मैली चादर

 मंगल गीतों के बीच लाल रेशमी जोड़े में सजी तन्वी की विदाई का वक्त करीब आ चुका था। यूँ तो तन्वी मेरी सगी बेटी थी, मेरी कोख से जन्मी थी, लेकिन आज मंडप की वेदी पर खड़े होकर वर-वधू का हाथ एक-दूसरे के हाथ में सौंपने और कन्यादान का सबसे बड़ा पुण्य कमाने का सौभाग्य मेरी भाभी सुनैना को मिला था।

सुनैना भाभी बड़े लाड़ और वात्सल्य से तन्वी के आँसू पोंछ रही थीं। वे उसके सिर पर हाथ फेरते हुए समझा रही थीं, “मेरी बच्ची, ससुराल में जाकर कभी अपने मायके की संपन्नता का दंभ मत भरना। घर ईंट-पत्थरों या रुपयों से नहीं, झुकने और सबको अपना बना लेने के हुनर से चलता है। अपने मीठे बोल और सेवा भाव से सबका दिल जीत लेना।”

तन्वी बिलखते हुए अपनी ‘बड़ी माँ’ के गले लग गई थी।

मैं एक कोने में खड़ी यह सब देख रही थी। मेरी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी। उस पल मैं सिर्फ तन्वी की माँ नहीं थी, बल्कि अपनी अंतरात्मा के कटघरे में खड़ी वह अपराधी ननद थी, जिसने कभी इस ममतामयी देवी के वजूद को अपनी नफरत और अहंकार की आग में झोंकने की पूरी कोशिश की थी। मेरा मन बरसों पीछे, अतीत के उन कड़वे पन्नों में जा भटका, जहाँ से इस रिश्ते की शुरुआत हुई थी।

हमारा परिवार शहर के प्रतिष्ठित और संपन्न घरानों में गिना जाता था। पिता जी का अनाज का बहुत बड़ा थोक कारोबार था। घर में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। मेरे सबसे बड़े भाई, सिद्धार्थ भैया, पढ़ने-लिखने में अत्यंत मेधावी थे और उन्होंने कड़ी मेहनत के बाद आयकर विभाग में गजेटेड ऑफिसर का पद हासिल किया था। हम सब भाई-बहनों में वे सबसे बड़े थे। पिता जी और माँ को अपनी सामाजिक साख और धन का बेहद गुरूर था। वे चाहते थे कि भैया की शादी किसी बड़े रईस खानदान में हो, जहाँ से लाखों की नकदी, चमकती गाड़ियाँ और हीरों के ज़ेवर दहेज में आएँ।

लेकिन किस्मत ने कुछ और ही तय कर रखा था।

एक दिन भैया ने घर आकर माँ और पिता जी के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा, “माँ, मेरे दफ्तर में ही एक लड़की संविदा पर सहायक क्लर्क के पद पर काम करती है। नाम है सुनैना। अत्यंत सरल, स्वाभिमानी और सुशिक्षित लड़की है। उसके पिता जी का साया बचपन में ही उठ गया था, इसलिए उसने अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने छोटे भाई को पढ़ाया और अपनी बीमार माँ का सहारा बनी। मैं उसी से विवाह करना चाहता हूँ।”

यह सुनते ही माँ का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया था। माँ ने अपनी रेशमी साड़ी का पल्लू झटकते हुए तिनक कर कहा था, “तू पागल हो गया है क्या सिद्धार्थ? इतना बड़ा सरकारी अफसर है तू, पूरे शहर में तेरी चर्चा है। खाते-पीते रईस घरों के रिश्ते तेरी चौखट पर हाथ जोड़े खड़े हैं। और तू उस दो कौड़ी की क्लर्क के पीछे अपनी जिंदगी तबाह करना चाहता है? हमारे खानदान की नाक कटवाएगा क्या?”

भैया अपनी जगह चट्टान की तरह अडिग रहे। उन्होंने बहुत ही संयत और गंभीर स्वर में कहा, “माँ, मुझे जीवनसंगिनी चाहिए, कोई दहेज का तराजू नहीं। जिस लड़की ने इतने अभावों में भी अपने चरित्र और संस्कारों को बचाए रखा, वही इस घर को स्वर्ग बना सकती है।”

भैया की ज़िद के आगे माँ-बाबूजी को झुकना पड़ा। समाज के डर और बेटे की नाराज़गी से बचने के लिए उन्होंने भारी मन से शादी की हामी भर दी। लेकिन वह शादी किसी उत्सव जैसी नहीं थी। एक सादे से सामुदायिक भवन में फेरे हुए। दहेज के नाम पर सुनैना भाभी के मायके वाले सिर्फ अपनी बेटी के बक्से में कुछ साधारण कपड़े, भैया के लिए दो जोड़ी कुर्ते और पूजा की एक पीतल की थाली ही दे पाए थे।

