“माफ़ कर दे मुझे बेटा…” ओंकारनाथ जी की आवाज़ भर्रा गई। “मेरा अहंकार बहुत बड़ा था, लेकिन तेरे प्यार और मेरी बेटी के संस्कारों ने आज मुझे हरा दिया। और सच कहूँ, तो इस हार में मुझे ज़िंदगी की सबसे बड़ी जीत महसूस हो रही है। जिस लड़के ने मेरी बेटी के सम्मान के लिए अपनी गरिमा को दांव पर लगा दिया, उससे बेहतर मेरी बच्ची की रक्षा कोई और नहीं कर सकता।”
घर के कोने में खड़ी मालती देवी ने पल्लवी को अपनी बाहों में भर लिया। पल्लवी फूट-फूट कर रो पड़ी। यह आँसू किसी जीत के घमंड के नहीं थे, बल्कि उस पावन मर्यादा की विजय के आँसू थे जिसने दो परिवारों को बिखरने से बचा लिया था।
कॉफ़ी हाउस के कोने वाली मेज़ पर रखी दो कॉफ़ी ठंडी हो चुकी थी। बाहर ठंडी हवा के झोंके खिड़की के काँच से टकरा रहे थे, लेकिन भीतर टेबल के आमने-सामने बैठे दो दिलों में बेचैनी की आग सुलग रही थी। मेज़ पर रखे रूमाल को अपनी उंगलियों में मरोड़ती पल्लवी की पलकें लगातार भीग रही थीं। उसकी आँखों के नीचे पड़े हल्के काले घेरे इस बात की गवाही दे रहे थे कि वह कई रातों से सोई नहीं थी। उसके सामने बैठा आदित्य, जो शहर की एक प्रतिष्ठित आर्किटेक्चर फर्म में कार्यरत था, गहरी सांसें लेते हुए लगातार अपने सिर पर हाथ फेर रहा था।
काफी देर की घुटन भरी खामोशी को तोड़ते हुए आदित्य ने आगे झुककर पल्लवी के कांपते हाथों को थामने की कोशिश की, लेकिन पल्लवी ने आहिस्ता से अपने हाथ पीछे खींच लिए।
“पल्लवी, तुम इस तरह खामोश रहकर हमारी ज़िंदगी को किस मोड़ पर ले जाना चाहती हो?” आदित्य की आवाज़ में बेबसी और गुस्सा दोनों साफ झलक रहे थे। “हम पिछले चार सालों से एक-दूसरे के साथ हैं। कॉलेज के पहले दिन से लेकर आज तक मैंने अपनी ज़िंदगी का हर सपना तुम्हारे साथ देखा है। क्या तुम अपने घर में इतनी सी बात नहीं कह सकतीं कि तुम्हारी पसंद कोई और है? तुम अपने बाबूजी को सीधे-सीधे क्यों नहीं बता देतीं कि तुम मेरे अलावा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकतीं?”
पल्लवी की आँखों से आँसू छलक कर उसकी शॉल पर गिर पड़े। उसने अपनी रुंधती आवाज़ को संभालते हुए कहा, “आदित्य, तुम नहीं जानते कि मैंने कितनी कोशिश की है। परसों रात जब बाबूजी अपने कमरे में बैठे थे, तो मैंने बहुत हिम्मत जुटाकर माँ के सामने तुम्हारी बात छेड़ी थी। मैंने कहा कि आदित्य बहुत सुलझा हुआ लड़का है, उसकी अपनी नौकरी है और वह मेरा बहुत ख्याल रखता है। लेकिन बाबूजी ने मेरी बात पूरी होने से पहले ही हाथ उठा दिया। उन्होंने साफ कह दिया कि हमारे खानदान की एक रीत है, एक मर्यादा है। वे अपनी बिरादरी के किसी पुराने कारोबारी घराने में ही मेरा हाथ सौंपेंगे। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि अगर मैंने अपनी मर्जी थोपने की कोशिश की, तो वे समाज में किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। अब तुम ही बताओ आदित्य, मैं उस पिता के सामने अपनी जिद कैसे रखूँ जिन्होंने अपनी पूरी जवानी हमारे लिए घिस दी?”
