पंखों को जब आसमान मिला

सावित्री की आंखों से बरसों का दर्द आंसुओं के रूप में बह निकला। उस दिन आंगन में केवल एक बेटी के भविष्य का फैसला नहीं हुआ था, बल्कि एक टूटे हुए रिश्ते में समझ, सम्मान और नए विश्वास की कोंपलें फूटी थीं। देवकी देवी ने भी जब बेटे और बहू की आंखों में एक नई रोशनी देखी, तो उनका पुराना रूखापन पिघलने लगा। उन्होंने आगे बढ़कर अपनी पोती अंजलि के सिर पर हाथ रखा और आशीर्वाद दिया।

  अंजलि बारहवीं की परीक्षा में पूरे जिले में अव्वल आई थी और अब शहर जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने का सपना देख रही थी। सावित्री ने बेटी के कंधे पर हाथ फेरते हुए बड़े धीमे और गंभीर स्वर में कहा, “बिटिया, जीवन में कभी भी पूरी तरह किसी दूसरे के सहारे जीने की भूल मत करना। चाहे वह पिता का घर हो, पति का संसार हो या फिर खुद की औलाद का आंगन। सबसे पहले अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा होना सीख, अपने भीतर की ताकत को पहचान और स्वावलंबी बन। जब इंसान अपनी पहचान खोकर केवल दूसरों की दया और उम्मीद पर टिक जाता है, तो उम्मीद टूटने पर कोई आवाज नहीं होती, बस एक गहरा और कभी न भरने वाला दर्द सीने में दफन रह जाता है। औरत को सहनशील होने के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनना भी अनिवार्य है, यह बात मैं किसी किताब से नहीं बल्कि अपनी जिंदगी के कड़वे अनुभवों से बता रही हूं।”

कमरे के दरवाजे पर खड़ी सावित्री की सास देवकी देवी ने जैसे ही बहू के यह शब्द सुने, उनकी त्योरियां चढ़ गईं। हाथ में पूजा की थाली लिए वे भीतर दाखिल हुईं और तल्ख आवाज में बोलीं, “अरे बहू! ये कैसी उल्टी पट्टी पढ़ा रही हो अपनी जवान बेटी को? न्याय, अन्याय और आत्मनिर्भरता के बड़े-बड़े भाषण देने से पहले जरा पीछे मुड़कर देख। आज जिस पक्के मकान में बैठकर यह ज्ञान बांट रही हो, वह मेरे बेटे रमेश की पसीने की कमाई से बना है। तेरी दोनों बड़ी बेटियों का ब्याह समाज में इज्जत के साथ किसके दम पर हुआ? क्या मेरे बेटे ने सहारा नहीं दिया? हमने ऐसी कौन सी कमी रखी इस घर में कि आज तू अपनी बच्ची को यह सिखा रही है कि परिवार और पति पर भरोसा करने से पहले दुनियादारी नापे और घर बसाने से पहले अपने पैर तलाशे?”

सावित्री ने नजरें उठाकर सास की ओर देखा। उसकी आंखों में कोई कड़वाहट या बगावत नहीं थी, बल्कि वर्षों की दबी हुई एक खामोश पीड़ा तैर रही थी। उसने हाथ जोड़ते हुए बहुत ही संयत भाव से कहा, “मां जी, मैं आप पर या इस परिवार पर कोई लांछन नहीं लगा रही हूं। न ही मैं किसी की शिकायत कर रही हूं। मैं तो बस अपनी बच्ची को उस कांटे भरे रास्ते से बचाना चाहती हूं, जिस पर चलकर मेरे अपने पैर लहूलुहान हो गए। जब मैं ब्याह कर इस दहलीज पर आई थी, तब मेरी आंखों में भी आसमान छूने के ख्वाब थे। मैं भी एक मुकाम हासिल करना चाहती थी, अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहती थी। मेरे मायके में गरीबी थी, पिता जी का साया सिर से उठ चुका था, फिर भी मेरी मां ने कभी मुझे पढ़ने से नहीं रोका। उन्होंने विपरीत हालात में भी मुझे कॉलेज भेजा। शादी तय हुई तो मुझे लगा कि यह एक संभ्रांत, पढ़ा-लिखा और प्रतिष्ठित परिवार है, जहां मेरे सपनों को समझा जाएगा और मैं अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी कर पाऊंगी।”

