हरिहर जी ने अपनी कांपती हुई उंगलियों से एक रेशमी लिफाफा निकाला। उस लिफाफे में पच्चीस लाख रुपये का ड्राफ्ट और गहनों की सूची थी। उन्होंने वह लिफाफा विश्वनाथ जी के हाथों में सौंपते हुए हाथ जोड़कर कहा, “समधी जी, यह हमारी तरफ से बेटी के सुखद भविष्य और आपकी मान-मर्यादा के लिए एक छोटी सी भेंट है। मेरी बेटी अब आपकी अमानत है, कोई भूल-चूक हो तो क्षमा कीजिएगा।”
घर के मुखिया विश्वनाथ चौबे अपनी पसंदीदा आरामकुर्सी पर बैठकर हाथ में चाय की चुस्की ले रहे थे और उनके चेहरे पर एक ऐसी तृप्ति भरी चमक थी जो केवल उन पिताओं के चेहरे पर दिखती है जिनके बच्चे कामयाबी की बुलंदियों को छू रहे हों। उनके इकलौते बेटे प्रणव ने देश के शीर्ष प्रबंधन संस्थान से एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद शहर की एक बहुराष्ट्रीय टेक कंपनी में सीनियर कंसल्टेंट का पद हासिल कर लिया था। उसका वार्षिक पैकेज इतना शानदार था कि सुनते ही नाते-रिश्तेदारों की आँखें फैल जाती थीं।
जैसे ही यह खबर फैली, विश्वनाथ जी के फोन की घंटी बजनी बंद नहीं हो रही थी। दूर-दराज के रिश्तेदारों, बिरादरी के प्रतिष्ठित लोगों और अगुआकारों का तांता लग गया। हर कोई अपने हाथ में किसी न किसी संभ्रांत परिवार की पढ़ी-लिखी और सुंदर लड़की की तस्वीर लिए दौड़ा चला आ रहा था। कोई उद्योगपति पिता अपनी बेटी के साथ लग्जरी कार और करोड़ों के जेवरात देने की बात कर रहा था, तो कोई शहर के नामी बिल्डर अपने फ्लैट की चाबी उपहार में देने की पेशकश कर रहे थे।
विश्वनाथ जी का सीना गर्व से चौड़ा हो रहा था। वे अपने पुराने दोस्तों के बीच बैठकर अक्सर कहा करते थे, “भाई, बेटे को पढ़ाने-लिखाने में अपनी जिंदगी की सारी कमाई झोंक दी है। अब जब बेटा हीरा बना है, तो उसके ब्याह में भी तो खानदान की शान दिखनी चाहिए। बिरादरी देखेगी कि विश्वनाथ चौबे के बेटे का ब्याह कैसे होता है।”
उसी शाम जब घर में तीन अलग-अलग परिवारों से आए रिश्तों की चर्चा हो रही थी, तभी प्रणव दफ्तर से लौटा। उसने पिता के चेहरे पर सजे वो झूठे दर्प के भाव देखे और मेज पर बिखरी हुई तस्वीरें भी। विश्वनाथ जी ने बड़े उत्साह से एक तस्वीर उठाते हुए कहा, “देख प्रणव, यह रीवा के सबसे बड़े ठेकेदार साहब की बेटी है। बीएड किया हुआ है और पिता का कहना है कि विवाह में वे जो कुछ देंगे, हमारी सात पीढ़ियों ने नहीं देखा होगा। पचास लाख नकद, बड़ी गाड़ी और शहर के मुख्य इलाके में एक व्यावसायिक भूखंड।”
प्रणव ने शांत भाव से वह तस्वीर मेज पर वापस रख दी। उसने अपने चश्मे को ठीक किया और बहुत सहज, गंभीर आवाज में बोला, “पापा, मुझे गाड़ी या वो पचास लाख नहीं चाहिए। मैं बिना किसी लेन-देन और बिना एक रुपये के दहेज के विवाह करूंगा।”
कमरे में मानो सन्नाटा पसर गया। विश्वनाथ जी के हाथ से चाय की प्याली छूटते-छूटते बची। उनका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा, “क्या बकवास कर रहा है प्रणव? दिमाग ठिकाने है तेरा? चार किताबें ज्यादा क्या पढ़ लीं, खुद को जमाने से अलग समझने लगा है? बिना पैसे के ब्याह? लोग क्या कहेंगे? बिरादरी में मेरी क्या नाक रह जाएगी? सब यही समझेंगे कि लड़के में ही कोई खोट है, तभी तो बिना किसी मान-दान के ब्याह कर दिया। हमारे खानदान की एक परंपरा रही है, रीति-रिवाज रहे हैं। ब्याह बिरादरी के कायदे से ही होगा और मैं तय करूंगा कि क्या लेना है।”