आदित्य के चेहरे पर हताशा और कड़वाहट छा गई। उसने टेबल पर मुट्ठी पटकते हुए कहा, “तो फिर इसका सीधा सा मतलब यही है पल्लवी कि हमारे पास अब कोई सीधा रास्ता नहीं बचा। अगर तुम्हारे बाबूजी अपनी झूठी शान और पुरानी रीतियों के आगे हमारे प्यार को नहीं समझ रहे, तो हमें खुद अपने लिए फैसला लेना होगा। कल रात नौ बजे दिल्ली जाने वाली स्वर्ण मंदिर मेल छूटती है। हम दोनों कल शहर छोड़ देंगे। दिल्ली पहुँचकर कोर्ट मैरिज कर लेंगे। एक बार जब हमारे हाथ में शादी का सर्टिफिकेट होगा, तो दुनिया का कोई इंसान हमें अलग नहीं कर पाएगा। कुछ महीने बाद जब उनके गुस्से की आग ठंडी होगी, तो वे खुद ही हमें गले लगा लेंगे।”
‘हम दोनों कल शहर छोड़ देंगे…’
यह वाक्य पल्लवी के कानों में किसी जलते हुए तीर की तरह चुभा। उसका पूरा वजूद सिहर उठा। उसने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से आदित्य की तरफ देखा, जिनमें अब आँसुओं के साथ-साथ एक गहरा अविश्वास और आघात तैर रहा था।
“तुम… तुम मुझे घर से भागने के लिए कह रहे हो आदित्य?” पल्लवी की आवाज़ थरथरा उठी, लेकिन उसमें एक तीखापन था। “तुम चाहते हो कि जिस चौखट को मेरे बाबूजी ने अपने खून-पसीने और ईमानदारी से सींचा है, मैं उस पर अपनी कायरता की कालिख पोतकर भाग जाऊँ? जिस पिता ने कभी मुझे धूप नहीं लगने दी, जिसने अपनी फटी हुई बनियान छुपाकर मुझे शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में पढ़ाया, आज जब उनके सम्मान और उनकी पगड़ी की बात आई, तो मैं उनकी इज्जत को सड़क पर नीलाम कर दूँ? क्या तुम्हारे प्यार का पैमाना यही है कि मैं पहले अपने बाप के आत्मसम्मान की बलि चढ़ाऊँ?”
आदित्य ने झल्लाकर कहा, “पल्लवी, तुम बहुत भावुक होकर सोच रही हो। जब समाज और परिवार दीवार बन जाएँ, तो प्यार को बचाने के लिए बगावत करनी ही पड़ती है। अगर कल को तुम्हारी शादी किसी और से हो गई, तो क्या तुम खुश रह पाओगी? क्या तुम्हारे पिता की इज्जत बच जाएगी जब वे तुम्हें एक बेजान गुड़िया की तरह किसी अजनबी के हवाले कर देंगे और तुम अंदर ही अंदर घुटकर मरोगी? लोग दो दिन बातें करते हैं पल्लवी, तीसरे दिन सब अपनी ज़िंदगी में मस्त हो जाते हैं। हमें अपने मुस्तकबिल की फिक्र करनी होगी।”
पल्लवी ने अपनी कुर्सी पीछे खिसकाई और उठ खड़ी हुई। उसने अपनी शॉल को कसकर लपेटा। उसके चेहरे पर अब रोना-धोना नहीं था, बल्कि एक अजीब सा ठहराव और आत्मसम्मान की लौ चमक रही थी।
“जो लोग दो दिन बातें करते हैं आदित्य, वे दो दिन में सब भूल जाते होंगे, लेकिन जिस पिता की पगड़ी उछलती है, वह जिंदगी भर हर रोज़ तिल-तिल कर मरता है। मुझे ऐसी खुशी की कोई चाह नहीं है जो मेरे पिता की चिता की राख पर खड़ी हो।” इतना कहकर पल्लवी बिना पीछे मुड़े कॉफ़ी हाउस से बाहर निकल गई।
