घर का मुख्य दरवाजा धीरे से खुला और भीतर दाखिल होते ही अलका के पैरों तले की जमीन खिसक गई। सामने फर्श पर उसकी सत्रह बरस की इकलौती बेटी तनीषा बेसुध पड़ी थी। बिखरे हुए सुनहरे रंगे बाल, चेहरे पर अस्त-व्यस्त हुआ गहरा मेकअप, एक हाथ में महंगी चमकती घड़ी और बदन पर पश्चिमी फैशन के नाम पर लिपटा अधूरा लिबास। कमरे की हवा में सिगरेट के धुएं और तीखी शराब की दुर्गंध इस कदर रची-बसी थी कि अलका को उबकाई आने लगी।
क्रोध, अपमान और बेबसी के मिले-जुले आवेग में अलका का हाथ उठा और उसने तनीषा की पीठ पर दो-तीन थप्पड़ जड़ दिए। “उठ! अभागन, उठ! किस मुंह से इस चौखट के अंदर कदम रखा तूने? यही संस्कार दिए थे मैंने तुझे? भगवान, मुझे पहले ही उठा लेता, तो अपनी आंखों से यह दिन न देखना पड़ता!” अलका की चीख में एक मां का कलेजा फटा जा रहा था। वह बदहवास होकर अपने बाल नोचने लगी।
तभी पूजाघर से माला फेरते हुए अलका की सास, सावित्री जी बाहर निकलीं। सफेद सूती साड़ी पहने, चेहरे पर झुर्रियों और जीवन के गहरे अनुभवों की लकीरें समेटे सावित्री जी ने तुरंत आगे बढ़कर बहू का हाथ थाम लिया। उनकी आवाज में एक अजीब सा ठहराव और दृढ़ता थी, “बस कर अलका! रुक जा। इस तरह कलेश करने से, इस बेसुध बच्ची पर हाथ उठाने से क्या बिगड़ी हुई बात संवर जाएगी? आवाज नीची रख, बाहर आधी रात का पहरा है। अगर दीवार के उस पार तक यह भनक लग गई, तो हमारे पूरे खानदान की इज्जत कौड़ियों के भाव नीलाम हो जाएगी।”
सावित्री जी के मजबूत हाथों का स्पर्श पाकर अलका वहीं फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूटकर रोने लगी। उसका आंचल आंसुओं से भीग गया। वह अपनी सास के पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगी, “अम्मा जी… मेरा दिमाग फटा जा रहा है। मैं क्या करूं? आप तो मुझे हमेशा आगाह करती थीं, हर बार टोकती थीं कि बेटी को इतनी बेलगाम छूट मत दे। पर मैं ही अंधी हो गई थी। मुझे लगता था कि मैं पुराने जमाने की बंदिशों में पली-बढ़ी, तो अपनी बेटी को जमाने के साथ कदमताल करना सिखाऊंगी। उसे मॉडर्न बनाने के फितूर ने मेरी आंखें बंद कर दी थीं।”
अलका अपनी छाती पीटते हुए आगे बोली, “सहेलियों में उसका रुतबा बढ़े, इसलिए मैंने उसकी हर जिद के आगे घुटने टेक दिए। सत्रह साल की कच्ची उम्र में उसे सत्तर हजार का स्मार्टफोन दिला दिया। हर हफ्ते ब्यूटी पार्लर के चक्कर, महंगे ब्रांडेड कपड़े, देर रात तक कमरे का दरवाजा बंद करके दोस्तों से बातें करना… मैंने इन सबको ‘पर्सनल स्पेस’ और ‘मॉडर्न लाइफस्टाइल’ का नाम देकर बढ़ावा दिया। जब भी आप कहती थीं कि कच्ची मिट्टी को ज्यादा हवा लगे तो बर्तन चटक जाता है, मैं आपको दकियानूसी समझकर आपकी बातें अनसुनी कर देती थी। आज उसी छूट ने मेरी बेटी का यह हाल कर दिया अम्मा जी! यह कल दोपहर अपनी दोस्त रिया के जन्मदिन का बहाना बनाकर निकली थी। बोली थी कि सहेलियां मिलकर केवल लंच करेंगी और शाम को सिनेमा देखकर लौट आएगी। पर मुझे क्या पता था कि वह जन्मदिन किसी होटल के बेसमेंट में चल रही रेव पार्टी का छलावा था! वहां यह लड़कों के साथ शराब पी रही थी, नाच रही थी… सिगरेट के कश लगा रही थी! उफ, सोचकर ही मेरी रूह कांप रही है। अगर इसके पापा को यह पता चल गया, तो वे तो जीते जी मर जाएंगे। वे जो इसे अपनी पलकों पर बैठाकर गुड़िया कहते नहीं थकते, वे यह सदमा कैसे बर्दाश्त करेंगे?”
