जगदीश जी ने पलटकर उस रिश्तेदार की आंखों में देखा। उनकी आवाज में एक अजीब सा तेज और ठहराव था, “शास्त्रों ने धर्म सिखाया है, पाखंड नहीं! जिस दिन मैंने इस बच्ची के आंसुओं को पोछकर इसे बेटी का दर्जा दिया था, उसी दिन भगवान साक्षी थे कि यह मेरी संतान है। अगर एक पिता अपनी बेटी को विदा कर सकता है, तो एक ससुर अपनी उस बहू को क्यों नहीं विदा कर सकता जिसे उसने अपनी आत्मा से बेटी माना हो? दुनिया क्या कहती है, मुझे फर्क नहीं पड़ता। मेरे लिए मेरा धर्म यही है कि मैं अपनी बच्ची का हाथ एक योग्य वर के हाथ में सौंपूं।”
हर घर के चबूतरे पर, चाय की थड़ियों पर और छतों की मुंडेरों से सिर्फ एक ही चर्चा की फुसफुसाहट हवा में तैर रही थी— “अरे, सुना तुमने? मास्टर जगदीश नारायण जी के घर आज शहनाई बज रही है! लोग बेटियों की शादी में इतना तामझाम करते हैं, पर वो तो अपनी विधवा बहू को ब्याहने चले हैं!” किसी के लहजे में हैरत थी, किसी की आंखों में दबी हुई संकीर्णता, तो कोई चुपचाप इस अनूठी बात को हजम करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन उस पुराने पुश्तैनी मकान के आंगन में गूंजती शहनाई की धुन और ताजे गेंदे के फूलों की महक किसी भी संशय से परे एक नए सवेरे का स्वागत कर रही थी।
मास्टर जगदीश नारायण जी इंटर कॉलेज से रिटायर्ड गणित के शिक्षक थे। जीवन भर सिद्धांतों, अनुशासन और मर्यादा की पटरी पर चलने वाले जगदीश जी का भरा-पूरा संसार महज दो साल पहले एक झटके में उजड़ गया था। उनका इकलौता बेटा हर्ष, जो शहर के एक बड़े सरकारी अस्पताल में फार्मासिस्ट था, एक भीषण सड़क हादसे में असमय ही दुनिया छोड़ गया था। हर्ष की शादी को तब केवल सवा साल हुआ था। जिस आंगन में अभी बहू तन्वी की चूड़ियों और पायल की छन-छन नई-नई रची-बसी थी, वहां अचानक सफेद चादरों और सन्नाटे का पहरा बैठ गया था।
हर्ष के जाने के बाद रिश्तेदारों ने परंपराओं की दुहाई देकर तन्वी के जीवन को बेनूर करने की पूरी कोशिश की थी। किसी ने उसकी रंगीन साड़ियां समेटने की बात कही, तो किसी ने उसे मायके भेजकर पल्ला झाड़ने की सलाह दी। पर जगदीश जी ने उस वक्त जो फैसला लिया, उसने सबको खामोश कर दिया। उन्होंने हाथ जोड़कर रिश्तेदारों से कहा था, “हर्ष चला गया, यह मेरी किस्मत का खोटा सिक्का था। लेकिन तन्वी किसी की किस्मत का बोझ नहीं है। जब मेरा बेटा इसे ब्याह कर लाया था, तो मैंने अग्नि के सामने वचन दिया था कि यह इस घर की बेटी है। आज मेरा बेटा नहीं रहा, तो क्या मेरी पितृत्व की डोर भी टूट गई? यह कहीं नहीं जाएगी, यह मेरे पास रहेगी, मेरी छत्रछाया में रहेगी।”
तन्वी उस समय पूरी तरह बिखर चुकी थी। महज तेईस साल की उम्र में अपने जीवनसाथी को खो देना किसी जलजले से कम नहीं था। उसने खाना-पीना छोड़ दिया था, कमरा बंद करके दिन-रात रोती रहती थी। लेकिन उस अंधकार भरे दौर में जगदीश जी उसके लिए एक चट्टान बनकर खड़े हो गए। वे सुबह खुद चाय बनाकर उसके कमरे में ले जाते, उसके सिर पर हाथ फेरते और कहते, “तन्वी बिटिया, दुख बहुत बड़ा है, इसे मैं मिटा नहीं सकता। लेकिन अगर तू यूं घुट-घुट कर मरती रही, तो हर्ष की आत्मा को कभी शांति नहीं मिलेगी। तुझे जीना होगा, अपने लिए और अपने सपनों के लिए।”
तन्वी बी.कॉम कर चुकी थी। जगदीश जी ने सबसे पहले उसकी रुकी हुई पढ़ाई को फिर से शुरू करवाया। उन्होंने खुद शहर के प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान में उसका दाखिला कराया। जब तन्वी हिचकिचाई कि लोग क्या कहेंगे, तो जगदीश जी ने उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा था, “दुनिया का काम है बातें बनाना, और एक पिता का काम है अपनी संतान के पंखों को हवा देना। तू बस आगे देख, पीछे मुड़कर मत देखना।”