घर लौटते समय पल्लवी के कदम भारी थे। अमृतसर की वो तंग और जानी-पहचानी गलियाँ आज उसे किसी अनजाने मोड़ जैसी लग रही थीं। उसके दिमाग में एक तरफ आदित्य के चार साल का साथ, उसकी हँसी और उसके वादे गूँज रहे थे, और दूसरी तरफ अपने पिता, पं. ओंकारनाथ जी का वह शांत, गंभीर चेहरा जो मोहल्ले में सच्चाई और उसूलों का प्रतीक माना जाता था। ओंकारनाथ जी शहर के एक पुराने स्कूल से हेडमास्टर पद से रिटायर हुए थे। उनके पास बैंक बैलेंस के नाम पर कोई बड़ी दौलत नहीं थी, पर उनका नाम ऐसा था कि बाज़ार में कोई भी दुकानदार उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता था।
जैसे ही पल्लवी ने अपने घर की दहलीज पर कदम रखा, उसने देखा कि आँगन में खाट पर बाबूजी बैठे थे। उनके हाथ में चश्मा था और वे किसी पुराने परिचित से फोन पर बात करते हुए खिलखिला रहे थे। पल्लवी की माँ मालती देवी पास ही पीतल की थाली में शाम की आरती के लिए फूल सजा रही थीं।
पल्लवी को देखते ही ओंकारनाथ जी ने फोन काटा और बहुत ही स्नेह से बोले, “आ गई मेरी लाडो? देख, आज तेरे चाचा जी का फोन आया था। जालंधर से एक बहुत ही प्रतिष्ठित और संस्कारी परिवार ने तेरे लिए संदेश भेजा है। लड़का मल्टीनेशनल कंपनी में बहुत बड़े पद पर है। परिवार के लोग इतने सादगी पसंद हैं कि उन्होंने कहा है कि उन्हें सिर्फ हमारी संस्कारी बेटी चाहिए, कोई दान-दहेज नहीं। मालती, सच कहता हूँ, हमारी बेटी जिस घर में जाएगी, वहाँ दीप जलाकर रखेगी।”
पिता की आँखों में अपनी बेटी के सुखद भविष्य के लिए जो संतोष और गर्व का भाव था, उसे देखकर पल्लवी का कलेजा मुँह को आ गया। वह बिना कुछ बोले धीरे से अपने कमरे में चली गई और अंदर से कुंडी लगाकर बिस्तर पर गिर पड़ी।
उस रात पल्लवी ने अपने आँसुओं को तकिए में दबाए रखा। उसकी आत्मा दो हिस्सों में बँट चुकी थी। एक तरफ वह लड़का था जिससे उसने अपने जीवन का हर कोमल अहसास साझा किया था, और दूसरी तरफ वे माता-पिता थे जिन्होंने अपनी हर साँस उसके नाम कर दी थी। वह सोचने लगी कि क्या प्यार इतना स्वार्थी होता है कि वह इंसान को अंधा बना दे? क्या किसी को चाहने का मतलब यह होता है कि आप उन तमाम रिश्तों की बलि चढ़ा दें जिन्होंने आपको इंसान बनाया? रात के तीसरे पहर, जब कमरे की खिड़की से चाँद की मद्धिम रोशनी फर्श पर पड़ रही थी, पल्लवी के अंतर्मन ने अपना अंतिम फैसला ले लिया। उसने तय कर लिया कि वह प्यार को मिटने नहीं देगी, लेकिन मर्यादा की सीमा को भी कभी नहीं लांघेगी।
अगली शाम, ठीक साढ़े आठ बजे, अमृतसर रेलवे स्टेशन के मुख्य प्रवेश द्वार के पास आदित्य बेचैनी से टहल रहा था। उसने अपने दोनों हाथों में दिल्ली की दो कंफर्म टिकटें पकड़ रखी थीं। उसके कंधे पर एक बड़ा सा बैग टंगा था और वह बार-बार अपनी कलाई घड़ी देख रहा था। स्टेशन पर ट्रेनों की आवाजाही का शोर था, कुली सामान लेकर दौड़ रहे थे और लाउडस्पीकर पर ट्रेनों की उद्घोषणाएँ गूँज रही थीं।
