“दो अधूरे सच” – निभा राजीव
“उसने शादी की थी अपने भाई की साँसें खरीदने के लिए, और उसने सात फेरे लिए थे अपनी बेटी को एक ‘माँ’ देने के लिए—जब दो मजबूरियां एक छत के नीचे टकराईं, तो रिश्ता कागज़ का नहीं, रूह का बन गया।” बनारस जंक्शन से ट्रेन के छूटते ही एसी फर्स्ट क्लास के कूपे में एक … Read more