाद को अपने ब्याज सा प्यार करते हैं।रात के जश्न में भला सविता कैसे ना आती।ढेर सारा मक्खन , दही और घर का दूध लेकर आई थी, अपनी सहेली के बच्चों के स्वागत में।लस्सी बनाकर पिला रही थी, उसके साथ आई एक सुंदर , साधारण रूप रंग की लड़की।एक दम सविता सी दिख रही थी।सुषमा ने तो झट से पहचान लिया, और गले से लगाकर ढेर सारा प्यार किया।शहर से खरीदी सुंदर सी साड़ी उपहार में देने लगी, तो उस शालीन लड़की ने मना कर दिया।तब सविता ने ही कहा उससे”अरे, तेरी मौसी लाई है तेरे लिए।तब कैसा संकोच।मेरी सबसे अच्छी सहेली है।ले ले रब्बो।” मां की आज्ञा समझकर साड़ी लेकर रब्बो ने बड़ी शालीनता से सुषमा को प्रणाम किया।सुषमा ने उससे वादा लिया कि साड़ी पहनकर दिखाएगी उसे।
दो -तीन दिनों तक ही रुकने का मन बनाकर आई थी सुषमा,पर बच्चों को यहां बहुत अच्छा लग रहा था।जिद करके और कुछ दिन रुकने के लिए राजी करवा लिया सुषमा को।
अब सुयष,और सुधा भोर होते ही निकल जाते,और रब्बो उन्हें पूरा गांव ,पहाड़ घुमाती।नाव चलाकर नदी की सैर भी करवाया उसने।
रब्बो के प्रति सुयष का रवैया बहुत ही संवेदनशील लगा सुषमा को।उसके आने का इंतजार करता रहता,ना आने पर सुषमा से पूछता”आज तुम्हारी सहेली की बेटी क्यों नहीं आई अभी तक?समय की बिल्कुल पाबंद नहीं है।ना ही कपड़े पहनने का सलीका। बिल्कुल गाय भैंस चराने वाली लगती है आपकी रब्बो।” सुषमा को बेटे की मनःस्थिति भांपने में देर नहीं लगी।
सविता के मायके गई घूमते हुए,तो देखा सविता के पति बिस्तर पर ही बिछे हैं। हिल-डुल भी नहीं पा रहे।सविता से पूछने पर उसने बताया कि चार साल पहले लकवा मारा है।सब काम बिस्तर पर पड़े हुए ही करते हैं।बापू तो चल बसे, तो अम्मा ने यहीं बुलवा लिया।अपनी जमीन भी धीरे-धीरे दूसरे लोगों ने झपट ली।तब से यही अम्मा के साथ आकर रह रहें हैं।रब्बो ख़ुद पढ़ भी रही है अब यहीं के कॉलेज में, और ट्यूशन भी पढ़ाती है घर खर्च के लिए।बड़ा सहारा है रे उसका।पढ़ने में बहुत होशियार थी, पर तेरे जीजाजी की बीमारी की वजह से वह बाहर जा ही नहीं पाई।हम सभी का बहुत बड़ा सहारा है रे रब्बो।अब बस इसी की चिंता सताती है मुझे।शादी हो जाए किसी अच्छे लड़के से, बस मैं गंगा नहा लूं।” बचपन की सहेली की लाचारी देखकर सुषमा का मन दुखी हो गया।यदि मैं कुछ मदद कर पाती इसकी? पर क्या मदद करूंगी ? पैसे तो लेगी नहीं यह। सोचते-सोचते घर आई।अपनी मां से रब्बो के बारे में चर्चा की तो मां ने भी दुखी होकर कहा” हां रे , इतनी सुंदर, सभ्य और सुशील लड़की है सविता की।एक अच्छा दामाद मिल जाता तो पूरा परिवार तर जाता।तू देखना ना शहर में।कोई नौकरी वाला लड़का।अचानक सुषमा ने मां से कहा”मां सुयष कैसा रहेगा रब्बो के लिए।ज्यादा आधुनिक नहीं है, पर रिश्तों की कद्र करना जानती है।चार पैसे कमाने का हुनर भी है।शादी के बाद मेरे लिए सविता की मदद करना आसान हो जाएगा।तुम क्या कहती हो?”
