“नहीं प्रणय, मेरे भाई… तुम्हारे इस महल में किसी चीज की कोई कमी नहीं है। यहाँ की सुख-सुविधाएं तो राजाओं जैसी हैं। लेकिन प्रणय, एक बहन अपने भाई के पास उसकी दौलत देखने या उसके नौकरों से सेवा करवाने नहीं आती। वह आती है अपने बचपन को ढूंढने, अपने भाई के कंधे पर सिर रखकर दो पल सुकून से बात करने। बचपन में जब हम अमरूद के पेड़ पर चढ़ते थे और मां की डांट से बचने के लिए एक ही कंबल में छुप जाते थे, उस वक्त हमारे पास कुछ नहीं था, पर हम एक-दूसरे के पास थे।”
हर साल मई के महीने में जब स्कूलों में गर्मियों की लंबी छुट्टियां होती थीं, तो आरुषि और उसका छोटा भाई चीकू अपनी मां वंदना के साथ ननिहाल जरूर जाते थे। लेकिन इस बार का सफर हर साल से बिल्कुल जुदा था। अब तक हर साल वे अपने बड़े मामा गिरधर जी के घर जाया करते थे। बड़ा ननिहाल एक बेहद सादा, पुराना खपरैल की छत और सीमेंट के आंगन वाला घर था। वहां कोई एयर कंडीशनर नहीं था, सिर्फ एक पुराना खड़खड़ाता हुआ कूलर था जिसमें दिन में दो बार बाल्टी से पानी भरना पड़ता था। वहां बड़े मामा के पास एक पुरानी स्कूटर थी और कमरों में सामान्य पंखे। लेकिन उस घर का कोना-कोना बच्चों की किलकारियों से गूंजता रहता था।
बड़े मामा के दोनों बच्चे, हर्ष और पलक, आरुषि और चीकू की उम्र के ही थे। चारों बच्चे सुबह आंख खुलते ही आंगन में गिल्ली-डंडा, लूडो और छुपन-छुपाई खेलने लगते थे। दोपहर में जब बड़ी मामी मनोरमा जी अपने हाथों से आम का पना, मट्ठे की कढ़ी और सिलबट्टे पर पिसी धनिए-पुदीने की चटनी के साथ गरम-गरम पूरियां परोसती थीं, तो चारों बच्चे एक ही थाली में छीना-झपटी करके खाते थे। शाम को छत पर पानी छिड़क कर जब बिस्तर बिछाए जाते, तो रात भर तारों की छांव में परियों और राजा-रानियों की कहानियां सुनते-सुनते कब आंख लग जाती, पता ही नहीं चलता था। जब छुट्टियों का एक महीना पूरा होने पर लौटने का दिन आता, तो चारों बच्चों की आंखों से आंसुओं की धार बह निकलती थी और बड़ी मामी पूरे रास्ते के लिए बेसन के लड्डू और मठरियों का डिब्बा बांधते हुए दरवाजे तक छोड़ने आती थीं।
लेकिन इस बार कहानी का रुख पूरी तरह बदल चुका था। इस बार आरुषि और चीकू जा रहे थे अपने छोटे मामा प्रणय और छोटी मामी संजना के यहां।
आरुषि की नजर में छोटे मामा-मामी की दुनिया किसी सपनों के महल जैसी थी। मामा प्रणय शहर के नामी न्यूरोसर्जन थे और मामी संजना एक मशहूर रेडियोलॉजिस्ट। जब भी पापा और मम्मी घर में उनकी चर्चा करते, तो आरुषि मंत्रमुग्ध होकर सुनती थी। उसने तस्वीरों में देखा था कि छोटे मामा का बंगला किसी फाइव स्टार होटल से कम नहीं दिखता था। उनके पास दो-दो विदेशी गाड़ियां थीं, घर के कमरों में बड़े-बड़े होम थिएटर लगे थे, हर कमरे में सेंट्रलाइज्ड एसी था और बगीचा इतना बड़ा था कि उसमें एक पूरा क्रिकेट मैच खेला जा सकता था। आरुषि अपने स्कूल के दोस्तों को हमेशा डींगें हांकती थी कि इस बार वह अपने डॉक्टर मामा के उस आलीशान महल में छुट्टियां बिताने जा रही है।
