स्वाभिमान की डोर

 जानकी देवी की आँखों से एक आंसू ढुलककर नंदिनी के माथे पर जा गिरा। उन्होंने उसे पोंछते हुए कहा, “यही इस समाज की सबसे कड़वी सच्चाई है बेटी। जब कोई बहू घर में सबको संभालकर चलती है, सबका आदर करती है, मीठी बोली बोलती है, तो लोग कहते हैं कि बड़े अच्छे कुल की बेटी है, माँ ने बड़े सुंदर संस्कार दिए हैं। लेकिन खुदा न खास्ता अगर कभी तुझसे कोई चूक हो गई, कभी तूने थकान या परेशानी में किसी बात का तीखा जवाब दे दिया, या उनके तौर-तरीकों में ढलने में थोड़ी देर लगा दी, तो एक पल नहीं लगेगा लोगों को यह कहने में कि ‘इसकी माँ ने इसे कुछ सिखाया-पढ़ाया ही नहीं! माँ ने ही लाड़-प्यार में बेटी का दिमाग खराब कर रखा है।’ तेरी हर कमी, हर गलती सीधा मेरी परवरिश पर कालिख पोतने का जरिया बना दी जाएगी। बेटी जब ससुराल में लड़खड़ाती है, तो चोट हमेशा उसकी माँ की मर्यादा को लगती है।”

आईने के सामने बैठी नंदिनी अपनी लाल बनारसी साड़ी की चुनरी को संभाल रही थी। माथे पर चमकता मांगटीका, हाथों में खनकती लाल-हरी चूड़ियाँ और पैरों में रची गहरी लाल महावर। वह आज किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। कमरे के बाहर शहनाई की धीमी, मार्मिक धुन गूंज रही थी और रिश्तेदारों की चहल-पहल का शोर साफ़ सुनाई दे रहा था। दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई और उसकी माँ, जानकी देवी, धीरे से कदम बढ़ाते हुए अंदर दाखिल हुईं। जानकी देवी के हाथों में हल्दी और अक्षत से सजी पूजा की एक छोटी थाली थी।

नंदिनी ने आईने के अक्स में माँ को देखा तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक तैर गई। वह खिलखिलाते हुए मुड़ी और बोली, “देख ना माँ, ब्यूटीशियन कह रही थी कि मेरा यह रूप देखकर अनिकेत तो सचमुच अपनी सुध-बुध ही खो बैठेंगे! सच बताना, तेरी बेटी आज दुनिया में सबसे खूबसूरत लग रही है ना?”

जानकी देवी ने थाली को पास रखी मेज पर रखा और चुपचाप नंदिनी के सिर पर हाथ फेरने लगीं। उनकी हथेलियाँ हल्की सी कांप रही थीं और पलकों के कोरों पर नमी की एक पतली परत तैर रही थी। माँ को इस तरह खामोश और गंभीर देखकर नंदिनी की हँसी अचानक थम गई। उसने माँ का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया और बहुत लाड़ से पूछा, “अरे माँ, क्या हुआ? चेहरे पर बारह क्यों बज रहे हैं? बेटी की शादी का इतना बड़ा दिन है और तू ऐसे उदास चेहरा बनाकर खड़ी है जैसे कोई सजा मिल रही हो! बाबा भी बाहर चुपचाप घूम रहे हैं, भाई रोहन भी बिना किसी बात के चिड़चिड़ा रहा है। अगर आप लोगों का मुझे विदा करने का बिल्कुल मन नहीं है, तो कहो तो अभी मंडप में जाकर अनिकेत से कह दूँ कि शादी कैंसिल! मैं तो यहीं अपने घर में, अपनी माँ के आँचल में ही मजे से रहूँगी।”

नंदिनी की बात सुनकर जानकी देवी के चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान आई, मगर अगले ही पल वह मुस्कान एक गहरी चिंता में बदल गई। उन्होंने नंदिनी के गाल पर हाथ रखते हुए एक भारी सांस छोड़ी और बोलीं, “तेरी इसी नादानी और बचपने को देखकर तो कलेजा कांप रहा है नंदिनी। तू अभी तक दुनिया की रीत और रिश्तों की गंभीरता को समझ ही नहीं पाई है।”

