नजरिए का दर्पण

अंजलि की आंखें अचरज और कृतज्ञता से भर आईं। जिस बात के लिए उसे हमेशा घर में झिझक महसूस होती थी, आज उसी बात की इजाजत सासू मां ने खुद आगे बढ़कर दी थी। अंजलि के होंठों पर एक ऐसी सुकून भरी मुस्कान खिल गई जो शायद कल्याणी जी ने पहले कभी नहीं देखी थी।

कुछ ही देर में ड्राइंग रूम का नजारा बदल चुका था। बीच की मेज पर चाय की केतली, पकोड़ों की थाली और इमरती की महक तैर रही थी। विश्वंभर जी अपनी कुर्सी पर बैठे अखबार एक तरफ रखकर दोनों बहुओं और बेटी को हंसते-बोलते देख रहे थे। सृष्टि कभी नंदिनी को पकोड़े खिला रही थी, तो कभी अंजलि के कंधे पर सिर रखकर अपने एनजीओ के बच्चों के किस्से सुना रही थी। अंजलि भी बड़ी बहन की तरह सृष्टि के उलझे बालों को संवारते हुए उसकी बातें सुन रही थी।

  कल्याणी जी हाथ में तुलसी की माला लिए बैठी थीं। मन ईश्वर के स्मरण में लगाने की भरपूर कोशिश थी, मगर निगाहें बार-बार मुख्य द्वार और घड़ी की टिक-टिक पर जाकर टिक जाती थीं। आज जीवन के उस पड़ाव पर पहुंचकर वे खुद को जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त मान सकती थीं। बड़े बेटे मयंक की शादी छह साल पहले उसकी पसंद से अंजलि से हुई थी। मयंक खुद एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था और अंजलि भी कॉरपोरेट जगत में एक बड़ी फाइनांस कंसलटेंट के तौर पर अपनी पहचान बना चुकी थी। दोनों ने प्रेम विवाह किया था, समाज और जाति के बंधनों से परे जाकर। शुरुआत में कल्याणी जी और उनके पति विश्वंभर जी ने थोड़ा संकोच दिखाया था, पर बेटे की अटल निष्ठा और अंजलि की शालीनता के आगे वे मान गए थे। वहीं छह महीने पहले सबसे छोटे बेटे प्रतीक का ब्याह भी कल्याणी जी ने अपनी दिली इच्छा से एक भरे-पूरे घराने की लड़की सृष्टि से करवाया था। प्रतीक पेशे से आर्किटेक्ट था और सृष्टि एक गैर-सरकारी संस्था से जुड़ी थी, जो अनाथ और उपेक्षित बच्चों की शिक्षा के लिए दिन-रात काम करती थी।

घर में बेटी नंदिनी की शादी उसी शहर के सेक्टर बाईस में एक प्रतिष्ठित डॉक्टर परिवार में हुई थी। नंदिनी का ससुराल पास होने की वजह से जब भी उसका दिल चाहता, वह अपनी मां से मिलने चली आती। दामाद जी भी बहुत सुलझे हुए इंसान थे और अक्सर रविवार को पूरे परिवार के साथ बैठकर चाय की चुस्कियां लेना उनका नियम बन चुका था।

सब कुछ वैसा ही था जैसा कोई भी मां अपनी संतानों के लिए सपने में देखती है, लेकिन कल्याणी जी के मन में एक गहरा असंतोष हमेशा सुलगता रहता था। उनकी दोनों बहुएं एक-दूसरे से इतनी अलग थीं मानो उत्तर और दक्षिण ध्रुव। अंजलि बेहद गंभीर, नपी-तुली, हर काम को वक्त के तराजू पर तौलने वाली और बात-बात पर मायके की फिक्र करने वाली थी। दूसरी तरफ सृष्टि थी, जिसके भीतर कोई गंभीरता नाम की चीज ही नहीं थी। घर में हर वक्त उसकी पायल की छन-छन, हंसी के ठहाके, कभी विश्वंभर जी के चश्मे पर चुटकुले बनाना तो कभी रसोई में काम करते हुए गाने गुनगुनाना। सृष्टि कभी अपने मायके का नाम तक नहीं लेती थी, मानो उसका कोई अतीत था ही नहीं। कल्याणी जी को अंजलि का हद से ज्यादा मायके जाना अखरता था और सृष्टि का कभी मायके न जाना और चौबीसों घंटे बच्चों जैसी नादानियां करना उन्हें परेशान करता था।

