देवेन के इन शब्दों ने मनोरमा के दिल पर एक जोरदार प्रहार किया। उसकी आंखों के सामने अपनी ही संकीर्णता का आईना आ गया था। उसे समझ आया कि जिसे वह दौलत समझ रही थी, वह तो सिर्फ कागजों की चमक थी; असली इंसानियत और खानदानी संस्कार तो इस लड़के के भीतर थे, जो इतनी बड़ी हैसियत पाकर भी उसके आगे हाथ जोड़कर खड़ा था।
मनोरमा की आंखें पश्चाताप के आंसुओं से भर आईं। उसने आगे बढ़कर देवेन के सिर पर अपना हाथ रख दिया। उसका गला रुंध गया, “मुझे माफ कर दो देवेन बेटा। मेरी आंखें सिर्फ पैसों की चमक देख पा रही थीं, मैं इंसान की परख करना भूल गई थी। तुम सच में कनक के लिए ईश्वर का भेजा हुआ सबसे अनमोल उपहार हो।”
साबरमती रिवरफ्रंट के किनारे बने पत्थर के चबूतरे पर बैठी कनक की आंखें लाल थीं और आंसुओं की धार उसके गालों पर सूखने से पहले ही नई बूंदों से भीग जाती थी। उसके हाथों में मुड़ा-तुड़ा रुमाल उसकी घबराहट की गवाही दे रहा था। आज दोपहर उसके घर में जो तमाशा खड़ा हुआ था, उसने उसकी आत्मा को झकझोर कर रख दिया था।
कनक के बड़े भाई महेंद्र और उसकी भाभी मनोरमा ने पूरे घर में एक फरमान जारी कर दिया था। परिवार में माता-पिता के गुजर जाने के बाद घर के हर छोटे-बड़े फैसले मनोरमा ही लेती थी। उसके लिए सामाजिक प्रतिष्ठा, बैंक बैलेंस, गाड़ियों के काफिले और लोगों के सामने अपनी ऊंची हैसियत का ढिंढोरा पीटना ही जीवन का परम सत्य था। जब कनक ने हिम्मत जुटाकर अपनी पसंद और देवेन के बारे में बताया, तो मनोरमा ने बिना सोचे-समझे उस रिश्ते की धज्जियां उड़ा दी थीं। मनोरमा का साफ कहना था कि एक मामूली से आर्किटेक्चरल फर्म में साधारण वेतन पर काम करने वाले लड़के के साथ वह अपने खानदान की बेटी कभी नहीं ब्याहेगी। उसने कनक के सामने साफ शर्त रख दी थी कि उसका विवाह उसी बड़े कपड़ा व्यापारी के बेटे से होगा, जहां से भारी भरकम रिश्ता आया है। कनक के भाई महेंद्र भी अपनी पत्नी के तर्कों के आगे पूरी तरह मौन रहे।
कनक को लग रहा था कि उसकी जिंदगी का फैसला किसी सौदे की तरह किया जा रहा है। तभी दूर से दौड़ते कदमों की आवाज आई। देवेन वहां पहुंचा। कनक को बेबस, रोते हुए देखकर देवेन का दिल भी भर आया, पर उसने अपने आंसुओं को पीकर चेहरे पर एक गहरा आत्मसंयम ओढ़ लिया। वह कनक के पास बैठा और उसके थरथराते हुए हाथों को अपने मजबूत हाथों में थाम लिया।
देवेन ने बेहद कोमल लेकिन अडिग आवाज में कहा, “कनक, अपनी इन आंखों से एक भी आंसू मत बहने दो। तुम्हारी भाभी ने जो दीवारें खड़ी की हैं, वे सिर्फ गलतफहमियों और दौलत के गुमान की हैं। तुम भरोसा रखो, कोई भी ताकत हमें अलग नहीं कर सकती। हमारा प्यार कोई गुनाह नहीं है, और मैं इसे किसी की दया पर नहीं, बल्कि अपने सम्मान और हक से हासिल करूंगा।”
देवेन की आवाज में गजब का ठहराव था। कनक ने जब उसकी आंखों में वह दृढ़ संकल्प देखा, तो उसके भीतर का तूफान कुछ शांत हुआ। उसे महसूस हुआ कि जब तक देवेन उसके साथ है, उम्मीद की डोर नहीं टूटेगी।