देवकी देवी ने मुंह बिचकाते हुए कहा, “तो इसमें गलत क्या हुआ? जो सपने मायके की तंगहाली में पूरे न हो सके, उन्हें ससुराल आकर पूरा करने की जिद भला कौन सी समझदारी थी? हमने कब कहा था कि तुम अनपढ़ रहो, पर घर की जिम्मेदारियां, चौका-चूल्हा, सास-ससुर की सेवा और कुल की मर्यादा भी तो कोई चीज होती है! अगर ये सब काम भी मैं इस उम्र में करती, तो फिर इस घर में बहू लाने का क्या मतलब रह जाता? बहू का पहला फर्ज घर संभालना होता है, किताबें खोलकर बैठना नहीं।”

सावित्री ने एक गहरी सांस ली और बोली, “मां जी, मैं आपसे कोई शिकायत नहीं करती। हमारे इस समाज में ऐसी सासें बहुत कम होती हैं जो बहू को अपनी बेटी मानकर उसके सपनों को परवान चढ़ाने में उसकी ढाल बनें। आप भी उसी पुरानी परंपरा की पैरोकार थीं, इसलिए आपसे गिला क्या करना! आपने मेरे बढ़ते कदमों को रोका, मुझे चारदीवारी तक सीमित रखने की कोशिश की, इसका मुझे उतना मलाल नहीं हुआ। पर सबसे बड़ा दुख और आघात तो तब लगा जब उस इंसान ने भी मेरा साथ छोड़ दिया जिसके साथ मैंने सात फेरे लिए थे। जिनसे मैंने जीवन भर साथ निभाने और सुख-दुख साझा करने का वचन लिया था, उन्होंने भी समाज की दकियानूसी सोच के आगे घुटने टेक दिए और मेरे सपनों का गला घोंटने में मूक दर्शक बने रहे।”

बहू के मुंह से यह बात सुनकर देवकी देवी गुस्से में पैर पटकती हुई कमरे से बाहर निकल गईं। तभी कमरे के दूसरे कोने से सावित्री के पति रमेश बाबू उठ खड़े हुए। रमेश एक दफ्तर में साधारण क्लर्क थे। उनके चेहरे पर झेंप और हल्की नाराजगी साफ झलक रही थी। वे बोले, “सावित्री, तुम हर बात का ठीकरा मेरे सिर पर क्यों फोड़ती हो? मैंने तुम्हें कब रोका था? शादी के बाद तुमने प्राइवेट से एम.ए. की परीक्षा दी, फिर तुमने बी.एड. करने की जिद पकड़ ली। अब तुम ही बताओ, उस वक्त मेरी आमदनी कितनी थी? तुम बी.एड. करने के लिए अपने मायके में जाकर रहने लगीं। पूरे दो साल तुम अपने मायके में रहकर कॉलेज जाती रहीं। उस वक्त तुम्हें मेरी, मेरे घर की और हमारे दांपत्य की कोई चिंता नहीं थी? अब इतने सालों बाद जब बाल पकने को आए हैं, तब न्याय और अन्याय का राग अलापने से क्या हासिल होगा?”

पास ही बैठी अंजलि ने अपने पिता की ओर देखा और फिर मां का हाथ थामते हुए धीमी आवाज में कहा, “मां, आप पापा की बातों से परेशान मत होइए। आप मुझे बताइए कि उस दौर में आखिर हुआ क्या था? आपने किन मुश्किलों का सामना किया?”

