कौशल्या जी ने प्यार से अंकिता के सिर पर हाथ फेरा और उसके आंसू पोंछते हुए बड़े वात्सल्य से कहा, “पगली, कर्ज कैसा? एक बात हमेशा गांठ बांध कर रख ले। एक घर तभी बिखरता है जब घर के लोग अपनों की बजाय गैरों की फुसफुसाहटों पर यकीन करने लगते हैं। जब तक सास अपनी बहू की ढाल बनकर खड़ी रहेगी और बहू अपनी सास को अपनी मां का दर्जा देगी, तब तक दुनिया की कोई भी बसंती इस चौखट की एक ईंट भी नहीं हिला सकती।
कौशल्या जी खाट पर कंबल ओढ़कर बैठी थीं और पास रखी पीतल की परात में मटर छील रही थीं। रसोई से अदरक और इलायची वाली कड़क चाय की भीनी-भीनी महक पूरे घर में तैर रही थी। तभी मुख्य लोहे का दरवाजा चरमराते हुए खुला और एक तेज, बेचैन आवाज ने आंगन की शांति को एकदम से चीर दिया। “अरे कौशल्या भाभी! कहां दुबकी बैठी हो जरा बाहर तो निकलो… हमारी छाती पर तो मानो पहाड़ टूट पड़ा है और तुम मजे से धूप सेंक रही हो! जब तक तुम्हें पूरी बात बता न दें, हमारे कलेजे में आग जलती रहेगी, रत्ती भर चैन नहीं मिलेगा!”
बगल के बरामदे में आरामकुर्सी पर बैठकर चश्मा लगाए अखबार पढ़ रहे विश्वंभर जी ने जैसे ही यह भारी-भरकम आवाज सुनी, उन्होंने चश्मे के ऊपर से झांका और धीमी आवाज में बुदबुदाए, “लो भाई, मोहल्ले का चलता-फिरता आकाशवाणी केंद्र आ धमका। अब अगले दो घंटे किसके घर में आग लगेगी, ईश्वर ही जाने।” इतना कहकर उन्होंने अखबार समेटा, अपनी चप्पलें घसीटते हुए कमरे में गए और भीतर से दरवाजा बंद कर लिया।
कौशल्या जी की नजर जब कमरे के बंद होते दरवाजे पर पड़ी, तो उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान बिखर गई। वहीं पास में बैठी कामवाली चंपा, जो आंगन में गेहूं साफ कर रही थी, उसने तुरंत कौशल्या जी की तरफ झुककर फुसफुसाते हुए कहा, “मां जी, जरा होशियार रहिएगा। ये बसंती काकी मोहल्ले भर में आग लगाने के लिए ही मशहूर हैं। किसके घर में कब कलह करवानी है, इनका रोज का यही धंधा है। भगवान जाने आज किसका कच्चा-चिट्ठा लेकर आई हैं।”
कौशल्या जी ने मटर का छिलका टोकरी में डालते हुए बड़े सहज भाव से आवाज लगाई, “अरे बसंती, दरवाजे पर ही क्यों खड़ी हो? यहां आंगन में धूप खिली है, आकर खाट पर बैठो। बताओ, ऐसी कौन सी आफत आ गई जो तुम्हारी सांस उखड़ रही है?”
बसंती ने चारों तरफ अपनी चौकन्नी आंखें दौड़ाईं। उसने दरवाजे की ओट देखी, फिर रसोई की खिड़की की तरफ झांका और दबे पांव पास आकर खाट के कोने पर बैठ गई। उसने कौशल्या जी का हाथ पकड़ते हुए रहस्यमयी आवाज में कहा, “अरे भाभी, यहां खुले में बैठ के बात नहीं हो सकती। अंदर चलो, तुम्हारे कमरे में बैठ के कुंडी लगाकर बताएंगे। बात ही इतनी शर्मनाक और गंभीर है कि अगर किसी गैर के कान में पड़ गई तो खानदान की मिट्टी पलीत हो जाएगी।”
कौशल्या जी ने माथे पर बल डालते हुए पूछा, “अरे ऐसा भी क्या छुपाना? घर में कोई पराया तो है नहीं। जो कहना है साफ-साफ यहीं कहो।”
बसंती ने अपना पल्लू ठीक किया, गर्दन आगे बढ़ाई और अपनी आवाज को बेहद फुसफुसाहट भरे अंदाज में बदलकर बोली, “भाभी, तुम्हें तो दुनियादारी की कोई खबर ही नहीं रहती। तुम तो अपनी बहू को सिर पर चढ़ाकर घूमती हो, लेकिन बाजार और चौराहे पर तुम्हारी उसी लाडली बहू अंकिता के बारे में कैसी-कैसी गंदी बातें उड़ रही हैं, तुम्हें अंदाजा भी नहीं है। मेरी तो सुनकर ही रूह कांप गई। पहले अंदर चलो और जरा एक कप गरम चाय बनवाओ, गला सूख रहा है। फिर तुम्हें इत्मीनान से बताते हैं कि तुम्हारी पीठ पीछे क्या गुल खिल रहे हैं। यहां खुले में कहीं तुम्हारी बहू के कान में बात न पड़ जाए।”
कौशल्या जी के चेहरे पर कोई हड़बड़ाहट नहीं आई। उनकी अनुभवी आंखों ने बसंती की आंखों में तैरती उस कुटिल चमक को तुरंत भांप लिया, जो दूसरों के घरों में आग लगाकर तमाशा देखने वालों के चेहरे पर अक्सर दिखाई देती है। उन्होंने बिना एक पल गंवाए, अपनी आवाज को थोड़ा और ऊंचा करते हुए सीधे रसोई की तरफ आवाज लगाई, “अंकिता बहू! जरा एक कप कड़क चाय और बना देना और यहीं बाहर आंगन में ले आना। तेरी बसंती चाची आई हैं और तेरे ही बारे में कोई बहुत जरूरी बात बताने वाली हैं!”
