तान्या की आँखें भी भीग चुकी थीं। उसने अपनी माँ का हाथ थामते हुए रुंधे गले से कहा, “हाँ माँ, आप बिल्कुल सच कह रही हैं। मैंने भी भाभी के साथ बहुत ज़्यादती की है। हर बात में उनका मज़ाक उड़ाया, उन्हें नीचा दिखाया। पर जब मेरी ज़िंदगी का सबसे बुरा दौर था, तब सिर्फ उन्होंने ही मुझे उस दलदल से बचाया था। ऐसी भाभी तो सचमुच पिछले जन्मों के पुण्यों से मिलती है।”
दरवाज़े के बाहर खड़ी प्रज्ञा की आँखों से आँसुओं की मूसलाधार बारिश बहने लगी। उसके सारे त्याग, सारी रात की थकान, सारे अनकहे दर्द एक पल में धुल गए। आज उसे लगा कि उसके धैर्य और संस्कारों की जीत हुई है। उसने आज उस कठोर दिल सास का प्यार और सम्मान जीत लिया था।
दूसरी मंजिल के कमरे से कुछ गिरने और कराहने की धीमी सी आवाज़ आई। नीचे रसोई में दाल में तड़का लगा रही प्रज्ञा के हाथ वहीं रुक गए। उसने गैस धीमी की और दुपट्टा संभालते हुए सीढ़ियों की तरफ दौड़ी। ऊपर वाले कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। भीतर का दृश्य देखकर प्रज्ञा की साँसें जैसे गले में ही अटक गईं।
परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य, पचासी वर्षीय बाबा बद्रीप्रसाद जी बिस्तर के नीचे फर्श पर अचेत पड़े थे। उनका शरीर शिथिल था और होंठ हल्के नीले पड़ रहे थे। उस वक्त घर में प्रज्ञा के अलावा कोई दूसरा इंसान नहीं था। एक पल के लिए घबराहट की तेज़ लहर उसके पूरे वजूद में दौड़ गई। हाथ-पाँव कांपने लगे कि हे भगवान, इस हाल में अकेले कैसे संभालूँगी? सासू माँ और जेठानी शहर से बाहर रिश्तेदारी में गई हैं, पति मयंक भी अपनी फैक्ट्री में हैं। अगर बाबा को कुछ हो गया तो सारा दोष उसी के सिर मढ़ दिया जाएगा।
तभी प्रज्ञा के कानों में अपनी माँ की वह पुरानी सीख गूंज उठी जो विदाई के समय उन्होंने दी थी—”बेटी, जब घर के बड़े-बुजुर्ग असहाय हो जाएँ, तो वे किसी नन्हे बच्चे की तरह होते हैं। उनकी सेवा में कभी झिझक या डर मत रखना, ईश्वर अपने आप बल देता है।”
माँ की यह बात याद आते ही प्रज्ञा ने अपने सारे संकोच और भय को एक किनारे झटक दिया। वह तुरंत फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई। उसने बेहद सावधानी से बाबा का सिर अपनी गोद में रखा और उनके गालों को थपथपाया, “बाबा जी! सुनिए, आँखें खोलिए बाबा जी!” लेकिन कोई हरकत नहीं हुई। उनका शरीर काफी भारी था, पर न जाने उस नाज़ुक सी दिखने वाली बहू में उस पल कहाँ से इतनी हिम्मत और ताकत आ गई। उसने बड़ी मशक्कत से बाबा को सहारा देकर फर्श से उठाया और धीरे-धीरे खींचते हुए बिस्तर पर लिटाया। उनके पसीने से भीगे कपड़े बदले, तकिया ठीक किया और तुरंत अपने फोन से कॉलोनी के फैमिली डॉक्टर माथुर को कॉल मिलाया।
डॉक्टर साहब पास ही रहते थे, वे पंद्रह मिनट में आ पहुँचे। उन्होंने तुरंत बाबा की नब्ज़ जाँची, बीपी चेक किया और एक इंजेक्शन लगाया।
“घबराने की बात नहीं है बहू बेटा,” डॉक्टर माथुर ने स्टेथोस्कोप समेटते हुए राहत भरी सांस ली, “अचानक ब्लड प्रेशर बहुत ज्यादा गिर गया था और डिहाइड्रेशन की वजह से इन्हें चक्कर आ गया। अगर तुमने दस-पंद्रह मिनट और देर कर दी होती या इन्हें उठाने में हड़बड़ाहट दिखाई होती, तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती थी। तुमने बिल्कुल सही समय पर संभाला और मुझे बुला लिया। मैंने बीपी सामान्य करने की दवा दे दी है, शाम तक होश पूरी तरह आ जाएगा। ये पर्चा लो और मेडिकल स्टोर से दवाइयां मँगवाकर हर चार घंटे पर एक चम्मच पानी के साथ दे देना।”
