“तान्या, मेरी बात को ठंडे दिमाग से सुनो। तुम जानती हो कि माँ जी पुराने ख्यालों की हैं। उनकी उम्र ऐसी है जहाँ छोटी-छोटी बातें भी उन्हें असहज कर देती हैं। लेकिन तुम खुद दिल पर हाथ रखकर सोचो, जब पिछले महीने तुम्हारी तबीयत खराब हुई थी, तो पूरी रात जागकर तुम्हारे सिर पर पट्टी किसने रखी थी? माँ जी ने ही ना? माँ का दिल कभी अपनी बहू के लिए बुरा नहीं सोचता। हो सकता है कि रिश्तेदारों के सामने उनसे गलती से कोई बात निकल गई हो, पर इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि वे तुमसे प्यार नहीं करतीं।”
दो दिन पहले ही उसकी छोटी ननद अंकिता अपने सात साल के बेटे शौर्य के साथ मायके आई थी।
अंकिता के आने की खबर सुनते ही वैशाली ने पूरे घर को सजाया था। गेस्ट रूम में नई चादरें बिछाई थीं, फ्रिज को अंकिता के मनपसंद मौसमी फलों, मिठाइयों और नमकीन से भर दिया था और नाश्ते से लेकर डिनर तक का ऐसा मेनू तैयार किया था जो अंकिता को सबसे ज्यादा प्रिय था। वैशाली दिल से चाहती थी कि जब ननद ससुराल की व्यस्त दिनचर्या से निकलकर कुछ दिनों के लिए मायके आए, तो उसे सुकून और अपनेपन का पूरा अहसास मिले।
लेकिन हर बार की तरह इस बार भी वही पुरानी तस्वीर दोहराई जा रही थी। अंकिता जब भी घर आती, उसका पूरा संसार सिर्फ अपनी माँ यानी वैशाली की सासू माँ मनोरमा जी के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह जाता। सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, वह हर पल अपनी माँ के कमरे में ही बैठी रहती। दोनों माँ-बेटी दरवाजे बंद करके फुसफुसातीं, हँसतीं या पुरानी बातों की पोटली खोलकर बैठ जातीं।
वैशाली जब भी उनके लिए चाय या नाश्ता लेकर कमरे में जाती, तो कमरे में अचानक एक असहज सन्नाटा पसर जाता। मनोरमा जी भी बेटी के आते ही पूरी तरह बदल जाती थीं। उन्हें घर के किसी कोने में क्या हो रहा है, बहू ने क्या खाया या बहू किस हाल में है, इससे कोई सरोकार नहीं रहता था। अंकिता के सामने आते ही माँ जी की आँखों पर बेटी के मोह का ऐसा चश्मा चढ़ जाता कि वैशाली की उपस्थिति उनके लिए बिल्कुल अदृश्य हो जाती थी।
शुरुआती सालों में वैशाली का मन इस उपेक्षा से बहुत कचोटता था। विवाह के बाद जब वह इस घर में आई थी, तो उसने सोचा था कि वह ननद के साथ एक सहेली जैसा रिश्ता बनाएगी। लेकिन हर बार खुद को किनारे लगा देखकर उसका दिल भारी हो जाता था। वह रसोई में आंसू पोंछती और सोचती कि जिस घर को उसने अपने पसीने और समर्पण से संवारा है, उसी घर में एक बेटी के आते ही बहू पराई क्यों महसूस होने लगती है?