तभी भीड़ को चीरती हुई पल्लवी आती दिखाई दी।
आदित्य की जान में जान आई। वह लपक कर उसकी तरफ बढ़ा, लेकिन जब उसकी नज़र पल्लवी पर पड़ी, तो उसके कदम जहाँ के तहाँ ठिठक गए। पल्लवी के हाथों में कोई बैग नहीं था। वह अपने रोज़मर्रा के साधारण सलवार-सूट में थी, उसके बाल करीने से बँधे थे और उसके चेहरे पर किसी भगोड़े इंसान का खौफ नहीं था।
“पल्लवी! तुम्हारा सामान कहाँ है?” आदित्य ने बदहवास होकर पूछा। “ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर दो पर लग चुकी है, सिर्फ पंद्रह मिनट बचे हैं। तुम ऐसे खाली हाथ क्यों आई हो?”
पल्लवी ने अपनी स्थिर, गंभीर और शांत आँखें उठाकर सीधे आदित्य की आँखों में देखा। उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि स्टेशन के शोर में भी सीधे आदित्य के सीने में उतर गई।
“मैं तुम्हारे साथ भागने नहीं आई हूँ आदित्य। मैं स्टेशन पर सिर्फ यह बताने आई हूँ कि मैं किसी अंधेरे रास्ते पर कदम नहीं रखूँगी।”
आदित्य के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसके हाथ से टिकटें छूटते-छूटते बचीं। “यह क्या पागलपन है पल्लवी? कल तो तुमने कुछ नहीं कहा। इसका मतलब तुम सब कुछ खत्म कर देना चाहती हो? तुम्हारा वो प्यार, वो कसमें, सब एक पल में झूठी हो गईं? तुम अपने उस पिता के झूठे संस्कारों के लिए मुझे छोड़ रही हो जो तुम्हारी खुशियों की परवाह तक नहीं करते?”
पल्लवी की आँखों में एक बूँद आँसू चमका, लेकिन उसकी पलकें झुकी नहीं। उसने बहुत ही संतुलित और दृढ़ स्वर में कहा,
“आदित्य, अगर मेरा प्यार झूठा होता, तो मैं आज यहाँ तुम्हें यह समझाने भी नहीं आती। मैं तुमसे आज भी उतना ही प्यार करती हूँ जितना कल करती थी। लेकिन जिस रिश्ते की नींव मेरे माँ-बाप के आँसुओं, उनकी बेबसी और उनकी बिखरी हुई पगड़ी पर रखी जाएगी, वह इमारत कभी खुशियों का आशियाना नहीं बन सकती। जो औलाद अपने जन्मदाताओं के विश्वास को रौंदकर अपना घर बसाती है, उसकी चौखट पर कभी बरकत नहीं उतरती।”
पल्लवी ने एक कदम आगे बढ़ाया और आदित्य के हाथ पर अपनी उंगलियाँ रखीं, “आदित्य, अगर तुम्हारी मोहब्बत में ज़रा भी सच्चाई है, अगर तुम्हारा पौरुष सिर्फ बातों तक सीमित नहीं है, तो भागने का यह कायरतापूर्ण रास्ता छोड़ दो। अगर तुम मुझे अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहते हो, तो कल सुबह मेरे घर आओ। मेरे बाबूजी के सामने खड़े होकर उनका हाथ जोड़ो। उनसे कहो कि तुम उनकी बेटी से प्यार करते हो और उसका जीवन भर सम्मान करोगे।”
आदित्य ने तड़पकर कहा, “तुम होश में तो हो पल्लवी? तुम्हारे पिता मुझे देखते ही ज़लील करके घर से धक्के मारकर निकाल देंगे। वे कभी नहीं मानेंगे!”