डॉक्टर के जाने के तुरंत बाद प्रज्ञा ने नुक्कड़ वाले मेडिकल स्टोर पर फोन करके दवाइयां घर मँगवाईं। जब तक दवाइयां आईं, उसने रसोई में जाकर बाबा के लिए हल्का दलिया और गुनगुना पानी तैयार किया। दवा देकर जब उसने देखा कि बाबा गहरी और शांत नींद में सो गए हैं, तब जाकर प्रज्ञा की जान में जान आई। उसने दीवार पर टंगी ठाकुर जी की तस्वीर के आगे हाथ जोड़े और फिर अपने पसीने से भीगे माथे को पोंछते हुए घर के बाकी अधूरे पड़े कामों को पूरा करने के लिए नीचे चल पड़ी।
प्रज्ञा की शादी को अभी मुश्किल से डेढ़ साल ही हुआ था। वह एक बहुत ही साधारण, सीमित आय वाले शिक्षक परिवार की संस्कारी बेटी थी। दूसरी तरफ मयंक का परिवार शहर के बड़े रईस और प्रतिष्ठित घरानों में गिना जाता था। मयंक ने एक पारिवारिक समारोह में प्रज्ञा की सादगी, सहज सुंदरता और विनम्र स्वभाव को देखा था और उसी क्षण तय कर लिया था कि वह जीवनसंगिनी इसी लड़की को बनाएगा।
घर के मुखिया पिता सरकारी वन विभाग में उच्च पद पर कार्यरत होने के कारण ज्यादातर बाहर फील्ड पोस्टिंग पर ही रहते थे और महीने में एक-दो बार ही घर आ पाते थे। घर में मयंक, उसकी छोटी बहन तान्या, बूढ़े बाबा और सबसे ऊपर थीं घर की स्वामिनी—सासू माँ मनोरमा देवी।
मनोरमा देवी अपने नाम के बिल्कुल विपरीत बेहद कठोर, दबंग और तुनकमिज़ाज स्वभाव की महिला थीं। खानदान और समाज में उनका ऐसा रुतबा था कि उनके फैसले के आगे कोई चूँ तक नहीं कर सकता था। बेटे मयंक की ज़िद के आगे उन्होंने बेमन से यह शादी तो स्वीकार कर ली थी, लेकिन एक मध्यमवर्गीय परिवार की बहू को वे दिल से कभी अपना नहीं पाई थीं।
शादी के अगले ही दिन, जब प्रज्ञा अपनी पहली रसोई की रस्म के लिए सुबह पाँच बजे नहा-धोकर घूंघट काढ़े रसोई में पहुँची थी, तब मनोरमा देवी ने वहीं खड़े होकर सख्त लहजे में सीमाएं तय कर दी थीं। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा था, “देखो बहू, यह कोई आम घराना नहीं है। यहाँ की हर ईंट मेरे नियमों से बंधी है। अपनी पुरानी आदतों और अपनी मर्जी को अपने मायके की दहलीज पर ही छोड़ आई हो तो बेहतर है। यहाँ पत्ता भी मेरी इजाज़त के बिना नहीं हिलेगा। तुम सिर्फ इस घर की सेवा और मान-मर्यादा संभालने आई हो, मालकिन बनने की गलतफहमी अपने दिमाग में मत पालना।”
उन तीखे शब्दों ने उस दिन प्रज्ञा के मासूम दिल को भीतर तक छलनी कर दिया था। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई सास अपनी नई-नवेली बहू से पहले ही दिन इस तरह बात कर सकती है। पर उसने अपनी माँ के संस्कारों का दामन नहीं छोड़ा। माँ ने विदा करते समय यही तो समझाया था कि ‘बेटी, ससुराल में अपने व्यवहार, धैर्य और सेवा से सबके दिलों में जगह बनाना।’ इसलिए प्रज्ञा सिर झुकाकर चुप रही।
पति मयंक ने भी रात में एकांत मिलने पर प्रज्ञा को धीरे से समझा दिया था, “प्रज्ञा, माँ का स्वभाव थोड़ा कड़क और अधिकार जताने वाला है। उन्हें अपनी बात के आगे किसी की दलील सुनना पसंद नहीं। तुम उनकी बातों को दिल पर मत लगाना, बस वही करना जो वो कहें।” प्रज्ञा ने मुस्कुराकर सहमति में सिर हिला दिया था, लेकिन मन ही मन एक कसक उठती थी कि क्या बहू का अपना कोई वजूद, कोई भावना नहीं होती?
