अनिकेत ने रिया के सामने वह वीडियो चला दिया। उसने न कोई चीख-पुकार की, न हाथ उठाया, बस भरी आंखों से शांत स्वर में कहा, “रिया, मुझे तुम पर तरस आ रहा है। जिस मां ने छह महीने जागकर तुम्हारे बच्चे को अपनी छाती से लगाकर पाला, जिसने तुम्हारी हर सेवा को अपना सौभाग्य समझा, तुमने उस मां के आंसुओं का यह सिला दिया? और बाबूजी, जिनकी उंगली पकड़कर मैंने चलना सीखा, तुमने उन्हें मुफ्तखोर ठहरा दिया? याद रखना रिया, आज जो बीज हम अपने बच्चों के सामने बो रहे हैं, कल बुढ़ापे में वही फसल हमें भी काटनी होगी। अगर कान्हा ने कल हमारे साथ यही किया, तो क्या तुम सह पाओगी?”
हरिनारायण जी के पुश्तैनी मकान के आंगन में आज पैर रखने की जगह नहीं थी। चारों तरफ रंग-बिरंगी रोशनियां झिलमिला रही थीं, सुगंधित फूलों के गुलदस्ते महक रहे थे और बैकग्राउंड में बजता धीमा शास्त्रीय संगीत माहौल को गरिमामय बना रहा था। जबलपुर के एक प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेज में गणित के विभागाध्यक्ष पद से पैंतीस वर्षों की लंबी और निष्कलंक सेवा के बाद आज वे सेवानिवृत्त हुए थे। उनके साथी प्राध्यापक, पुराने छात्र और रिश्तेदार उन्हें बधाई देने आ रहे थे। दो वर्ष पहले ही वे अपनी छोटी बेटी अनामिका का विवाह एक संभ्रांत परिवार में करके अपनी सबसे बड़ी पारिवारिक चिंता से मुक्त हो चुके थे। अनामिका अपने ससुराल में बेहद प्रसन्न थी और दामाद भी बहुत सुलझे हुए इंसान थे।
बड़ा बेटा अनिकेत भी अपनी पसंद से कॉलेज की सहपाठी रिया के साथ विवाह के बंधन में बंधा था। हरिनारायण जी और उनकी धर्मपत्नी अन्नपूर्णा जी ने बच्चों की खुशी को ही अपनी खुशी मानकर बिना किसी हिचक के इस रिश्ते को सहर्ष स्वीकारा था। अनिकेत और रिया दोनों पुणे की एक बड़ी आईटी कंपनी में ऊंचे पदों पर कार्यरत थे और वहीं अपनी आधुनिक जिंदगी में व्यस्त रहते थे। रिया स्वभाव से थोड़ी तुनकमिज़ाज, बेहद आधुनिक और अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर हद से ज्यादा सचेत रहने वाली लड़की थी। हालांकि, साल में एकाध बार ही उसका ससुराल आना होता था, इसलिए कभी कोई प्रत्यक्ष विवाद नहीं हुआ। अन्नपूर्णा जी हमेशा यही सोचतीं कि आज की पीढ़ी की अपनी सोच और जीवनशैली है, इसलिए हर छोटी बात को दिल से लगाने की बजाय सामंजस्य बिठाना ही गृहस्थी का असली धर्म है।
समारोह अपने पूरे शबाब पर था। भोजन के स्टॉल पर लोग स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद ले रहे थे। तभी हरिनारायण जी के बचपन के लंगोटिया यार प्रोफेसर महेंद्र ने उनकी पीठ थपथपाते हुए कहा, “यार हरी, अब तो जिम्मेदारियों की घंटी बजना बंद हो गई। अब इस बड़े से मकान में तुम दोनों अकेले रहकर क्या करोगे? क्यों न तुम और भाभी जी पुणे शिफ्ट हो जाओ? बेटा-बहू के साथ रहोगे तो बुढ़ापा भी हंसते-खेलते कट जाएगा और अकेलापन भी पास नहीं फटकेगा।”
संयोग से उसी वक्त प्लेट में मीठा लिए रिया वहां से गुजर रही थी। महेंद्र जी के शब्द उसके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरे। उसके चेहरे की मुस्कान पल भर में गायब हो गई और माथे पर गहरी चिंता की लकीरें उभर आईं। उसके मन में तुरंत एक अजीब सी बेचैनी घर कर गई कि कहीं बाबूजी सचमुच इस बात को गंभीरता से लेकर उनके साथ पुणे चलने का मन न बना लें। उसकी निजी स्वतंत्रता, लेट नाइट पार्टियां और अपनी मर्जी से जीने की आदत पर उसे खतरा मंडराता नजर आने लगा।