मगर समय के साथ वैशाली ने खुद को संभाला। वह एक शिक्षित, सुलझी हुई और संवेदनशील महिला थी। उसने आत्ममंथन किया और समझा कि अगर वह इस उपेक्षा को अपने दिल पर लगाएगी, तो न केवल उसका मानसिक सुकून छिनेगा, बल्कि घर की शांति भी भंग होगी। आखिर माँ-बेटी महीनों बाद मिलती हैं, तो उनका एक-दूसरे में खो जाना स्वाभाविक भी है। धीरे-धीरे वैशाली ने इस स्थिति को सहजता से स्वीकार करना शुरू कर दिया। उसने उम्मीदों का बोझ हटा दिया और अपने पति आलोक तथा बेटी पीहू के साथ अपनी खुशियों की दुनिया बसा ली। जब उम्मीदें खत्म हुईं, तो शिकायतें भी खुद-ब-खुद दम तोड़ गईं और वैशाली का जीवन एक शांत नदी की तरह बहने लगा।
वैशाली का मायका जबलपुर में था। वहां उसका छोटा भाई मयंक, भाभी तान्या और उसकी माँ शारदा जी रहते थे। मायके में वैशाली की अपनी स्थिति बिल्कुल विपरीत थी। वैशाली अपनी माँ के बेहद करीब थी, लेकिन जब मयंक का विवाह हुआ और तान्या उस घर में आई, तो वैशाली ने सबसे पहले एक बात सुनिश्चित की थी कि माँ के दिल में तान्या को वही प्यार और अधिकार मिले जो एक बेटी को मिलता है।
वैशाली जब भी जबलपुर जाती, वह सारा दिन अपनी माँ के साथ बैठकर भाभी की अनुपस्थिति में समय बिताने के बजाय तान्या के साथ रसोई में हाथ बंटाती, उसके साथ बाजार जाती और उसकी छोटी-छोटी खुशियों का ख्याल रखती। नतीजा यह था कि तान्या और वैशाली के बीच ननद-भाभी का नहीं, बल्कि दो सगी बहनों जैसा प्रगाढ़ और आत्मीय रिश्ता बन चुका था। तान्या ससुराल की कोई भी बात, कोई उलझन या मयंक से हुई नोकझोंक सबसे पहले वैशाली से ही साझा करती थी।
शाम का समय था। मनोरमा जी पड़ोस में आयोजित सुंदरकांड के पाठ में गई हुई थीं। बच्चे ड्राइंग रूम में टीवी पर एनिमेटेड फिल्में देखने में मग्न थे। घर में एक हल्की सी शांति थी। तभी अंकिता अपने कमरे से निकलकर वैशाली के कमरे में आई।
“भाभी, क्या कर रही हैं?” अंकिता ने दरवाजे पर खड़े होकर पूछा।
वैशाली ने मुस्कुराते हुए अपनी किताब एक तरफ रखी और कहा, “कुछ खास नहीं अंकिता, बस आराम ही कर रही थी। आओ, बैठो। मैं तुम्हारे लिए बढ़िया इलायची वाली चाय बनाकर लाती हूँ।”
वैशाली ने दोनों के लिए चाय बनाई, साथ में कुछ हल्के स्नैक्स प्लेट में सजाए और दोनों बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियां लेने लगीं। काफी समय बाद दोनों को इस तरह शांत माहौल में बात करने का मौका मिला था। अंकिता अपने ससुराल की कुछ बातें बता ही रही थी कि तभी वैशाली के मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर उसकी भाभी तान्या का नाम चमक रहा था।
वैशाली ने फोन उठाकर धीमे से कहा, “हाँ तान्या, कैसी हो? मैं अभी अंकिता के साथ बैठी हूँ, थोड़ी देर में तुम्हें आराम से कॉल बैक करती हूँ।”
लेकिन दूसरी तरफ से तान्या की रुआंसी आवाज आई, “दीदी, प्लीज फोन मत काटिए… मुझे अभी आपसे दो मिनट बात करनी है। मैं बहुत परेशान हूँ।”
वैशाली ने महसूस किया कि तान्या किसी बात से बेहद आहत है। उसने अंकिता की तरफ देखा और वहीं बैठे-बैठे बात करने का फैसला किया, ताकि अंकिता को यह न लगे कि ननद के पास बैठते ही भाभी बहाना बनाकर मायके वालों से बात करने चली गई।