घर में सिर्फ सास ही नहीं, बल्कि ननद तान्या का बर्ताव भी प्रज्ञा के प्रति कभी सहज नहीं रहा। तान्या शहर के एक बड़े प्राइवेट कॉलेज में पढ़ती थी और पूरी तरह अपनी माँ के मिज़ाज पर गई थी। खुद को मॉडर्न और रईस समझने वाली तान्या हर बात में भाभी की सादगी का उपहास उड़ाती। कभी दाल में नमक कम होने पर माँ से शिकायत करना, तो कभी प्रज्ञा की पहनी हुई साड़ियों की पसंद पर तंज कसना उसका रोज़ का नियम बन गया था।
सुबह पाँच बजे से लेकर रात के ग्यारह बजे तक प्रज्ञा घर में बिना थके कोल्हू के बैल की तरह जुटी रहती। सुबह की चाय, नाश्ता, बाबा के नहलाने-धोने से लेकर उनके खाने का समय, दोपहर का भोजन, कपड़े, शाम का नाश्ता और फिर रात का खाना—सब कुछ प्रज्ञा की उंगलियों पर रहता। इसके बावजूद मनोरमा देवी के चेहरे पर कभी संतोष का भाव नहीं दिखता था। तान्या ज़रा सा सिरदर्द का बहाना बना देती तो माँ उसकी तीमारदारी में लग जातीं, लेकिन प्रज्ञा कभी तेज़ बुखार में भी काम करती रहती तो किसी की ज़ुबान से यह नहीं निकलता था कि ‘बहू, थोड़ी देर आराम कर लो।’ प्रज्ञा को अक्सर लगता कि इस विशाल हवेली में वह केवल एक बिन वेतन की नौकरानी बनकर रह गई है, जिसे कोई अपना नहीं समझता।
लेकिन प्रज्ञा के जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब घर पर एक भारी संकट के बादल मंडराने लगे।
एक दिन घर की कामवाली बाई रुक्मिणी ने बर्तन साफ़ करते हुए प्रज्ञा को एक बेहद चौंकाने वाली बात बताई। रुक्मिणी ने फुसफुसाते हुए कहा, “छोटी भाभी, एक बात आपसे कहनी है। आप दीदी जी (तान्या) पर थोड़ा ध्यान रखिए। पिछले कुछ दिनों से मैं देख रही हूँ कि मोहल्ले के नुक्कड़ पर एक अजीब सा लड़का रोज़ गाड़ी लेकर खड़ा रहता है। कल दोपहर जब बड़ी मालकिन सो रही थीं, तब दीदी जी पिछले दरवाज़े पर उससे बातें कर रही थीं। वो लड़का कह रहा था कि बैग तैयार रखना, हम रात को भाग निकलेंगे।”
प्रज्ञा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने बात की गहराई को समझा। उसने रुक्मिणी के ज़रिए उस लड़के के बारे में तहकीकात करवाई। प्रज्ञा खुद डॉक्टर को दिखाने के बहाने निकली और उस लड़के के इलाके में जाकर गोपनीय तरीके से जानकारी जुटाई। जो सच सामने आया, उसने प्रज्ञा की रूह कँपा दी। वह लड़का न केवल आपराधिक पृष्ठभूमि का था, बल्कि पहले से शादीशुदा था और भोली-भाली अमीर लड़कियों को प्रेमजाल में फंसाकर उनसे पैसे ऐंठने और उन्हें ब्लैकमेल करने का धंधा करता था।
प्रज्ञा उसी शाम सीधे तान्या के कमरे में गई। उसने दरवाज़ा बंद किया और बेहद संयम से तान्या का हाथ पकड़कर कहा, “तान्या, तुम मेरी छोटी बहन जैसी हो। तुम जिस लड़के के साथ अपनी ज़िंदगी के सपने देख रही हो, वह एक धोखेबाज़ और शादीशुदा इंसान है। वह तुम्हें सिर्फ बर्बाद करना चाहता है। कृपया अपने कदम पीछे खींच लो, यह पूरा परिवार तबाह हो जाएगा।”
तान्या का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उसने झटके से प्रज्ञा का हाथ छुड़ाया और चीखते हुए बोली, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे निजी मामलों में दखल देने की? तुम अपनी हद में रहो भाभी! तुम सिर्फ इस घर की बहू हो, मेरी माँ बनने की कोशिश मत करो। मुझे पता है तुम मेरी खुशियों से जलती हो!”
