“जीती रह बहू…” यशोदा जी की आवाज़ में पहली बार वो कठोरता नहीं, बल्कि एक बुज़ुर्ग का सच्चा आशीष था। उन्होंने शारदा की तरफ देखा और बोलीं, “शारदा, आज तूने मेरी आंखें खोल दीं। मैं सोचती थी कि नियमों को पकड़कर रखना ही घर को जोड़े रखना होता है, लेकिन आज समझ आया कि घर नियमों से नहीं, अपनों के दर्द को समझने और प्यार से बंधता है। तूने जो हिम्मत आज दिखाई है, काश वो हिम्मत किसी ने मेरे दौर में दिखाई होती तो शायद मैं भी इतनी कठोर न बनती। आज से इस घर के नियम वही होंगे, जो तू बनाएगी।”
घर की सबसे बुजुर्ग मुखिया थीं यशोदा जी, जिनकी उम्र अस्सी को छू रही थी, मगर आंखों की सख्ती और आवाज़ की कड़क में आज भी रत्ती भर कमी नहीं आई थी। उनके बनाए नियम ही इस चौखट का संविधान थे, और उस संविधान की पहली धारा यही थी कि घर की बहू-बेटियों का सिर कभी खुला न रहे, बड़ों के सामने उनकी आवाज़ न उठे और जब तक घर के मर्द भोजन न कर लें, तब तक किसी औरत का अन्न ग्रहण करना पाप समझा जाए।
रसोई में पंखा तो लगा था, मगर यशोदा जी के पुराने आदेश के मुताबिक चूल्हे की आग बुझने के डर से उसे बहुत धीमी गति पर ही चलाया जाता था। पसीने से तरबतर अंजलि भारी कदमों से एक थाली से दूसरी थाली में रोटियां परोस रही थी। अंजलि का सातवां महीना चल रहा था। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था और लगातार खड़े रहने की वजह से उसके टखनों और पंजों पर गहरी सूजन आ गई थी। जब भी वह थोड़ा झुकती, उसके पेट के निचले हिस्से में असहनीय खिंचाव होने लगता। डॉक्टर ने उसे सख्त हिदायत दी थी कि वह ज्यादा देर तक लगातार खड़ी न रहे और भारी काम बिल्कुल न करे। लेकिन इस घर में डॉक्टर की सलाह से कहीं ज्यादा वजन दादी सास के उन नियमों का था, जो दशकों पहले गढ़े गए थे।
“अंजलि! हाथ जरा फुर्ती से चलाओ बहू। तुम्हारे ससुर जी और जेठ जी भोजन की चौकी पर बैठ चुके हैं। उन्हें गरम-गरम फुल्के चाहिए, ठंडे नहीं। हमारे जमाने में तो नौवें महीने तक हम चक्की पीसती थीं और कुएं से पानी खींचती थीं, आजकल की लड़कियों को जरा सा गर्भ क्या ठहर गया, जैसे कोई पहाड़ टूट पड़ा हो!” यशोदा जी बैठक के पास वाले दालान में आरामकुर्सी पर बैठी पान चबाते हुए तेज़ आवाज़ में बोलीं।
अंजलि ने अपने होठ भींच लिए और चुपचाप तवे पर रोटी सेंकने लगी। दर्द के मारे उसकी आंखों के कोरों से आंसू छलकने को आतुर थे, लेकिन वह उन्हें रोकने की भरसक कोशिश कर रही थी। रसोई के एक कोने में खड़ी उसकी सास, शारदा जी, अपनी बहू की इस हालत को बहुत ध्यान से देख रही थीं। शारदा जी पिछले पच्चीस सालों से इस घर की बहू थीं। उन्होंने इस हवेली की दीवारों के पीछे अनगिनत आंसुओं को घूंट-घूंट कर पिया था। उन्हें अच्छी तरह याद था कि जब उनका बेटा मयंक उनके गर्भ में था, तब कैसे उन्हें भी इन्हीं कठोर नियमों की भट्टी में झोंक दिया गया था।
शारदा जी आगे बढ़ीं और उन्होंने हौले से अंजलि के हाथ से चिमटा ले लिया।
