संघर्ष की तपिश – डॉ बीना कुण्डलिया 

रिमझिम अपने पिता बंशी के साथ रोज खेतों पर जाती क्योंकि आजकल उसके स्कूल की छुट्टियां चल रही थी। वो पिता बंशी की लाडली बिटिया थी। उसके आँखों का तारा थी । उसकी मां तो उसे बचपन में ही छोड़ ईश्वर को प्यारी हो गई थी। पिता ने दूसरी शादी नहीं की वो नहीं चाहते … Read more

किस्मत – खुशी

नवीन वर्ष की शुभ कामनाएं उम्मीद करती हूं कि इस वर्ष भी आप सभी मेरी कहानियों को प्रेम देंगे और कोई त्रुटि हो तो क्षमा करेंगे। किशोरी लाल तीन भाइयों का इकलौता भाई था।मां शमा और पिता गुलज़ारी लाल ऐसा परिवार था।गुलज़ारी लाल की परचून की दुकान थी और किशोरी भी बाप की दुकान ही … Read more

किस्मत वाली – रंजना गुप्ता

सीमा चंदनपुर गाँव के सरकारी स्कूल में अध्यापिका बनकर आयी है और गाँव वाले उसका फूलों के हार पहना कर स्वागत कर रहे हैं। उसकी आँखों से आँसू छलकते हैं और होठों पर मुस्कुरुहट। कभी वह इसी स्कूल की छात्रा थी। सब लोग उस पर फूलों की वर्षा कर रहे हैं और तालियाँ बजा रहे … Read more

किस्मतवाली – डाॅ संजु झा

रामलाल   नैना को बेखौफ नन्हें -नन्हें कदमों से ऑंगन में  चहलकदमी करते हुए देखकर सोचते हैं -“किस्मत के खेल भी निराले हैं।कभी एक संतान के लिए पति-पत्नी तरसते थे,आज दो-दो बेटियों से हमारा जीवन गुलजार है!”  रामलाल खुद को भाग्यशाली समझें या बेटियों को किस्मतवाली उनकी समझ से परे है!जिस प्रकार एक नवजात पक्षी अपने … Read more

रीचार्ज – शुभ्रा बैनर्जी 

पचासी साल पूरे कर चुकीं हैं सासू मां।सारे दांत निकलवा लिए है, दर्द से हार कर।अपनी जिंदगी में क्या कुछ नहीं सहा है उन्होंने? उन्हें देखकर तो शुभा खुद से ही लड़ती रहती है।जब मां इस उम्र में अपनी इच्छाशक्ति के बल पर स्वयं को खुश रख सकतीं हैं, तो वह क्यों नहीं?  आंखों की … Read more

एक माँ – एम. पी. सिंह

आशा और गोपाल दास के दो बेटे थे, राम और श्याम. दोनों मे 2 साल का अंतर था. घर के पास ही गोपाल जी का अपना किराना स्टोर था और काफ़ी अच्छा कमा लेते थे. सवेरे दुकान पर जाते तो रात को ही वापस आते. लंच नौकर घर से ले जाता था. माँ का प्यार … Read more

थोड़ा और कमा लूं – के आर अमित

ये कहानी एक मनोज की नही बल्कि हर उस आदमी की है जो हजारों सपने लेकर घर से बाहर निकलता है । स्कूल की पढ़ाई खत्म करके अभी जवानी में कदम रखा ही था कि नौकरी की फिक्र सताने लगी। कुछ छोटी मोटी नौकरी मिली भी तो सैलेरी इतनी कम थी कि अपना गुजारा करना … Read more

सोने की मोहर – शुभ्रा बैनर्जी 

“मैं अब नहीं रहने वाली यहां।सारा दिन खटती रहती हूं,फिर भी मन नहीं भरता आपके बेटे का।रोज -रोज खाने को लेकर चिक-चिक,हद है।हर बात में तैयार रहता है आपका बेटा लड़ने को।क्या कभी मैंने अपने दायित्वों से मुंह मोड़ा है?कभी भी आप लोगों के साथ बुरा बर्ताव किया है?ससुराल में सब अपनी सास से परेशान … Read more

पगडंडी -लतिका श्रीवास्तव

दिसम्बर का उत्साह पूरे उफान पर था।शायद अपनी बारी की प्रतीक्षा करते करते अंत में वहीं बचता है अकेला पूरे वर्ष का भर ढोने वाला।पूरे वर्ष सारे महीनों ने जो उम्मीदें पूरी नहीं की उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी का बोझ उठाता दिसंबर कभी निराश नहीं दिखता।मेरे साथ यह वर्ष खत्म हो जाएगा इसका दुख … Read more

अहंकार छोटा कर बहु – मधु वशिष्ठ

    घर बचाना है तो अहंकार छोटा कर बहु, माधवी जी मैं बड़ी बहू सुजाता को डांटते हुए बोला परंतु आज  सुजाता कुछ सुनना ही नहीं चाहती थी। उसने भी अपनी पूरी आवाज बढ़ाते हुए कहा यह अहंकार नहीं आत्मसम्मान है। आज आप केवल रीना की आए दहेज के सामान के कारण ही उसकी हर गलतियों … Read more

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