तान्या उल्टे रोते हुए अपनी माँ के पास पहुँची और प्रज्ञा पर झूठा आरोप लगा दिया कि भाभी उसके चरित्र पर कीचड़ उछाल रही हैं और उस पर झूठे लांछन लगा रही हैं। मनोरमा देवी बिना सच जाने आगबबूला हो गईं। उन्होंने भरी बैठक में प्रज्ञा को जमकर खरी-खोटी सुनाई, “तुम्हारी औकात कैसे हुई मेरी बेटी पर ऊँगली उठाने की? दो कौड़ी के घर से आकर हमारे ही खानदान की इज़्ज़त पर सवाल उठाती हो? अगर आज के बाद तुमने तान्या के मामले में ज़ुबान भी खोली, तो इस घर से बाहर का रास्ता दिखा दूँगी!”
प्रज्ञा की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह हाथ जोड़कर, सिर झुकाए अपने कमरे में लौट आई। उसने मयंक से भी कुछ नहीं कहा, क्योंकि वह जानती थी कि घर में क्लेश और बढ़ेगा। लेकिन ईश्वर की लाठी में आवाज़ नहीं होती।
तान्या के अहंकार पर उस दिन करारा तमाचा लगा जब दो दिन बाद उस धोखेबाज़ लड़के ने तान्या से फोन पर साफ़ कहा कि “अगर भागना है तो घर की तिजोरी से माँ के सारे गहने और दस लाख रुपये कैश लेकर आना, खाली हाथ आई तो मैं तुम्हें अपने साथ नहीं रखूँगा।” उस पल तान्या के दिमाग से मोहब्बत का नशा एक झटके में उतर गया। उसे समझ आ गया कि भाभी जो कह रही थीं, वह सोलह आने सच था। वह लड़का उससे नहीं, उसकी दौलत से प्यार करता था। तान्या ने खुद ही उस लड़के का नंबर ब्लॉक कर दिया और सहमकर घर में बैठ गई।
उसी दौरान किस्मत से मयंक के पिता ने अपनी बिरादरी के एक बेहद संभ्रांत, सुशिक्षित और समझदार लड़के मोहित से तान्या का रिश्ता तय कर दिया। तान्या ने बिना किसी आनाकानी के तुरंत शादी के लिए हाँ कर दी। दो महीने के भीतर तान्या का विवाह धूमधाम से संपन्न हो गया। जब तान्या विदा हो रही थी, प्रज्ञा ने राहत की गहरी सांस ली कि चलो, इस घर की बेटी का जीवन बर्बाद होने से बच गया, भले ही उसका श्रेय उसे न मिला हो।
तान्या के जाने के कुछ ही हफ्तों बाद एक और दुर्घटना घटी। एक सुबह मनोरमा देवी गीले फर्श पर फिसलकर गिर पड़ीं। उनके पैर में भीषण मोच आई और घुटने की नस खिंच गई। डॉक्टर ने उन्हें कम से कम एक महीने तक पूर्ण विश्राम (बेड रेस्ट) की सलाह दी।
उस एक महीने में प्रज्ञा ने अपनी निष्ठा की पराकाष्ठा दिखा दी। मनोरमा देवी का हिलना-डुलना तक दूभर था। प्रज्ञा ने दिन-रात एक कर दिया। समय पर सूप, दवाइयां, गर्म पानी की सिंकाई, उनके कपड़े बदलना, यहाँ तक कि उन्हें सहारा देकर बाथरूम ले जाना—प्रज्ञा ने हर काम ऐसे किया जैसे कोई बेटी अपनी सगी माँ की तीमारदारी करती है। एक दिन के लिए भी उसके चेहरे पर शिकन या माथे पर बल नहीं आया। इसके बावजूद, मनोरमा देवी का अहंकार इतना बड़ा था कि उनके होंठों से कभी प्रज्ञा के लिए ‘धन्यवाद’ या प्यार का एक मीठा शब्द नहीं निकला। वे हमेशा अपने चेहरे पर वही कठोरता ओढ़े रहीं।