उस दिन के बाद से हमारे घर में जैसे अशांति का धुआँ सुलगने लगा।

शादी के बाद जब रिश्तेदार और मोहल्ले की औरतें नई दुल्हन को ‘मुँह दिखाई’ के लिए देखने आतीं, तो वे माँ से पूछतीं, “वाह समधिन जी! इतने बड़े अफसर बेटे की शादी की है, दहेज में क्या-क्या मिला? कोई गाड़ी-वाड़ी तो दिख नहीं रही!”

तब माँ एक गहरी और दर्द भरी आह भरकर पूरे समाज के सामने भाभी की खिल्ली उड़ाते हुए कहतीं, “अरे बहन, हमारी किस्मत में कहाँ किसी राजघराने की दौलत लिखी थी! बेटा अपनी आँखों पर पट्टी बाँधकर एक कंगाल घर की छोरी उठा लाया। मुँह दिखाई में भी क्या दिखाऊँ, सिवाय इसकी इस फटीहाली के!”

एक दिन जब भैया ने माँ को ऐसा कहते सुना, तो वे तमतमा उठे। उन्होंने मुझे पुकारा, “रागिनी! ज़रा इधर आओ।”

मैं उस वक्त अपने कॉलेज की किताबों को समेट रही थी। मैं पास जाकर ठसक के साथ बोली, “क्या है भैया?”

भैया ने दुखी स्वर में कहा, “रागिनी, तुम तो पढ़ी-लिखी हो, समझदार हो। माँ को समझाओ ना। सुनैना अगर यह सब सुनेगी तो उसके दिल पर क्या बीतेगी? उसने अभी-अभी अपनी माँ और भाई का घर छोड़कर हमारे भरोसे यहाँ कदम रखा है। तुम तो उसकी हमउम्र हो, उसका संबल बनो।”

उस वक्त मेरे भीतर एक अमीर बाप की इकलौती बेटी होने का घमंड और ईर्ष्या का ज़हर खौल रहा था। भैया, जो कभी मेरे हर नखरे उठाते थे, जिनके पर्स से मेरी हर फ़रमाइश पूरी होती थी, वे आज एक पराई, साधारण सी लड़की की वकालत मेरे सामने कर रहे थे!

मैं मुँह बिचकाकर तल्ख लहजे में बोली थी, “भैया, माँ गलत क्या कह रही हैं? सुंदरता को क्या थाली में परोसकर चाटेंगे? अगर चार पैसे, कोई गाड़ी या गहने वो अपने साथ लातीं, तो हमारी भी समाज में कोई साख बनती। आपकी इस तथाकथित सादगी ने पूरे खानदान के सामने हमारा सिर झुका दिया है। आप तो बस उसके भोले चेहरे पर लट्टू हो गए हैं!” इतना कहकर मैं पैर पटकती हुई वहाँ से निकल गई थी।

कमरे के एक कोने में सोफे पर सिर झुकाए बैठी सुनैना भाभी ने मेरी यह कड़वी बात सुन ली थी। उनकी आँखों से दो बूँद आँसू चुपचाप उनकी सूती चुनरी पर टपक पड़े थे। लेकिन उन्होंने कोई पलटवार नहीं किया। जब भी कोई मेहमान आता, वे झुककर उनके चरण छूतीं और विनम्रता से पानी का गिलास पकड़ातीं।

मेरा छोटा भाई शौर्य भी बात-बात पर उनका उपहास उड़ाता, “अरे वाह सिद्धार्थ भैया! क्या किस्मत पाई है, शादी के पहले ही दिन से जोरू के गुलाम बन गए!” हम सब मिलकर भाभी के आत्मसम्मान को हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा छलनी करते रहते थे।

मैं मन ही मन भाभी से जलती थी। हालाँकि मैं रूप-रंग में भाभी से बहुत साधारण थी, लेकिन मेरे पास अपनी डिग्रियाँ और पिता की अथाह दौलत का अहंकार था। मैं सोचती थी कि भाभी तो बस एक मामूली क्लर्क हैं, उनकी मेरी बराबरी कहाँ! माँ और बाबूजी भी समय-समय पर उन्हें ताने मारने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। कभी खाने में नमक कम होने पर पूरी थाली खिसका दी जाती, तो कभी किसी त्यौहार पर उन्हें मायके से कोई महंगा उपहार न आने का उलाहना दिया जाता। लेकिन भाभी गंगा की तरह शांत बहती रहीं। उनके होंठों पर हमेशा एक मीठी, मौन मुस्कान तैरती रहती थी।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा।