“अरे, मैं तो कब से यही सपना देखें बैठी हूं।लड़की जान पहचान की है।घर के काम काज में निपुण। चरित्र वान लड़की है सविता की।सुयष को इससे अच्छी बीवी मिल नहीं सकती।तू बात कर ना अपने बेटे से।सुषमा ने भी मन कड़ा करके सुयष से पूछ ही लिया” सुयष तुझे रब्बो कैसी लगती है उसे।
उसने कंधे झटककर कहा”ठीक ही है।गांव की ठेठ गंवार लगती है।कपड़े पहनने का भी सलीका नहीं।पता नहीं इन्हें कोई जरूरी बातें सिखाता क्यों नहीं।रब्बो में कोई क्या दिलचस्पी लेगा मां।हर बात पर टोका-टाकी, ऐसे चलो, ऐसे बोलो।जानवरों से प्यार से बात करो।गांव की गंवार मुझे एटिकेट्स सिखाती है।”
बेटे का मन जानते हुए भी,सुषमा ने सविता से कहा कि रब्बो को एक अच्छी सी साड़ी पहनाकर तैयार रखें।घर आएंगे हम।
शाम को दोनों बच्चों,और मां के साथ सुषमा सविता के यहां पहुंची।कल वापस शहर भी जाना था।घर बहुत बड़ा तो था नहीं।आंगन में बिछे खाट पर ही सभी को बैठाया गया।थोड़ी ही देर में रब्बो चाय नाश्ता लेकर आई।जो चाय नाश्ता लेकर आई,वह रब्बो है,ऐसा किसी को विश्वास ही नहीं हो पाया।सुषमा की दी हुई साड़ी बड़े सलीके से पहनी थी उसने।बिना मेकअप के भी वह बहुत सुंदर लग रही थी।सुषमा गौर से सुयष को देख रही थी।लगता तो था कि सुयष भी अचंभित था, रब्बो को इस रूप में देखकर।
बहन ने भी भाई से रब्बो के बारे में विचार जानना चाहा।दोनों की बात काफी देर तक चलती रही।अब शहर जाकर सुयष के पापा से पहले बात करनी होगी।वहां तो सुयष के पापा एक सुंदर बहू की आस में ही जी रहे थे।झट से रब्बो की फोटो देखते ही फायनल करने को कहा। खुशी-खुशी सुषमा अपनी सहेली के यहां बहू का हांथ मांगने आई,तो सविता का कंठ अवरुद्ध हो गया।खुशी के मारे उससे बोला भी नहीं जा रहा था।छह महीने के अन्दर ही दोनों की शादी हो गई।अब सुषमा निश्चिंत हो गई थी।जिद्दी बेटे को समझदारी सिखाने के लिए उपयुक्त बहू आई थी घर में।
सुषमा ने रब्बो को शहरी परिवेश में रहने लायक नियम -तरीके सिखा दिया था।वैसे तो वह पहले से ही मंजी थी हर काम में।घर के नियम कायदों को बड़ी अहमियत देती थी वह।घर पर ही ट्यूशन पढ़ाने लगी थी।सुषमा ने ही व्यवस्था करवा दी थी।
सुषमा काम -काज से भी निवृत्ति पा चुकी थी।अब रब्बो की छूटी हुई पढ़ाई पूरी करवाने की जिम्मेदारी सुषमा ने ली ।रब्बो की पढ़ाई पुनः शुरू होते देख, सुयष का रवैया बिल्कुल बदल गया पत्नी के प्रति।जब -तब ताने देने लगा था।सुबह की चाय से लेकर रात के खाने में बस सुयष को मौका चाहिए था रब्बो को अपमानित करने का।
राखी के एक दिन पहले जब रब्बो घर जाने की तैयारी कर रही थी,सुयष ने फरमान जारी किया “अब तुम कहां जा पाओगी।मुझे तो सुधा से राखी बंधवाना है।वो आती ही होगी।आकर यदि देखेगी कि उसकी भाभी नहीं है ,तो कितना बुरा लगेगा उसे।तुम्हारा तो कोई सगा भाई है भी नहीं,तो राखी में क्यों जाना?”
रब्बो ने कुछ नहीं कहा बस डबडबाई आंखें संभालती बाथरूम में चली गई।सुषमा का मन पसीजने लगा।सुबोध ने तो मुझे कभी नहीं रोका था मायके जाने से।ये ऐसा क्यों व्यवहार कर रहा है।”खाने में नमक ज्यादा,रोटी जल गई है, लंचबॉक्स से बदबू आती है,ख़ुद का कोई स्टेटस ही मेंटेन नहीं किया,चार दोस्तों के सामने ले जाने लायक भी नहीं है तुम्हारी बहू। सिर्फ तुम्हारे कहने से शादी की थी मैंने,पर इस गंवारन को अपने लायक नहीं बना पाया अब तक।मुझे अब घिन आती है इससे।तुमने ही मेरी जिंदगी नरक बना दी।दोस्तों के साथ कभी कभार पार्टी करने के लिए कहो,तो सीधे कहती हैं,घर मत आना ।अरे इसके बाप का घर है क्या ?मुझे खाना तब देती है,जब तुम खाती हो।कहती हैं इससे मां -बेटे में प्यार बढ़ता है।और कितनी बचकानी बातें गिनाऊं तुम्हें?खैर तुम्हें तो इसकी कोई बुराई नजर आएगी नहीं? हैं तो दोनों एक ही जगह की। तुम्हारी सहेली ने बेटी पकड़ा दी बिना कोई खर्च किए, और तुमने समाजसेवा कर दी ।अब जिंदगी भर भुगतना पड़ेगा मुझे।” सुषमा की सारी बातें अंगारे बन सुषमा के कानों में जल रही थी।एक औरत के सामने दूसरी औरत की इतनी बेईज्जती, सुयष कैसे कर सकता है?