देर रात जब पार्टी समाप्त हो गई, सारे मेहमान रुखसत हो गए और घर में सन्नाटा पसर गया, तो बेडरूम का दरवाजा बंद करते ही रिया का सब्र टूट गया। वह अनिकेत पर बरस पड़ी, “देखो अनिकेत, मैं पहले ही साफ कर देना चाहती हूं। तुम्हारे मम्मी-पापा हमारे साथ पुणे नहीं जाएंगे। मुझे अपनी जिंदगी में किसी का दखल बिल्कुल पसंद नहीं है। तुम सुबह उन्हें कोई भी बहाना बनाकर संभाल लेना, पर वो हमारे साथ नहीं आने चाहिए।”
अनिकेत हक्का-बक्का रह गया। उसने धीमी आवाज में समझाने की कोशिश की, “रिया, तुम कैसी बातें कर रही हो? बाबूजी आज रिटायर हुए हैं। जीवन भर उन्होंने हमारे लिए पसीना बहाया है। एक बेटे के तौर पर क्या मेरा यह फर्ज भी नहीं बनता कि मैं उनसे अपने साथ चलने का आग्रह करूं? लोग क्या कहेंगे?”
रिया ने त्योरियां चढ़ाते हुए कहा, “मुझे नहीं पता लोग क्या कहेंगे। अगर वो हमारे साथ गए, तो मैं उस घर में एक दिन भी चैन से नहीं रह पाऊंगी।”
दुर्भाग्य से, उसी समय अन्नपूर्णा जी रसोई से पीने का पानी लेने निकली थीं और बेडरूम के अधखुले दरवाजे से छनकर आती यह कड़वी बातचीत सीधे उनके कानों में पड़ गई। एक मां का कलेजा भीतर तक छलनी हो गया, पर उन्होंने चेहरे पर शिकन तक न आने दी। वे चुपचाप अपने कमरे में लौट आईं। अगली सुबह नाश्ते की मेज पर रिया का चेहरा उतरा हुआ था। वह किसी से आंखें नहीं मिला रही थी और रुखा-सूखा व्यवहार कर रही थी। अन्नपूर्णा जी उसकी इस नाराजगी की वजह भली-भांति जानती थीं, लेकिन उन्होंने अपनी ममता के आंचल में उस दर्द को समेटे रखा।
दोपहर में जब गाड़ी में सामान रखते हुए अनिकेत ने संकोच और भारी मन से कहा, “बाबूजी, अब आप भी रिटायर हो गए हैं, क्यों न आप और मां हमारे साथ ही पुणे चलें? वहां हमारा फ्लैट भी बड़ा है और आप दोनों का मन भी लगा रहेगा।”
हरिनारायण जी के चेहरे पर एक स्वाभाविक चमक आ गई। अपने बेटे के मुंह से यह सुनकर किसी भी पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता। वे कुछ कहते, उससे पहले ही अन्नपूर्णा जी ने स्थिति की नज़ाकत को भांपते हुए मुस्कुराकर बात संभाल ली। वे बोलीं, “अरे नहीं बेटा! इतने सालों की भागदौड़ के बाद अब जाकर तो हमें अपने लिए फुर्सत के पल मिले हैं। अब हम दोनों अपनी पुरानी किताबों, बगीचे और पुराने संगी-साथियों के साथ वक्त बिताएंगे। तीर्थ यात्राओं पर जाएंगे। जब तुम्हारा मन करे, तुम यहां आ जाना।”
रिया के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान तैर गई और उसने चैन की सांस ली। अनिकेत अपनी मां की समझदारी के आगे नतमस्तक हो गया, हालांकि उसे अपनी पत्नी के व्यवहार पर भीतर ही भीतर ग्लानि हो रही थी।
देखते ही देखते दो साल का वक्त रेत की तरह फिसल गया। हरिनारायण जी अपनी पेंशन, सुबह की सैर और समाज सेवा में व्यस्त रहते, जबकि अन्नपूर्णा जी घर-गृहस्थी और पूजा-पाठ में रमी रहतीं। इसी दौरान रिया गर्भवती हुई। प्रसव का समय नजदीक आया, तो उसने बड़ी चतुराई से अनिकेत से कहकर ससुराल आने की इच्छा जताई। वह जानती थी कि किसी बड़े शहर के अस्पताल में और अकेले रहकर नवजात की देखभाल करना उसके बस की बात नहीं थी। वह जबलपुर आई और पूरे छह महीने अन्नपूर्णा जी ने अपनी गिरती सेहत की परवाह किए बिना अपनी बहू की ऐसी सेवा की, जैसी कोई सगी मां भी शायद ही कर पाए। सुबह के पौष्टिक काढ़े से लेकर रात में बच्चे के गीले कपड़े बदलने तक, अन्नपूर्णा जी ने अपनी पलकें नहीं झपकाईं। हरिनारायण जी अपने पोते कान्हा को देखकर निहाल रहते थे।