दो साल के भीतर मेरी शादी जालंधर के एक खाते-पीते और बड़े कारोबारी परिवार में हो गई। पिता जी ने मेरी शादी में दिल खोलकर पानी की तरह पैसा बहाया। लाखों के ज़ेवर, लक्ज़री कार और घर-गृहस्थी का सारा सामान देकर मुझे विदा किया गया। उधर छोटे भाई शौर्य को भी एक विदेशी कंपनी में नौकरी मिल गई और वह अपनी पत्नी के साथ ऑस्ट्रेलिया जाकर बस गया।

अब घर में केवल बूढ़े माँ-बाबूजी, भैया और सुनैना भाभी रह गए थे। माँ के घुटने अब जवाब देने लगे थे और पिता जी को शुगर और ब्लड प्रेशर की पुरानी बीमारी ने घेर लिया था। पूरे घर का दारोमदार—रसोई से लेकर दवाओं के समय तक—अकेले सुनैना भाभी के कंधों पर आ टिका था। जिस सास-ससुर ने उन्हें ज़िंदगी भर ताने दिए थे, भाभी उन्हीं की सेवा में एक आज्ञाकारी दासी की तरह जुटी रहती थीं।

शादी के बाद मैं अक्सर मायके आया करती थी। जब भी मैं आती, भाभी मेरा स्वागत किसी महारानी की तरह करतीं। मेरी पसंद की कचौड़ियाँ, रबड़ी और घेवर पहले से तैयार रखे होते। मुझे विदा करते वक्त वे अपने सीमित बजट में से भी मेरे लिए साड़ियाँ और शगुन के लिफाफे सजाना कभी नहीं भूलती थीं।

समय बीतने के साथ भाभी की गोद में एक सुंदर सा बेटा, आरव आ गया। जब भी मैं मायके आती, भाभी बड़े प्यार से कहतीं, “रागिनी, अब तुम कब खुशखबरी सुना रही हो? घर में नन्हें कदमों की आहट के बिना सब अधूरा लगता है।” मैं बस मुस्कुराकर टाल देती।

शादी के तीन साल बाद वह शुभ दिन आया जब मैं गर्भवती हुई। जब यह खबर मायके पहुँची, तो सबसे ज्यादा खुशी सुनैना भाभी के चेहरे पर थी। उन्होंने तुरंत फोन करके कहा था, “रागिनी, तू बिल्कुल चिंता मत करना। जब भी डिलीवरी का वक्त होगा, तेरी यह भाभी तेरे साथ खड़ी रहेगी।”

उस वक्त मुझे उनकी यह बात बहुत औपचारिक लगी थी। मुझे लगा कि मेरे ससुराल में इतनी नौकरानियाँ हैं, मेरी सासू माँ हैं, तो मुझे इस मामूली भाभी की क्या ज़रूरत पड़ेगी। लेकिन इंसान सोचता कुछ है और ईश्वर की योजना कुछ और ही होती है।

नौवां महीना लगते ही मुझे असहनीय पीड़ा उठी और मुझे अस्पताल में भर्ती कराया गया। मेरी स्थिति इतनी जटिल हो गई थी कि डॉक्टरों को आनन-फानन में बड़ा ऑपरेशन करना पड़ा। ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों की एक भारी लापरवाही के चलते एनेस्थीसिया का ओवरडोज़ हो गया। बच्ची तो सुरक्षित पैदा हो गई, लेकिन मैं गहरे कोमा जैसी अचेत अवस्था में चली गई। पूरे बहत्तर घंटे तक मुझे होश नहीं आया।

उस नाज़ुक घड़ी में मेरे ससुराल वालों के हाथ-पाँव फूल गए। मेरी सासू माँ खुद गठिया और दिल की मरीज थीं, वे अस्पताल की भागदौड़ नहीं झेल सकती थीं। मेरे पति कारोबार के सिलसिले में अचानक आई कानूनी उलझन और मेरी हालत देखकर बदहवास हो चुके थे। उधर मायके में मेरी माँ का स्वास्थ्य इतना गिर चुका था कि वे बिस्तर से उठ नहीं सकती थीं।

ऐसे भयानक अंधकार के समय में, जब सब रिश्ते असहाय होकर खड़े थे, तब सुनैना भाभी ने आगे बढ़कर कमान संभाली।