“लेकिन पापा, यह परंपरा नहीं, सौदेबाजी है,” प्रणव ने दृढ़ता से अपनी बात रखी। “मैंने अपनी मेहनत से पढ़ाई की, अपनी काबिलियत से नौकरी पाई है। मैं किसी के घर की लक्ष्मी को अपने घर लाऊंगा, कोई सामान खरीद कर नहीं ला रहा कि साथ में वारंटी और बिल का भुगतान मांगूं। यह मेरा अंतिम फैसला है, मैं किसी से एक पैसा भी नहीं लूंगा। अगर आपको मेरी यह बात मंजूर नहीं, तो मैं विवाह ही नहीं करूंगा।”
पिता और पुत्र के बीच विचारों की यह खाई उस दिन से गहरी होने लगी। एक तरफ विश्वनाथ जी की तथाकथित सामाजिक प्रतिष्ठा थी, तो दूसरी तरफ प्रणव का अटूट स्वाभिमान और आधुनिक सोच।
दिन बीतते गए और महीनों में बदल गए। प्रणव अपनी नौकरी में लगातार तरक्की करता रहा। उसने बैंक से किसी तरह का अनुचित कर्ज लिए बिना, अपनी बचत और मासिक वेतन से अरेरा हिल्स के पास एक बहुत ही खूबसूरत तीन कमरों का फ्लैट बुक कराया। अगले डेढ़ सालों में उसने अपने ही पैसों से उस घर का इंटीरियर करवाया, आधुनिक फर्नीचर लगवाया और उसे एक सपनों के आशियाने की तरह सजा दिया।
विश्वनाथ जी जब भी उस नए घर को देखते, तो उनका मन भीतर ही भीतर कुढ़ता। वे अपनी पत्नी उमा जी से बड़बड़ाते, “लड़का पागल हो गया है। अपना गाढ़ा पसीना बहाकर घर की एक-एक चीज जुटा रहा है। अरे, अगर किसी अच्छे घराने में ब्याह कर लेता, तो लड़की वाले खुद अपने हाथों से पूरा घर सजाकर देते, सोने-चांदी के बर्तनों से लेकर हर सुख-सुविधा का सामान गाड़ी में भरकर भेजते। पर इसे तो अपनी जिद के आगे किसी की परवाह ही नहीं।”
घर के इस तनावपूर्ण माहौल से उमा जी सबसे ज्यादा परेशान थीं। पति की रूढ़िवादी सोच और बेटे के अडिग उसूलों के बीच वे लगातार पिस रही थीं। प्रणव अब सत्ताईस का हो चुका था और विवाह की उम्र निकलती जा रही थी। एक रात जब प्रणव अपने कमरे में लैपटॉप पर काम कर रहा था, उमा जी चुपके से उसके कमरे में आईं और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बैठ गईं।
“प्रणव बेटा, एक बात सच-सच बता,” माँ ने बड़े संकोच से पूछा, “क्या तेरे मन में कोई और है? किसी लड़की को पसंद करता है क्या कॉलेज या ऑफिस में? अगर ऐसी कोई बात है तो खुलकर बता दे, मैं तेरे पापा को मना लूंगी। इस तरह ब्याह के नाम पर घर में महाभारत मत मचा।”
प्रणव मुस्कुराया और माँ का हाथ अपने हाथों में लेकर बोला, “नहीं माँ, मेरी जिंदगी में ऐसा कोई नहीं है। अगर ऐसा कुछ होता तो मैं आपसे सबसे पहले कहता। मेरी बस इतनी सी इच्छा है कि मेरे विवाह में व्यापार न हो। आप और पापा जिसे भी चुनेंगे, मैं उसी से खुशी-खुशी ब्याह करूंगा। लड़की चाहे किसी साधारण परिवार की हो या अमीर परिवार की, बस सुशिक्षित और समझदार होनी चाहिए। मुझे सिर्फ एक जीवनसंगिनी चाहिए, उसके पिता की दौलत नहीं।”