समय अपनी गति से बीतता रहा। कुछ महीने बाद मयंक के ममेरे भाई की शादी तय हुई। शादी दूसरे शहर में थी। बाबा की गिरती सेहत को देखते हुए उन्हें सफर पर ले जाना संभव नहीं था। मनोरमा देवी ने फैसला सुनाया कि मयंक और वह शादी में जाएँगे, और प्रज्ञा घर पर रहकर बाबा की देखभाल करेगी।
उसी दिन, जब सब लोग शादी के लिए निकल चुके थे, दोपहर में बाबा की तबीयत बिगड़ी थी और प्रज्ञा ने अपनी सूझबूझ से उन्हें मौत के मुंह से खींच निकाला था।
शाम को जब मयंक और मनोरमा देवी शादी से लौटे, तो डॉक्टर माथुर घर के बाहर ही मिल गए। डॉक्टर माथुर ने मनोरमा देवी से हाथ जोड़कर कहा, “भाभी जी, आपके कुल के पुण्य प्रबल हैं जो आपको प्रज्ञा जैसी बहू मिली है। आज अगर वह लड़की अपनी जान लड़ाकर बाबा को न संभालती और समय पर मुझे न बुलाती, तो शायद आज आप घर लौटकर अपने ससुर का चेहरा न देख पातीं। उसने अकेले दम पर उस बुजुर्ग को जीवनदान दिया है। धन्य हैं वे माता-पिता जिन्होंने ऐसी देवी जैसी बेटी को जन्म दिया!”
डॉक्टर के ये शब्द मनोरमा देवी के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरे। उनका मन भीतर तक डोल गया, लेकिन चेहरे का पाषाण अभी भी पूरी तरह नहीं टूटा था।
इस घटना को बीते कई दिन हो चुके थे। तान्या अपनी ससुराल से पहली बार मायके आई हुई थी। वह हाल ही में अपने पति के साथ स्विट्ज़रलैंड घूमकर लौटी थी। पूरे घर में तान्या के आने की रौनक थी। मयंक ने भी बहन के स्वागत में ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी ले ली थी। प्रज्ञा सुबह से ही रसोई में तान्या की पसंद के पकवान—शाही पनीर, कचौड़ियाँ और खीर बनाने में जुटी थी।
दोपहर के समय मयंक बाज़ार से कुछ ताज़े फल लेने गया था। बाबा अपने कमरे में आराम से विश्राम कर रहे थे। तान्या और मनोरमा देवी शयनकक्ष में बैठकर बतिया रही थीं।
प्रज्ञा ट्रे में गरमा-गरम अदरक वाली चाय और मेवे की प्लेट सजाकर सासू माँ के कमरे की ओर बढ़ी। जैसे ही वह दरवाज़े के पास पहुँची, उसके कान भीतर से आ रही बातचीत पर पड़े। वह दरवाज़े के ओट में अनजाने ही रुक गई।
कमरे के भीतर मनोरमा देवी की आवाज़ भर्राई हुई थी। वे अपनी बेटी तान्या से कह रही थीं, “तान्या… आज मेरा कलेजा बहुत भारी है। मैं अपनी ही नज़रों में गिरती जा रही हूँ।”
तान्या ने चौंककर पूछा, “क्या हुआ माँ? आप अचानक ऐसी बातें क्यों कर रही हैं?”