अगले दिन सुधा अपने पति के साथ राखी बांधने आई तो,पहली फुर्सत में ही सुषमा ने उससे कुछ जरूरी बात करने के लिए छत पर बुलवाया।सुधा को समझ तो आ गया था कि ,घर में कुछ तो हुआ है।
मां का हांथ पकड़ कर जैसे ही सुधा ने पूछा” मां ,भाभी का व्यवहार आपके प्रति अच्छा नहीं है क्या?आपके और भाभी के चेहरे में इतनी तकलीफ़ दिख रही।तबीयत खराब है क्या आपकी मां?”
सुषमा बेटी के गले लग कर रोने लगी,और कहा” सुधा ,तेरे ऊपर एक जिम्मेदारी डाल रही हूं।दामाद जी को भेजकर तू कुछ दिनों के लिए रुक जा ।बाद में आने की फिर से सहूलियत नहीं मिल पाती जल्दी।”
सुधा मामले को कुछ तो समझ रही थी।दो दिन बाद पति के जाते ही ,मां के साथ एक बिल्कुल सीक्रेट मिशन में निकल पड़ी।और जिस बात का अंदेशा था ,वही हुआ।सुषमा अपनी कोख के बेटे को पहचानने में गलती नहीं कर सकती।सुयष के ही ऑफिस में काम करती थी टीना। आधुनिक युग की जीती जागती मिसाल।नौकरी के बाद अक्सर उसी के साथ फिल्म देखता,मंदिर-रैस्टोरेंट जा रहा था। ऑफिस स्टाफ से पता चला कि सुयष अक्सर कहता है कि मां ने अनपढ़ गंवार पल्ले बांध दिया है।यह कभी ना सुधरने वाली।
एक महिला मित्र ने तो यहां तक बताया कि,सुयष की नौकरी स्टेट में लग गई।वह बहुत जल्दी भारत से बाहर जाना चाहता है,पर सिर्फ मां को लेकर,उस गंवार को लेकर तो जाने का कोई मतलब ही नहीं।बस एक बार मां हां कह दे,तो मैं इस रिश्ते को अभी तोड़ दूंगा।अपनी मनपसंद की जीवन संगिनी के साथ जीवन स्वर्ग लगता है।वरना गंवार हिटलर के साथ तो नरक काट रहें हैं।
सुषमा ने उस लड़की की फोटो ले ली फोन में।सारी बातें सबसे पहले रब्बो को बताई,और उसका फैसला पूछा।रब्बो ने बड़े आत्मविश्वास से कहा”मां,जिस रिश्ते में प्रेम और सम्मान नहीं रहता,उसे छोड़ देना अच्छा मां।आपने मुझे पढ़ाकर आगे बढ़ना सिखाया है।मेरा आत्मविश्वास जगाया है।तो मुझे किसी की सहानुभूति के सहारे जीने की जरूरत नहीं।मीठे बोल ही यदि पति से ना मिले,तो पति भी पूज्यनीय नहीं रह जाते।यदि मैं ही समस्या हूं,उनकी जिंदगी की ,तो मैं ही चली जाऊंगी।वैसे भी मैं आपके बेटे के लायक थी ही नहीं।”
आज सुषमा को अपने आप पर घिन आने लगी।जिस बेटे को हमेशा अच्छे से अच्छा मानती रही, उसने ही सुषमा के मुंह में तमाचा जड़ दिया।सुधा के साथ जाकर रब्बो को उसकी मां के घर छोड़ा सुषमा ने और सविता के हाथों पर अपना हांथ रखकर शर्मिंदगी से बोली”सविता तेरी बेटी को बहू बनाकर ले गई थी मैं, पर मेरा बेटा तेरी बेटी के लायक नहीं।तेरी बेटी हीरा है हीरा, मेरा पत्थर बेटा उसकी कद्र नहीं कर पाया।एक औरत के स्त्रीत्व को ललकारा है उसने।आज मैं खुद ही तेरी बेटी को इस घुटन भरे रिश्ते से आजाद करवा लाई।अब यह रुकेगी नहीं, खूब आगे बढ़ेगी।इतनी ऊपर पहुंचेगी कि मेरे बेटे को नीचे से वह दिखाई ही ना दे।जिस रिश्ते में सम्मान नहीं वह रिश्ता ढकोसला है।और हां एक वादा और करती हूं, मैं रब्बो की विदाई यहां से करवाकर अपने घर लेकर गई थी।आज अपनी बहू की विदाई उस घर से करवाकर तेरे पास ले आई।अब जल्दी ही मैं अपनी बहू की विदाई तेरे घर से करवाऊंगी, किसी सुयोग्य पात्र के घर।
मुझे माफ़ कर दे सविता।”
शुभ्रा बैनर्जी
#घुटन भरे रिश्ते से आजादी