कनक को सुरक्षित उसके घर के पास छोड़कर देवेन सीधा शहर के आधुनिक कमर्शियल हब, प्रह्लाद नगर की ओर निकल पड़ा। रास्ते भर उसका दिमाग तेजी से चल रहा था। वह अच्छी तरह जानता था कि केवल भावुक बातों, मिन्नतों या आंसुओं से मनोरमा जैसी दुनियादार औरत का दिल नहीं बदला जा सकता। उसे साबित करना होगा कि दौलत केवल बैंक के खातों में नहीं होती, बल्कि इंसान की मेहनत, उसकी नीयत और उसकी काबिलियत में होती है।
देवेन एक गगनचुंबी कॉर्पोरेट टावर के सामने रुका। लिफ्ट से होते हुए वह सीधे शीर्ष मंजिल पर पहुंचा, जहां शहर के सबसे प्रतिष्ठित इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजाइन समूह ‘आरंभ कॉर्प’ का मुख्यालय था। इस विशाल साम्राज्य का संचालन कर रहा था शहर का सबसे चर्चित युवा उद्योगपति, अरहान।
अरहान के केबिन के बाहर सुरक्षाकर्मी और सचिवों की भीड़ थी। देवेन ने रिसेप्शन पर जाकर बस इतना कहा, “अरहान से कहिए कि उसका हॉस्टल रूममेट देवेन आया है।”
कुछ ही सेकंड में केबिन का दरवाज़ा खुद अरहान ने खोल दिया। अरहान, जो शहर की बड़ी-बड़ी व्यापारिक बैठकों में बेहद गंभीर दिखता था, देवेन को देखते ही खिलखिला पड़ा। उसने आगे बढ़कर देवेन को अपनी बाहों में भींच लिया।
“देवेन! मेरे भाई, तू इतने सालों बाद? और सीधे मेरे दफ्तर में?” अरहान ने खुशी से कहा और उसे खींचते हुए अपने निजी लाउंज में ले गया।
अरहान ने अपने स्टाफ को बाहर रहने का इशारा किया और देवेन के कंधे पर हाथ मारकर बोला, “याद है वो दिन? जब इंजीनियरिंग के तीसरे साल में मेरे घर की आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि मैं कॉलेज छोड़ने की कगार पर था? उस वक्त तूने अपनी स्कॉलरशिप का पूरा पैसा मेरे हाथ में रख दिया था और छह महीने तक खुद रात को कॉल सेंटर में काम करके मेरा सेमेस्टर पूरा करवाया था। अगर उस दिन तू न होता, तो आज यह अरहान किसी कोने में गुमनाम होता। बता, आज अपने इस भाई की याद कैसे आई?”
देवेन ने मुस्कुराते हुए पुरानी यादों को समेटा, लेकिन उसकी मुस्कान के पीछे का दर्द अरहान से छिप न सका। अरहान के बार-बार पूछने पर देवेन ने कनक, उसके परिवार, और भाभी मनोरमा द्वारा ठुकराए गए रिश्ते की पूरी सच्चाई बयां कर दी। उसने बताया कि कैसे उसकी ईमानदारी और सादगी को गरीबी का तमगा देकर कनक के घर से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।
अरहान ने ध्यान से पूरी बात सुनी। उसने अपनी कॉफी का कप टेबल पर रखा और उसकी आंखों में एक चमक कौंध गई। वह बोला, “देवेन, तेरी डिजाइनिंग और आर्किटेक्चर की समझ का लोहा तो पूरा कॉलेज मानता था। तूने हमेशा सादगी को चुना, इसलिए अपनी छोटी सी दुनिया में खुश रहा। लेकिन अब वक्त आ गया है कि दुनिया तेरी असली कीमत पहचाने। और जहां तक कनक के परिवार की बात है, तो उनकी आंखों पर चढ़े इस चश्मे को उतारना अब मेरी जिम्मेदारी है। तू बस मेरे साथ कदम से कदम मिलाकर चल।”