सावित्री ने अपनी बेटी के चेहरे पर हाथ फेरा और फिर रमेश की आंखों में आंखें डालकर कहा, “कोई भी विवाहिता खुशी-खुशी अपना ससुराल छोड़कर मायके में नहीं बैठती रमेश जी। या तो कोई बहुत बड़ी मजबूरी होती है या फिर आत्मसम्मान की रक्षा की लड़ाई। मेरी मजबूरी यह थी कि उस समय आपकी नौकरी पक्की नहीं थी, घर में तंगी थी और यहां मुझे पढ़ाई के लिए न तो मानसिक शांति मिल रही थी और न ही समय। सुबह चार बजे से रात के ग्यारह बजे तक बस काम, ताने और उपेक्षा। मेरी मां ने अपनी आधी रोटी काटकर मुझे अपने पास रखा ताकि मैं बी.एड. पूरा कर सकूं। अगर मुझे इस चौखट पर थोड़ा सा भी हौसला, थोड़ा सा भी अपनापन और सहयोग मिला होता, तो ईश्वर साक्षी है, मैं कभी अपने पति का घर छोड़कर दूर नहीं रहती। लेकिन आपने कभी मेरी पीड़ा को समझा ही नहीं।”

रमेश ने अपनी बात का बचाव करते हुए कहा, “स्त्री का सबसे बड़ा धर्म अपने पति के साथ हर हाल में कदम से कदम मिलाकर चलना होता है। लेकिन तुमने हमेशा अपनी किताबों, अपनी डिग्रियों और अपनी महत्वाकांक्षा को आगे रखा। माना कि मेरी मां का स्वभाव थोड़ा कड़क था, घर में तनाव रहता था, पर इसका मतलब यह तो नहीं था कि तुम मुझे अकेला छोड़कर मायके चली जाओ। तुमने भी तो मेरे साथ रहने का फर्ज पूरी तरह नहीं निभाया।”

सावित्री की आंखें छलक आईं, पर उसकी आवाज में एक गजब का ठहराव था। उसने कहा, “फर्ज केवल एक तरफ से नहीं निभाए जाते रमेश जी। अगर आपने उस समय मेरा हाथ थामकर अपनी मां से यह कह दिया होता कि सावित्री पढ़ेगी और हम दोनों मिलकर इस घर को संवारेंगे, तो आज मुझे यह मलाल नहीं होता। मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की, पर जब नौकरी का मौका आया, तब भी यही कहा गया कि खानदान की बहुएं बाहर नौकरी करने नहीं जाएंगी। मैंने परिवार की शांति के लिए अपने सारे प्रमाणपत्र संदूक में बंद कर दिए। मैंने समझौता किया, आपके बच्चों को पाला, आपकी गृहस्थी को सींचा। पर उस समझौते की कीमत यह चुकानी पड़ी कि अंदर ही अंदर मेरा आत्मसम्मान तिल-तिल कर मरता रहा। इसलिए आज मैं अपनी अंजलि को सिखा रही हूं कि वह अपने पैरों पर खड़ी हो, ताकि कल को उसे अपनी पहचान साबित करने के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। रमेश निरुत्तर होकर वहीं बैठ गए। उनके पास सावित्री के तर्कों का कोई जवाब नहीं था। उन्हें पहली बार यह अहसास हुआ कि जिस शांति को वे गृहस्थी की कुशलता समझते रहे, वह दरअसल सावित्री का अनकहा बलिदान और उसका दम तोड़ता हुआ आत्मसम्मान था। अंजलि ने अपनी मां के आंसुओं को पोंछा और एक दृढ़ संकल्प के साथ खड़ी हुई। उसने कहा, “पापा, मां ने जो सहा सो सहा, लेकिन आज अगर मैं पढ़-लिखकर आगे नहीं बढ़ी, तो यह सिर्फ मेरी हार नहीं होगी, बल्कि मां के उस अधूरे संघर्ष की भी हार होगी। मैं शहर जाकर प्रशासनिक सेवा की तैयारी करूंगी और मां का सिर गर्व से ऊंचा करूंगी।”

दिन बीतते गए। घर में अंजलि के शहर जाने को लेकर असमंजस बना रहा। देवकी देवी अब भी पुराने खयालों पर अड़ी थीं कि लड़की जात को पराए घर जाना है, ज्यादा पढ़ाकर क्या होगा। रमेश भी भारी मन से दुविधा में थे। लेकिन सावित्री इस बार अडिग थी। उसने साफ कह दिया कि चाहे उसे अपने गहने बेचने पड़ें, पर वह अंजलि को शहर भेजेगी।