सास की यह बुलंद आवाज सुनकर बसंती के तो जैसे होश ही उड़ गए। उसके चेहरे का रंग फक पड़ गया। वह हड़बड़ाकर अपनी जगह से आधी खड़ी हो गई और घबराते हुए बोली, “अरे… अरे भाभी! ये क्या अनर्थ कर रही हो? तुमने बहू को आवाज क्यों लगा दी? हमने तुमसे चुपके से बताने को कहा था। तुम तो भरी दोपहरी में सारा तमाशा खड़ा करने पर तुल गई!”
जब तक बसंती अपनी घबराहट पर काबू पाती, तब तक रसोई का पर्दा हटा और अंकिता एक हाथ में चाय की ट्रे और चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान लिए आंगन में आ गई। अंकिता ने खाट की छोटी मेज पर चाय की प्याली रखी और बसंती के पैर छूते हुए बड़े आदर से कहा, “प्रणाम चाची जी। लीजिए, आपकी चाय। बताइए, आप मेरे बारे में मां जी से क्या कह रही थीं? मुझसे कोई भूल-चूक हो गई क्या?”
कौशल्या जी ने चाय की चुस्की ली और बड़े शांत लेकिन मजबूत स्वर में कहा, “हां बसंती, अब बहू भी सामने आ गई है और चाय भी तैयार है। अब जरा खुलकर, ऊंची आवाज में बताओ कि चौराहे पर मेरी बहू के बारे में क्या चर्चा चल रही है? हम भी तो सुनें कि हमारे पीठ पीछे दुनिया क्या कह रही है। आखिर घर की बात है, हमें भी पता चलना चाहिए।”
बसंती की हालत इस वक्त काटो तो खून नहीं जैसी हो गई थी। उसके होंठ कांपने लगे और नजरें झुक गईं। उसने अपनी घबराहट छुपाने के लिए झूठी हंसी हंसने की कोशिश की और अटकते हुए बोली, “अरे… नहीं भाभी, वो तो… मोहल्ले के लोग तो कुछ भी वाहियात बकते रहते हैं। लोगों का क्या है, जुबान है तो चलती है। अब इतनी छोटी सी उम्र की बहू बिटिया के सामने भला वो फूहड़ बातें कैसे दोहराई जाएं? हम तो बस तुम्हारे भले के लिए, तुम्हें अकेले में आगाह करने आए थे ताकि तुम घर संभाल सको।”
कौशल्या जी ने चाय का कप मेज पर रखा। उनका चेहरा अब पूरी तरह गंभीर हो चुका था। उन्होंने बसंती की आंखों में आंखें डालते हुए कहा, “बसंती, अगर मोहल्ले वाले कुछ गलत कह रहे हैं और तुम्हें भी लगता है कि वो सरासर झूठ और गंदा है, तब तो अंकिता का यहां खड़े होकर सुनना सबसे ज्यादा जरूरी है, ताकि इसे पता चले कि दुनिया में उसके खिलाफ कौन सा षड्यंत्र रचा जा रहा है और यह उनका मुंह बंद कर सके। और अगर मोहल्ले वाले सच कह रहे हैं, तब भी अंकिता का सुनना जरूरी है ताकि यह अपनी गलती सुधार सके। जिस इंसान की जिंदगी, सम्मान और चरित्र का सवाल है, उसे ही अंधेरे में रखकर उसके पीठ पीछे फैसला सुनाया जाए, यह न्याय नहीं होता।”
कौशल्या जी यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने अपनी बात को और कड़ा करते हुए कहा, “और सबसे बड़ी बात बसंती, अगर मोहल्ले वाले कुछ भी नहीं कह रहे हैं और यह सब तुम्हारी अपनी जहरीली सोच और मनगढ़ंत कहानी है, तो अपने कान खोलकर अच्छे से सुन लो। तुमने यह गुमान कैसे पाल लिया कि मैं अपनी कुल की मर्यादा और अपनी बहू की बुराई तुम्हारी जैसी फितरती औरतों से बैठकर सुनूंगी, उस पर चटकारे लूंगी और अपने ही हंसते-खेलते घर में आग लगाऊंगी? जिस बहू को मैं पराए घर से अपनी बेटी बनाकर इस चौखट के भीतर लाई हूं, उसकी वफादारी और चरित्र का प्रमाण-पत्र मुझे किसी मोहल्ले के नुक्कड़ या तुम्हारी जुबान से लेने की जरूरत नहीं है।”