दरअसल, यह योजना अचानक ही बनी थी। नाना-नानी के देहांत के बाद से बड़े मामा और बड़ी मामी ही वंदना के मायके का एकमात्र सहारा थे। बड़ी मामी ने कभी अपनी ननद को मां की कमी महसूस नहीं होने दी थी। लेकिन इस बार छुट्टियों से ठीक दस दिन पहले बड़ी मामी का बेहद संकोच भरा फोन आया, “दीदी, क्षमा कीजिएगा। इस बार मेरे छोटे भाई का विवाह जबलपुर में तय हुआ है और पूरा परिवार वहीं जा रहा है। घर में ताला रहेगा, इसलिए इस बार आप लोग वहां मत आइएगा। मुझे बहुत बुरा लग रहा है कि बच्चे निराश होंगे।”
वंदना का मन थोड़ा उदास हो गया था, लेकिन तभी उसके पति आलोक जी ने हंसते हुए कहा, “अरे वंदना, इसमें उदास होने की क्या बात है? तुम्हारा छोटा भाई प्रणय भी तो उसी शहर में रहता है। वह अक्सर शिकायत करता रहता है कि जीजाजी और दीदी कभी हमारे घर नहीं आते, हमेशा बड़े भैया के यहां ही रुक जाते हैं। इस बार तुम बच्चों को लेकर प्रणय के बंगले पर हो आओ। बच्चे भी नई जगह देखकर खुश हो जाएंगे और तुम्हारा भाई से मिलना भी हो जाएगा।”
प्रणय को फोन किया गया, तो उसने फोन पर बेहद व्यस्त अंदाज में कहा, “अरे दीदी, यह भी कोई पूछने की बात है! आप बिना किसी झिझक के आइए। घर आपका ही है।” बस, आलोक जी ने वंदना और बच्चों का रिजर्वेशन करवा दिया।
आरुषि खिड़की से बाहर देखते हुए ख्यालों में खोई थी कि कैसे वह उस बंगले के बड़े से स्विमिंग पूल में नहाएगी और विदेशी चॉकलेट्स खाएगी। तभी वंदना ने उसका कंधा हिलाया, “आरुषि, चीकू… उठो बेटा, स्टेशन आ गया है।”
ट्रेन प्लेटफार्म पर रुकी। भारी सूटकेस और बैग संभालते हुए वंदना अपने दोनों बच्चों के साथ प्लेटफार्म पर उतरी। मई की तपती दोपहर में स्टेशन पर भारी भीड़ थी। वंदना की आंखें भीड़ में अपने छोटे भाई प्रणय का चेहरा तलाश रही थीं। उसे लगा था कि इतने सालों बाद दीदी आ रही है, तो प्रणय बांहें फैलाए खड़ा होगा। लेकिन दूर-दूर तक कोई अपना नजर नहीं आया।
तभी वंदना की नजर एक सफेद वर्दी पहने, सिर पर कैप लगाए ड्राइवर पर पड़ी। उसके हाथ में एक तख्ती थी, जिस पर अंग्रेजी में बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—’मिसेज वंदना शर्मा’।
वंदना हिचकिचाते हुए उस व्यक्ति के पास पहुंची, “भैया, मैं वंदना हूँ। लेकिन तुम कौन हो? प्रणय कहाँ है?”