लेकिन जैसे ही छह महीने पूरे हुए और बच्चा थोड़ा संभल गया, रिया के मन में फिर वही पुराना डर सिर उठाने लगा कि कहीं सास-ससुर बच्चे के मोह में बंधकर पुणे आने की जिद न पकड़ लें। उसने तुरंत अनिकेत से अपनी कंपनी का प्रोजेक्ट खत्म होने का बहाना बनवाया और एक दिन चुपचाप अपनी पैकिंग करके पुणे के लिए रवाना हो गई। जाते समय उसने औपचारिकता के लिए भी यह नहीं कहा कि ‘मां जी, आप भी कुछ दिन के लिए चलिए।’ अन्नपूर्णा जी ने नम आंखों से अपनी छाती से चिपके पोते को विदा किया, पर उनके होठों पर सिर्फ आशीष ही रहे।
पुणे लौटने के कुछ ही महीनों बाद रिया की असली मुश्किलें शुरू हुईं। वर्क फ्रॉम होम खत्म हो चुका था और हाइब्रिड मॉडल में उसे हफ्ते में तीन-चार दिन ऑफिस जाना पड़ता था। एक साल का नटखट कान्हा अब पूरे घर में दौड़ने लगा था। मेड रखी गई, लेकिन वह कभी छुट्टी मार लेती, तो कभी बच्चे को ठीक से संभाल नहीं पाती। न रिया चैन से ऑफिस का काम कर पाती, न अपनी सहेलियों के साथ किटी पार्टी या पार्लर जा पाती। घर की अव्यवस्था, बच्चे का रोना और ऑफिस का तनाव मिलकर उसके स्वभाव को और ज्यादा चिड़चिड़ा बनाने लगे। रात-रात भर जागकर जब वह थककर चूर हो जाती, तब उसे पहली बार अपनी सास के हाथों के उस सुकून और ममता भरे स्पर्श की सख्त कमी खलने लगी, जिसे वह जबलपुर में मुफ्त की सेवा समझती रही थी।
एक शाम थकी-हारी रिया ने अनिकेत के आगे अपना दुखड़ा रोते हुए एक नया पासा फेंका, “अनिकेत, मैं सोच रही थी कि बाबूजी और मम्मी जी का भी तो कान्हा के साथ खेलने का मन करता होगा। वो वहां अकेले बोर होते रहते हैं। क्यों न तुम कुछ महीनों के लिए उन्हें यहीं अपने पास बुला लो? बच्चे का मन भी लगा रहेगा और उनका भी अकेलापन दूर हो जाएगा।”
अनिकेत तो जैसे इसी दिन का इंतजार कर रहा था। उसने बिना कोई सवाल किए उसी रात अपने माता-पिता के लिए फ्लाइट के टिकट बुक करवा दिए और फोन पर खुशखबरी सुना दी। हरिनारायण जी खुशी से फूले नहीं समाए। पोते को गोद में खिलाने और बेटे के साथ रहने की उमंग ने उनके बूढ़े पैरों में नई जान फूंक दी। लेकिन अन्नपूर्णा जी का दिल किसी अनहोनी की आशंका से कांप रहा था। वे जानती थीं कि बहू के मन में अचानक यह प्रेम नहीं उपजा है, बल्कि यह केवल अपनी सहूलियत का इंतजाम है। फिर भी, बेटे का मान रखने और पोते के मोह में वे दोनों अपना घर बंद करके पुणे पहुंच गए।
शुरुआती एक हफ्ता बेहद अच्छा बीता। रिया ने खूब आवभगत की, अच्छे-अच्छे व्यंजन बनाए। लेकिन जैसे ही स्थिति सामान्य हुई, रिया का असली रंग सामने आने लगा। अब उसे एक ऐसी दाई मिल चुकी थी जो चौबीसों घंटे बिना किसी पगार के बच्चे की देखभाल कर सकती थी। रिया सुबह ऑफिस निकल जाती या फिर अपने दोस्तों के साथ लंच, शॉपिंग, किटी पार्टी और स्पा के चक्कर लगाने लगती। पीछे से पूरे घर का जिम्मा, अनिकेत की पसंद का खाना बनाना, बर्तनों की देखरेख और ऊपर से साल भर के चंचल बच्चे को संभालना—यह सब अन्नपूर्णा जी के कमजोर कंधों पर आ पड़ा।