संयोग से, कनक के भाई महेंद्र की एक मध्यम स्तर की इंटीरियर और सिविल कांट्रैक्टिंग फर्म थी। वे पिछले छह महीनों से ‘आरंभ कॉर्प’ के नए मेगा टाउनशिप प्रोजेक्ट का सब-कांट्रैक्ट पाने के लिए दिन-रात एक कर रहे थे। यह प्रोजेक्ट उनकी कंपनी के लिए जीवन-मरण का सवाल था।
अगले ही दिन, अरहान के दफ्तर से महेंद्र को एक विशेष बुलावा गया। महेंद्र जब अरहान के शानदार ऑफिस पहुंचे, तो उनकी सांसें फूल रही थीं।
अरहान ने बेहद पेशेवर अंदाज में महेंद्र से हाथ मिलाया और प्रोजेक्ट की फाइल सामने रखते हुए कहा, “महेंद्र जी, आपकी फर्म का ट्रैक रिकॉर्ड मैंने देखा है। काम अच्छा है, लेकिन मेरी कंपनी का यह पचास करोड़ का नया प्रोजेक्ट केवल एक शर्त पर आपको मिल सकता है। हमारे बोर्ड ने हाल ही में हमारे चीफ प्रोजेक्ट डायरेक्टर और पार्टनर के रूप में एक बेहद प्रतिभावान विशेषज्ञ को शामिल किया है। पूरे प्रोजेक्ट का तकनीकी और वित्तीय नियंत्रण उन्हीं के हाथों में है। अगर वे आपके काम, आपकी सोच और आपकी कार्यशैली को मंजूरी दे देते हैं, तो डील उसी वक्त पक्की हो जाएगी।”
महेंद्र की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने तुरंत हाथ जोड़कर कहा, “अरहान साहब, यह तो हमारे लिए बहुत बड़ा सौभाग्य होगा। आप और आपके चीफ डायरेक्टर आज शाम हमारे घर डिनर पर आइए। हम बैठकर औपचारिकताएं भी पूरी कर लेंगे और आपको हमारे आतिथ्य का मौका भी मिलेगा।” अरहान ने मुस्कुराते हुए निमंत्रण स्वीकार कर लिया।
घर लौटते ही महेंद्र ने जब यह खबर अपनी पत्नी मनोरमा को सुनाई, तो उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। उसने पूरे घर को सजाने का हुक्म दे दिया। शहर के सबसे महंगे केटरर से संपर्क किया गया, चांदी के बर्तन निकाले गए और ड्राइंग रूम को नए परदों से सजाया गया। मनोरमा का सीना गर्व से फूल रहा था कि शहर का इतना बड़ा उद्योगपति उसके घर कदम रखने वाला है। वह कनक पर भी रौब झाड़ रही थी कि देखो, असली हैसियत क्या होती है। कनक एक कोने में गुमसुम खड़ी अपनी तकदीर पर आंसू बहा रही थी।
रात के ठीक आठ बजे दरवाजे की घंटी बजी। महेंद्र और मनोरमा ने एक-दूसरे को देखा और बड़े आदर से दरवाजा खोला। बाहर अरहान सूट-बूट में मुस्कुराता हुआ खड़ा था।
“आइए, आइए अरहान जी, हमारे धन्य भाग जो आप पधारे,” महेंद्र ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
अरहान ने भीतर कदम रखा और पीछे मुड़कर कहा, “महेंद्र जी, मिलिए मेरे सबसे अजीज दोस्त, कंपनी के मुख्य भागीदार और इस प्रोजेक्ट के सर्वेसर्वा से।”
जैसे ही वह दूसरा व्यक्ति रोशनी में आया, मनोरमा की आंखें फटी की फटी रह गईं। महेंद्र के हाथ हवा में ही जम गए। दरवाजे के पीछे खड़ी कनक के हाथ से पानी की ट्रे लगभग छूटने ही वाली थी।
सामने देवेन खड़ा था। एक सधे हुए, सुरुचिपूर्ण फॉर्मल सूट में, चेहरे पर वही शांत आत्मविश्वास और आंखों में वही गहरी शालीनता।
इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता या असहज होता, देवेन ने आगे बढ़कर सबसे पहले झुककर महेंद्र और फिर मनोरमा के पैर छुए। उसने किसी बदले की भावना या घमंड का एक कतरा भी अपने व्यवहार में नहीं आने दिया।