ड्राइवर ने बहुत ही सधे हुए, भावशून्य चेहरे से सिर झुकाया और अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ कागज़ का पुर्जा निकालकर वंदना की तरफ बढ़ा दिया। उस पर्ची पर प्रणय की परिचित लिखावट में दो पंक्तियां खिंची थीं—’दीदी, अस्पताल में एक इमरजेंसी सर्जरी आ गई है, इसलिए स्टेशन नहीं आ सका। यह हमारा ड्राइवर रामू है, आप इसके साथ आराम से घर आ जाइएगा – प्रणय।’
वंदना के दिल के किसी कोने में एक हल्की सी टीस उठी। भाई अस्पताल में व्यस्त था, यह स्वाभाविक था, लेकिन स्टेशन पर किसी अपने का न होना और ड्राइवर का वह प्लेकार्ड… कुछ ऐसा था जो उसके मन को अजीब सा बेगानापन दे गया। उसने अपने मन को समझाया कि डॉक्टरों का पेशा ही ऐसा होता है।
कार में बैठकर जब वे शहर के सबसे पॉश इलाके में पहुंचे, तो आरुषि की आंखें फटी की फटी रह गईं। लोहे के विशाल ऑटोमैटिक गेट खुले और गाड़ी एक बेहद खूबसूरत, हरी-भरी घास से सजे लॉन को पार करती हुई सफेद संगमरमर की बनी दो मंजिला कोठी के सामने रुकी। वह घर सचमुच किसी महल जैसा था।
गाड़ी रुकते ही एक नौकर दौड़कर आया और उसने सूटकेस उठा लिए। वंदना ने गाड़ी से उतरते ही उत्सुकता से पूछा, “भैया, प्रणय और संजना कहाँ हैं?”
नौकर ने बहुत ही औपचारिक स्वर में उत्तर दिया, “मैम, सर तो हॉस्पिटल में ऑपरेशन थियेटर में हैं और मैम अपने डायग्नोस्टिक सेंटर पर पेशेंट्स देख रही हैं। वे दोनों दोपहर के खाने के वक्त तक आएंगे। आप आइए, मैं आपको गेस्टरूम दिखा देता हूँ।”
वह उन्हें पहली मंजिल पर बने एक शानदार कमरे में ले गया। कमरा इतना बड़ा और ठंडा था कि बाहर की चिलचिलाती गर्मी का नामोनिशान नहीं था। दीवार पर 65 इंच का अल्ट्रा-एचडी स्मार्ट टीवी लगा था, मखमली कालीन बिछे थे और बाथरूम में चमकते हुए शीशे लगे थे। कुछ ही मिनटों में एक आया ट्रे में ठंडी कोल्ड ड्रिंक्स, काजू-बादाम और बेकरी के महंगे स्नैक्स की प्लेटें सजाकर मेज पर रख गई।
आरुषि सोफे पर उछलते हुए बोली, “अरे वाह मम्मी! यह तो बिल्कुल किसी महल जैसा है। देखो कितना बड़ा टीवी है!”
चीकू ने तुरंत रिमोट उठाया और कार्टून चैनल लगा लिया। दोनों बच्चे स्क्रीन पर आंखें गड़ाए बैठ गए। लेकिन वंदना कमरे के बीचों-बीच खड़ी उस सन्नाटे को महसूस कर रही थी। न कहीं कोई खिलखिलाहट थी, न कोई अपना पूछने वाला था कि ‘दीदी, सफर कैसा रहा? थकान तो नहीं हुई?’