सत्तर की उम्र पार कर चुके हरिनारायण जी से अपनी पत्नी की यह दुर्दशा देखी नहीं जाती थी। अन्नपूर्णा जी के घुटनों में ऑस्टियोआर्थराइटिस की पुरानी समस्या थी। लगातार सीढ़ियां चढ़ने-उतरने और बच्चे को गोद में लेकर घूमने से उनके घुटने सूज गए थे और वे दर्द से कराह उठती थीं। पर बहू के सामने वे अपना दर्द कभी जाहिर नहीं होने देती थीं।
एक शनिवार की दोपहर रिया किसी लग्जरी मॉल में दोस्तों के साथ पार्टी की तैयारी कर रही थी। उसने गहरे नीले रंग की वेस्टर्न ड्रेस पहनी थी और बैग संभाल रही थी। उसी समय अन्नपूर्णा जी रसोई में कान्हा के लिए दलिया बना रही थीं। अचानक उनके घुटने में ऐसा भयंकर दर्द उठा कि उनके हाथ से चमचा छूट गया और वे दीवार का सहारा लेकर फर्श पर बैठ गईं। उनकी आंखों से दर्द के मारे आंसू टपक पड़े।
हरिनारायण जी पानी पीने आए तो उन्होंने यह दृश्य देख लिया। उनका खून खौल उठा, पर उन्होंने खुद को शांत रखा। वे ड्राइंग रूम की तरफ बढ़े, जहां रिया सैंडल पहन रही थी। हरिनारायण जी ने बेहद संयत स्वर में कहा, “बहू बेटा, आज तुम्हारी मां की तबीयत बिल्कुल ठीक नहीं है। उसके घुटनों में बहुत तेज दर्द है और वह खड़ी भी नहीं हो पा रही है। अगर आज कोई बहुत जरूरी काम न हो, तो क्या तुम घर पर रुककर कान्हा को संभाल लोगी ताकि अन्नपूर्णा थोड़ा आराम कर सके?”
रिया का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उसने अपने हाथ का पर्स सोफे पर पटका और चीखते हुए बोली, “बाबूजी! यह क्या रोज-रोज का नाटक है? मैंने पूरे हफ्ते काम करने के बाद आज का दिन अपने दोस्तों के लिए रखा है। अगर आप लोगों से एक छोटा सा बच्चा नहीं संभलता, तो यहां क्या सिर्फ आराम फरमाने और राजा-रानी की तरह हुक्म चलाने आए हैं? जब देखिए कोई न कोई बीमारी लेकर बैठ जाती हैं!”
उसके ये जहरीले शब्द सीधे हरिनारायण जी के आत्मसम्मान के सीने में खंजर की तरह चुभे। जीवन भर सैकड़ों विद्यार्थियों को अनुशासन और संस्कार सिखाने वाले प्रोफेसर हरिनारायण जी अवाक रह गए। उनका गला रुंध गया और आंखें पथरा गईं। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस बेटे के घर वे आए हैं, वहां उनकी जीवनसंगिनी का ऐसा घोर अपमान होगा।
अन्नपूर्णा जी किसी तरह दीवार पकड़कर बाहर आईं। उन्होंने अपने पति का कांपता हुआ हाथ थाम लिया। वे जानती थीं कि अगर बात आगे बढ़ी, तो अनिकेत और रिया के दांपत्य में दरार आ जाएगी। उन्होंने आंखों ही आंखों में हरिनारायण जी से शांत रहने की प्रार्थना की। वे उन्हें धीरे से अपने कमरे में ले गईं और दरवाजा सटाकर बोलीं, “सुनिए जी, अपने मान-सम्मान को आहत मत होने दीजिए। जहां हमारी कद्र सिर्फ एक नौकर की तरह हो, वहां हमारा एक पल भी रुकना हमारे संस्कारों की तौहीन है। हम आज ही अपने घर लौट चलेंगे। वैसे भी मुझे अपने डॉक्टर को घुटने दिखाने हैं। आप अनिकेत से कोई बहस मत कीजिएगा, मैं खुद बात कर लूंगी।”
शाम को जब अनिकेत ऑफिस के किसी काम से बाहर से लौटा, तो उसने देखा कि दोनों सूटकेस पैक रखे हैं। अन्नपूर्णा जी शांत भाव से सोफे पर बैठी थीं और हरिनारायण जी खिड़की से बाहर शून्य में ताक रहे थे।
अनिकेत चौंक गया, “मां, यह सब क्या है? यह सूटकेस क्यों बंधे हैं?”