सावित्री के इस अटूट संकल्प ने रमेश के दिल पर गहरा असर डाला। उन्होंने पुरानी डायरियां और सावित्री की बी.एड. की डिग्री निकाल कर देखी। वे पन्ने पीले पड़ चुके थे, लेकिन उन पर सावित्री की मेहनत की चमक अब भी बाकी थी। रमेश को अपनी पुरानी गलतियों, अपनी कायरता और सावित्री के प्रति अपनी उदासीनता पर गहरा पछतावा हुआ। उन्होंने सोचा कि जो अन्याय वे अपनी पत्नी के साथ होने से न रोक सके, वही अन्याय वे अपनी बेटी के साथ नहीं होने देंगे।

अगली सुबह, जब सावित्री रसोई में चाय बना रही थी, रमेश वहां पहुंचे। उन्होंने एक लिफाफा सावित्री के हाथ में रख दिया। सावित्री ने चौंककर देखा, तो उसमें शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज के हॉस्टल की फीस और दाखिले का फॉर्म था।

रमेश की आंखों में पश्चाताप के आंसू थे। उन्होंने सावित्री के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और रुंधे गले से कहा, “सावित्री, मुझे माफ कर दो। मैं एक अच्छा पति नहीं बन सका, तुम्हारी काबिलियत को कभी वह मान नहीं दे पाया जिसकी तुम हकदार थीं। अपनी कायरता और समाज के डर की वजह से मैंने तुम्हारे सपनों की बलि चढ़ा दी। पर आज मैं एक कमजोर बाप साबित नहीं होना चाहता। अंजलि शहर जाएगी, खूब पढ़ेगी और अपने पैरों पर खड़ी होगी। और यह फैसला सिर्फ तुम्हारा नहीं, हमारा दोनों का है।”

सावित्री की आंखों से बरसों का दर्द आंसुओं के रूप में बह निकला। उस दिन आंगन में केवल एक बेटी के भविष्य का फैसला नहीं हुआ था, बल्कि एक टूटे हुए रिश्ते में समझ, सम्मान और नए विश्वास की कोंपलें फूटी थीं। देवकी देवी ने भी जब बेटे और बहू की आंखों में एक नई रोशनी देखी, तो उनका पुराना रूखापन पिघलने लगा। उन्होंने आगे बढ़कर अपनी पोती अंजलि के सिर पर हाथ रखा और आशीर्वाद दिया।

कुछ वर्षों बाद, अंजलि ने राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पहले ही प्रयास में उत्तीर्ण कर ली। जब वह लाल बत्ती की गाड़ी में अपने माता-पिता के आंगन में उतरी, तो पूरा मोहल्ला तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अंजलि ने गाड़ी से उतरते ही अपनी पहली सरकारी नियुक्ति का पत्र अपनी मां सावित्री के हाथों में रख दिया और झुककर उनके चरण छुए। सावित्री ने जब बेटी को सीने से लगाया, तो उसे लगा कि जैसे आज उसकी खुद की आत्मा को नया जीवन और नई पहचान मिल गई हो। रमेश ने गर्व से अपनी पत्नी के कंधे पर हाथ रखा, और इस बार उस स्पर्श में केवल अधिकार नहीं, बल्कि असीम सम्मान और कृतज्ञता थी।

दोस्तों, आज भी हमारे समाज में यह सोच पूरी तरह खत्म नहीं हुई है कि औरत का वजूद केवल त्याग, समझौते और चारदीवारी की जिम्मेदारियों तक सीमित है। परिवार संभालना बेहद सुंदर कार्य है, लेकिन क्या किसी स्त्री को अपनी शिक्षा, अपने सपनों और अपनी आत्मनिर्भरता की बलि देकर ही खुद को एक आदर्श बहू या पत्नी साबित करना चाहिए?

आपकी नजर में एक स्त्री के लिए आत्मनिर्भर होना कितना जरूरी है? क्या आज के दौर में भी ससुराल पक्ष को बहू के सपनों का मान नहीं रखना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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