शुरुआत में तन्वी का मन पढ़ाई में नहीं लगता था। किताबों के पन्नों पर हर्ष का मुस्कुराता चेहरा उभर आता था। लेकिन जगदीश जी का समर्पण देखकर उसने अपने आंसुओं को अपनी ताकत बना लिया। ससुर जी रोज सुबह उसके उठने से पहले नाश्ता तैयार रखते, कॉलेज की बस आने पर उसे दरवाजे तक छोड़ने जाते और शाम को उसके लौटने पर दिन भर का हाल पूछते। जगदीश जी की अपनी पत्नी का देहांत कई साल पहले हो चुका था, ऐसे में घर के चूल्हे-चौके से लेकर तन्वी की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल वे अकेले ही रखते थे। धीरे-धीरे तन्वी के चेहरे पर फिर से आत्मविश्वास की चमक लौटने लगी।
दो साल की अथक मेहनत के बाद तन्वी ने एमबीए की परीक्षा में पूरे विश्वविद्यालय में अव्वल स्थान हासिल किया। जब दीक्षांत समारोह में उसे गोल्ड मेडल मिला, तो सभागार में सबसे पीछे बैठे जगदीश जी की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। उसी शाम एक बड़ी बहुराष्ट्रीय वित्तीय कंपनी ने तन्वी को अच्छे पैकेज पर सीधे नियुक्ति पत्र सौंप दिया। तन्वी ने वह पत्र लाकर जगदीश जी के चरणों में रख दिया और फूट-फूट कर रो पड़ी, “बाबूजी, अगर आप न होते, तो मैं कब की अंधेरों में खो गई होती। आपने मुझे नई जिंदगी दी है।”
जगदीश जी ने उसे उठाकर गले से लगा लिया और बोले, “यह तेरी मेहनत का फल है बिटिया। मैंने तो सिर्फ रास्ता दिखाया था, चलना तूने खुद सीखा है। लेकिन आज मैं तुझसे कुछ मांगना चाहता हूं।”
तन्वी ने चौंक कर देखा, “बाबूजी, आप जो कहेंगे, मैं सिर झुकाकर मानूंगी।”
जगदीश जी ने एक गहरी सांस ली और बड़ी संजीदगी से कहा, “मैं चाहता हूं कि तू अपनी जिंदगी को दोबारा शुरू करे। तू अभी बहुत छोटी है, पूरी जिंदगी तेरे सामने पड़ी है। मैं चाहता हूं कि तू फिर से अपना घर बसाए।”
यह सुनते ही तन्वी के पैर ठिठक गए। उसने घबराकर सिर हिलाया, “नहीं बाबूजी! कभी नहीं। मैं आपको इस उम्र में अकेला छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। हर्ष की यादें और आपकी सेवा ही मेरी पूरी जिंदगी है। मुझे किसी नए बंधन में नहीं बंधना।”
उस रात जगदीश जी ने उसे बहुत समझाया, “तन्वी, त्याग और तपस्या औरत का गहना कहे जाते हैं, लेकिन बेवजह का संन्यास किसी समस्या का समाधान नहीं है। हर्ष हमेशा तेरी यादों में रहेगा, कोई उसे छीन नहीं सकता। लेकिन जीवन गति का नाम है, ठहराव का नहीं। अगर मैं कल को नहीं रहा, तो इस भरे संसार में तू अकेली किसके सहारे जिएगी? एक पिता की असली तसल्ली तब होती है जब उसकी बेटी का अपना एक खुशहाल संसार हो।”
तन्वी ने रोते हुए इनकार कर दिया, लेकिन जगदीश जी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने स्तर पर योग्य और समझदार जीवनसाथी की तलाश शुरू की। वे जानते थे कि आज के दौर में भी किसी विधवा बहू को दिल से अपनाने वाले लोग आसानी से नहीं मिलते, पर वे समझौता करने के मूड में बिल्कुल नहीं थे। उन्हें एक ऐसा इंसान चाहिए था जो तन्वी के अतीत का सम्मान करे और उसके आत्मसम्मान को अपनी जागीर न समझे।