कौशल्या जी के इस दो टूक और चट्टान जैसे अटल जवाब ने बसंती के पैरों तले से जमीन खिसका दी। वह शर्मिंदगी के मारे अपना सा मुंह लेकर रह गई। उसके पास सफाई देने के लिए एक शब्द भी नहीं बचा था।
पास ही बैठी कामवाली चंपा अपनी हंसी नहीं रोक पाई। उसने पल्लू से मुंह ढकते हुए चुटकी ली, “अरे बसंती काकी, चाय ठंडी हो रही है, पी लीजिए! लेकिन मुझे लगता है कि बहू जी के हाथ की चाय आपके पेट की खलबली शांत करने के बजाय उसे और खौला देगी। जैसी दवा मां जी ने दी है, उसके बाद तो चाय का घूंट भी गले से नीचे उतरना मुश्किल लग रहा है।”
बसंती ने न चाय की तरफ देखा और न ही कौशल्या जी की तरफ आंख उठाने की हिम्मत की। वह झटके से अपनी जगह से उठी, अपना पल्लू कसकर संभाला और बिना एक भी लफ्ज कहे, उल्टे पैरों दरवाजे की तरफ ऐसे भागी जैसे कोई चोर रंगे हाथों पकड़ा गया हो।
जब दरवाजा बंद हुआ, तो आंगन में एक अजीब सा सुकून फैल गया। अंकिता की आंखें भर आई थीं। वह कौशल्या जी के पास घुटनों के बल बैठ गई और उनका हाथ थामकर बोली, “मां जी, अगर आज आप मेरी जगह किसी और की बातों पर भरोसा कर लेतीं, तो शायद मैं जीते जी मर जाती। आपने बिना मुझसे कोई सवाल पूछे मुझ पर इतना अटूट विश्वास दिखाया, मैं आपका यह कर्ज जिंदगी भर नहीं चुका पाऊंगी।”
कौशल्या जी ने प्यार से अंकिता के सिर पर हाथ फेरा और उसके आंसू पोंछते हुए बड़े वात्सल्य से कहा, “पगली, कर्ज कैसा? एक बात हमेशा गांठ बांध कर रख ले। एक घर तभी बिखरता है जब घर के लोग अपनों की बजाय गैरों की फुसफुसाहटों पर यकीन करने लगते हैं। जब तक सास अपनी बहू की ढाल बनकर खड़ी रहेगी और बहू अपनी सास को अपनी मां का दर्जा देगी, तब तक दुनिया की कोई भी बसंती इस चौखट की एक ईंट भी नहीं हिला सकती। जब भी कोई पीठ पीछे बात करने आए, तो समझ लेना कि उसका मकसद समाधान नहीं, सिर्फ तमाशा देखना है। रिश्तों की बुनियाद जब विश्वास पर टिकी हो, तो बाहर के तूफान अपने आप दिशा बदल लेते हैं।”
उसी समय कमरे का दरवाजा खुला और विश्वंभर जी मुस्कुराते हुए बाहर निकले। उन्होंने कौशल्या जी की तरफ देखते हुए ताली बजाई और कहा, “वाह कौशल्या! आज तुमने साबित कर दिया कि घर की असली धुरी एक समझदार और न्यायप्रिय औरत ही होती है। जो औरत घर की मर्यादा को चौराहे पर नीलाम होने से बचा ले, वही वास्तव में कुल की रक्षक है।”
पूरा आंगन हंसी, आत्मीयता और एक अनूठे सुकून से भर उठा। उस दोपहर धूप सिर्फ आंगन में ही नहीं खिली थी, बल्कि उस घर के रिश्तों में विश्वास की एक ऐसी किरण उतर आई थी जो आने वाली हर गलतफहमी के अंधेरे को हमेशा के लिए मिटाने की ताकत रखती थी।
आपके विचार: हमारे समाज में अक्सर देखा जाता है कि बाहर वालों की कही-सुनी बातों और कानाफूसी के चलते हंसते-खेलते परिवारों में अविश्वास की दीवारें खड़ी हो जाती हैं। क्या आपको लगता है कि अगर हर घर की सास और बड़े-बुजुर्ग कौशल्या जी की तरह बिना किसी संकोच के खुले मंच पर बात करने और अपनी बहू पर विश्वास जताने का साहस दिखाएं, तो चुगलखोरों की दुकानें हमेशा के लिए बंद हो सकती हैं? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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