“अरे मां! क्या बात है, आज तुलसी मैया की आरती में मन नहीं लग रहा क्या?” दरवाजे की सांकल खटकी और नंदिनी की खनकती हुई आवाज ने कल्याणी जी के विचारों की तंद्रा तोड़ दी।

कल्याणी जी के चेहरे पर एकाएक ममता की चमक तैर गई। माला एक तरफ रखकर वे तेजी से उठ खड़ी हुईं, “अरे नंदिनी बेटा तू? आज अचानक? आज तो मंगलवार है, रविवार को तो तू आई ही थी। सब कुशल-मंगल तो है न? रोहन और दामाद जी साथ नहीं आए?”

नंदिनी हंस पड़ी और जूते उतारकर सीधे मां के गले लग गई, “अरे मेरी प्यारी मां, सांस तो लो! सब ठीक-ठाक है। क्लिनिक से लौटते वक्त इधर से गुजर रही थी, तो मन हुआ कि मां के हाथ की अदरक वाली चाय पी लूं और थोड़ा सुकून से बैठ लूं। इसलिए बिना बताए चली आई। क्या अपनी बेटी को डांटकर भगा दोगी?”

तभी अंदर के कमरे से विश्वंभर जी चश्मा ठीक करते हुए बाहर निकल आए। बेटी को देखते ही उनकी बांछें खिल गईं, “अरे नंदिनी! आओ बेटा, आओ। घर में अचानक बहार आ गई। बैठो, तुम्हारी मां तो बस सवालों की झड़ी लगा देती है।”

“हां-हां, आप तो बस बेटी की तरफदारी कीजिए,” कल्याणी जी ने कृत्रिम नाराजगी जताते हुए कहा, “तू बैठ बेटा, मैं तेरे लिए गरमा-गरम चाय बनाती हूं। तेरी दोनों भाभियां तो अपने-अपने दफ्तर में खप रही हैं। घर में सन्नाटा पसरा रहता है।”

नंदिनी ने अपनी मां का पल्लू पकड़कर खींचा, “नहीं मां, आप बैठो और पापा से बातें करो। मैं खुद रसोई में जाकर चाय चढ़ाती हूं और साथ में बेसन के करारे पकौड़े भी तलती हूं। आज बड़ी तेज भूख लगी है।”

“चल पगली, तू अकेले क्या बनाएगी, मैं भी चलती हूं। तू आलू-प्याज काट, मैं तब तक अदरक कूटकर चाय चढ़ा देती हूं,” कल्याणी जी ने कहा और दोनों मां-बेटी बातें करती हुई रसोई में आ गईं।

गैस पर पानी खौलने लगा और नंदिनी चॉपिंग बोर्ड पर प्याज के लच्छे काटने लगी। कल्याणी जी ने अदरक कूटते हुए एक लंबी ठंडी सांस भरी। नंदिनी ने तिरछी नजर से मां के चेहरे को देखा। वह समझ गई कि मां के भीतर कोई बात घुट रही है।

“क्या बात है मां? चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है? दोनों भाभियों से कोई अनबन हुई है क्या? छोटी भाभी तो अभी नई-नई आई है, तुम्हारी सेवा तो ठीक से करती है न?” नंदिनी ने बात छेड़ी।

“सेवा की बात मत पूछ नंदिनी। सेवा तो दोनों करती हैं, पर मैं क्या कहूं… मेरा मन ही कभी चैन नहीं पाता,” कल्याणी जी ने चाय की पत्ती डालते हुए कहा।

“क्यों? ऐसा क्या हो गया मां?”