काफी तलाश के बाद उनकी मुलाकात सिद्धार्थ से हुई। सिद्धार्थ शहर के ही एक प्रतिष्ठित कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे। बेहद सुलझे हुए, खुले विचारों के और मानवीय संवेदनाओं से भरे इंसान। सिद्धार्थ के माता-पिता भी उदारमना थे। जब जगदीश जी ने उनके सामने तन्वी की पूरी दास्तान रखी, तो सिद्धार्थ के पिता ने उठकर जगदीश जी के हाथ थाम लिए और कहा, “मास्टर साहब, आप जैसा ससुर और पिता जिस लड़की के सिर पर खड़ा हो, उसके संस्कार कितने ऊंचे होंगे, यह हमें सोचने की जरूरत ही नहीं है। हमें आपकी बेटी सहर्ष स्वीकार है।”
जब सिद्धार्थ और तन्वी की मुलाकात कराई गई, तो सिद्धार्थ ने तन्वी से सीधे शब्दों में कहा, “तन्वी जी, मैं आपके अतीत को मिटाना नहीं चाहता, बल्कि आपके वर्तमान का साथी बनना चाहता हूं। और सबसे बड़ी बात, विवाह के बाद जगदीश बाबूजी केवल आपके ससुर नहीं रहेंगे, वे मेरे भी पिता होंगे। उनका ख्याल रखना मेरी भी पहली जिम्मेदारी होगी।” सिद्धार्थ की यह सच्चाई तन्वी के दिल को छू गई, और अंततः उसने इस नए रिश्ते के लिए अपनी सहमति दे दी।
और आज वही शुभ दिन आ पहुंचा था। जगदीश जी के घर का कोना-कोना रोशनी से जगमगा रहा था। लाल बनारसी लहंगे में सजी तन्वी जब कमरे से बाहर निकली, तो उसकी सुंदरता और सादगी देखकर हर किसी की आंखें ठहर गईं। लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान के पीछे एक असीम वेदना छिपी थी—उस घर को, उस पिता तुल्य ससुर को छोड़ने की वेदना, जिसने उसे मौत के मुंह से खींचकर जिंदगी के उजाले में खड़ा किया था।
मंडप में वैदिक मंत्रोच्चार गूंज रहे थे। अग्नि के फेरे शुरू होने से ठीक पहले पंडित जी ने पुकारा, “कन्यादान के लिए वधू के माता-पिता आगे आएं।”
तन्वी के अपने माता-पिता बहुत पहले इस दुनिया से विदा हो चुके थे, उसके दूर के चाचा-चाची केवल रस्म निभाने के लिए एक कोने में खड़े थे। लेकिन इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, जगदीश नारायण जी अपनी धोती का पल्लू संभालते हुए सीधे वेदी के पास पहुंचे और दृढ़ स्वर में बोले, “पंडित जी, संकल्प पढ़िए। इस बेटी का कन्यादान इसका यह पिता करेगा।”
पूरे विवाह मंडप में सन्नाटा पसर गया। वहां मौजूद कई दकियानूसी बुजुर्गों की भौंहें तन गईं। एक दूर के रिश्तेदार ने धीमी आवाज में टोकने की कोशिश की, “मास्टर जी, यह क्या अनर्थ कर रहे हैं? ससुर होकर बहू का कन्यादान? हमारे शास्त्रों में ऐसा कहीं नहीं लिखा!”
जगदीश जी ने पलटकर उस रिश्तेदार की आंखों में देखा। उनकी आवाज में एक अजीब सा तेज और ठहराव था, “शास्त्रों ने धर्म सिखाया है, पाखंड नहीं! जिस दिन मैंने इस बच्ची के आंसुओं को पोछकर इसे बेटी का दर्जा दिया था, उसी दिन भगवान साक्षी थे कि यह मेरी संतान है। अगर एक पिता अपनी बेटी को विदा कर सकता है, तो एक ससुर अपनी उस बहू को क्यों नहीं विदा कर सकता जिसे उसने अपनी आत्मा से बेटी माना हो? दुनिया क्या कहती है, मुझे फर्क नहीं पड़ता। मेरे लिए मेरा धर्म यही है कि मैं अपनी बच्ची का हाथ एक योग्य वर के हाथ में सौंपूं।”
जगदीश जी के इन निर्भीक शब्दों ने जैसे सबकी जुबान पर ताले लगा दिए। सिद्धार्थ के माता-पिता की आंखों में आदर के भाव उमड़ आए और उन्होंने आगे बढ़कर जगदीश जी के फैसले का ताली बजाकर समर्थन किया।
पंडित जी ने पवित्र जल और अक्षत जगदीश जी की हथेली पर रखे। जगदीश जी ने कांपते लेकिन मजबूत हाथों से तन्वी का हाथ उठाया और सिद्धार्थ के हाथ में रख दिया। उस पल शंख की पवित्र ध्वनि गूंज उठी। सात फेरे पूरे हुए, सिंदूर दान हुआ और विवाह संपन्न हो गया।
अब विदाई की घड़ी आ पहुंची थी। आंगन में सन्नाटा था, सिर्फ सिसकियों की आवाज आ रही थी।