“तो तुम उन धक्कों को अपना प्रसाद समझना आदित्य!” पल्लवी की आवाज़ में एक चट्टान जैसा संकल्प गूँज उठा। “तुम एक बार जाओगे, वे भगाएँगे। तुम दूसरी बार जाना, वे डांटेंगे। तुम तीसरी बार जाना, वे दरवाज़ा बंद कर लेंगे। लेकिन तुम तब तक उनके दरवाजे पर सिर झुकाए खड़े रहना जब तक उन्हें यह यकीन न हो जाए कि मेरी बेटी का हाथ किसी कायर भगोड़े के हाथ में नहीं, बल्कि एक ऐसे स्वाभिमानी और सच्चे इंसान के हाथ में जा रहा है जो किसी भी तूफान में उसका साथ नहीं छोड़ेगा। अगर श्रीराम ने सीता के वरण के लिए शिव का कठोर धनुष तोड़ा था, तो तुम्हें भी मेरे पिता के उस अविश्वास और अहंकार के धनुष को अपनी निष्ठा से तोड़ना होगा। लेकिन मैं खिड़की से कूदकर, आधी रात को अंधेरे में तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगी। जो प्रेम मर्यादा खो दे, वह प्रेम नहीं, केवल एक स्वार्थ और वासना की जिद है।”
इतना कहकर पल्लवी ने अपने हाथ पीछे खींच लिए। उसने स्टेशन की चमकती लाइटों और उस खड़ी ट्रेन की ओर एक बार भी नहीं देखा। वह मुड़ी और पूरे गर्व और गरिमा के साथ वापस अपने घर की ओर चल दी।
आदित्य स्टेशन के उस खंभे के सहारे अकेला खड़ा रह गया। उसके हाथ में पकड़ी वे दो रेल टिकटें अचानक उसे किसी कचरे के टुकड़े जैसी लगने लगीं। पल्लवी के शब्द उसके कानों में हथौड़े की तरह बज रहे थे। उस लड़की ने एक ही झटके में उसे यह अहसास करा दिया था कि वह कितना छोटा और संकीर्ण सोच रहा था। वह जिस प्यार को पाने के लिए पल्लवी के पूरे परिवार को तबाह करने जा रहा था, पल्लवी ने उसी प्यार को मर्यादा का ताज पहनाकर एक दिव्य मुकाम पर पहुँचा दिया था। आदित्य की आँखें भर आईं। उसने वे दोनों टिकटें वहीं बीच प्लेटफॉर्म पर फाड़कर फेंक दीं और अपने कंधे से बैग उतार लिया।
अगली सुबह, अमृतसर की गलियों में अभी हल्की धुंध छाई हुई थी। पं. ओंकारनाथ जी अपने दालान में तुलसी के पौधे को जल चढ़ाकर अभी कुर्सी पर बैठे ही थे कि मुख्य द्वार पर किसी ने धीमी सी दस्तक दी।
मालती देवी ने दरवाज़ा खोला तो सामने एक सुदर्शन युवक खड़ा था। उसके बदन पर एक सादा कुर्ता-पायजामा था, चेहरे पर कोई घमंड या जल्दबाजी नहीं थी, बल्कि एक गहरी विनम्रता और पश्चाताप की छाया थी।
“आप कौन हैं बेटा? किससे मिलना है?” मालती देवी ने पूछा।
तभी ओंकारनाथ जी ने चश्मा लगाते हुए बाहर देखा, “कौन है मालती?”