“माँ, अब तू पहेलियाँ मत बुझा,” नंदिनी थोड़ा झेंपते हुए बोली, “साफ़-साफ़ बता क्या बात है? अनिकेत या उनके परिवार से कोई बात हुई है क्या? मुझे तो उनका घर, उनकी माँ, उनके पिता जी सब बहुत सुलझे हुए लगे थे। फिर तुझे किस बात का डर सता रहा है?”

जानकी देवी ने अपनी बेटी के चेहरे को दोनों हथेलियों के बीच भरा और बहुत ठहराव के साथ कहा, “डर अनिकेत या उनके परिवार का नहीं है नंदिनी, डर उस बदलाव का है जो आज रात के बाद तेरी पूरी जिंदगी में आने वाला है। आज तक इस घर में तू हमारी लाडली थी। तेरी हर जिद, चाहे वह सही हो या गलत, सिर-माथे पर बिठाई जाती थी। आधी रात को तुझे आइसक्रीम खाने की तलब होती तो तेरे पापा बिना उफ़ किए शहर के दूसरे कोने तक गाड़ी दौड़ा देते थे। भाई रोहन को तेरा देर तक सोना बिल्कुल पसंद नहीं था, लेकिन जब भी तू कॉलेज से थककर आती तो वह खुद तेरे कमरे का पर्दा खींचकर पंखा तेज कर देता था ताकि तेरी नींद खराब न हो। तू गुस्सा होकर थाली पटक देती तो मैं घंटों तेरे पीछे कटोरी लेकर घूमती थी। तेरा हर रोना, हर चीखना, हर नखरा हमने मुस्कुराकर झेला क्योंकि तेरी खुशी में ही हमारे पूरे घर का सुकून बसता था।”

नंदिनी ने अपनी माँ के सीने से सिर टिकाते हुए कहा, “तो इसमें गलत क्या था माँ? माता-पिता और भाई तो लाड़-प्यार करते ही हैं। ससुराल में भी तो सब अपने ही होंगे ना?”

“यही तो सबसे बड़ा भ्रम है मेरी बच्ची,” जानकी देवी ने उसके बालों को सहलाते हुए समझाया, “मायके का लाड़-प्यार सुरक्षा का घेरा होता है, जबकि ससुराल जिम्मेदारियों की कसौटी होती है। आज तक तेरी गलतियों को ‘बचपना’ कहकर माफ कर दिया जाता था। लेकिन कल जब तू उस नए घर की दहलीज लांघेगी, तब तू सिर्फ अनिकेत की पत्नी बनकर नहीं जा रही है, तू उस पूरे खानदान की बहू बनकर जा रही है। वहाँ तेरी कही एक-एक बात और तेरे किए एक-एक काम को तराजू में तौला जाएगा। और सबसे बड़ी बात जानती है क्या है नंदिनी? कल से तेरे किसी भी अच्छे या बुरे काम की जवाबदेह तू अकेले नहीं होगी… तेरे साथ-साथ हर पल कटघरे में मुझे खड़ा किया जाएगा।”

नंदिनी ने चौंककर सिर उठाया और माँ की आँखों में झांकते हुए पूछा, “तुझे क्यों कटघरे में खड़ा करेंगे माँ? अगर मुझसे कोई भूल होगी तो मुझे टोकेंगे, इसमें तेरी क्या गलती होगी?”