बड़ी भाभी के घर की याद अनायास ही वंदना के जेहन में कौंध गई। जब वे बड़े भैया के घर पहुंचते थे, तो ऑटो के रुकते ही बड़ी भाभी दौड़कर बाहर आ जाती थीं। बिना किसी औपचारिकता के वंदना को गले से लगा लेती थीं, बच्चों के माथे चूमती थीं और तुरंत रसोई से पीतल के लोटे में ठंडा पानी और गुड़ लेकर हाजिर हो जाती थीं। “अरे मेरी ननद रानी आ गई! कितनी कमजोर लग रही है, सफर में भूख लगी होगी ना?” कहते हुए वे खुद अपने हाथों से पंखा झलने लगती थीं।
यहाँ उस वातानुकूलित कमरे की ठंडक में भी वंदना का दम घुटने लगा था। उसने बच्चों को बिस्किट खिलाए, लेकिन खुद उसका एक घूंट पानी पीने का भी मन नहीं हुआ। घड़ी की सुइयां रेंग रही थीं। एक बज गया, फिर दो बज गए। बच्चे भी अब टीवी देखते-देखते ऊबने लगे थे। आरुषि ने पूछा, “मम्मी, मामा-मामी कब आएंगे? हमें तो बहुत तेज भूख लगी है।”
वंदना ने किसी तरह बच्चों को बहलाया, “बस बेटा, आते ही होंगे।”
लगभग ढाई बजे नीचे से किसी गाड़ी के हॉर्न की आवाज आई। थोड़ी देर बाद वही नौकर कमरे के दरवाजे पर आया और उसने बड़ी अदब से कहा, “मैम, डॉक्टर साहब घर आ गए हैं। वे आप लोगों को नीचे डाइनिंग हॉल में बुला रहे हैं।”
वंदना बच्चों का हाथ पकड़कर नीचे उतरी। नीचे का डाइनिंग हॉल किसी बड़े रेस्तरां जैसा सजा था। कांच की बड़ी डाइनिंग टेबल के सिरे पर प्रणय बैठा था, चेहरे पर गहरी थकान और हाथ में मोबाइल फोन था जिस पर वह कुछ टाइप कर रहा था। पास ही संजना बैठी थी, जो अपने लैपटॉप पर कुछ रिपोर्ट्स देख रही थी। दोनों ने सफेद एप्रन अभी उतारे ही थे।
“प्रणय!” वंदना की आवाज में बरसों का स्नेह छलक पड़ा।
प्रणय ने सिर उठाया, एक थकी हुई औपचारिक मुस्कान बिखेरी और कुर्सी से उठकर दीदी के कंधे पर हाथ रखा, “अरे दीदी, आ गईं आप! बहुत बढ़िया। सच कहूं तो आज इतना हेक्टिक शेड्यूल था कि सांस लेने की भी फुर्सत नहीं थी। बैठिए-बैठिए, खाना खाते हैं।”
संजना ने भी औपचारिक नमस्ते की, “नमस्ते दीदी, कैसी हैं आप? बच्चे कैसे हैं? सॉरी हम रिसीव नहीं कर पाए, असल में मेडिकल प्रोफेशन में पर्सनल लाइफ जैसी कोई चीज ही नहीं बचती।”
वंदना ने मुस्कुराकर कहा, “कोई बात नहीं संजना, हम समझते हैं।”
मेज पर खाना परोसा गया। तरह-तरह के महंगे व्यंजन, कॉन्टिनेंटल सलाद, रोस्टेड पनीर और फ्राइड राइस… सब कुछ खानसामा ने करीने से सजा रखा था। लेकिन उस विशाल मेज पर पसरा सन्नाटा किसी भारी पत्थर की तरह सीने पर चुभ रहा था। प्रणय का फोन हर दो मिनट में बज उठता था। वह चम्मच रखकर फोन कान से लगा लेता, “यस डॉक्टर, सीटी स्कैन रिपोर्ट भेजिए… आईसीयू बेड नंबर चार को मॉनिटर पर रखिए।” उधर संजना भी बीच-बीच में संदेशों के जवाब देने में व्यस्त थी।
