रिटायरमेंट – दीपा माथुर

लोग रिटायरमेंट के बाद बीमार क्यों होने लगते है? गार्डन में बोल उछालते हुए अवि ने धीरज से पूछा धीरज ;” हु मेरे दादा जी भी बीमार रहते है दादी दिनभर काम करती है मेरी हर जरूरत का ख्याल रखती है मम्मी,पापा सर्विस पर जाते तो पीछे सारा काम करती है तो व्यस्त रहती है। … Read more

रिश्ते अहंकार से नहीं त्याग और माफ़ी से टिकते हैं – दिव्या मिश्रा

सच्चा रिश्ता वही कहलाता है जिसमें अपनत्व की भावना हो कुछ गलतफहमियों के दस्तक देने पर भी उसमें कोई कड़वाहट न  फैले बल्कि वह अपने रिश्ते में मिठास बने रहने के लिए हर गलतफहमियों को भी नजरअंदाज कर देता है वहीं सच्चा रिश्ता होता है रिश्तों को अमीरी या ग़रीबी के तराजू में नहीं तौला … Read more

रिश्ते अहंकार से नहीं,त्याग और माफ़ी से टिकते हैं – मीनाक्षी

रिश्ते, प्यार और त्यागइतना अहंकार नहीं। यह अच्छा नहीं होता।इसी तरह की एक कहानी है आदेश की, जिसे अहंकार था।वो जो भी ऊँचे मुकाम पर था, अपनी बदौलत समझता था। उसे न पिता से मतलब था, न माँ से। इकलौता बेटा था। पिता ने कितनी मेहनत करके आदेश को पढ़ाया-लिखाया था। दिन-रात नौकरी करता। उसे … Read more

रिश्ते अहंकार से नहीं,त्याग और माफ़ी से टिकते हैं – गीता यादवेन्दु : Moral Stories in Hindi

त्याग और माफ़ी दो ऐसे शब्द हैं जिन्हें आप जितना भी करते जाओ कभी उनकी सीमा ख़त्म ही नहीं होती क्योंकि जिन्हें आपके त्याग और माफ़ी की कद्र नहीं है वे कभी उसका मूल्य नहीं समझते और आपसे सदा त्याग की ही उम्मीद करते जाते हैं और वो भी बिना कोई श्रेय दिए और वे … Read more

आग पर तेल छिड़कना – विनीता सिंह

सरला जी ने अपने बेटे की  शादी की थी ,उनकी बहू सुरभि जो की एक पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की है। लेकिन दोनों की सोच में जमीन आसमान का अंतर था ।सरला जी जहां परंपरा को मानने वाली और उनका विचार था की बहू को घूंघट में रहना चाहिए, और वहीं दूसरी तरफ सुरभि  खुले विचारों … Read more

जेवर – प्रियंका पांडेय त्रिपाठी

प्रिया की शादी का दूसरा दिन था। सुबह का समय जेठानी जी फर्श पर बैठी हुई थी ननद रसोई में नाश्ता बना रही थी अचानक ननद प्रिया के पास आई ,उसे आंगन में ले गई और ऊंचे स्वर में प्रिया से कहने लगी कि….      “भाभी ने हमारे लिए बहुत किया है वो मां के समान … Read more

वो भी तो मेरा अंश था… – चंचल नरूला

काश कोई बड़ा भाई या बहन होती जो संभाल लेती मेरी लाडो को हम बुड्ढा बुढ़िया के बाद | जाने किस उधेड़ बुन मे फंसी थी चेतना जब डॉ. ने कहा माँ जी आपको अपने लिए नहीं अपनी इकलोती  बेटी के लिए जीना है | ” कितनी खुश थी न चेतना उन 2 लकीरों को … Read more

चकल्लस – रवीन्द्र कान्त त्यागी

“अरे नामाकूलो, मेरा चश्मा कहाँ मर गया” मां जी पूरी ताकत से चिल्लाईं। “फिर ये शैतान की औलाद मेरा चश्मा उठाकर ले गए। मेरा तो इस घर में जीना मुहाल हो गया है। पता नहीं क्या खाकर पैदा किया है इन चुड़ैलों ने औलादों को। सारे दिन मेरे ही सामानों के पीछे पड़े रहते हैं। … Read more

“ये जीवन है…।” – रवीन्द्र कान्त त्यागी

आह… कितनी देर सोया। पता ही नहीं चला। सुबह होने वाली है शायद। मगर… मगर अभी तो अंधेरा सा है। ओह, कई दिन की थकान से पूरा शरीर दुख रहा है। तेरह दिन तक जमीन पर बैठे बैठे। और उसके बाद… उसके बाद मौत का उत्सव। मेरी बीवी की मौत का जश्न। ओह… मेरी परम्पराओं … Read more

रिटायरमेंट – प्रतिमा पाठक

रेलवे स्टेशन की पुरानी घड़ी ने जैसे ही शाम के पाँच बजाए, राघव बाबू की ड्यूटी खत्म हो गई। आज का दिन उनके जीवन का सबसे अलग दिन था, क्योंकि यह उनकी नौकरी का आख़िरी दिन था। चालीस वर्षों की अनवरत सेवा के बाद वे आज रिटायर हो रहे थे। स्टेशन मास्टर की वर्दी उतारते … Read more

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