देवेन ने बड़े आदर से कहा, “भाभी जी, बड़े भैया, नमस्ते।”
घर में सन्नाटा पसर गया। मनोरमा के चेहरे का रंग उड़ चुका था। जिस लड़के को उसने कल दोपहर दो कौड़ी का कहकर अपमानित किया था, वह आज उसके घर का भाग्य विधाता बनकर खड़ा था, फिर भी उसके पैर छू रहा था।
अरहान ने आगे बढ़कर माहौल को संभाला। उसने ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठते हुए बड़े सहज स्वर में कहा, “महेंद्र जी, शायद आप नहीं जानते, लेकिन देवेन की प्रतिभा की वजह से ही आज मेरी कंपनी इस मुकाम पर है। यह सिर्फ एक असाधारण आर्किटेक्ट ही नहीं, बल्कि एक ऐसा इंसान है जिसने अपनी पूरी जिंदगी दूसरों की मदद के लिए चुपचाप खपा दी। इसने कभी अपनी शोहरत का ढिंढोरा नहीं पीटा। आज यह मेरी पूरी कंपनी के चालीस प्रतिशत का साझीदार है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी दौलत इसका यह स्वभाव है—जो अपनों के अपमान के बदले भी उन्हें झुककर सम्मान देना जानता है।”
देवेन ने खड़े होकर दोनों हाथ जोड़े और सीधे मनोरमा की ओर देखा। उसकी आवाज में न कोई कटुता थी, न ही ताना।
देवेन ने कहा, “भाभी जी, मैं जानता हूं कि कल आपने जो कुछ भी कहा, वह कनक के भविष्य की चिंता में कहा था। एक अभिभावक के तौर पर आपका यह सोचना बिल्कुल गलत नहीं था कि आपकी ननद एक सुरक्षित और खुशहाल जीवन जिए। मैं आज यहां किसी कंपनी के डायरेक्टर की हैसियत से नहीं आया हूं, न ही किसी डील का रौब दिखाने आया हूं। मैं आज भी उसी देवेन के रूप में आपके सामने खड़ा हूं जो कनक से सच्चा प्रेम करता है। मैं बस इतना भरोसा दिलाने आया हूं कि कनक को दुनिया की हर सुख-सुविधा देने की सामर्थ्य मेरे पास है, लेकिन उससे भी ज्यादा मेरे पास उसे जिंदगी भर रानी बनाकर रखने वाला दिल और आपके परिवार का सम्मान करने वाले संस्कार हैं।”
देवेन के इन शब्दों ने मनोरमा के दिल पर एक जोरदार प्रहार किया। उसकी आंखों के सामने अपनी ही संकीर्णता का आईना आ गया था। उसे समझ आया कि जिसे वह दौलत समझ रही थी, वह तो सिर्फ कागजों की चमक थी; असली इंसानियत और खानदानी संस्कार तो इस लड़के के भीतर थे, जो इतनी बड़ी हैसियत पाकर भी उसके आगे हाथ जोड़कर खड़ा था।
मनोरमा की आंखें पश्चाताप के आंसुओं से भर आईं। उसने आगे बढ़कर देवेन के सिर पर अपना हाथ रख दिया। उसका गला रुंध गया, “मुझे माफ कर दो देवेन बेटा। मेरी आंखें सिर्फ पैसों की चमक देख पा रही थीं, मैं इंसान की परख करना भूल गई थी। तुम सच में कनक के लिए ईश्वर का भेजा हुआ सबसे अनमोल उपहार हो।”
महेंद्र ने भावुक होकर देवेन को गले से लगा लिया। कनक के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान खिल उठी, जो आंसुओं के समंदर को पार करके आई थी। अरहान ने दोनों दोस्तों की ओर देखकर संतोष की सांस ली। कॉलेज के दिनों की एक निस्वार्थ मदद ने आज न केवल एक व्यापारिक साम्राज्य खड़ा किया था, बल्कि एक सच्चे प्यार को भी उसके सम्मानजनक मुकाम तक पहुंचा दिया था।
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