यादें – गरिमा जैन

पापा मम्मी के पास आना मेरे लिए हमेशा से ही एक खुशनुमा पल रहा है। गर्मियों की छुट्टियों में जब भी दिल्ली की चिलचिलाती धूप से मैं परेशान होता तो भाग कर शिमला आ जाता। शिमला में हमारा पुश्तैनी मकान ,दूर-दूर तक सुंदर नजारे, सच बचपन की कितनी ही यादें वापस ताजा हो जाती हैं … Read more

शिकवा – कमलेश राणा

राधिका जी और नितिन के विवाह को 40 वर्ष बीत चुके हैं,,,इन वर्षों में जीवन के बहुत से रंग देखे हैं दोनों ने साथ-साथ,, विवाह के एक वर्ष बाद ही ईश्वर की कृपा से उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई,,इस पीढ़ी का पहला बेटा था वो,,सारे परिवार की आँखों का तारा,, संयुक्त परिवार था,,हाथों ही हाथों … Read more

जादूगरनी – पुष्पा पाण्डेय

बड़ी मुश्किल से विवेक पार्थ को सुला पाया।  घंटों मशक्कत के बाद वह सो पाया। न जाने कैसे बबीता इसे दस मिनट में खेलते- खेलाते सुला देती थी। आज तीन दिन हो गये बबीता को अस्पताल में। सीढ़ियों से गिर पड़ी और बेहोशी की हालत में उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। अब डेढ वर्षीय पार्थ … Read more

 अजूबा – मुकुन्द लाल

  यह घटना उस समय की है, जब मैं बेरोजगार था। अपना परवरिश करने के लिए या यों समझिये कि अपना पेट पालने के लिए एक शुभचिंतक के घर में इस शर्त पर रह रहा था कि उसके लड़के को सबह और शाम दो घंटे पढ़ाना है, इसके एवज में रहने के लिए एक छोटे से … Read more

मन सरोवर –  रीमा महेंद्र ठाकुर 

तेजस्विनी, जल्दी जल्दी बैग पैक कर रही थी!  उसके दोनों बच्चे, आपस में मस्ती कर रहे थे! चट की आवाज,  क्या हुआ, तेजस्विनी ने आवाज की ओर मुहं करके पूछा,  सन्नाटा,      बाहर जाकर देखने को उद्दत हुई, तभी बडी बेटी भागती हुई उसके पास आयी, और अलमारी के कोने में छुपकर बैठ गयी, घुटने में … Read more

बहू घर की इज्जत होती है – सोनिया निशांत कुशवाहा

बर्तन गिरने की आवाज सुन ऋचा दौड़ती हुई आँगन में पहुँची। पहुंचते देखा कि उसके ससुर जी ने नाश्ते की थाली गुस्से में फेंक दिया है।  उनकी नजर जैसे ही ऋचा पर पड़ी  उन्होंने गुस्से में कहा, “ना जाने कौन घड़ी में तू निकम्मी हमार गले पड़ गई। अरे! चार आदमी का खाना बनाने में … Read more

कन्यादान – अनुपमा

सुबह सुबह घर मैं इतनी चहल पहल देख कर मैं बाहर निकला तो देखा दीदी की कामवाली अपने बच्चों को लेकर आई थी आज , मैं कुछ ऑफिस के काम से कानपुर आया था तो दीदी के यहां ही रुक गया था । उसकी चार लड़कियां ,देखने मैं तो बमुश्किल साल साल भर का ही … Read more

ये कैसा प्यार – प्रीती सक्सेना

    मैं मनीषा,,, पंद्रह वर्ष की थी, जब ब्याह के अशोक के घर आई थी,,, मैं,, छोटे से कद की,, नाजुक दुबली पतली,, वहीं वो लंबा चौड़ा, सजीला जवान,,,बहुत अच्छा लगता था,,, मुझे तो हीरो जैसा लगता था,, मेरी सहेलियों कहती थीं,, मनीषा,, तेरी तो किस्मत खुल गई,,, पर जल्दी ही मुझे पता चल गया,, कि … Read more

सांझ – गरिमा जैन

अकेलापन,  शायद यही एक ऐसा एहसास था जो मुझे एक  डरावने सपने जैसा लगता और कहते हैं ना कि किस्मत आपके डर को आपके सामने खड़ा कर देती है वही मेरे साथ हुआ। जीवन के साठ मील चलने के बाद यह अकेलापन मुझ पर जोरों से हंसने लगा । मैं इसके आने से पहले ही … Read more

 जोड़ा – विनय कुमार मिश्रा

आज एक बहुत ही अच्छी रोमांटिक फिल्म लगी है। शॉपिंग के बाद मैं और निहारिका टिकट के लिए लाइन में लगे थे। हमारे आगे ही एक और जोड़ी भी इस फ़िल्म की टिकट के लिए लाइन में थी। बिल्कुल देहाती! उनकी बातों से लग रहा था वो अपनी शादी के बाद पहली बार साथ फ़िल्म … Read more

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