आरुषि और चीकू सहमे हुए से प्लेट में चम्मच हिला रहे थे। वे अपने घर पर या बड़े मामा के यहाँ जितनी बेबाकी से बातें करते थे, यहाँ उस पिन-ड्रॉप साइलेंस में वे एक शब्द भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। खाना खत्म होते ही प्रणय ने नैपकिन से हाथ पोंछे और घड़ी देखते हुए बोला, “दीदी, मुझे शाम के राउंड्स के लिए साढ़े चार बजे फिर निकलना होगा। एक क्रिटिकल केस है। आप लोग आराम कीजिएगा, शाम को ड्राइवर गाड़ी लेकर तैयार रहेगा, बच्चों को किसी अच्छे मॉल या गेमिंग जोन में घुमा लाएगा।”
संजना भी उठ खड़ी हुई, “हां दीदी, मैं भी क्लिनिक जा रही हूँ। आप लोग घर को अपना ही समझिए, कोई भी जरूरत हो तो कुक से बोल दीजिएगा।”
और पंद्रह मिनट के भीतर वह आलीशान डाइनिंग हॉल फिर से श्मशान जैसा शांत हो गया। दोनों डॉक्टर अपनी-अपनी कारों में बैठकर सायरन बजाते हुए निकल गए।
शाम को ड्राइवर गाड़ी लेकर आया और बच्चों को शहर के सबसे महंगे मॉल में ले गया। आरुषि ने बड़े-बड़े झूले झूले, चीकू ने वीडियो गेम्स खेले, ड्राइवर ने उन्हें महंगी आइसक्रीम भी दिलवाई। लेकिन उस चमक-दमक के बीच आरुषि की आंखों में वह खुशी नहीं थी। लौटते वक्त उसने गाड़ी की पिछली सीट पर बैठी अपनी मां की गोद में सिर रख दिया और धीरे से बोली, “मम्मी… यहां मामा-मामी हमसे बातें क्यों नहीं करते? यहां कोई हमारे साथ खेलता क्यों नहीं? बड़ी मामी के घर तो हर्ष भैया और पलक दीदी दिन भर हमारे साथ रहते थे। बड़ी मामी हमें अपनी गोद में बिठाकर खाना खिलाती थीं। यहां तो सब कुछ बहुत ठंडा है मम्मी… मुझे बड़े मामा के घर जाना है।”
आरुषि के उन मासूम शब्दों ने वंदना के दिल को झकझोर कर रख दिया। एक नौ साल की बच्ची ने वह कड़वा सच इतनी सरलता से कह दिया था जिसे बड़े-बड़े ज्ञानी नहीं समझ पाते। वैभव, विलासिता, एयर कंडीशनर और महंगी कारों से जीवन में आराम तो खरीदा जा सकता है, लेकिन आत्मीयता, समय और प्रेम की गर्माहट कभी नहीं खरीदी जा सकती।
अगले तीन दिन भी इसी ढर्रे पर बीते। प्रणय और संजना सुबह सात बजे निकल जाते, दोपहर में आधे घंटे के लिए खाने पर औपचारिक मुलाकात होती और रात को ग्यारह बजे जब वे लौटते, तब तक बच्चे सो चुके होते थे। वंदना को महसूस हुआ कि वह अपने ही सगे भाई के घर में एक सम्मानित ‘पेइंग गेस्ट’ बनकर रह गई है, जहां सुख-सुविधाएं तो सब थीं, लेकिन अपनों का स्पर्श कहीं खो चुका था।
चौथे दिन शाम को, जब संजना का क्लिनिक थोड़ा जल्दी बंद हुआ और प्रणय भी किसी तरह साढ़े आठ बजे घर लौट आया, तो उन्होंने देखा कि ड्राइंग रूम में दोनों सूटकेस पैक होकर रखे हैं।
प्रणय हैरान रह गया, “दीदी! यह क्या? अभी तो आपको आए सिर्फ चार दिन हुए हैं। आपने तो कहा था कि पूरे दस दिन रुकेंगी। क्या किसी चीज की कमी रह गई? क्या नौकरों ने ठीक से खिदमत नहीं की? या खाना पसंद नहीं आया?”