अन्नपूर्णा जी ने एक बहुत ही सौम्य मुस्कान के साथ कहा, “बेटा, हमारे जबलपुर लौटने का समय आ गया है। तू हमारी कल की ट्रेन की टिकट करवा दे।”
“पर मां, अचानक क्या हुआ? सब ठीक तो है न? रिया ने कुछ कहा क्या? या कान्हा ने परेशान किया?” अनिकेत ने घबराकर पूछा।
अन्नपूर्णा जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “नहीं मेरे लाल, कोई बात नहीं है। बस, हम बूढ़े परिंदों को अपने पुराने घोंसले की याद सता रही है। तुम्हारे पापा का यहां फ्लैट की चारदीवारी में दम घुटता है। वहां उनका पुस्तकालय है, दोस्त हैं, खुली हवा है। और फिर जब तुम्हारा मन करे, तुम कान्हा को लेकर हमारे पास आ जाना।”
अनिकेत ने अपनी मां की आंखों में तैरती उस अथाह उदासी को पढ़ लिया, जिसे वे मुस्कान के पीछे छुपाने का प्रयास कर रही थीं। अगली सुबह जब वे दोनों स्टेशन के लिए निकले, तो रिया अपने कमरे में ही रही, वह बाहर विदा करने तक नहीं आई। हरिनारायण जी और अन्नपूर्णा जी ने किसी से कोई शिकायत नहीं की और चुपचाप अपने स्वाभिमान की गठरी बांधकर ट्रेन में बैठ गए।
जबलपुर पहुंचकर उन्होंने राहत की सांस ली, लेकिन रिया के घर का माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था। अनिकेत को अपनी पत्नी की बेरुखी और माता-पिता के अचानक चले जाने की असली वजह समझने में देर नहीं लगी। उसने घर में लगे सीसीटीवी कैमरे की रिकॉर्डिंग चेक की और जब उसने उस दोपहर का वीडियो देखा, जिसमें रिया उसके लाचार माता-पिता पर चिल्ला रही थी और कह रही थी कि ‘क्या यहां आराम फरमाने आए हैं’, तो अनिकेत के पैरों तले जमीन खिसक गई।
अनिकेत ने रिया के सामने वह वीडियो चला दिया। उसने न कोई चीख-पुकार की, न हाथ उठाया, बस भरी आंखों से शांत स्वर में कहा, “रिया, मुझे तुम पर तरस आ रहा है। जिस मां ने छह महीने जागकर तुम्हारे बच्चे को अपनी छाती से लगाकर पाला, जिसने तुम्हारी हर सेवा को अपना सौभाग्य समझा, तुमने उस मां के आंसुओं का यह सिला दिया? और बाबूजी, जिनकी उंगली पकड़कर मैंने चलना सीखा, तुमने उन्हें मुफ्तखोर ठहरा दिया? याद रखना रिया, आज जो बीज हम अपने बच्चों के सामने बो रहे हैं, कल बुढ़ापे में वही फसल हमें भी काटनी होगी। अगर कान्हा ने कल हमारे साथ यही किया, तो क्या तुम सह पाओगी?”