उमा जी ने ठंडी सांस भरी, “लेकिन बेटा, तू समझता क्यों नहीं? दुनिया बड़ी बेरहम है। अगर हम कुछ मांगेंगे नहीं, तो लोग समझेंगे कि हमारी कोई हैसियत नहीं है। और फिर अगर बिना लेन-देन के शादी होगी, तो अच्छे और संपन्न घरों के लोग तो अपनी बराबरी वालों में ही मान-मर्यादा देखकर रिश्ते करते हैं। तू पापा की बात मान ले, समाज में चार लोग क्या कहेंगे, इसका भी तो ध्यान रखना पड़ता है।”
“माँ, समाज चार बातें तभी करता है जब हम उसकी गलत रीतियों के आगे झुकते हैं,” प्रणव ने कहा। “आप पापा से कह दीजिए कि लड़की वे अपनी पसंद की ही ढूंढें, अपनी पूरी बराबरी के खानदान में ढूंढें। लेकिन मेरी शर्त बस एक ही रहेगी—सामने वाले परिवार से कोई दहेज, कोई उपहार या नकद राशि की मांग नहीं की जाएगी। यदि वे अपनी मर्जी से कोई टीका या रस्म के नाम पर राशि देंगे भी, तो उसे घर के किसी काम या शादी के खर्चे में नहीं छुआ जाएगा।”
उमा जी ने जाकर यह बात विश्वनाथ जी को समझाई। काफी सोच-विचार और बेटे के हठी स्वभाव को देखते हुए विश्वनाथ जी ने मन ही मन एक योजना बनाई और ऊपर से हामी भर दी। उन्होंने सोचा, “एक बार रिश्ता तो तय हो जाने दो, मंडप तक बात पहुंचेगी तो सब अपने आप संभल जाएगा। बिरादरी के सामने कौन पिता अपनी बेटी को खाली हाथ विदा करता है।”
कुछ ही महीनों में विश्वनाथ जी ने अपने ही बराबर के एक प्रतिष्ठित शिक्षक और समाजसेवक पंडित हरिहर शर्मा जी के परिवार में रिश्ता तय कर लिया। हरिहर जी जबलपुर के एक जाने-माने और सम्मानित व्यक्ति थे। उनकी सुपुत्री सौम्या ने अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर किया था और एक निजी कॉलेज में व्याख्याता के रूप में कार्यरत थीं। सौम्या न केवल रूपवती थीं, बल्कि बेहद संस्कारी और विचारवान युवती थीं। दोनों परिवारों की मुलाकात हुई, कुंडली और विचार मिले और विवाह की तारीख तय हो गई।
सगाई और विवाह की तैयारियां बड़े धूमधाम से शुरू हो गईं। विश्वनाथ जी ने बिरादरी में अपनी प्रतिष्ठा का ढिंढोरा पीटने के लिए शहर के सबसे महंगे मैरिज गार्डन को बुक किया। रिश्तेदारों को न्योते भेजे गए। हालांकि, हरिहर जी ने बातचीत के दौरान ही कहा था कि वे अपनी सामर्थ्य के अनुसार बेटी के लिए सब कुछ करेंगे। विश्वनाथ जी ने उनके कान में धीरे से कह दिया था, “शर्मा जी, लड़का तो आज के जमाने का है, कहता है कुछ नहीं चाहिए। लेकिन आप तो समझदार हैं, समाज में हमारे भी कुछ नाते-रिश्तेदार हैं, जो रीत-रिवाज होता है वह तो आपको अपने हिसाब से निभाना ही पड़ेगा।”
हरिहर जी एक स्वाभिमानी पिता थे। वे नहीं चाहते थे कि ससुराल में उनकी बेटी को किसी ताने का सामना करना पड़े। उन्होंने अपनी जीवन भर की जमा पूंजी, प्रोविडेंट फंड का बड़ा हिस्सा और कुछ पैतृक जमीन बेचकर पच्चीस लाख रुपये का एक डिमांड ड्राफ्ट तैयार करवाया और साथ ही लाखों के सोने के आभूषण बनवाए।