वंदना ने आगे बढ़कर अपने छोटे भाई के सिर पर हाथ फेरा। उसकी आंखों में ममता का समंदर था, लेकिन आवाज में एक गहरी वेदना थी।
“नहीं प्रणय, मेरे भाई… तुम्हारे इस महल में किसी चीज की कोई कमी नहीं है। यहाँ की सुख-सुविधाएं तो राजाओं जैसी हैं। लेकिन प्रणय, एक बहन अपने भाई के पास उसकी दौलत देखने या उसके नौकरों से सेवा करवाने नहीं आती। वह आती है अपने बचपन को ढूंढने, अपने भाई के कंधे पर सिर रखकर दो पल सुकून से बात करने। बचपन में जब हम अमरूद के पेड़ पर चढ़ते थे और मां की डांट से बचने के लिए एक ही कंबल में छुप जाते थे, उस वक्त हमारे पास कुछ नहीं था, पर हम एक-दूसरे के पास थे।”
वंदना का गला भर आया। उसने संजना की ओर देखा और बहुत ही कोमल स्वर में कहा, “संजना, तुम दोनों समाज के लिए भगवान का रूप हो, लोगों की जानें बचाते हो। मुझे तुम दोनों की कामयाबी पर बहुत गर्व है। लेकिन इस अंधी दौड़ में, सफलता के इस ऊंचे एवरेस्ट पर चढ़ते-चढ़ते तुम दोनों यह भूल गए हो कि रिश्तों को भी सांस लेने के लिए वक्त की जरूरत होती है। आरुषि और चीकू यहाँ गेमिंग जोन और प्लाज्मा टीवी देखने नहीं आए थे, वे अपने मामा-मामी के सीने से लगकर प्यार पाने आए थे। तुमने हमें सुविधाएं तो सारी दीं, पर अपनापन देने का वक्त तुम्हारे पास नहीं था।”
वंदना की बातें किसी सीधे तीर की तरह प्रणय और संजना के अंतर्मन को भेद गईं।
प्रणय स्तब्ध खड़ा रह गया। उसने मुड़कर अपने उस विशाल, खाली बंगले को देखा। पहली बार उसे एहसास हुआ कि जिस संगमरमर के फर्श और विदेशी फर्निशिंग को वह अपनी उपलब्धि समझता था, वह असल में एक ठंडी जेल बन चुकी थी जिसमें संवेदनाएं दम तोड़ रही थीं। उसने देखा कि उसकी भांजी आरुषि सोफे के कोने में चुपचाप बैठी थी, उसके चेहरे पर वह चहक नहीं थी जो उसने तस्वीरों में बड़े भैया के घर देखी थी।
संजना की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने आगे बढ़कर वंदना के हाथ पकड़ लिए, “दीदी… हमें माफ कर दीजिए। हम सचमुच करियर, ईएमआई, बैंक बैलेंस और शोहरत की ऐसी दौड़ में दौड़ रहे थे कि हमें होश ही नहीं रहा कि हम क्या खोते जा रहे हैं। आज आपकी बातों ने हमारे कानों पर पड़ा वह पर्दा हटा दिया है जिसे हम कामयाबी का नशा समझ रहे थे।”
प्रणय की आंखें भी नम हो गईं। वह आगे बढ़ा और अपनी बड़ी दीदी के गले लगकर फफक पड़ा। बरसों बाद एक न्यूरोसर्जन का कठोर खोल टूटा था और उसके भीतर का वही छोटा भाई बाहर निकल आया था जो कभी दीदी के आंचल में छुप जाया करता था।
“दीदी… आज मत जाइए। प्लीज, एक मौका मुझे दीजिए,” प्रणय ने रोते हुए कहा, “मैं कल और परसों अपनी सारी ओपीडी और नॉन-इमरजेंसी सर्जरी अपने असिस्टेंट्स को सौंप रहा हूँ। दो दिन मैं किसी फोन को हाथ नहीं लगाऊंगा। मैं अपनी दीदी के साथ बैठकर बचपन की बातें करूँगा और अपने भांजे-भांजी को अपनी पीठ पर बिठाकर घोड़ा-घोड़ा खेलूँगा।”
संजना ने भी कहा, “हां दीदी, कल रसोई में कोई कुक खाना नहीं बनाएगा। कल हम दोनों बहनें मिलकर खाना बनाएंगी और पूरा परिवार एक साथ जमीन पर बैठकर खाएगा।”