“अंजलि, तू जाकर बैठक में बैठ। रोटियां मैं सेंक देती हूं और बाबूजी को परोस भी आऊंगी। तू जाकर थोड़ा आराम कर ले, तेरे पैर बहुत ज्यादा सूज गए हैं,” शारदा जी ने धीमी और ममतामयी आवाज़ में कहा।
“नहीं मां जी, दादी जी फिर नाराज़ होंगी। वो कहेंगी कि जेठ जी और ससुर जी के सामने मेरा बैठना ठीक नहीं है, वो भी जब वे भोजन कर रहे हों,” अंजलि ने घबराते हुए कहा।
“तू जा, मैं कह रही हूं ना। जो होगा मैं देख लूंगी,” शारदा जी के स्वर में एक ऐसा संकल्प था जो शायद इस घर की दीवारों ने पहले कभी नहीं सुना था।
अंजलि भारी मन और लड़खड़ाते कदमों से रसोई से बाहर निकली। बैठक में लकड़ी के बड़े पाटे बिछे थे, जिन पर उसके ससुर हरिशंकर जी और जेठ पंकज जी भोजन कर रहे थे। पूरे परिवार में यह रिवाज था कि पुरुष पाटे पर बैठते थे और बहुएं ज़मीन पर बैठकर उन्हें भोजन परोसती थीं। ज़मीन पर बैठना अंजलि के लिए इस समय किसी यातना से कम नहीं था। पेट का भार इतना बढ़ चुका था कि नीचे बैठते ही सांस फूलने लगती थी और उठते समय रीढ़ की हड्डी में तीखा दर्द उठता था।
अंजलि ने हिम्मत जुटाकर दीवार के सहारे रखी एक साधारण सी गद्देदार कुर्सी खींची और उस पर बैठ गई। उसने अपने भारी पैरों को थोड़ा सीधा किया तो उसे लगा जैसे बेजान हो चुके जिस्म में थोड़ी जान लौटी हो। उसने सोचा कि वह बस दो मिनट सांस ले लेगी और फिर उठ जाएगी।
लेकिन तभी दालान से यशोदा जी की नज़र बैठक के भीतर पड़ी। अपनी पोता बहू को ससुर और जेठ के सामने कुर्सी पर ऊंचे आसन पर बैठे देख यशोदा जी के तन-बदन में मानो आग लग गई। वे अपनी लाठी खटखटाते हुए तेज़ी से बैठक के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं।
“अरे राम राम! ये क्या अनर्थ देख रही हूं मैं! शर्म-लिहाज सब घोलकर पी गई हो क्या अंजलि? अपने ससुर और जेठ के सामने इतनी ऊंचाई पर कुर्सी पर पसर कर बैठी हो? ज़रा सा भी लिहाज नहीं बचा इस नए ज़माने की लड़कियों में? जिस घर में बहुएं बड़ों के सामने आंख उठाकर नहीं देखती थीं, वहां तुम बराबरी का आसन जमाकर बैठी हो! उतरो तुरंत नीचे, और ज़मीन पर बैठकर तमीज़ से हाथ जोड़कर ससुर की थाली देखो!” यशोदा जी की कर्कश आवाज़ पूरी हवेली में गूंज उठी।
हरिशंकर जी और पंकज जी ने असहज होकर अपने सिर झुका लिए। अंजलि का चेहरा शर्म और डर से फक पड़ गया। वह घबराकर कांपते हुए कुर्सी से उठने की कोशिश करने लगी, लेकिन दर्द के कारण उसके मुंह से एक हल्की सी चीख निकल गई।
इससे पहले कि अंजलि ज़मीन पर गिरती या बैठती, रसोई से शारदा जी बाहर आ गईं। उन्होंने तेज़ी से आगे बढ़कर अंजलि के दोनों कंधे थामे और उसे वापस उसी कुर्सी पर प्यार से बैठा दिया।
“बैठी रहो अंजलि, बिल्कुल उठने की ज़रूरत नहीं है,” शारदा जी ने शांत लेकिन बहुत दृढ़ आवाज़ में कहा।
यशोदा जी की आंखें गुस्से से फैल गईं। उन्होंने शारदा को घूरते हुए कहा, “शारदा! ये क्या बेहूदगी है? तुम अपनी बहू को बड़ों का अनादर करना सिखा रही हो? मेरे जीते-जी इस घर में कुल की मर्यादा को तार-तार नहीं किया जा सकता। क्या तुम्हारे मायके वालों ने तुम्हें यही सीख दी थी कि ससुर के सामने बहू कुर्सी पर ठाठ से बैठेगी?”