विवाह का दिन आ गया। बारात पूरे ठाठ-बाट के साथ मैरिज गार्डन पहुंची। शहनाई की मधुर धुन गूंज रही थी, फूलों की महक से पूरा प्रांगण सराबोर था। द्वारपूजा और जयमाला का कार्यक्रम बहुत ही उल्लासपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ। इसके बाद जब विवाह के मुख्य संस्कार के लिए लग्न मंडप की वेदी सजी, तो पंडित जी ने कन्यादान और तिलक की रस्म के लिए दोनों पक्षों के मुख्य लोगों को बुलाया।
मंडप में एक तरफ विश्वनाथ जी अपने खास रिश्तेदारों के साथ बैठे थे और दूसरी तरफ हरिहर जी अपने भाइयों के साथ। चारों तरफ बिरादरी के सैकड़ों गणमान्य नागरिक, रिश्तेदार और मित्रगण उपस्थित थे।
पंडित जी ने जब वर-सत्कार का मंत्र पढ़ा, तो हरिहर जी ने अपनी कांपती हुई उंगलियों से एक रेशमी लिफाफा निकाला। उस लिफाफे में पच्चीस लाख रुपये का ड्राफ्ट और गहनों की सूची थी। उन्होंने वह लिफाफा विश्वनाथ जी के हाथों में सौंपते हुए हाथ जोड़कर कहा, “समधी जी, यह हमारी तरफ से बेटी के सुखद भविष्य और आपकी मान-मर्यादा के लिए एक छोटी सी भेंट है। मेरी बेटी अब आपकी अमानत है, कोई भूल-चूक हो तो क्षमा कीजिएगा।”
विश्वनाथ जी की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने मुस्कुराते हुए उस लिफाफे को अपनी जेब में रखने की कोशिश की, जैसे उन्होंने कोई बड़ा किला फतह कर लिया हो। वे मन ही मन सोच रहे थे कि समाज के सामने उनकी पगड़ी का मान रह गया।
लेकिन ठीक उसी क्षण, प्रणव जो मंडप में अपनी शेरवानी की सिलवटें ठीक कर रहा था, उठ खड़ा हुआ। उसने बहुत ही आदरपूर्वक अपने पिता के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “पापा, जरा वह लिफाफा मुझे दीजिए।”
विश्वनाथ जी सकपका गए। उन्हें लगा कि प्रणव शायद उसे अपने पास रखना चाहता है। उन्होंने मुस्कुराते हुए वह लिफाफा प्रणव के हाथ में थमा दिया।
प्रणव ने लिफाफा हाथ में लिया और फिर वेदी की परिक्रमा करते हुए सीधे अपने होने वाले ससुर हरिहर जी के सामने जाकर खड़ा हो गया। उसने भरी सभा के सामने झुककर हरिहर जी के दोनों हाथ थामे और वह रेशमी लिफाफा उनके हाथों में वापस रख दिया।
पूरे मंडप में अचानक सन्नाटा छा गया। शहनाई वादक ने भी अपनी धुन रोक दी। कानाफूसी शुरू हो गई।
हरिहर जी का चेहरा डर और आशंका से पीला पड़ गया। उनके हाथ थरथराने लगे। उन्हें लगा कि शायद लड़के वालों को यह रकम कम लगी है या विवाह में कोई बहुत बड़ी गलती हो गई है। उनकी आँखों से आंसू छलक पड़े। उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा, “बेटा प्रणव… यह क्या कर रहे हो? क्या हमसे कोई भूल हो गई? क्या खातिरदारी में कोई कमी रह गई? इस तरह भरे समाज में, सैकड़ों रिश्तेदारों के सामने हमारा अपमान मत करो बेटा। मेरी पगड़ी आपके पैरों में है। अगर कोई कमी रह गई हो तो मैं हाथ जोड़कर क्षमा मांगता हूँ, लेकिन इस तरह ऐन वक्त पर विवाह से इनकार मत करो। मेरी बेटी की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी।”
सौम्या की माँ भी रोने लगीं और वहां खड़े रिश्तेदार तरह-तरह की बातें बनाने लगे। विश्वनाथ जी गुस्से से कांपने लगे, उनकी आँखें लाल हो गईं। वे चिल्लाकर बोले, “प्रणव! होश में आ! यह क्या तमाशा बना रखा है? पूरे खानदान की नाक कटवाएगा क्या?”