कल्याणी जी चूल्हे के पास खड़ी होकर अपनी साड़ी का कोना उंगलियों में लपेटने लगीं, “देख, तेरी बड़ी भाभी अंजलि को देख ले। पढ़ी-लिखी है, खानदान में सब उसकी अक्ल की दाद देते हैं, पर उसका एक पैर ससुराल में रहता है और दूसरा पैर मायके में। हफ्ते में दो दिन तो वह अपनी मां के घर ही डेरा डाले रहती है। कोई भी बात हो, पहले अपनी मां से मशविरा करती है। मुझे लगता है जैसे उसका मन कभी इस घर में पूरी तरह रमा ही नहीं। ससुराल को सिर्फ धर्मशाला समझ रखा है, जहां रात को सोने आ जाती है।”

नंदिनी ने मुस्कुराते हुए प्याज बेसन के घोल में डाले, “अच्छा, और छोटी भाभी सृष्टि? वह तो बेचारी कभी मायके की तरफ देखती भी नहीं।”

“अरे उसी की तो बात कर रही हूं!” कल्याणी जी झुंझलाकर बोलीं, “वह दूसरी ही मिट्टी की बनी है। चौबीस घंटे घर में फुदकती रहती है। कभी मेरे गले लग जाएगी, कभी तेरे पापा के साथ कैरम खेलने बैठ जाएगी। उसमें जरा भी गंभीरता या सलीका नहीं है कि एक बड़े घर की बहू को कैसे पेश आना चाहिए। सारा दिन ‘मम्मी जी ये, मम्मी जी वो’। मायके जाने का नाम लो तो बात टाल जाती है। तेरे पापा तो कहते हैं कि घर में नन्ही बच्ची आ गई है, पर मुझे डर लगता है कि यह अल्हड़पन कब छूटेगा? समाज में लोग क्या कहेंगे कि बहू को कोई कायदा ही नहीं सिखाया।”

नंदिनी ने तेल की कड़ाही में पकौड़े छोड़े और फिर गैस धीमी करके अपनी मां के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए। उसकी आंखों में एक गहरी समझदारी और करुणा उतर आई थी।

“मां, क्या कभी आपने इस बात पर ठंडे दिमाग से गौर किया है कि उन दोनों का यह स्वभाव ऐसा क्यों है? आपने सिर्फ उनका आज देखा है, उनका कल कभी समझने की कोशिश की?” नंदिनी ने बेहद शांत स्वर में पूछा।

कल्याणी जी ठिठक गईं, “कल मतलब? जो सामने दिखता है, वही तो सच होता है।”

“नहीं मां, इंसान का आज उसके बीते हुए कल की छांव में ही गढ़ा जाता है,” नंदिनी ने समझाना शुरू किया। “बड़ी भाभी अंजलि जब सिर्फ पंद्रह साल की थीं, तब उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। वे घर में सबसे बड़ी संतान थीं। उनकी मां सीधी-सादी, घरेलू महिला थीं जिन्हें बैंक की पासबुक देखना तक नहीं आता था। उनके पीछे दो छोटे भाई-बहन थे। अंजलि भाभी ने अपनी पूरी किशोरावस्था खेल-कूद या सहेलियों के साथ घूमने में नहीं, बल्कि ट्यूशन पढ़ाकर घर का चूल्हा जलाने में गुजारी। जिस उम्र में लड़कियां गुड़ियों या सपनों की दुनिया में जीती हैं, उस उम्र में उन्होंने राशन की कतारों और बिजली के बिलों के बीच अपनी जवानी झोंक दी। जब इंसान इतनी कम उम्र में परिवार का भार उठाता है, तो उसके भीतर का अल्हड़पन हमेशा के लिए मर जाता है और उसकी जगह जरूरत से ज्यादा गंभीरता और जिम्मेदारी ले लेती है।”