शारदा जी ने गहरी सांस ली। आज पच्चीस सालों का दबा हुआ दर्द, घुटन और कड़वाहट उनके सीने से बाहर आने के लिए मचल रही थी। उन्होंने अपनी सासू मां की आंखों में सीधे देखा। उस निगाह में कोई बदतमीज़ी नहीं थी, लेकिन एक चट्टान जैसी दृढ़ता थी।
“अम्मा जी, आज मर्यादा की बात मत कीजिए,” शारदा जी ने बहुत सधे हुए शब्दों में कहना शुरू किया। “मर्यादा इंसानों के सम्मान और सुरक्षा से बनती है, किसी को तिल-तिल तड़पाने से नहीं। आपको अंजलि का कुर्सी पर बैठना दिख गया, जो कुल मिलाकर ज़मीन से डेढ़ फुट ऊंची है, लेकिन आपको अपनी इस सात महीने की गर्भवती बहू के सूजे हुए पैर नहीं दिखे? आपको यह नहीं दिखा कि उसका पेट दबने से उसकी सांस फूल रही है? आपको यह नहीं दिखा कि वो पिछले तीन घंटे से लगातार उस तपती रसोई में खड़ी होकर आप सबके लिए खाना बना रही थी?”
“तो क्या हो गया? औरत का शरीर सहने के लिए ही बना होता है। हमने भी तो बच्चे जने हैं, क्या हम कुर्सी पर बैठते थे?” यशोदा जी ने तिनक कर जवाब दिया।
“हां अम्मा जी! आपने भी बच्चे जने हैं, और यही सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि एक औरत होकर भी आप दूसरी औरत की पीड़ा कभी नहीं समझ पाईं,” शारदा जी की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई, लेकिन उनका हौसला डिगा नहीं।
बैठक में एकदम सन्नाटा छा गया। हरिशंकर जी ने अपने हाथ रोक लिए। वे अपनी पत्नी को इतनी बेबाकी से बोलते हुए पहली बार देख रहे थे।
शारदा जी ने अपनी बात जारी रखी, “अम्मा जी, आज जब मैं अंजलि को इस कुर्सी पर दर्द से कराहते हुए देखती हूं ना, तो मुझे छब्बीस साल पुरानी वो दोपहर याद आ जाती है, जब मयंक मेरे पेट में था। आठवां महीना था मेरा। मुझे भीषण पीलिया हो गया था और पूरे शरीर पर लाल चकत्ते और पित्ती उछल आई थी। डॉक्टर ने कहा था कि इन्हें सूती, ढीले-ढाले कपड़े पहनाइए और ठंडक में रखिए, वरना बच्चे और मां दोनों की जान को खतरा हो सकता है। लेकिन आपने क्या कहा था? याद है आपको?”