प्रणव विचलित नहीं हुआ। उसने बहुत ही शालीनता और विनम्रता से हरिहर जी के दोनों हाथ पकड़कर उन्हें सीधा खड़ा किया और खुद झुककर उनके चरण स्पर्श किए। फिर उसने अपनी आवाज को इतना बुलंद किया कि मंडप में बैठे अंतिम व्यक्ति तक उसकी बात स्पष्ट पहुंचे।
“बाबूजी, आप गलत समझ रहे हैं,” प्रणव ने बेहद कोमल स्वर में कहा। “मैं कोई अपमान नहीं कर रहा और न ही इस पवित्र विवाह से पीछे हट रहा हूँ। सौम्या जी से विवाह करना मेरे लिए गर्व की बात है। लेकिन यह लिफाफा मैं स्वीकार नहीं कर सकता।”
हरिहर जी ने विस्मय से देखा, “लेकिन बेटा, यह तो रीत है…”
“नहीं बाबूजी, यह रीत नहीं, एक कुरीति है,” प्रणव ने सभा की ओर देखते हुए कहा। “मेरे पिताजी चाहते थे कि उनका बेटा बिरादरी के सबसे प्रतिष्ठित घराने में ब्याहे और बिरादरी देखे कि उनकी कितनी इज्जत है। उनकी वह इच्छा आज पूरी हो गई, क्योंकि उन्होंने आप जैसे भले, शिक्षित और सम्मानित परिवार से मेरा नाता जोड़ा। लेकिन मेरी भी एक जिद थी। मैंने अपनी पढ़ाई अपनी मेहनत से की है, मैं हर महीने लाखों कमाता हूँ। ईश्वर की कृपा से मेरे पास घर है, गाड़ी है और अपने परिवार को हर सुख देने का सामर्थ्य है। फिर मैं आपकी जीवन भर की गाढ़ी कमाई का यह हिस्सा किस हक से लूं?”
प्रणव ने आगे कहा, “पापा की जिद थी कि रिश्ता आपकी बराबरी में हो और मेरी जिद थी कि इस रिश्ते में पैसे का कोई लेन-देन न हो। आज दोनों की जिद पूरी हो गई। बाबूजी, आपने अपनी जिस लाडली को इतने प्यार से पाला, पढ़ाया-लिखाया और आज मुझे सौंप रहे हैं, उसका कोई मोल दुनिया की कोई दौलत नहीं चुका सकती। मुझे आपकी बेटी एक जीवनसाथी, एक मित्र के रूप में चाहिए, किसी सौदे के रूप में नहीं। इस लिफाफे में आपकी वर्षों की मेहनत और त्याग है, इस पर केवल आपका और आपकी बेटी के आत्मसम्मान का हक है। यदि आप मुझे सचमुच कुछ देना चाहते हैं, तो बस अपना आशीर्वाद दीजिए कि मैं सौम्या को जीवन भर वही सम्मान और खुशी दे सकूं जो उसे आपके घर में मिली है।”
प्रणव के एक-एक शब्द में इतनी सच्चाई, शालीनता और वजन था कि मंडप में उपस्थित हर व्यक्ति की आँखें नम हो गईं।
हरिहर जी ने अवाक होकर उस युवक को देखा। उनका सीना गर्व से भर गया। उन्होंने आगे बढ़कर प्रणव को अपने सीने से लगा लिया और फफक पड़े, “बेटा, आज तुमने कन्यादान का सही अर्थ मुझे समझा दिया। मेरी बेटी सचमुच बहुत भाग्यशाली है जिसे तुम जैसा जीवनसाथी मिला। आज तुमने मुझे एक पिता के रूप में दुनिया का सबसे सम्मानित और धनी इंसान बना दिया।”
सौम्या ने अपने घूंघट की ओट से जब यह दृश्य देखा, तो उसके नयनों से बहते आंसू उसकी मुस्कान में बदल गए। उसके मन में अपने होने वाले पति के लिए अगाध श्रद्धा और प्रेम का दीपक जल उठा।
