बाई की बेटी -कान्ता – एम. पी. सिंह

संजय और सुधा दिल्ली मै रहते थे. दोनों पढे लिखे थे और नौकरी करते थे, संजय सी.ए. था और सुधा टीचर. बेटा होने के बाद सुधा ने नौकरी छोड़ दी. सुधा बेटी चाहती थी, पर संतोष कर लिया की दूसरी संतान बेटी होंगी. पर संजय दूसरा बच्चा नहीं चाहता था. दो दो बच्चों से जिम्मेदारी … Read more

अपनों से बढ़ कर गैर है – रेखा जैन 

“रश्मि शादी के सारे इंतजाम, सारी तैयारियां तो हो गई है लेखन फिर भी दिल को चिंता लगी रहती है कि शादी के 4 दिन के कार्यक्रम में तुम और मैं तो बहुत व्यस्त रहेंगे तो इस दौरान सभी मेहमानों का ध्यान रखना और बाकी के सारे ऊपर के काम कौन देखेगा!” सुरेंद्र जी ने … Read more

इतना अभिमान सही नहीं – नीलम गुप्ता

चार लड़कियां नमिता नैना नीरू और निशा एक ही विद्यालय में पहली कक्षा से साथ-साथ पढ़ रही थी । चारों का नाम अंग्रेजी के एन अक्षर से शुरू होता था इसलिए वे N4 के नाम से प्रसिद्ध थी । उनकी दोस्ती पूरे विद्यालय में जानी जाती थी l चारों ही पढ़ने में अच्छी थी उनके … Read more

आँगन की रौनक – डॉ बीना कुण्डलिया 

मीनाक्षी की बेटी नैना की विदाई धीरे-धीरे सभी मेहमान विदा हो गये । ज्यादातर तो अपने इसी शहर में रहते तो दोपहर तक घर खाली हो गया । कल तक कितनी चहल-पहल इसलिए आज आँगन की रौनक फीकी लग रही थी । वैसे विवाह कार्यक्रम तो वैडिंग प्वाइंट में सम्पन्न हुए और आधे दूर दराज … Read more

मैं भी तो एक बेटी हूं – मंजू ओमर

मंशा जी भइया जा मम्मी के लिए पतली पतली सी खिचड़ी बना था , मंशा सुन ही नहीं रही थी वो तो बस फोन में ही लगी थी । मंशा तू सुन रही है कि नहीं भाई निखिल ने जोर से कहा। हां भईया सुन रही हूं । हां मैं इस घर की बेटी हूं … Read more

समय का फेर – हेमलता गुप्ता

रमन और महेश की दोस्ती शहर में मिसाल मानी जाती थी। दोनों ने बचपन एक ही मोहल्ले में गुज़ारा था। स्कूल की घंटी बजते ही दोनों साथ भागते, एक ही टिफिन से रोटी बाँटते, और शाम को गली के मोड़ पर खड़े होकर बड़े-बड़े सपने देखते—“एक दिन अपना भी नाम होगा, अपना भी काम होगा।” … Read more

अनोखा जन्मदिन – रीतू गुप्ता

जानकी जी के आश्रम में आज सुबह से ही एक अजीब-सी हलचल थी—वैसी हलचल जैसी बच्चों के स्कूल में “बर्थडे सेलिब्रेशन” वाले दिन होती है। कोई रंग-बिरंगे गुब्बारे फुला रहा था, कोई दीवार पर कागज़ के फूल चिपका रहा था, कोई रसोई में जाकर बार-बार झाँक रहा था कि केक आया या नहीं। यहाँ “जन्मदिन” … Read more

रस्सी उतना ही खींचे जितना उसमे लोच हो – लतिका

सुबह सुबह आराधना जी का बड़बड़ाना शुरू हो गया था। छह बज गया अभी तक बहू रानी के उठने का समय ही नहीं हुआ है। एक हम थी सुबह चार बजे ही नहा धोकर तैयार हो सासु माँ को प्रणाम करने चली जाती थी और एक हमारी बहुरिया है जिन्हे सुबह छह बजे तक कुछ … Read more

काश…. – संगीता अग्रवाल

” क्या बात है अंतरा क्या सोच रही हो ऐसे गुमगुम बैठी?” मासूमी अपनी दोस्त के घर पहुंच उसे गुमसुम देख बोली। ” कुछ नही यार बस ऐसे ही !” अंतरा अनमनी सी बोली। ” ऐसे तो नही कोई तो बात है ?” मासूमी ने जैसे ही अंतरा के कंधे पर हाथ रखा उसकी कराह … Read more

 “गैर ” लेकिन अपना सा – गीता वाधवानी

 श्यामू ने अपनी पत्नी राधा को आवाज लगाते हुए कहा-” राधा, जल्दी से खाना लगा दो मुझे काम से बाहर जाना है। लोग सच ही कहते हैं, गरीब की किस्मत भी गरीब होती है। ”   राधा-” ऐसा क्यों कह रहे हो रानी के बापू,? ”   श्यामू -” और क्या कहूं राधा, तुम अच्छी तो रही … Read more

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