अनिकेत के ये शांत लेकिन वज्र जैसे शब्द सीधे रिया के अंतःकरण पर लगे। अनिकेत ने उस दिन के बाद से रिया से बात करना लगभग बंद कर दिया। वह बच्चे को क्रेच में छोड़ने लगा और घर के कामों के लिए कुक रख लिया। रिया दिन-रात घर की भागदौड़, ऑफिस के तनाव और अनिकेत की पथरीली खामोशी के बीच पिसने लगी।
एक दिन जब कान्हा को तेज बुखार हुआ, तो वह रात भर रोता रहा। रिया थर्मामीटर हाथ में लिए अकेली बैठी रो रही थी। अनिकेत डॉक्टर को फोन करने बाहर गया था। उस तन्हाई में जब उसने अपने बच्चे को तड़पते देखा, तब उसे याद आया कि जब कान्हा छह महीने का था और उसे ऐसी ही ठंड लगी थी, तब मां जी ने पूरी रात उसे अपनी छाती से लगाकर बिताई थी ताकि बच्चे को गर्माहट मिल सके। उस रात मां जी ने एक घूंट पानी तक नहीं पिया था।
रिया की आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उसे अपनी आधुनिकता, अपने अहंकार और अपने स्वार्थ की संकीर्णता पर बेहद घिन आने लगी। उसे समझ आ गया कि बुजुर्ग घर में मुफ्त की रोटियां तोड़ने नहीं आते, बल्कि वे उस वटवृक्ष की तरह होते हैं जो खुद धूप और आंधियां सहकर पूरे परिवार को संस्कारों और सुरक्षा की ठंडी छांव देते हैं। रिश्तों का आधार सहूलियत नहीं, बल्कि समर्पण और सम्मान होता है।
अगले ही हफ्ते रिया ने ऑफिस से दस दिन की छुट्टी ली। उसने अनिकेत से कुछ नहीं कहा, बस कान्हा का बैग पैक किया और अनिकेत के हाथ में जबलपुर की तीन फ्लाइट टिकटें रख दीं। अनिकेत ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। रिया की आंखें आंसुओं से भीगी थीं और उसने हाथ जोड़कर सिर्फ इतना कहा, “मुझे अपनी गलतियों का प्रायश्चित करने का एक मौका दो अनिकेत। मुझे अपनी मां और अपने बाबूजी के चरणों में माफी मांगनी है।”
जब जबलपुर के उस पुराने मकान का दरवाजा खुला, तो सामने अन्नपूर्णा जी तुलसी के पौधे में जल चढ़ा रही थीं और हरिनारायण जी अखबार पढ़ रहे थे। जैसे ही उन्होंने अनिकेत, रिया और कान्हा को देखा, उनके चेहरे पर वही पुरानी वात्सल्य भरी चमक लौट आई।
इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, रिया दौड़कर अन्नपूर्णा जी के चरणों में गिर पड़ी। उसकी हिचकियां बंध गईं, “मां जी! मुझे माफ कर दीजिए। मैं अपनी सुख-सुविधाओं और स्वार्थ में इतनी अंधी हो गई थी कि यह भूल गई कि परिवार सहूलियत से नहीं, एक-दूसरे के सम्मान से चलता है। मैंने आपका बहुत दिल दुखाया है मां जी, लेकिन आज आपकी यह बहू अपनी भूल सुधारने आई है।”
अन्नपूर्णा जी का ममतालु हृदय पिघल गया। उन्होंने बिना एक पल गंवाए रिया को उठाकर अपने सीने से लगा लिया और उसके आंसू पोंछते हुए कहा, “पगली, मां-बाप भी कभी अपने बच्चों से नाराज होते हैं क्या? तू समझ गई, हमारे लिए यही सबसे बड़ा सुख है।”
हरिनारायण जी ने आगे बढ़कर कान्हा को अपनी गोद में उठा लिया। उस दिन उस पुराने घर के आंगन में न कोई कड़वाहट बची थी, न कोई गिला-शिकवा। रिया ने सच्चे मन से अपने सास-ससुर की सेवा करने और उन्हें अपने जीवन का सबसे अभिन्न अंग मानने का संकल्प लिया। उसने तय किया कि वह अब अपनी नौकरी को इस तरह व्यवस्थित करेगी जिससे वह अपने परिवार और बुजुर्गों को पूरा सम्मान और समय दे सके। पूरा परिवार एक बार फिर प्रेम, सम्मान और विश्वास के अटूट धागे में बंध चुका था।
दोस्तों, आज के आधुनिक दौर में हम अक्सर अपनी सहूलियत और आजादी के फेर में उन बुजुर्गों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा बैठते हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन हमारे भविष्य को संवारने में खपा दिया। क्या बुजुर्गों की अहमियत केवल बच्चों की देखरेख करने या जरूरत पड़ने पर काम आने तक ही सीमित है? क्या परिवार में उनके सम्मान और भावनाओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए? इस संवेदनशील विषय पर आपकी क्या राय है, हमें अपनी टिप्पणी के माध्यम से जरूर बताएं।
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