तन्वी जब विदा होने लगी, तो वह खुद को रोक न सकी। वह दौड़कर जगदीश जी के सीने से लिपट गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उसकी सिसकियों से पूरा माहौल गमगीन हो गया।
“बाबूजी… मुझे छोड़कर मत जाइए… मैं आपके बिना कैसे रहूंगी? किसने संभाला था मुझे जब सबने मुंह मोड़ लिया था? आप अकेले इस सूने घर में कैसे रहेंगे? मुझे अपने पास ही रख लीजिए बाबूजी, मुझे नहीं जाना…” तन्वी के ये शब्द किसी बहू के नहीं, बल्कि अपने पिता के कलेजे से जुदा हो रही उस मासूम बेटी के थे, जिसकी पूरी दुनिया ही उसका पिता था।
जगदीश जी की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। उनका वृद्ध शरीर भावनाओं के बोझ से कांप रहा था। उन्होंने तन्वी के सिर पर अपना हाथ रखा, उसे अपने से थोड़ा अलग किया और बड़े स्नेह से उसके आंसू पोंछे।
उनकी आवाज भर्राई हुई थी, लेकिन शब्दों में अगाध वात्सल्य था, “पगली, रोती क्यों है? तू जा कहां रही है? तू तो हमेशा मेरे दिल में रहेगी। एक बात हमेशा याद रखना तन्वी, ससुराल से बेटी विदा होती है, लेकिन दिल से कभी कोई संतान जुदा नहीं होती। तूने मुझे एक पिता होने का गौरव दिया है। जब दुनिया मुझे एक बेबस, टूटा हुआ बूढ़ा समझ रही थी, तब तेरी कामयाबी ने मुझे समाज में सिर उठाकर जीना सिखाया। आज मेरी तपस्या पूरी हुई है।”
उन्होंने सिद्धार्थ को पास बुलाया और दोनों के हाथों को जोड़ते हुए कहा, “सिद्धार्थ बेटा, मैंने तुम्हें अपनी बहू नहीं, अपनी आत्मा का टुकड़ा सौंपा है। इसने जिंदगी के बहुत गहरे जख्म सहे हैं। इसे हमेशा खुश रखना, इसे कभी यह महसूस मत होने देना कि इसका कोई अपना नहीं है।”
सिद्धार्थ ने झुककर जगदीश जी के चरण स्पर्श किए और नम आंखों से कहा, “बाबूजी, आप निश्चिंत रहिए। तन्वी की मुस्कान अब मेरी अमानत है। और यह घर कभी सूना नहीं रहेगा, हम हर हफ्ते आपके पास आएंगे और आपको भी हमारे साथ ही रहना होगा।”
तन्वी ने झुककर जगदीश जी के दोनों पैर पकड़ लिए और अपना माथा उनके चरणों में रख दिया। जगदीश जी ने झुककर उसे उठाया और उसके माथे को चूमते हुए कहा, “सदा सुहागिन रहो बिटिया… खूब फूलो-फलो, अपनी नई गृहस्थी को स्वर्ग बनाओ। आज से तेरा नया जीवन शुरू हो रहा है, अब पीछे मुड़कर कभी गम के आंसू मत बहाना।”
गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ गई। तन्वी खिड़की से बाहर हाथ निकाले तब तक देखती रही, जब तक कि मोड़ पर खड़े उसके बाबूजी का सफेद कुर्ता ओझल नहीं हो गया।
दरवाजे पर अकेले खड़े जगदीश नारायण जी के चेहरे पर आज एक अलौकिक शांति और संतोष की चमक थी। उनका आंगन भले ही खाली हो गया था, लेकिन उनका अंतर्मन एक पिता के कर्तव्य को पूरी निष्ठा से निभाने के सुकून से सराबोर था। उन्होंने समाज की उस सदियों पुरानी रूढ़िवादी सोच को हमेशा के लिए तोड़ दिया था, जो एक विधवा बहू को केवल घर की दासी या मनहूस समझकर छोड़ देती है। उन्होंने दुनिया को दिखा दिया था कि रिश्ते खून की बूंदों से नहीं, बल्कि दिल के निःस्वार्थ प्रेम, आदर और त्याग से अमर बनते हैं।
आपके विचार हमारे लिए बेहद अनमोल हैं: क्या आज के आधुनिक समाज में भी हर उस ससुर को, जिसके घर में ऐसी विपदा आई हो, जगदीश जी की तरह अपनी बहू को बेटी मानकर उसे नया जीवन देने का साहस दिखाना चाहिए? क्या एक पिता और बेटी का रिश्ता केवल जन्म देने से तय होता है या फिर संबल देने से? अपनी अमूल्य राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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मूल लेखिका : मीनाक्षी सिंह