यशोदा जी की नज़रें ज़रा सी झिझकीं, मगर वे चुप रहीं।
“आपने कहा था कि माथुर खानदान की बहू भारी जरी की साड़ी का पल्ला सिर पर बांधकर ही रहेगी। चाहे गर्मी से मेरी खाल झुलस जाए, चाहे खुजली और जलन से मेरा दम घुट जाए, लेकिन आपने मुझे अपने बंद कमरे में भी एक ढीला कुर्ता पहनने की इजाज़त नहीं दी थी। आपने कहा था कि ये सब मर्यादा के खिलाफ है। मैं पूरी-पूरी रात उस अंधेरे कमरे में रो-रोकर काटती थी। मुझे लगता था कि काश कोई ऐसा हो जो मेरी इस बेबसी को समझे, जो मेरे सिर पर हाथ रखकर कह दे कि ‘बहू, तू पहले अपनी जान संभाल, रस्में बाद में निभ जाएंगी।’ लेकिन उस समय किसी ने मेरा हाथ नहीं थामा था। मैंने उस असहनीय पीड़ा को अपनी छाती में पत्थर रखकर झेला था।”
शारदा जी की आंखों से आंसू की एक बूंद टपकी, जिसे उन्होंने अपनी उंगलियों से पोंछ दिया।
“उस दिन मैंने अपने आंसुओं की कसम खाई थी कि अगर भगवान ने मुझे कभी सास बनने का मौका दिया, तो मैं अपनी बहू को उन खोखले नियमों की भेंट कभी नहीं चढ़ने दूंगी जो इंसानियत का गला घोंटते हों। शर्म और लिहाज़ कपड़ों की लंबाई या ज़मीन और कुर्सी की ऊंचाई में नहीं होता अम्मा जी, शर्म और लिहाज़ मन में और नीयत में होता है। अंजलि अपने ससुर और जेठ का कितना आदर करती है, यह बात इस घर का बच्चा-बच्चा जानता है। तो क्या इस नाज़ुक हालत में ज़रा से आराम के लिए एक कुर्सी पर बैठ जाने से उसका आदर कम हो गया?”
शारदा जी ने आगे बढ़कर अपने पति हरिशंकर जी की तरफ देखा।
“सुनिए जी, आप तो इसके ससुर हैं, पिता समान हैं। क्या किसी पिता के सामने उसकी अपनी बेटी जब तकलीफ में हो, तो क्या वो उसे ज़मीन पर बैठने के लिए मजबूर करेगा? क्या आपकी मर्यादा इतनी कमज़ोर है कि एक बीमार और गर्भवती बच्ची के कुर्सी पर बैठने से आपकी इज़्ज़त घट जाएगी?”
हरिशंकर जी की आंखें भर आईं। वे तुरंत पाटे से उठे और थाली छोड़कर सीधे अंजलि के पास आए। उन्होंने बड़े स्नेह से अंजलि के सिर पर हाथ रखा।
“नहीं शारदा, तुम बिल्कुल सच कह रही हो,” हरिशंकर जी का गला रुंध गया था। उन्होंने अपनी मां यशोदा जी की तरफ मुड़कर कहा, “अम्मा, शारदा ने जो सहा, वो हमारी खामोशी का गुनाह था। हम मर्यादा और कुल की झूठी दुहाई देकर सालों तक अपनी औरतों के दर्द को अनदेखा करते रहे। लेकिन अब और नहीं। अंजलि सिर्फ इस घर की बहू नहीं, हमारी बेटी है। और इस समय उसके और आने वाले बच्चे के स्वास्थ्य से बड़ा कोई नियम, कोई संस्कार नहीं हो सकता।”
पंकज भी उठ खड़ा हुआ और उसने कहा, “दादी जी, मां बिल्कुल सही कह रही हैं। अगर हमारे सामने बैठने से छोटी बहू को ज़रा सा भी सुकून मिलता है, तो वो हमेशा कुर्सी पर ही बैठेगी। हमें इसमें कोई अपमान नहीं, बल्कि अपनी मर्यादा की रक्षा दिखाई देती है।”
अंजलि की आंखों से खुशी और राहत के आंसू बह निकले। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस घर के उसूलों से वह थर-थर कांपती थी, उसी घर में उसकी सास उसके सम्मान और आराम के लिए ढाल बनकर खड़ी हो जाएगी।