उधर, विश्वनाथ जी जो कुछ देर पहले तक अपमान की ज्वाला में जल रहे थे और सोच रहे थे कि उनकी इज्जत मिट्टी में मिल गई, उन्होंने अचानक वातावरण का रुख बदलते देखा। मंडप में बैठे शहर के गणमान्य लोग, जज, प्रोफेसर और व्यापारी खड़े होकर तालियां बजाने लगे। हर कोई विश्वनाथ जी के पास आकर उनके हाथ मिलाने लगा।
एक बुजुर्ग रिश्तेदार ने विश्वनाथ जी की पीठ थपथपाते हुए कहा, “चौबे जी, धन्य हैं आप! आपने बेटे को केवल डिग्रियां नहीं दीं, बल्कि ऐसे उच्च संस्कार दिए हैं जो आज के युग में दुर्लभ हैं। आज आपके बेटे ने इस पूरे समाज का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। आज आपकी जितनी इज्जत इस भरी सभा में बढ़ी है, उतनी करोड़ों रुपये का दहेज लेकर भी कभी नहीं बढ़ती। आप सचमुच एक महान बेटे के पिता हैं।”
चारों तरफ से हो रही प्रशंसा और सम्मान की इस गूंज ने विश्वनाथ जी के अंतर्मन के सारे जाले साफ कर दिए। उनका मिथ्या अहंकार गलकर बह गया। उन्होंने महसूस किया कि जो सम्मान वे पैसे की थैली में खोज रहे थे, वह तो उनके बेटे के विचारों की महानता ने चुटकियों में उनके कदमों में लाकर रख दिया था।
विश्वनाथ जी की आँखों से पश्चाताप और गर्व के मिले-जुले आंसू बह निकले। वे आगे बढ़े और उन्होंने अपने बेटे प्रणव के सिर पर हाथ रख दिया। फिर हरिहर जी से बोले, “शर्मा जी, मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं दुनियादारी के दिखावे में अंधा हो गया था। आज मेरे बच्चे ने मुझे सिखा दिया कि खानदान की असली नाक पैसे के लेन-देन से नहीं, बल्कि विचारों की गरिमा और संस्कारों की ऊंचाई से ऊंची होती है। हमें सिर्फ आपकी सुलक्षणा बेटी चाहिए, और कुछ नहीं।”
पंडित जी ने हर्षोल्लास के साथ शंखनाद किया और विवाह के फेरे पूरे हुए। उस रात अरेरा कॉलोनी के उस मंडप से केवल एक डोली ही विदा नहीं हुई थी, बल्कि समाज की एक सड़ी-गली कुप्रथा पर एक सशक्त प्रहार भी हुआ था।
दोस्तों, दहेज समाज के माथे पर एक ऐसा कलंक है जो न जाने कितने पिताओं की रीढ़ तोड़ देता है और कितनी बेटियों के स्वाभिमान को कुचलता है। इस कहानी में प्रणव ने यह साबित कर दिया कि असली मर्द वह नहीं जो अपनी पढ़ाई और नौकरी की कीमत ससुराल से वसूले, बल्कि वह है जो अपने दम पर अपना संसार बसाए और स्त्री के मान-सम्मान की रक्षा करे। आपकी नजर में एक बेटे और एक पिता का असली कर्तव्य क्या होना चाहिए? क्या आज के हर शिक्षित युवा को प्रणव की तरह यह कदम नहीं उठाना चाहिए? अपनी राय और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : रश्मि झा मिश्रा