सावित्री जी ने बहू के सिर पर स्नेह से हाथ फेरा और उसे सहारा देकर सोफे पर बैठाया। उन्होंने जग से एक गिलास पानी भरकर अलका के कांपते हाथों में थमाया। “पानी पी बहू, और खुद को संभाल। जब घर की छत टपकने लगे, तो रोने से काम नहीं चलता, छप्पर को तुरंत दुरुस्त करना पड़ता है। ईश्वर का लाख-लाख शुक्र मना कि यह बात चारदीवारी के बाहर नहीं फैली। यह तो भला हो हमारे सामने वाले पड़ोस के लड़के विनीत का। वह उस क्लब के जिस कैटरिंग विभाग में सुपरवाइजर है, वहीं उसने तनीषा को कुछ बिगड़े रईसजादों की टोली के साथ बहकते देख लिया। विनीत संस्कारी लड़का है। उसने बिना कोई तमाशा खड़े किए, सबसे पहले सीधे तुझे फोन किया। न उसने मोहल्ले में किसी को कानाफूसी की, न ही सीधे अपने ताऊ जी यानी तेरे पति को बताया, क्योंकि वह जानता था कि बाप का दिल यह नहीं झेल पाता। तू समय रहते अपनी कार लेकर वहां पहुंच गई और अपनी बच्ची को उस दलदल से सुरक्षित खींच लाई।”
अलका ने कांपती आंखों से सास को देखा, “अम्मा जी, क्या विनीत भैया सचमुच चुप रहेंगे? आज का जमाना तो ऐसा है कि लोग किसी की बर्बादी का तमाशा देखने के लिए गिद्ध की तरह ताक में रहते हैं। अगर उन्होंने अपने घर में या किसी पड़ोसी से जरा सा भी जिक्र कर दिया, तो कल सुबह का सूरज हमारे लिए बदनामी की कालिख लेकर उगेगा।”
अभी अलका की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि बैठक के बाहरी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। सावित्री जी ने इशारा किया और अलका ने दुपट्टे से अपने आंसू पोंछकर दरवाजा थोड़ा सा खोला। सामने विनीत ही खड़ा था। उसके हाथ में तनीषा का वह महंगा हैंडबैग था, जो वह क्लब के सोफे पर ही भूल आई थी।
विनीत ने नजरें नीची रखते हुए अत्यंत शालीनता से वह बैग अलका की तरफ बढ़ाया। अलका की घबराई हुई आंखें देखकर विनीत के चेहरे पर एक धीमा, आश्वस्त करने वाला भाव उभरा। उसने हाथ जोड़ते हुए बहुत ही संजीदा आवाज में कहा, “चाची जी, प्रणाम। दादी जी, आपको भी मेरा प्रणाम। चाची, आप इस तरह हाथ जोड़कर मुझे पराया मत कीजिए। मैं इस घर को अपना ही समझता हूं। मेरे बचपन के दिन इसी आंगन में खेलते हुए बीते हैं। तनीषा मेरी अपनी छोटी बहन जैसी है। आज जो कुछ भी मैंने देखा, वह वहीं उस क्लब के दरवाजे के बाहर ही दफन हो गया है। घर की बात अगर घर के लोगों के बीच न सुलझे, तो दुनिया सिर्फ तमाशा बनाती है और मुझे तमाशा देखना नहीं, अपने परिवार की लाज बचाना आता है। आप बिल्कुल बेफिक्र रहिए, मेरे मुंह से एक लफ्ज भी बाहर नहीं निकलेगा।”
अलका के अश्रुपूरित नेत्रों में विनीत के प्रति असीम कृतज्ञता उमड़ पड़ी। उसने रुंधे गले से कहा, “विनीत बेटा, तूने आज सिर्फ मेरी बच्ची को ही नहीं बचाया, इस पूरे परिवार के मान-सम्मान को खाक में मिलने से बचा लिया। तेरा यह अहसान मैं जिंदगी भर नहीं भूलूंगी।”
विनीत ने सिर हिलाया और कहा, “अहसान कैसा चाची? बस एक विनती है। तनीषा अभी बहुत नासमझ है। बाहरी दुनिया की चकाचौंध अक्सर इस उम्र में बच्चों की आंखों में भ्रम की धूल झोंक देती है। उसे मारिए-पीटिए मत, बल्कि उसे समझाइए। अपनों का भरोसा ही भटके हुए को वापस खींच लाता है। अब मैं चलता हूं, रात बहुत हो गई है।”