जानकी देवी की आँखों से एक आंसू ढुलककर नंदिनी के माथे पर जा गिरा। उन्होंने उसे पोंछते हुए कहा, “यही इस समाज की सबसे कड़वी सच्चाई है बेटी। जब कोई बहू घर में सबको संभालकर चलती है, सबका आदर करती है, मीठी बोली बोलती है, तो लोग कहते हैं कि बड़े अच्छे कुल की बेटी है, माँ ने बड़े सुंदर संस्कार दिए हैं। लेकिन खुदा न खास्ता अगर कभी तुझसे कोई चूक हो गई, कभी तूने थकान या परेशानी में किसी बात का तीखा जवाब दे दिया, या उनके तौर-तरीकों में ढलने में थोड़ी देर लगा दी, तो एक पल नहीं लगेगा लोगों को यह कहने में कि ‘इसकी माँ ने इसे कुछ सिखाया-पढ़ाया ही नहीं! माँ ने ही लाड़-प्यार में बेटी का दिमाग खराब कर रखा है।’ तेरी हर कमी, हर गलती सीधा मेरी परवरिश पर कालिख पोतने का जरिया बना दी जाएगी। बेटी जब ससुराल में लड़खड़ाती है, तो चोट हमेशा उसकी माँ की मर्यादा को लगती है।”

कमरे में कुछ पलों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। शहनाई की धुन जैसे अब सीधे दिल को चीरती हुई महसूस हो रही थी। नंदिनी की चंचलता पूरी तरह गायब हो चुकी थी। उसने पहली बार अपनी माँ के चेहरे की उन झुर्रियों और चिंताओं को इतनी गहराई से देखा था, जो अब तक उसकी खुशियों के पीछे छिपी रहती थीं।

जानकी देवी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “शादी का मतलब सिर्फ नए-नए लिबास पहनना, जेवरों की चमक में इतराना, महंगे होटलों में घूमना या सोशल मीडिया के लिए हँसती हुई तस्वीरें खिंचवाना नहीं होता नंदिनी। यह सब तो महज कुछ दिनों का तमाशा है। असली शादी तो तब शुरू होती है जब ये सारे गहने उतरकर अलमारी में बंद हो जाते हैं और सामने गृहस्थी का खुला मैदान होता है। एक ऐसा घर, जहाँ के नियम पहले से तय हैं, जहाँ की आदतें अलग हैं, जहाँ के लोगों के मिजाज अलग हैं। तू वहाँ नई होगी, लेकिन उम्मीद हमेशा तुझसे ही की जाएगी कि तू खुद को उनके सांचे में ढाल ले। त्याग और समझौते की हर उम्मीद सबसे पहले बहू से ही बांधी जाती है।”

नंदिनी की आँखों में डर की एक परछाई तैर गई। उसने सहमते हुए पूछा, “माँ, तो क्या मुझे वहाँ हर बात पर झुकना पड़ेगा? क्या मुझे अपनी पहचान, अपनी पसंद सब कुछ मिटा देना होगा?”

“बिल्कुल नहीं!” जानकी देवी का स्वर अचानक दृढ़ और गंभीर हो गया। उन्होंने नंदिनी के कंधे को मजबूती से थामते हुए कहा, “मेरी बात को गांठ बांध ले नंदिनी। मैंने तुझे झुकना नहीं, संभालना सिखाया है। नए परिवार को अपनाना बहुत जरूरी है, उनके सुख-दुख को अपना समझना संस्कार है, उनकी छोटी-मोटी कमियों को नजरअंदाज करना बड़प्पन है। लेकिन जहाँ बात तेरे आत्मसम्मान की आ जाए, वहाँ कभी कोई ऐसा समझौता मत करना जिससे तेरी आत्मा ही लहूलुहान हो जाए। समझौता प्रेम और सम्मान के साथ किया जाता है, अपनी गरिमा को दांव पर लगाकर नहीं। जिस दिन किसी औरत का आत्मसम्मान मर जाता है, उस दिन वह सिर्फ एक जीती-जागती लाश बनकर रह जाती है। इसलिए अपनी जुबान में मिठास रखना, लेकिन अपनी रीढ़ की हड्डी को कभी मत झुकने देना।”