वे अपने डेढ़ साल के बेटे आरव को पड़ोस की एक विश्वसनीय महिला के पास छोड़कर, दिन-रात अस्पताल के उस आईसीयू के बाहर एक पैर पर खड़ी रहीं। उन्होंने तीन दिनों तक अपनी पलकें नहीं झपकाईं। वे लगातार डॉक्टरों के पीछे भागती रहीं, दवाइयाँ लाती रहीं और नवजात बच्ची को अपनी छाती से चिपकाए चम्मच से दूध पिलाती रहीं।

चौथे दिन जब मुझे हल्का सा होश आया, तो मेरी धुंधली आँखों ने जो पहला दृश्य देखा, उसने मेरी आत्मा को झकझोर कर रख दिया।

अस्पताल के उस ठंडे कमरे में, फर्श पर अपनी साड़ी का पल्लू बिछाए सुनैना भाभी बैठी थीं। उनकी आँखें जागने की वजह से लाल थीं, चेहरा मुरझाया हुआ था और उनकी गोद में मेरी नवजात बच्ची बड़े सुकून से सो रही थी। जैसे ही मेरी उँगलियाँ हिलीं, भाभी ने रोते हुए ईश्वर का धन्यवाद किया और दौड़कर मेरे माथे को चूम लिया। “रागिनी! मेरी बच्ची… तू वापस आ गई! भगवान ने मेरी सुन ली!”

अस्पताल से जब मुझे छुट्टी मिली, तो डॉक्टरों ने सख्त हिदायत दी कि मुझे कम से कम तीन महीने तक पूर्ण ‘बेड रेस्ट’ पर रहना होगा, क्योंकि आंतरिक टांकों में गंभीर संक्रमण का खतरा था। मैं करवट भी नहीं बदल सकती थी। ससुराल में ऐसी कोई महिला नहीं थी जो चौबीसों घंटे मेरी और नवजात बच्ची की तीमारदारी कर सके।

तब सुनैना भाभी ने मेरे पति के सामने हाथ जोड़कर कहा, “दामाद जी, आप रागिनी और गुड़िया को हमारे घर ले चलिए। जब तक रागिनी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती, इसकी और बच्ची की जिम्मेदारी मेरी है।” मेरे पति की आँखों में कृतज्ञता के आँसू छलक आए और वे तुरंत मान गए।

मैं अपनी बच्ची के साथ मायके आ गई। और वहीं से शुरू हुआ भाभी की उस तपस्या का अध्याय, जिसे याद करके आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

भाभी सुबह चार बजे उठती थीं। अपने छोटे बेटे आरव को संभालना, बीमार सास-ससुर के लिए दलिया और काढ़ा बनाना, फिर कमरे में आकर मुझे सहारा देकर उठाना, मेरे गंदे कपड़ों को बदलना और स्पंज करना—यह सब वे बिना किसी शिकन के करती थीं।

मेरी बच्ची दिन-रात रोती थी। भाभी रात-रात भर जागकर उसे अपनी छाती से लगाकर टहलाती थीं ताकि मेरी नींद में खलल न पड़े। नवजात बच्ची के मल-मूत्र से सने कपड़ों को वे अपने हाथों से गर्म पानी और डेटॉल में धोती थीं। जब कभी बच्ची बहुत रोती, तो भाभी अपनी उँगलियों से उसे शहद चटातीं, उसकी तेल मालिश करतीं और धूप दिखातीं।

एक दिन जब भाभी मेरी कमर के नीचे की पट्टी बदल रही थीं और मेरे घाव से मवाद रिस रहा था, तो मुझसे रहा नहीं गया। मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।

मैंने रुंधे गले से कहा, “भाभी… आपको मुझसे घिन नहीं आती? मैं तो वही अभागन ननद हूँ ना, जिसने आपकी शादी के दिन आपका मज़ाक उड़ाया था? जिसने कहा था कि आप हमारे स्तर की नहीं हैं? आज आप मेरी यह गंदी सेवा क्यों कर रही हैं?”