विनीत के जाने के बाद अलका ने दरवाजा बंद किया और गहरी सांस ली। उसके सीने का भारीपन थोड़ा कम हुआ था, लेकिन ममता की कसक अब भी सुलग रही थी।
सावित्री जी उसके करीब आईं और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोलीं, “सुना तूने बहू? विनीत ने जो कहा, वही इस समस्या की असली दवा है। आज के दौर में मां-बाप अपनी औलादों को भौतिक सुख-सुविधाएं तो सब कुछ दे देते हैं, लेकिन जो सबसे जरूरी चीज है—संस्कार, समय और सही-गलत की समझ—वही देना भूल जाते हैं। हम सोचते हैं कि बच्चे को हर महंगी चीज दिला देना ही अच्छी परवरिश है। लेकिन जब वही कच्ची उम्र का बच्चा दिशाहीन होकर भटक जाता है, तो सारा दोष केवल उस बच्चे के मत्थे मढ़ दिया जाता है। सच तो यह है अलका, कि जब बागबान ही पौधे की डालियों को सही सहारा देना छोड़ दे, तो बेल का गलत दिशा में फैल जाना स्वाभाविक है। गलती केवल तनीषा की नहीं, तुम्हारी उस अंधी छूट की भी है।”
अलका ने सिर झुका लिया। उसके भीतर का अपराधबोध अब आत्ममंथन में बदल रहा था। सावित्री जी ने आगे कहा, “पर अभी देर नहीं हुई है। जो पौधा थोड़ा सा झुक गया हो, उसे काटकर फेंका नहीं जाता, बल्कि खूंटा गाड़कर फिर से सीधा खड़ा किया जाता है। एक मां में वह दिव्य शक्ति होती है जो पाताल में गिरती संतान को भी अपने आंचल के सहारे स्वर्ग की राह पर ला सकती है। अब रोना बंद कर, अपनी कमर कस और इस बिगड़ी हुई दिशा को मोड़कर सही रास्ते पर ले आ।”
सास के इन शब्दों ने अलका के भीतर एक नई चेतना और असीम शक्ति का संचार कर दिया। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से बहते आंसू पोंछे। उसका चेहरा अब लाचारी का नहीं, बल्कि एक दृढ़ निश्चयी मां का आईना बन चुका था। उसने गहरी सांस ली और सीधे कदमों से उस अलग कमरे की ओर बढ़ी, जो उसने तनीषा को उसके ‘पर्सनल स्पेस’ के नाम पर सजाकर दिया था।
कमरे में तनीषा बिस्तर पर अचेत सी पड़ी थी। अलका ने एक पल उसे ममता भरी नजरों से देखा। फिर उसने एक बड़ा सूटकेस निकाला। सबसे पहले उसने टेबल पर रखा तनीषा का महंगा मोबाइल उठाया और उसका स्विच ऑफ करके अपनी अलमारी में बंद कर दिया। उसके बाद उसने तनीषा की अलमारी खोली। वहां टंगे उन तमाम अंग-प्रदर्शन करने वाले कपड़ों, महंगे मेकअप किट्स और क्लबिंग के सामान को समेटकर एक तरफ रख दिया। इसके बाद तनीषा की किताबों, साधारण सलवार-सूट और दैनिक उपयोग की जरूरी चीजों को सहेजकर अलका ने सीधे अपने और अपने पति के बेडरूम में ले जाकर रख दिया।
अलका ने तय कर लिया कि अब कोई अलग कमरा नहीं होगा। वह अपनी बेटी को फिर से अपने आंचल की छांव में रखेगी, ठीक वैसे ही जैसे बरसों पहले रखती थी।
सुबह के करीब नौ बज चुके थे। सूरज की तेज किरणें जब खिड़की के शीशों को चीरती हुई कमरे में आईं, तो तनीषा की आंखें खुलीं। उसका सिर भयंकर दर्द से फटा जा रहा था। मुंह का स्वाद कड़वा था और बदन टूट रहा था। उसने हड़बड़ाकर अपने चारों तरफ देखा। वह अपने अलग कमरे में नहीं, बल्कि अपनी मां के कमरे के बिस्तर पर थी। उसके बदन पर वही कल रात के गंदे कपड़े थे।
कमरे के कोने में अलका शांत भाव से बैठी भगवद्गीता के पन्ने पलट रही थी। तनीषा को होश में आते देख अलका ने किताब बंद की और उठकर उसके करीब आई। उसने बिना किसी गुस्से या चीख-पुकार के, एक कटोरी में गुनगुना नींबू-पानी तनीषा के आगे कर दिया।