“हाँ तान्या, बताओ क्या बात है? सब ठीक तो है ना?” वैशाली ने संवेदनशीलता से पूछा।
तान्या सिसकते हुए बोली, “दीदी, आज सुबह माँ जी ने सबके सामने मुझे बहुत सुना दिया। मयंक के एक दूर के रिश्तेदार आए थे, उनके सामने माँ जी ने कह दिया कि आजकल की बहुओं को रसोई की रीतियों का कोई ज्ञान ही नहीं है। दीदी, मैंने सुबह से खड़े होकर उनके पसंद का नाश्ता और खाना तैयार किया था। अगर नमक थोड़ा कम हो गया था, तो वे अकेले में भी कह सकती थीं। मुझे बहुत बुरा लगा। मुझे लगता है कि माँ जी कभी मुझे अपना नहीं समझ पाएंगी।”
वैशाली ने तान्या की पूरी बात बिना टोके, बहुत धैर्य से सुनी। जब तान्या का गुस्सा और रोना थोड़ा शांत हुआ, तो वैशाली ने बहुत कोमल और समझाइश भरे स्वर में कहा:
“तान्या, मेरी बात को ठंडे दिमाग से सुनो। तुम जानती हो कि माँ जी पुराने ख्यालों की हैं। उनकी उम्र ऐसी है जहाँ छोटी-छोटी बातें भी उन्हें असहज कर देती हैं। लेकिन तुम खुद दिल पर हाथ रखकर सोचो, जब पिछले महीने तुम्हारी तबीयत खराब हुई थी, तो पूरी रात जागकर तुम्हारे सिर पर पट्टी किसने रखी थी? माँ जी ने ही ना? माँ का दिल कभी अपनी बहू के लिए बुरा नहीं सोचता। हो सकता है कि रिश्तेदारों के सामने उनसे गलती से कोई बात निकल गई हो, पर इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि वे तुमसे प्यार नहीं करतीं।”
वैशाली ने आगे समझाया, “तान्या, अगर किसी बात पर माँ का मूड खराब था, तो तुम्हें उसे अपने दिल से लगाकर खुद को बीमार नहीं करना चाहिए। तुम उस घर की धुरी हो। अगर तुम उदास रहोगी, तो मयंक भी परेशान होगा और पूरे घर का माहौल भारी हो जाएगा। तुम बस चाय बनाकर माँ के पास जाओ, मुस्कुराकर कहो कि माँ जी अगली बार ध्यान रखूंगी। देखना, माँ का गुस्सा पल भर में पिघल जाएगा। और सुनो, मैं अभी माँ से बात करती हूँ, तुम बिल्कुल चिंता मत करो।”
तान्या का मन शांत हो गया। उसने कहा, “थैंक यू दीदी, आपसे बात करके हमेशा हिम्मत मिल जाती है।”
फोन रखते ही वैशाली ने तुरंत अपनी माँ शारदा जी का नंबर मिलाया। माँ ने जैसे ही फोन उठाया, वैशाली ने हंसते हुए हालचाल पूछा और फिर बातों-बातों में कहा, “माँ, आज तान्या का फोन आया था। बेचारी बहुत दुखी थी। आपने रिश्तेदारों के सामने उसे टोक दिया? माँ, वह बच्ची अपना घर-बार छोड़कर आपके भरोसे उस चौखट पर आई है। उसने सुबह से कितनी मेहनत की थी। अगर कोई कमी रह भी गई थी, तो आप अकेले में समझा देतीं। वह तो आपकी इतनी इज्जत करती है। अब आप एक काम कीजिए, उसे पास बुलाइए और उसके सिर पर हाथ रखकर प्यार से समझाइए। आखिर वह आपकी ही तो बेटी है।”
शारदा जी ने भी अपनी भूल महसूस की और कहा, “हाँ बेटी, मुझे भी बाद में लगा कि मैंने थोड़ा ज्यादा कह दिया। तू चिंता मत कर, मैं अभी तान्या को बुलाती हूँ।”
वैशाली ने निश्चिंत होकर फोन रख दिया और अपनी चाय का कप उठाया।
अंकिता जो पिछले पंद्रह मिनट से एकटक वैशाली को देख रही थी, उसके चेहरे पर अचरज और उलझन के गहरे भाव थे। वह खुद को रोक नहीं पाई और बोली, “भाभी, आप सचमुच बहुत अजीब हैं! आपकी भाभी आपकी ही माँ की शिकायत आपसे कर रही थी और आप बड़े आराम से अपनी माँ की बुराइयां सुन रही थीं? कोई अपनी माँ की कमियां ऐसे कैसे सुन सकता है?”