कल्याणी जी चुपचाप अपनी बेटी का मुंह देखने लगीं।

नंदिनी ने आगे कहा, “और रही बात उनके बार-बार मायके जाने की… तो मां, क्या आप भूल गईं कि मयंक भैया से शादी के वक्त भाभी ने साफ कहा था कि वे शादी के बाद भी अपने उस परिवार का सहारा बनी रहेंगी जिसे उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा है? आज वे दोनों भाई-बहन अपने पैरों पर खड़े हो रहे हैं, लेकिन उस बूढ़ी मां को अंजलि भाभी के सहारे की जरूरत हमेशा रहेगी। आज सोचिए, जिस बहू को आप मायके जाने का ताना देती हैं, उसी बहू ने आपके इस घर को कितनी सहूलियतें दी हैं! आपको और पापा को कभी अस्पताल की लाइनों में नहीं लगना पड़ता, भाभी अपनी जान-पहचान से घर बैठे बेहतरीन डॉक्टरों का अपॉइंटमेंट लेती हैं। घर के सारे टैक्स, बीमा, बिल और कागजी काम वे लैपटॉप पर चुटकियों में निपटा देती हैं। आपकी हर जरूरत का सामान वे बिना आपके कहे ऑनलाइन मंगवा देती हैं। क्या यह सब उस जिम्मेदारी की भावना के बिना मुमकिन था जो उन्होंने अपने मायके के संघर्षों से सीखी?”

कल्याणी जी के हाथ में रखा चाय का चम्मच एक पल के लिए कांप गया। उनके पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं बचा था।

नंदिनी ने कड़ाही से सुनहरे पकोड़े प्लेट में निकालते हुए बात आगे बढ़ाई, “अब आइए आपकी छोटी बहू सृष्टि पर। आप कहती हैं कि वह मायके जाने का नाम नहीं लेती और चौबीस घंटे आपके इर्द-गिर्द घूमकर बचपना दिखाती है। मां, क्या आपको सचमुच उसकी कहानी नहीं पता? सृष्टि जब केवल सात साल की थी, उसकी सगी मां एक लंबी बीमारी के बाद गुजर गई थीं। उसके पिता ने कुछ ही महीनों में दूसरी शादी कर ली। उस सौतेली मां ने सृष्टि और उसके छोटे भाई को कभी अपनी संतान नहीं माना। बात-बात पर ताने, रूखा व्यवहार और उपेक्षा ही उस मासूम का मुकद्दर बन गई थी। नौबत यहां तक आ गई कि उसके पिता ने घर के झगड़ों से बचने के लिए दोनों बच्चों को एक दूर-दराज के बोर्डिंग स्कूल में पटक दिया।”

कल्याणी जी की आंखें धीरे-धीरे चौड़ी होने लगीं।

“सोचिए मां,” नंदिनी का गला भर आया, “जिस बच्ची ने अपने बचपन में कभी मां की गोद का स्पर्श नहीं पाया, जिसे कभी किसी ने लाड़ से नहीं पुचकारा, वह लड़की बरसों तक एक सच्चे परिवार के लिए तरसती रही। जब उसकी शादी प्रतीक से हुई और वह इस घर में आई, तो उसे आपमें वह मां दिखाई दी जिसे उसने सात साल की उम्र में खो दिया था। उसे पापा में वह पिता दिखे जो कभी उसके सिर पर प्यार से हाथ फेर सकें। वह मायके इसलिए नहीं जाना चाहती क्योंकि उस मायके में उसके आंसुओं और जिल्लत के सिवा कुछ नहीं बचा है। वह आपके पल्लू से इसलिए लिपटी रहती है क्योंकि वह उस बचपन को फिर से जीना चाहती है जो उससे बहुत बेरहमी से छीन लिया गया था। उसका वह अल्हड़पन कोई नादानी नहीं है मां, वह इस परिवार पर उसका अटूट विश्वास और सुकून है! आप सब इतने गंभीर रहते हैं, दिन भर अपनी चिंताओं में डूबे रहते हैं, और यह अकेली लड़की है जो बिना किसी स्वार्थ के, अपने सीने में छिपे दर्द को भुलाकर, आप सबके चेहरों पर हंसी बिखेरती है।”