जानकी देवी ने खिड़की की तरफ देखा, जहाँ शाम का सूरज ढल रहा था और बारात के स्वागत के लिए ढोल-नगाड़ों की आवाजें करीब आ रही थीं। उन्होंने नंदिनी का हाथ अपने सीने पर रखा और बेहद आत्मीयता से कहा, “और एक आखिरी बात याद रखना लाडो… ससुराल तेरा अपना घर जरूर बनेगा, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मायके का दरवाजा तेरे लिए बंद हो जाएगा। अगर कभी जिंदगी में ऐसा कोई मोड़ आए जहाँ तुझे लगे कि तू बिल्कुल अकेली पड़ गई है, जहाँ कोई तेरी बात सुनने वाला न हो, जहाँ तेरे आत्मसम्मान पर लगातार प्रहार हो रहे हों, तो कभी यह मत सोचना कि माँ-बाप क्या कहेंगे या समाज क्या कहेगा। तू जब भी पलटकर देखेगी, मैं, तेरे पापा और तेरा भाई तेरे पीछे एक चट्टान की तरह खड़े मिलेंगे। यह घर, यह चौखट और मेरी यह बाहें तेरे लिए तब तक खुली रहेंगी, जब तक इस शरीर में सांस है।”

माँ की यह बात सुनते ही नंदिनी के सब्र का बांध टूट गया। उसने कसकर अपनी माँ को गले से लगा लिया। आंसुओं की अविरल धारा उसकी आँखों से बहकर जानकी देवी के कंधे को भिगोने लगी। उस आलिंगन में एक बेटी का अपनी माँ के प्रति अथाह प्रेम भी था और उस नई जिंदगी के प्रति गहरा अहसास भी, जिसमें वह अब कदम रखने जा रही थी।

कुछ देर तक दोनों बिना कुछ बोले एक-दूसरे की धड़कनों को सुनते रहे। नंदिनी ने अपने आंसुओं को पोंछा, आईने में देखकर अपनी बिखरी हुई हिम्मत को समेटा और एक गहरी सांस लेकर मुस्कुराई। उसके चेहरे पर अब एक नई परिपक्वता, एक अनोखा तेज था।

उसने माँ के चरण छुए और उनकी आँखों में सीधे देखते हुए पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा, “माँ, तूने आज मेरी आँखें खोल दीं। मैं वादा करती हूँ कि मैं अनिकेत के परिवार को अपना मानकर पूरे मन से सेवा और प्रेम दूँगी। मैं ऐसा कोई आचरण नहीं करूँगी जिससे तेरी परवरिश या बाबा के संस्कारों पर कोई एक उंगली भी उठा सके। मैं उस घर को अपने प्यार से जोड़ूँगी, लेकिन अपने स्वाभिमान की रक्षा भी उसी गरिमा के साथ करूँगी जैसा तूने सिखाया है। तेरी बेटी कभी झुककर नहीं, बल्कि सिर उठाकर, संस्कारों और मर्यादा के साथ जीकर दिखाएगी।”

जानकी देवी ने अपनी बेटी के माथे को चूमा और मन ही मन भगवान को धन्यवाद दिया कि उनकी बेटी अब केवल एक दुल्हन नहीं, बल्कि जीवन की हर कसौटी पर खरी उतरने वाली एक सशक्त और समझदार स्त्री बन चुकी थी।

विदाई की शहनाई बज उठी, डोली तैयार थी, लेकिन नंदिनी के कदम अब डगमगा नहीं रहे थे। उसके मन में माँ की दी हुई सीख की वह अमर ज्योति जल रही थी, जो उसे हर अंधेरे रास्ते पर सही और गलत का फर्क समझाने के लिए काफी थी। एक बेटी की विदाई सिर्फ दो घरों का मिलन नहीं होती, बल्कि यह एक माँ द्वारा अपनी बरसों की तपस्या, सीख और संस्कारों को दूसरे कुल की समृद्धि के लिए सौंपने का सबसे पावन अनुष्ठान होता है।

एक माँ का अपनी विदा होती बेटी को यह सिखाना कि “रिश्ते निभाना मगर स्वाभिमान मत खोना”, क्या आज के दौर में हर बेटी के लिए सबसे जरूरी सीख है? इस पर आपकी क्या राय है, हमें अपने विचारों से जरूर अवगत कराएं।

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