“मेरी कोई इज्जत नहीं है क्या??” – अमिता कुचया

सफेद रंग की ऑडी कार गैराज में आकर रुकी। अमित ने गाड़ी से उतरते ही जोर से दरवाजा बंद किया। उसके चेहरे पर तनाव साफ़ दिख रहा था। वह तेज कदमों से घर के अंदर दाखिल हुआ। ड्राइंग रूम में उसके पिता, रघुवीर जी, अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे एक डायरी में कुछ हिसाब … Read more

पारस पत्थर – गरिमा चौधरी

विनय की आवाज़ में खीझ साफ़ झलक रही थी। उसने हाथ में पकड़ी हुई कलाई घड़ी को झुंझलाहट के साथ टेबल पर पटका। “सृष्टि! अब हद हो रही है। पिछले बीस मिनट से मैं मोज़े ढूंढ रहा हूँ और तुम हो कि उस ‘महारथी’ को दलिया खिलाने में व्यस्त हो। मेरी मीटिंग है आज, तुम्हें … Read more

एक सखी, जो देवरानी के रूप में आई थी – संगीता अग्रवाल 

कमरे में बिखरे हुए कपड़ों के ढेर के बीच मीरा हताश होकर बेड के किनारे बैठ गई। माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं और आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। अलमारी के सारे रैक खाली हो चुके थे, साड़ियाँ, सूट, शॉल—सब कुछ बेड पर एक पहाड़ की तरह जमा था, लेकिन वह … Read more

बड़ी बहन – निभा राजीव 

गुलाबी रंग की बनारसी साड़ी में लिपटी नीलम, घर के आँगन से लेकर रसोई तक किसी फिरकी की तरह घूम रही थी। पिछले तीन दिनों से घर में शादी की शहनाइयाँ गूँज रही थीं, और नीलम ने शायद कुल मिलाकर चार घंटे की नींद भी ठीक से नहीं ली होगी। फिर भी, उसके चेहरे पर … Read more

खोखले घर – रमा शुक्ला

“अरे ओ महारानी! अभी तक बिस्तर में ही है? सूरज सिर पर आ गया है और इसे देखो, कुंभकरण की औलाद अभी तक सो रही है।” बगल के कमरे से मामीजी की तीखी आवाज़ ने मीरा की नींद को एक झटके में तोड़ दिया। मीरा हड़बड़ा कर उठी। उसने जल्दी से अपनी पुरानी शॉल लपेटी … Read more

बहू ने सीमा खींच दी – मधु वशिष्ठ

——————— सर्दियों की दोपहर में ,और गर्मियों की शाम को, गुप्ता आंटी , “कॉलोनी में ”    अपने घर के बाहर चारपाई बिछाकर सबको इकट्ठा करके बहू पुराण शुरू हो जाती थी। उस पुराण में कहीं कुछ भूल जाए तो याद कराने का काम उनके साथ बैठी उनकी बिटिया रानी का था। खाने का काम … Read more

भाई जैसा मित्र नहीं और भाई जैसा शत्रु नहीं दोनों ही देखने को मिल जाएंगे – मंजू ओमर 

भइया आप हमारे घर क्यों आए हैं ,जरूर पैसे मांगने आए होंगे।आप तो हम लोगों को सुकून से रहने ही नहीं देते।जब देखो तब चले आते हैं मुंह उठाकर।हमें नहीं रखना आप लोगों से कोई मतलब आप समझते क्यों नहीं।अरे नेहा मैं तो बस छोटे से मिलने आया था बहुत दिन हो गए थे उससे … Read more

बहु ने सिमा रेखा खिंच दी। – बबीता झा

शांति जब अठारह वर्ष कि हुइ तभी उसकी शादी कर दि गइ।  मायके से वह सबके लिए इज्जत और प्यार का तोहफ़ा लेकर आई। शांति जैसा नाम, बस वैसी ही उसकी पहचान थी। छोटी उम्र में ही ससुराल आने के बाद उसने घर का सब काम अपने ऊपर ले लिया था, यानी कहिए जिम्मेदारी। शांति … Read more

लगावट – लतिका श्रीवास्तव

क्या कह रहा था मंटू इस बार तो छुट्टियों में आ रहा है ना मनोहर जी ने पत्नी जानकी से बहुत उत्सुकता से पूछा जो बेटे मंतव्य उर्फ मंटू से मोबाइल पर बात कर रही थी। आपको तो बस घर कब आ रहा है घर कब आ रहा है का राग छेड़ना आता है।इतनी बड़ी … Read more

मैं आदर्श बहू नहीं बनना चाहती – शिल्पा अग्रवाल

कमरे में एसी की धीमी घड़घड़ाहट और बाहर सन्नाटा पसरा हुआ था। रात के ग्यारह बज रहे थे। बेडसाइड लैंप की मद्धम रोशनी में अनन्या अपनी फाइल बंद कर रही थी जब उसके पति, रोहन ने करवट बदली और थोड़ी हिचकिचाहट के साथ वह बात कही जो शायद वह पिछले दो घंटों से कहने की … Read more

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