नंदिनी ने प्लेट में टिशू पेपर बिछाया और दोनों कपों में खौलती हुई खुशबूदार चाय छान दी। उसने मां के चेहरे पर जमी असमंजस और पश्चाताप की परत को साफ देखा।

“मां, ईश्वर ने आपकी झोली में दो अनमोल रत्न डाले हैं,” नंदिनी ने बहुत ही कोमलता से कहा। “एक बहू ने आपको दुनिया की भागदौड़, चिंताओं और बाहरी जिम्मेदारियों से आजाद कर दिया, और दूसरी बहू ने आपके इस संजीदा घर को खुशियों, हंसी और अपनत्व से भर दिया। एक आपके घर की मजबूत ढाल है, तो दूसरी इस आंगन की खिलखिलाती धूप। और आप हैं कि सिर्फ इस बात पर परेशान हो रही हैं कि कोई अपने घाव भरने के लिए ज्यादा हंसती क्यों है और कोई अपने फर्ज निभाने के लिए मायके क्यों जाती है!”

कल्याणी जी का सिर शर्म और पश्चाताप से झुक गया। उनकी आंखों के कोरों से दो बूंद आंसू छलक कर रसोई के स्लैब पर टपक पड़े। जिस बात को वे अब तक अपनी बहुओं का अवगुण समझकर कोस रही थीं, वह दरअसल उनके जीवन के संघर्षों और उनके प्रेम की पराकाष्ठा थी। उन्होंने हमेशा बहुओं को अपनी बनाई हुई संकीर्ण परिभाषा के तराजू में तौला था, कभी उनके वजूद की गहराई में झांकने की कोशिश ही नहीं की थी।

“नंदिनी बेटा…” कल्याणी जी की आवाज कांप गई, “आज तूने मेरी आंखें खोल दीं। मैं कितनी अंधी हो रही थी। जो मुझे संभाल रही थी, मैं उसी में नुक्स निकाल रही थी, और जो मुझसे मां का प्यार मांग रही थी, मैं उसे नासमझ समझकर दूर धकेल रही थी।”

“देर नहीं हुई है मां,” नंदिनी ने मुस्कुराते हुए अपनी मां के आंसू पोंछे। “एक हीरे की असली पहचान जौहरी को ही होती है, और आप तो पूरे घर की सूत्रधार हैं।”

तभी बाहर का मुख्य दरवाजा खुला और कदमों की चाप के साथ सृष्टि की चहकती हुई आवाज गूंजी, “मम्मी जी! ओ मम्मी जी! देखिए मैं क्या लाई हूं… रास्ते में गरमा-गरम इमरती मिल रही थी, मुझे पता था कि पापा को बहुत पसंद है इसलिए झट से ले आई!”

सृष्टि दौड़ती हुई रसोई के दरवाजे पर आकर रुकी। उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा था। सामने नंदिनी को देखकर उसकी आंखें खुशी से चमक उठीं, “अरे नंदिनी दीदी! आप कब आईं? अरे वाह, आज तो चाय-पकौड़े की पार्टी चल रही है और मुझे किसी ने बुलाया भी नहीं!”

कल्याणी जी ने नम आंखों से उस मासूम चेहरे को देखा जो दिन भर की थकान के बाद भी घर के लिए खुशियां समेट कर लाया था। कल्याणी जी आगे बढ़ीं और बिना कुछ कहे सृष्टि को अपनी दोनों बाहों में भरकर सीने से लगा लिया।

सृष्टि एक पल के लिए ठिठक गई। उसने हमेशा सास के चेहरे पर एक दूरी और संकोच देखा था, लेकिन आज उस आलिंगन में एक सगी मां की ममता का समंदर उमड़ रहा था। कल्याणी जी ने उसके गाल को प्यार से सहलाया, “पगली, तुझे बुलाने की जरूरत है क्या? यह घर जितना हमारा है, उससे कहीं ज्यादा तेरा है। चल, मुंह धोकर आ, आज तेरी पसंद की अदरक वाली चाय नंदिनी ने बनाई है।”