मनोरमा देवी की आँखों से आँसू छलक रहे थे, “तान्या, तू मेरी कोख से जन्मी बेटी है, पर सच कहूँ तो इस घर के लिए प्रज्ञा तुझसे भी बड़ी बेटी साबित हुई है। मैं कितनी अंधी और अहंकारी थी! शादी के पहले दिन से मैंने उस बच्ची को सिर्फ ताने दिए, नौकरानी की तरह खटाया, कभी दो मीठे बोल नहीं बोले। पर उसने क्या किया? जब तू एक गलत लड़के के चक्कर में अपनी ज़िंदगी तबाह करने जा रही थी, उसने अपनी इज़्ज़त दांव पर लगाकर मुझे आगाह किया, पर मैंने उसे ज़लील किया। जब मेरे पाँव में मोच आई, तो उसने हफ़्तों मेरे गंदे कपड़े धोए, मेरी सेवा की जैसे कोई सगी माँ की करता है। और उस दिन… जब हम सब शादी में मौज-मस्ती कर रहे थे, उस बच्ची ने अकेले दम पर तेरे बाबा को यमराज के मुंह से बचा लिया! उसने कभी शिकायत नहीं की, कभी पलटकर जवाब नहीं दिया। मेरा अहंकार, मेरी झूठी शान मेरे आड़े आती रही, वरना मेरा दिल तो हर पल करता है कि दौड़कर उसे अपने सीने से चिपका लूँ और अपने सारे पापों की माफ़ी मांग लूँ। मैं ही पत्थर दिल हूँ तान्या… सच कहूँ तो ऐसी बहू किसी नसीब वाले को ही मिलती है।”
तान्या की आँखें भी भीग चुकी थीं। उसने अपनी माँ का हाथ थामते हुए रुंधे गले से कहा, “हाँ माँ, आप बिल्कुल सच कह रही हैं। मैंने भी भाभी के साथ बहुत ज़्यादती की है। हर बात में उनका मज़ाक उड़ाया, उन्हें नीचा दिखाया। पर जब मेरी ज़िंदगी का सबसे बुरा दौर था, तब सिर्फ उन्होंने ही मुझे उस दलदल से बचाया था। ऐसी भाभी तो सचमुच पिछले जन्मों के पुण्यों से मिलती है।”
दरवाज़े के बाहर खड़ी प्रज्ञा की आँखों से आँसुओं की मूसलाधार बारिश बहने लगी। उसके सारे त्याग, सारी रात की थकान, सारे अनकहे दर्द एक पल में धुल गए। आज उसे लगा कि उसके धैर्य और संस्कारों की जीत हुई है। उसने आज उस कठोर दिल सास का प्यार और सम्मान जीत लिया था।
प्रज्ञा ने जल्दी से अपनी साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछे, अपने चेहरे को सहज किया और मुस्कुराते हुए कमरे के भीतर कदम रखा।
“माँ जी, तान्या… चाय ले लीजिए, ठंडी हो जाएगी,” प्रज्ञा ने बेहद धीमी और मीठी आवाज़ में कहा और ट्रे को सेंटर टेबल पर रख दिया।
जैसे ही प्रज्ञा मुड़कर जाने लगी, तान्या अपनी जगह से उठकर तेजी से आगे आई। “भाभी, ज़रा रुकिए तो!”
प्रज्ञा ठिठक गई। पहली बार तान्या के स्वर में कोई तंज़ नहीं, बल्कि अगाध आदर और अपनत्व था। तान्या ने अपने बैग से एक बेहद खूबसूरत, नक्काशीदार कश्मीरी पश्मीना शॉल निकाला और बड़े ही मान के साथ प्रज्ञा के कंधों पर डाल दिया।
तान्या ने माँ की तरफ देखते हुए कहा, “माँ, देखिए तो! मेरी भाभी इस शॉल में कितनी सुंदर और गरिमामयी लग रही हैं ना?”
मनोरमा देवी की आँखें पूरी तरह नम थीं। वे बिस्तर से उठीं और थरथराते कदमों से प्रज्ञा के करीब आईं। उन्होंने प्रज्ञा के सिर पर हाथ रखा और फिर अपनी बाहें फैलाकर उसे अपने सीने से चिपका लिया। एक सास का कठोर पाषाण आज ममता की अविरल गंगा बनकर बह निकला था।
“बहुत सुंदर लग रही है मेरी बच्ची… साक्षात अन्नपूर्णा जैसी,” मनोरमा देवी की आवाज़ रुंध गई, “मुझे माफ़ कर दे बहू… नहीं, बहू नहीं, मेरी बेटी! मैं तुझे पहचानने में बहुत देर कर दी। तूने इस घर को घर बनाया है। आज से तू इस घर की सिर्फ बहू नहीं, मेरी सबसे बड़ी और सबसे लाडली बेटी है।”
प्रज्ञा की आँखें खुशी से छलक उठीं। उसने अपनी सास के सीने में सिर छिपा लिया। आज उसे लगा कि ससुराल की वह चौखट, जो कल तक पराई और बेगानी लगती थी, आज सचमुच उसका अपना आशियाना बन गई थी। आँगन में तुलसी के बिरवे पर शाम की किरणें उतर रही थीं, और घर के भीतर बरसों से जमी कड़वाहट की चादर हटकर प्रेम और विश्वास का नया सवेरा खिल उठा था।
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मूल लेखक : बालेश्वर गुप्ता