आदित्य बिना किसी हिचकिचाहट के भीतर आया। उसने आगे बढ़कर सबसे पहले ओंकारनाथ जी के चरण छुए। ओंकारनाथ जी अचकचा गए।
“मास्टर जी, मेरा नाम आदित्य है,” उसने हाथ जोड़कर, अपनी नज़रें नीची रखते हुए अत्यंत शालीनता से कहा। “मैं आपकी बेटी पल्लवी से पिछले चार वर्षों से प्रेम करता हूँ। मैं शहर की एक प्रतिष्ठित आर्किटेक्चर कंपनी में काम करता हूँ। कल रात मैंने एक बहुत बड़ा पाप करने की सोची थी… मैं पल्लवी को लेकर शहर से भागने वाला था। लेकिन आपकी बेटी ने मुझे मेरी औकात दिखा दी। उसने मुझे सिखाया कि जिस घर के संस्कार ऊँचे होते हैं, वहाँ की बेटियाँ कभी मर्यादा की चौखट नहीं लांघतीं। मैं आज यहाँ आपसे माफी माँगने आया हूँ, और साथ ही अपनी पूरी ज़िंदगी की ईमानदारी की गवाही देकर आपकी बेटी का हाथ माँगने आया हूँ।”
यह सुनते ही ओंकारनाथ जी का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उनके हाथ कांपने लगे। उनकी आँखें अंगारे बरसाने लगीं।
“तेरी इतनी जुर्रत!” ओंकारनाथ जी दहाड़े। “तू मेरे ही घर में आकर, मेरी ही चौखट पर खड़े होकर मेरी बेटी पर अपना हक जता रहा है? निकल जा यहाँ से! अगर दोबारा मेरी गली में दिखाई दिया तो पुलिस के हवाले कर दूँगा!”
आदित्य ने अपनी नज़रें नहीं उठाईं। उसने बस इतना कहा, “मास्टर जी, आपका गुस्सा बिल्कुल वाजिब है। आप मुझे जो सज़ा देना चाहें, दीजिए। लेकिन मैं अपनी बात से पीछे नहीं हटूंगा। मैं तब तक आपके दर पर आता रहूँगा जब तक आप मुझे अपने दामाद के रूप में स्वीकार नहीं कर लेते।”
उस दिन ओंकारनाथ जी ने आदित्य को धक्के देकर घर से बाहर निकाल दिया और दरवाज़ा धड़ाम से बंद कर लिया।
कमरे के भीतर खड़ी पल्लवी ने यह सब देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उन आंसुओं में डर नहीं था; उनमें एक गर्व था कि उसका चुना हुआ जीवनसाथी सचमुच परीक्षा की आग में उतर चुका था। पल्लवी ने घर में कोई चीख-पुकार नहीं की, कोई बगावत नहीं की। उसने खाना खाना नहीं छोड़ा, न ही अपने माता-पिता से मुँह मोड़ा। वह पहले से भी ज्यादा निष्ठा और सेवा भाव से अपने माता-पिता के कामों में जुटी रही।
और उधर आदित्य ने अपनी तपस्या शुरू कर दी।
अगले दिन सुबह, जब कड़ाके की ठंड पड़ रही थी, आदित्य ओंकारनाथ जी के घर के बाहर वाली दीवार के किनारे शांत खड़ा मिला। दोपहर की धूप हो या शाम की सर्द हवा, आदित्य रोज़ सुबह दफ्तर जाने से पहले और शाम को लौटने के बाद दो घंटे उस दरवाज़े के बाहर हाथ बाँधकर खड़ा रहता। जब ओंकारनाथ जी बाहर निकलते, तो वह झुककर उनके पाँव छूता। ओंकारनाथ जी मुँह फेरकर निकल जाते, पर आदित्य के चेहरे पर कभी शिकन नहीं आती।
एक हफ्ते बाद, जब शहर में मूसलाधार बारिश शुरू हुई और गलियों में पानी भर गया, तब भी आदित्य छाता बंद किए, भीगता हुआ उस गली के कोने पर खड़ा रहा।