शारदा जी ने फिर यशोदा जी की तरफ देखा और बहुत ही विनम्र लेकिन अडिग स्वर में कहा, “अम्मा जी, हम आपका अनादर नहीं कर रहे हैं। आप हमारे घर का वटवृक्ष हैं, आपकी छाया में ही हम सब पले-बढ़े हैं। लेकिन वटवृक्ष वही अच्छा होता है जो नई कोपलों को पनपने की जगह दे, न कि उन्हें अपनी भारी छांव तले कुचल दे। पुराने ज़माने के वो नियम जो किसी की जान पर बन आएं, उन्हें बदलना ही सच्ची समझदारी है। मेरी बहू अब सिर्फ इस नौ महीने ही नहीं, बल्कि जब भी उसका शरीर थकेगा या जब भी उसकी इच्छा होगी, वो हमारे साथ बैठकर ही खाना खाएगी। वो इस घर का आधा हिस्सा है, कोई पैर की जूती नहीं।”
हवेली के दालान में पसरा सन्नाटा अब टूटने लगा था। यशोदा जी ने धीरे से अपनी लाठी का सहारा लिया। उन्होंने अपनी बहू शारदा के चेहरे को गौर से देखा। उस चेहरे पर कोई बगावत की नफरत नहीं थी, बल्कि एक मां की ममता और अपने परिवार को सही दिशा में ले जाने का अटूट विश्वास था। यशोदा जी को अपनी पुरानी गलतियों का एहसास होने लगा। उन्हें याद आया कि कैसे उन्होंने भी अपनी जवानी में इन्हीं रिवाजों के नाम पर घुट-घुट कर दिन काटे थे, और अनजाने में वे वही ज़हर अपनी अगली पीढ़ियों को भी परोसती आ रही थीं।
यशोदा जी के चेहरे की सख्ती धीरे-धीरे पिघल गई। उन्होंने एक गहरी सांस ली और धीरे-धीरे चलकर अंजलि के पास पहुंचीं। अंजलि सहमकर थोड़ा पीछे होने लगी, लेकिन यशोदा जी ने अपने झुर्रियों भरे कांपते हाथों से अंजलि के गालों को छू लिया।
“जीती रह बहू…” यशोदा जी की आवाज़ में पहली बार वो कठोरता नहीं, बल्कि एक बुज़ुर्ग का सच्चा आशीष था। उन्होंने शारदा की तरफ देखा और बोलीं, “शारदा, आज तूने मेरी आंखें खोल दीं। मैं सोचती थी कि नियमों को पकड़कर रखना ही घर को जोड़े रखना होता है, लेकिन आज समझ आया कि घर नियमों से नहीं, अपनों के दर्द को समझने और प्यार से बंधता है। तूने जो हिम्मत आज दिखाई है, काश वो हिम्मत किसी ने मेरे दौर में दिखाई होती तो शायद मैं भी इतनी कठोर न बनती। आज से इस घर के नियम वही होंगे, जो तू बनाएगी।”
पूरे घर का माहौल एक पल में बदल गया। जिस हवेली में हमेशा एक अदृश्य डर और घुटन का साया रहता था, वहां अचानक खुशियों और अपनेपन की ताज़ी हवा बहने लगी। शारदा जी ने आगे बढ़कर अपनी सासू मां के चरण स्पर्श किए, और यशोदा जी ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया।
उस दिन माथुर निवास में सिर्फ एक बहू को कुर्सी पर बैठने का हक नहीं मिला था, बल्कि सदियों से चली आ रही उन बेड़ियों का अंत हुआ था जो संस्कारों के नाम पर स्त्रियों की सिसकियों को दबाती आई थीं। एक सास ने अपनी बहू के लिए मां बनकर यह साबित कर दिया था कि बदलाव की शुरुआत जब घर के भीतर से होती है, तभी समाज को एक नई और सुंदर दिशा मिलती है।
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