वंदना ने देखा कि बच्चों के चेहरों पर एकाएक वैसी ही चमक लौट आई जैसी बड़े मामा के घर हुआ करती थी। उसने मुस्कुराकर अपनी सहमति में सिर हिला दिया।
अगले दो दिन उस आलीशान कोठी के इतिहास के सबसे सुनहरे दिन बन गए। प्रणय ने अपना फोन साइलेंट करके दराज में बंद कर दिया था। उसने सुबह ही आरुषि और चीकू को कंधे पर बिठाकर पूरे लॉन के चक्कर लगवाए। संजना ने अपने हाथों से बेसन का हलवा बनाया और वंदना के साथ बैठकर घंटों अपने दिल की बातें साझा कीं। दोपहर में डाइनिंग टेबल की कुर्सियां खाली पड़ी रहीं, क्योंकि ड्राइंग रूम के कालीन पर चादर बिछाकर पूरा परिवार एक साथ बैठा था। प्रणय ने बच्चों के साथ लूडो खेला, चीकू के साथ कैरम में चीटिंग की और जब आरुषि ने उसे हराया, तो उसने पूरे घर को अपनी हंसी से गुंजा दिया।
उस घर की दीवारों ने शायद पहली बार किसी सगे रिश्ते की असली धड़कन सुनी थी। संगमरमर की वह ठंडक अब पारिवारिक प्रेम की धूप से गुनगुनी हो चुकी थी।
जब दो दिन बाद वंदना और बच्चों की विदाई का समय आया, तो स्टेशन पर कोई ड्राइवर नहीं था। खुद प्रणय गाड़ी चला रहा था और संजना अगली सीट पर बैठी थी। प्लेटफार्म पर जब ट्रेन आई, तो प्रणय ने खुद अपनी दीदी और बच्चों के सूटकेस बोगी में चढ़ाए।
चलती ट्रेन की खिड़की से जब आरुषि ने हाथ हिलाया, तो प्रणय और संजना दोनों की आंखों में आंसू थे, लेकिन उनके चेहरों पर एक आत्मिक तृप्ति की मुस्कान थी। प्रणय ने खिड़की के पास आकर वंदना के हाथ थामे और कहा, “दीदी, आपने इस बंगले को सचमुच एक ‘घर’ बना दिया। अगली बार जब आप आएंगी, तो आपको यहाँ डॉक्टर प्रणय नहीं, आपका वही पुराना छोटा भाई मिलेगा।”
ट्रेन आगे बढ़ चली। वंदना ने पीछे मुड़कर देखा, उसका भाई और बहू हाथ हिला रहे थे। आरुषि ने मां का आंचल थामते हुए कहा, “मम्मी, छोटे मामा और छोटी मामी दुनिया के सबसे अच्छे मामा-मामी हैं!”
वंदना ने मुस्कुराते हुए बेटी को गले से लगा लिया। उसे समझ आ गया था कि जिंदगी में सुख-साधनों की चमक चाहे कितनी भी हो, लेकिन रिश्तों का असली सौंदर्य केवल और केवल उस समय, स्नेह और अपनेपन में बसता है जो हम एक-दूसरे को देते हैं।
एक विचार आपके लिए: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर काम, करियर और पैसे कमाने की होड़ में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपने ही खून के रिश्तों को ‘समय’ देना भूल जाते हैं। हम महंगे उपहार और सुख-सुविधाएं देकर यह मान लेते हैं कि हमने अपना फर्ज पूरा कर दिया, जबकि हमारे अपने केवल हमारा थोड़ा सा वक्त और दिल से निकला अपनापन चाहते हैं। क्या आपको भी लगता है कि आधुनिक सुख-सुविधाओं ने हमारे संयुक्त परिवारों की उस आत्मीय गर्माहट को छीन लिया है? इस विषय पर आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपने अनमोल विचार जरूर साझा करें।
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