सृष्टि की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए। उसने कल्याणी जी के कंधे पर अपना सिर टिका दिया, जैसे बरसों की भटकी हुई कश्ती को आखिरकार किनारा मिल गया हो।

उसी वक्त मुख्य द्वार पर घंटी बजी। सृष्टि ने लपककर दरवाजा खोला तो सामने अंजलि खड़ी थी। हाथ में भारी ऑफिस बैग, चेहरे पर हल्की थकान, लेकिन आंखों में वही गजब का ठहराव।

“अंजलि बेटा, आ गई तू?” कल्याणी जी खुद आगे बढ़कर आईं और अंजलि के हाथ से उसका भारी बैग ले लिया।

अंजलि हैरान रह गई। उसने कभी अपनी सासू मां को इस तरह आगे बढ़कर उसका बैग थामते नहीं देखा था।

“मां जी, आप क्यों कष्ट कर रही हैं, मैं रख देती…” अंजलि ने संकोच से कहा।

“कोई कष्ट नहीं है बेटा,” कल्याणी जी ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। उनकी आवाज में एक अजीब सा अपनापन था। “तू दिन भर बहुत थक जाती है। सुन, कल शाम को मयंक से कहकर अपनी मां के घर हो आ। बहुत दिन हो गए हैं, समधन जी का स्वास्थ्य कैसा है, यह भी देख आना और हां, उनके लिए यह मिठाई का डिब्बा भी लेते जाना जो सृष्टि लाई है।”

अंजलि की आंखें अचरज और कृतज्ञता से भर आईं। जिस बात के लिए उसे हमेशा घर में झिझक महसूस होती थी, आज उसी बात की इजाजत सासू मां ने खुद आगे बढ़कर दी थी। अंजलि के होंठों पर एक ऐसी सुकून भरी मुस्कान खिल गई जो शायद कल्याणी जी ने पहले कभी नहीं देखी थी।

कुछ ही देर में ड्राइंग रूम का नजारा बदल चुका था। बीच की मेज पर चाय की केतली, पकोड़ों की थाली और इमरती की महक तैर रही थी। विश्वंभर जी अपनी कुर्सी पर बैठे अखबार एक तरफ रखकर दोनों बहुओं और बेटी को हंसते-बोलते देख रहे थे। सृष्टि कभी नंदिनी को पकोड़े खिला रही थी, तो कभी अंजलि के कंधे पर सिर रखकर अपने एनजीओ के बच्चों के किस्से सुना रही थी। अंजलि भी बड़ी बहन की तरह सृष्टि के उलझे बालों को संवारते हुए उसकी बातें सुन रही थी।

कल्याणी जी ने कमरे के कोने में खड़े होकर उस पूरे दृश्य को अपनी आंखों में भर लिया। आज उनका घर सचमुच एक मंदिर बन चुका था, जहां किसी को अपनी पहचान बदलने की जरूरत नहीं थी। सबको उनके अपने रूप में, उनके अपने संघर्षों और खूबियों के साथ स्वीकार कर लिया गया था। नजरिए का फेर बदलते ही कमियां अच्छाइयों में बदल चुकी थीं और घर का कोना-कोना प्रेम के उजाले से जगमगा उठा था।

हर इंसान का स्वभाव उसकी उन परिस्थितियों की देन होता है जिनसे वह गुजर कर आया है। जब हम किसी की एक कमी को पकड़कर उसकी सैकड़ों अच्छाइयों को भूल जाते हैं, तो रिश्ते बिखरने लगते हैं; लेकिन जब हम किसी के अतीत के दर्द को समझकर उसे अपनाते हैं, तो वही रिश्ते परिवार की सबसे बड़ी ताकत बन जाते हैं। क्या हमारे समाज में बहुओं के व्यक्तिगत संघर्षों और उनके मायके के प्रति उनकी निष्ठा को वह सम्मान मिल पाता है जिसकी वे हकदार हैं? अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!

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मूल लेखिका : मनीषा सिंह

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