कलह – लक्ष्मी त्यागी

शांतपुर—नाम के विपरीत, अब वह गाँव शांत नहीं रहा था। चौधरी देवेंद्र सिह जी की हवेली के भीतर उठी एक छोटी-सी ‘कलह’ ने पूरे गाँव की नींद छीन ली थी।  चौधरी देवेंद्र सिंह, उम्र साठ के पार, गाँव के सबसे सम्मानित व्यक्ति माने जाते थे। उनके दो बेटे—राघव और विवेक—एक ही छत के नीचे रहते … Read more

ज़हर का घूंट पीना। – लक्ष्मी त्यागी

सुबह की हल्की धूप आंगन में बिखरी थी, चिड़ियाँ आंगन में पेड़ों पर चहचहा रही थीं किन्तु राधा पर तो जैसे इस वातावरण का कोई असर नहीं था। राधा चुपचाप तुलसी के पौधे में जल चढ़ा रही थी उसकी आँखों में न तो आँसू थे, न ही कोई चमक — बस एक गहरी खामोशी थी, … Read more

कलह – सीमा सिंघी

अरे भाभी मैं तो मायके आई हूं और तुम अपने मायके चल दी यह क्या बात हुई भला। भाभी तुम्हें इतना तो समझना चाहिए कि जब ननद मायके आती है तो भाभी को अपने मायके नहीं जाना चाहिए। क्या तुम्हें अपने मायके से यह संस्कार भी नहीं मिले। शुभ्रा यही नहीं रुकी वह फिर कहने … Read more

कलह – सुदर्शन सचदेवा 

ज़िंदगी बाहर से बहुत खुशहाल लगती थी। बड़ी नौकरी, सुंदर घर, कार, और आधुनिक सुविधाएँ — सब कुछ था। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी चीज़ थी जो धीरे-धीरे उनके घर की दीवारों को खोखला कर रही थी — कलह। हर सुबह आवाज़ों का संग्राम शुरू हो जाता — “तुमने फिर देर कर दी!” “बच्चों … Read more

मुक्ति का मार्ग… – रश्मि झा मिश्रा

“…अम्मा कौशल की बहू है… आशीर्वाद दो…!” अम्मा ने हाथ उठाकर जमुना के सिर पर रख दिया… फिर अचानक भरे गले से, थरथराती आवाज में चिल्ला कर बोली… “आज भी मेरे कंगन दोगी या नहीं… अरे मुझे नहीं दिए, कम से कम बहू को मुंह दिखाई में देने को तो दे दो… सब धोखेबाज हैं… … Read more

कलह – मधु वशिष्ठ

रामेश्वर दास जी के तीन पुत्रियां और एक छोटा पुत्र था। उनकी दो बेटियों की शादी हो चुकी थी और अपनी तीसरी बेटी कला की शादी अपने दफ्तर के स्टोर पर काम करने वाले राघव से कर दी थी। रामेश्वर दास जी गवर्नमेंट में हेड क्लर्क थे। ज्यादातर दफ्तर के सामने वाली दुकान के मालिक … Read more

शर्म नहीं गर्व हूँ मैं – सरिता रानी

कल रात गाय ने एक बछिया को जन्म दिया था — जैसे घर में किसी कन्या का आगमन हुआ हो। पापा ने ख़ुशी से नाचते हुए सबको बताया, “देखो! हमारी गौ माता ने बछिया दी है! अब खूब दूध मिलेगा!” मां ने थाली में आरती उतारी, पापा ने गाय को दाना-पानी दिया, पड़ोसी बधाई देने … Read more

शर्म नहीं गर्व हूं मैं – विनीता सिंह

एक छोटा सा गांव वहां पर शिक्षा का अभाव और उनकी रूढ़िवादी सोच लड़की ज्यादा पढ़ लिख कर क्या करेगी। उसे करना तो चौका चूल्हा है। इसी गांव में रश्मि रहती थी उसका संयुक्त परिवार था उसके पिता जी और दादा जी सोच रूढ़िवादी थी। वह रश्मि के भाई के लिए किताबें, और हर सामान … Read more

तुम दोनों से तो मैं गौरवान्वित हूं बेटा – मंजू ओमर

मामा जी ये देखिए मेरा रिपोर्ट कार्ड,मैं क्लास मैं फर्स्ट पोजीशन पर आई हूं । मामा (प्रमोद)जी कुछ बोलते इससे पहले ही वहां मामी आ गई। अच्छा अच्छा ठीक है यहां रिपोर्ट कार्ड लेकर आ गई दिखाने के लिए मेरे बेटे के कम नंबर आए हैं इस लिए ।अब छोड़ो पढ़ाई लिखाई घर के काम … Read more

कड़वी हवा – रवीन्द्र कान्त त्यागी

पूरा हॉल तम्बाकू के कसैले धुंए और अल्कोहल की मिली जुली दमघोंटू महक से भरा हुआ था. निऑन लाइटों के रंगीन प्रकाश बिंदु इधर से उधर उछल रहे थे. कर्णभेदी संगीत की धुनों पर कई जोड़े लिपटकर ऐसे नाच रहे थे जैसे दुनिया में मुहब्बत की परिभाषा इन्ही से शुरू होकर इन्ही पर समाप्त होती … Read more

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