आदित्य ने ओंकारनाथ जी के पुराने सहकर्मियों और शहर के उन बुजुर्गों से मुलाकात की जो उसके काम और उसके चरित्र को जानते थे। उन बुजुर्गों ने आकर ओंकारनाथ जी से कहा, “मास्टर जी, लड़का बहुत नेक है। आज के जमाने में जहाँ लड़के ज़रा सी बात पर मुँह मोड़ लेते हैं या बच्चों को भगा ले जाते हैं, वहाँ यह लड़का पिछले बीस दिनों से आपकी चौखट पर अपने स्वाभिमान को गिरवी रखकर खड़ा है। ऐसा दामाद भाग्य से मिलता है।”
ओंकारनाथ जी अंदर ही अंदर पिघलने लगे थे। एक पिता का कठोर दिल उस लड़के के अटूट धैर्य और अपनी बेटी की खामोश, समर्पित आँखों के आगे धीरे-धीरे झुकने लगा था। उन्होंने देखा कि उनकी बेटी ने कभी उनके फैसले का अपमान नहीं किया, बल्कि चुपचाप अपने पिता के सम्मान की पहरेदार बनी रही।
और आखिरकार, इक्कीसवें दिन की शाम को चमत्कार हुआ।
बाहर ठंड बढ़ चुकी थी। ओंकारनाथ जी ने खुद जाकर मुख्य दरवाज़ा खोला। बाहर आदित्य कांपते हुए खड़ा था। ओंकारनाथ जी ने काफी देर तक उसकी आँखों में देखा। उन आँखों में न कोई वासना थी, न कोई अहंकार था; वहाँ केवल एक पवित्र समर्पण और पल्लवी के प्रति अटूट निष्ठा थी।
ओंकारनाथ जी की आँखों से अचानक दो बूँद आँसू छलक पड़े। उन्होंने आगे बढ़कर आदित्य की कलाई पकड़ी और उसे खींचकर अपने सीने से लगा लिया।
“माफ़ कर दे मुझे बेटा…” ओंकारनाथ जी की आवाज़ भर्रा गई। “मेरा अहंकार बहुत बड़ा था, लेकिन तेरे प्यार और मेरी बेटी के संस्कारों ने आज मुझे हरा दिया। और सच कहूँ, तो इस हार में मुझे ज़िंदगी की सबसे बड़ी जीत महसूस हो रही है। जिस लड़के ने मेरी बेटी के सम्मान के लिए अपनी गरिमा को दांव पर लगा दिया, उससे बेहतर मेरी बच्ची की रक्षा कोई और नहीं कर सकता।”
घर के कोने में खड़ी मालती देवी ने पल्लवी को अपनी बाहों में भर लिया। पल्लवी फूट-फूट कर रो पड़ी। यह आँसू किसी जीत के घमंड के नहीं थे, बल्कि उस पावन मर्यादा की विजय के आँसू थे जिसने दो परिवारों को बिखरने से बचा लिया था।
दो महीने बाद, उसी अमृतसर के पावन गुरुद्वारे और पास के प्राचीन मंदिर में शहनाइयों की गूँज उठी। पूरा मोहल्ला साक्षी था उस विवाह का। पल्लवी लाल जोड़े में सजी, अपने पिता के आशीर्वाद का अमृत अपने आँचल में समेटे, आदित्य के साथ फेरे ले रही थी। ओंकारनाथ जी ने जब अपनी कांपती हथेलियों से पल्लवी का कन्यादान किया, तो उनका सिर समाज के सामने तना हुआ था।
उस दिन केवल दो दिलों का मिलन नहीं हुआ था, बल्कि इस बात की जीत हुई थी कि सच्चा प्यार कभी मर्यादा की चौखट को नहीं लांघता; वह तो अपने धैर्य, त्याग और सच्चाई से उस चौखट को ही अपने लिए मंदिर का द्वार बना देता है।
प्रिय पाठकों,
क्या आज की युवा पीढ़ी को पल्लवी और आदित्य के इस फैसले से सीख नहीं लेनी चाहिए कि प्रेम को पाने के लिए अपनों की पगड़ी उछालना वीरता नहीं, बल्कि कायरता है? क्या माता-पिता के आशीर्वाद और सामाजिक मर्यादा के भीतर रहकर हासिल किया गया प्रेम ही जीवन भर का सच्चा सुकून नहीं देता? इस मार्मिक और प्रेरणादायी कहानी पर आपकी क्या राय है, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।
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