वैशाली मुस्कुराई और बहुत सहजता से बोली, “अंकिता, बुराई सुनना और किसी की सच्ची परेशानी को समझना, दोनों में बहुत फर्क होता है। अगर तान्या किसी बात से दुखी थी, तो क्या मुझे उसकी बात सिर्फ इसलिए नहीं सुननी चाहिए थी क्योंकि बात मेरी माँ की थी? गलतियाँ तो इंसान से ही होती हैं, चाहे वह माँ हो, बेटी हो या बहू। जब हम एक बहू की गलतियों को बड़ी आसानी से देख लेते हैं, तो हमें सास और ननद की कमियों को भी निष्पक्ष होकर देखना और स्वीकारना आना चाहिए।”
अंकिता ने भौंहें सिकोड़ते हुए अपनी खास सलाह दी, “लेकिन भाभी, अगर आप अपनी माँ और भाभी को इस तरह मिलाती रहेंगी, तो सोचिए, मायके में आपकी क्या जगह बचेगी? कल को अगर उन दोनों के बीच बहुत गहरी समझदारी और प्यार हो गया, तो आपको कौन पूछेगा? आपकी अहमियत तो खत्म हो जाएगी!”
वैशाली ने अंकिता की आँखों में देखा। उसकी बातों में वही असुरक्षा झलक रही थी जो शायद वह खुद इस घर में महसूस करती थी।
वैशाली ने बहुत शांत और स्पष्ट आवाज में कहा, “अंकिता, मेरी जगह मेरे मायके में जितनी होनी चाहिए, उतनी है और हमेशा रहेगी। कोई किसी की जगह नहीं छीन सकता। लेकिन उस घर में तान्या का भी अपना एक मान-सम्मान और स्थान होना चाहिए। वह उस घर की बहू है, उसने अपनी पूरी जिंदगी मेरे भाई और मेरे परिवार के नाम कर दी है। मेरा यह फर्ज बनता है कि मैं अपनी माँ को भी यह समझाऊं कि बहू का सम्मान करें और तान्या को भी सिखाऊं कि वह माँ का आदर करे।”
अंकिता थोड़ी असहज हो गई, लेकिन अपनी बात पर अड़ते हुए बोली, “पर भाभी, आप तो अपनी भाभी का पक्ष लेकर अपनी माँ को समझा रही थीं। अगर भाभी ही माँ के दिल पर राज करने लगेगी, तो आप तो पराई हो जाएंगी ना?”
अंकिता यह बोलते-बोलते अचानक खुद ही सकपका गई। उसके जेहन में बिजली की तरह एक कौंध हुई। उसे एकाएक अहसास हुआ कि वह खुद इस घर में क्या करती आई है! वह जब भी इस घर आती थी, अपनी माँ मनोरमा जी को पूरी तरह अपने कब्जे में रखती थी, कभी वैशाली को माँ के करीब आने का मौका ही नहीं देती थी। उसने हमेशा यही चाहा था कि इस घर में सिर्फ उसी का हुक्म चले और भाभी हमेशा दूसरे दर्जे पर रहे।
वैशाली ने अंकिता के चेहरे के बदलते भावों को पढ़ लिया। वह उठी, अंकिता के पास सोफे पर बैठी और उसने अंकिता के हाथ को अपने हाथों में थाम लिया।
“अंकिता, मेरी बात को ध्यान से समझना,” वैशाली ने बड़े वात्सल्य से कहा। “मैं उस घर की बेटी हूँ। अगर मेरे मायके में माँ और तान्या के बीच प्यार और सामंजस्य रहेगा, तो मेरा भाई मयंक सबसे ज्यादा खुश रहेगा। तुम सोचो, जब एक माँ और पत्नी के बीच तनाव होता है, तो सबसे ज्यादा कौन पिसता है? वह बेटा, जो अपनी माँ को भी प्यार करता है और अपनी पत्नी को भी छोड़ नहीं सकता। अगर मैं अपनी माँ के कान भरकर तान्या के खिलाफ करती, तो क्या होता? माँ दुखी होतीं, तान्या रोती और मेरा भाई अंदर ही अंदर घुटता। क्या किसी बेटी का यह धर्म हो सकता है कि वह अपने मायके में आग लगाकर अपनी झूठी अहमियत तलाशे?”