भाभी ने पट्टी बाँधते-बाँधते अपने हाथ रोके। उन्होंने अपनी आँखें उठाईं, जिनमें अमृत जैसा वात्सल्य बह रहा था। उन्होंने मेरे गालों पर हाथ फेरते हुए बड़े ही शांत स्वर में कहा,

“रागिनी, अगर मैं भी वही नफरत और हिसाब-किताब याद रखती जो तुमने उस दिन किया था, तो मुझमें और इस दुनिया के बाज़ारी रिश्तों में क्या फर्क रह जाता? तुमने जो कहा था, वह तुम्हारी नासमझी थी। लेकिन मेरे संस्कार मुझे यह सिखाते हैं कि ननद घर की लक्ष्मी होती है और यह बच्ची इस कुल का फूल है। जब अपनी बहन दर्द से तड़प रही हो, तो पुरानी बातें नहीं, सिर्फ उसकी साँसें देखी जाती हैं।”

भाभी के इन पवित्र शब्दों ने मेरे सीने में वर्षों से दबे अहंकार के पहाड़ को एक ही झटके में चकनाचूर कर दिया। मुझे लगा कि मैं जिस दौलत और प्रतिष्ठा के नशे में चूर थी, वह उस देवी के पैरों की धूल के बराबर भी नहीं थी। जो रूप और पैसा हमारे पास था, वह मन की इस विशालता के सामने कितना बौना था! उस दिन मैंने पहली बार अपनी भाभी के पैरों को छूकर अपने सारे गुनाहों की माफी माँगी।

सवा महीने बाद मेरी बच्ची का नामकरण संस्कार हुआ। भाभी ने बड़े प्यार से उसका नाम ‘तन्वी’ रखा। तन्वी अब ज्यादातर भाभी की ही गोद में रहती थी। वह अपनी माँ यानी मुझे भूल सकती थी, लेकिन बड़ी माँ की खुशबू पहचानते ही उसका रोना बंद हो जाता था।

जब तीन महीने पूरे हुए और मेरी सेहत पूरी तरह सुधर गई, तो मेरे ससुराल वाले मुझे लेने आए। विदाई की उस घड़ी में मेरा पूरा ससुराल सुनैना भाभी के आगे नतमस्तक था। मेरी सासू माँ ने अपने गले की सोने की कंठी उतारकर भाभी के गले में पहना दी और कहा, “बहू, तूने आज हमारी बेटी को नया जीवन दिया है। तेरा यह उपकार हम सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते।”

जाते वक्त मैंने तन्वी को भाभी की बाहों में सौंपते हुए कांपते होठों से कहा था, “भाभी, तन्वी ने भले ही मेरी कोख से जन्म लिया हो, लेकिन इसकी असली माँ आप हैं। इस पर पहला हक हमेशा आपका रहेगा।”

और भाभी ने उस हक को ज़िंदगी भर निभाया।

तन्वी जब भी छुट्टियों में मायके आती, वह अपने मामा-मामी के पास ही दौड़ती। आज जब तन्वी का विवाह संपन्न हुआ, तो मैंने और मेरे पति ने एक स्वर में फैसला किया कि जिस बेटी को जीवन और संस्कार सुनैना भाभी ने दिए हैं, उसका कन्यादान भी वही करेंगी।

आज जब मैंने मंडप में सुनैना भाभी के हाथों से तन्वी का कन्यादान होते देखा, तो मेरे दिल के भीतर एक अजीब सा अलौकिक सुकून उतर आया। माँ और बाबूजी, जो अब काफी वृद्ध हो चुके थे, कोने में बैठे हाथ जोड़कर अपनी उसी ‘बिना दहेज वाली’ बहू की ओर देख रहे थे, जिसकी बदौलत आज उनका पूरा खानदान समाज में सिर उठाकर जी रहा था।

सच ही तो है, दहेज, गाड़ियाँ, जेवर और बैंक बैलेंस—ये सब तो दुनिया का सबसे बड़ा छलावा हैं। ये चीज़ें इंसान को पल भर की झूठी शान तो दे सकती हैं, लेकिन जब ज़िंदगी के कठिन इम्तिहान आते हैं, जब साँसों की डोर डगमगाने लगती है, तब केवल और केवल इंसान का निस्वार्थ व्यवहार, उसकी ममता और उसके संस्कार ही काम आते हैं। सुनैना भाभी ने साबित कर दिया था कि घर को जोड़ने वाली असली दौलत तिजोरियों में नहीं, बल्कि एक स्त्री के पवित्र और विशाल हृदय में होती है।

प्रिय पाठकों,

क्या समाज में आज भी बहुओं को उनकी लाई हुई संपत्ति और दहेज के तराजू में तौलना सबसे बड़ी सामाजिक बुराई नहीं है? क्या सुनैना भाभी की तरह हर परिवार में एक-दूसरे के प्रति ऐसा ही क्षमाशील और निस्वार्थ प्रेम नहीं होना चाहिए जो नफरत को भी ममता में बदल दे? इस संवेदनशील और दिल को छू लेने वाली कहानी पर आपकी क्या राय है, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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लेखिका : सीमा दुबे

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