तनीषा का कलेजा कांप उठा। उसे कल रात की धुंधली-धुंधली घटनाएं याद आने लगीं—क्लब का शोर, तेज संगीत, वह अनजान लड़का जो उसके करीब आने की कोशिश कर रहा था, शराब का वह तीखा घूंट और फिर अचानक अपनी मां का वहां पहुंचना। तनीषा की नजरें शर्म और खौफ के मारे झुक गईं। वह थर-थर कांपने लगी कि अभी मां उस पर टूटेगी, गालियां देगी या पूरे घर में तमाशा होगा।
“मां… मुझे माफ कर दो…” तनीषा की आंखों से पश्चाताप के आंसू छलक पड़े। वह हाथ जोड़कर फफक पड़ी, “मां, मुझे नहीं पता था कि वहां ऐसा सब होगा। रिया और उसके दोस्तों ने कहा कि अगर मैंने वो ड्रिंक नहीं पी, तो वे मुझे पिछड़ा और अनपढ़ समझेंगे। वे मेरा मजाक उड़ा रहे थे। मुझे लगा कि कूल दिखने के लिए यह सब जरूरी है… मां, मैं बहुत डर गई थी। मुझे मत मारो मां…”
अलका ने नींबू-पानी का कटोरा एक तरफ रखा और आगे बढ़कर अपनी कांपती हुई बच्ची को अपने सीने से कसकर भींच लिया। कोई डांट नहीं, कोई ताना नहीं। मां के उस आत्मीय, सुरक्षित आलिंगन में तनीषा एक छोटे बच्चे की तरह फूट-फूटकर रोने लगी।
अलका ने बहुत ही कोमल, पर गंभीर स्वर में उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, “तनीषा, आज मैं तुझे मारूंगी नहीं, क्योंकि तुझे मारने का मतलब है अपनी ही कमजोर परवरिश पर तमाचा जड़ना। गलती तेरी जितनी थी, उससे कहीं ज्यादा मेरी थी कि मैंने तुझे मर्यादा की सीमाएं सिखाए बिना आजादी के खुले आसमान में उड़ने के लिए छोड़ दिया। आधुनिक होना गलत नहीं है बेटा, लेकिन आधुनिकता के नाम पर अपनी आत्मा, अपनी मर्यादा और अपने आत्मसम्मान को गिरवी रख देना सबसे बड़ा खोखलापन है। जो दोस्त तुझे जहरीले घूंट पीने पर मजबूर करें, जो तेरी गरिमा की कीमत पर तुझे ‘कूल’ होने का तमगा दें, वे तेरे दोस्त नहीं, तेरी बर्बादी के साथी हैं।”
अलका ने तनीषा का चेहरा अपने हाथों में थामा और उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “आज से तेरा कोई अलग कमरा नहीं होगा। जब तक तू सही और गलत के फर्क को पूरी तरह आत्मसात नहीं कर लेती, तू मेरे साथ रहेगी। तेरा यह फोन फिलहाल बंद रहेगा। तुझे दुनिया की झूठी चकाचौंध से दूर, अपनी असली पहचान और पढ़ाई की तरफ लौटना होगा। तेरी मां तेरे साथ एक चट्टान की तरह खड़ी है, लेकिन अब लक्ष्मण रेखा तुझे खुद खींचनी होगी।”
तनीषा ने अपनी मां के सीने में अपना चेहरा छुपा लिया और सिसकते हुए वचन दिया, “मां, मैं वादा करती हूं, अब कभी किसी दिखावे के पीछे नहीं भागूंगी। मुझे आपका वही पुराना प्यार और आपका अनुशासन चाहिए। मैं अपनी गलतियों को सुधारूंगी।”
दरवाजे की ओट में खड़ी दादी सावित्री जी ने जब यह दृश्य देखा, तो उनके चेहरे पर संतोष की एक असीम मुस्कान तैर गई। उन्हें विश्वास हो गया था कि भटकी हुई कश्ती अब तूफान से निकलकर सुरक्षित किनारे पर लौट आई थी।
दोस्तों, आज के इस अंधी चकाचौंध वाले दौर में अक्सर माता-पिता बच्चों को ‘आधुनिक’ और ‘स्वतंत्र’ बनाने के फेर में उन पर से अपना नियंत्रण और संवाद पूरी तरह खो देते हैं। लेकिन याद रखिए, आजादी और स्वच्छंदता में एक बहुत बारीक फर्क होता है। बच्चों को भौतिक सुविधाएं देने से ज्यादा जरूरी है उन्हें जीवन के नैतिक मूल्य और मर्यादा की समझ देना।
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