अंकिता चुपचाप सिर झुकाए सुन रही थी। उसके भीतर का अहंकार अब पिघलने लगा था।
वैशाली ने आगे कहा, “सच्ची बेटी वह नहीं होती जो माँ के कमरे में बैठकर बहू की बुराइयां करे या अपनी जगह पक्की करने के लिए दीवारों को गहरा करे। सच्ची बेटी तो वह सेतु होती है जो दो पीढ़ियों और दो अंजान किरदारों को आपस में जोड़ दे। और रही बात अहमियत की, तो रिश्ते किसी प्रतियोगिता का मैदान नहीं हैं। जहाँ निस्वार्थ भाव होता है, वहां हर रिश्ते के लिए दिल में भरपूर जगह होती है। ससुराल हो या मायका, अगर हम थोड़ा सा स्वार्थ छोड़ दें, तो कभी कोई घर नहीं टूटता। और अंकिता, मैं घर जोड़ने में यकीन रखती हूँ, तोड़ने में नहीं।”
वैशाली ने अंकिता के कंधे पर हल्के से थपकी दी और खाली कप उठाकर रसोई की ओर बढ़ गई।
पीछे बैठी अंकिता की आँखों में आंसुओं की धार बह निकली। वैशाली के एक-एक शब्द ने उसकी आत्मा को झकझोर कर रख दिया था। उसे अपनी हर उस हरकत पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी जो वह पिछले कई सालों से इस घर में करती आ रही थी। उसने देखा कि कैसे उसने अपनी भाभी को हमेशा पराया समझा, जबकि वही भाभी अपने मायके में अपनी भाभी को सिर आँखों पर बिठाकर रखती थी।
उसी समय मनोरमा जी सुंदरकांड के पाठ से लौटकर आईं। उनके हाथ में प्रसाद का डिब्बा था। वे हमेशा की तरह सीधे अंकिता के कमरे की ओर बढ़ीं और बोलीं, “अंकिता, देख तेरे लिए प्रसाद लाई हूँ…”
अंकिता ने अपने आंसू पोंछे। वह उठी और उसने अपनी माँ का हाथ पकड़कर कहा, “मम्मी, चलिए रसोई में चलते हैं। भाभी सुबह से हमारे लिए काम कर रही हैं। आज चाय और रात का खाना हम दोनों माँ-बेटी मिलकर बनाएंगे और भाभी को खिलाएंगे।”
मनोरमा जी हैरान होकर अपनी बेटी का चेहरा देखने लगीं। रसोई के दरवाजे पर खड़ी वैशाली ने जब यह सुना, तो उसकी आँखों में भी संतोष और खुशी की चमक तैर गई। अंकिता ने आगे बढ़कर वैशाली के हाथ से कड़ाही का चमचा ले लिया और मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी, आज आप बैठिए। आज मैं अपनी बड़ी बहन को अपने हाथ से खाना खिलाऊंगी।”
उस रात अरेरा कॉलोनी के उस घर में कोई पराया नहीं था। डाइनिंग टेबल पर जब सब एक साथ बैठे, तो हंसी के ठहाकों में बरसों की दूरियां धुल चुकी थीं। वैशाली की समझदारी और निस्वार्थ सोच ने एक ऐसी मिसाल कायम कर दी थी, जिसने न केवल एक ननद की सोच बदली, बल्कि उस घर की बुनियाद को हमेशा के लिए अटूट बना दिया।
दोस्तों, एक बेटी जब ससुराल जाती है तो वह बहू बनती है, लेकिन जब वह अपने मायके को देखती है तो वह ननद भी होती है। अगर हर बेटी और बहू वैशाली की तरह यह समझ ले कि रिश्तों में अपनी जगह बनाने के लिए दूसरों को गिराने की जरूरत नहीं होती, तो न किसी मायके में कलह होगी और न किसी ससुराल में कोई बहू बेगानी महसूस करेगी।
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