“दामाद जी, हमारी बेटी हमारे जिगर का टुकड़ा है। कभी कोई भूल हो जाए तो समझा लीजिएगा, पर इसके मान-सम्मान पर आंच मत आने दीजिएगा।” उस वक्त आलोक ने मुस्कुराते हुए हामी भरी थी, लेकिन वक्त के साथ वे वादे, वे कसमें जाने कहां हवा में बिखर गए।
वंदना ने कभी सुख-सुविधाओं की मांग नहीं की। ससुराल में कदम रखने के बाद से ही उसने हर रिश्ते को सहेजने में अपनी जान लगा दी। सास-ससुर की सेवा हो या जेठ-देवरानी की पसंद-नापसंद, उसने हमेशा खुद को पीछे रखकर परिवार को आगे रखा। मगर सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती थी, जब वही इंसान उसके दर्द को अनदेखा कर देता था जिसे उसने अपना हमसफर चुना था। चारदीवारी के भीतर आलोक का प्यार बड़ा सहज और अपना लगता, पर जैसे ही वे दोनों कमरे की दहलीज पार करके दुनिया के सामने आते, आलोक का रवैया पूरी तरह बदल जाता। समाज और रिश्तेदारों की महफ़िल में वह वंदना के पक्ष में खड़ा होना तो दूर, अक्सर दूसरों की बेतुकी बातों पर भी खामोश रहकर या पत्नी का ही मज़ाक उड़ाकर अपनी महानता साबित करने की कोशिश करता। वंदना हमेशा तरसती रही कि कभी तो भरी महफ़िल में उसके पति उसका हाथ थामकर गर्व से कहें, “मेरी पत्नी ने इस घर के लिए जो किया है, वह कोई और नहीं कर सकता।” पर ऐसी तारीफ तो दूर, उसे हर मोड़ पर सिर्फ उपेक्षा ही नसीब हुई।
कल शाम का वाकया तो जैसे उसके सब्र के प्याले को छलका गया। आलोक की बड़ी बहन, नलिनी दीदी का फोन आया था। नलिनी दीदी की छोटी बेटी आरुषि का विवाह तय हुआ था। फोन पर नलिनी दीदी ने बहुत ही औपचारिकता भरे लहजे में कहा, “आलोक, आरुषि के हाथ पीले हो रहे हैं। तुम दोनों को आना ही पड़ेगा, आखिर मामा का फर्ज बनता है।” कहने को तो यह बुलावा था, लेकिन उस बुलावे के पीछे छिपी कड़वाहट वंदना के सीने में चुभ गई।
वंदना का मन बरबस दो साल पीछे चला गया, जब नलिनी दीदी की बड़ी बेटी तन्वी की शादी थी। उस शादी की तैयारी में वंदना ने महीनों पहले से अपनी जमा-पूंजी और मेहनत झोंक दी थी। नलिनी दीदी अक्सर मायके में आकर रोती थीं कि उनके ससुराल वाले बहुत ताने मारते हैं और उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। वंदना को लगा कि ननद का दुख उसका अपना दुख है। उसने अपने मायके से मिली एफडी तुड़वाकर और अपनी निजी बचत से करीब सवा लाख रुपये तन्वी के गहने और कपड़ों में खर्च करवा दिए, ताकि शादी में कोई कमी न रहे और ननद का सिर ससुराल में ऊंचा रहे। परिवार में बाकी लोग भी थे—मझले भाई और उनकी पत्नी—जिन्होंने एक पैसा भी खर्च नहीं किया था और सिर्फ सज-धज कर मेहमानों की तरह पहुंचे थे।
लेकिन उस शादी में वंदना के साथ जो हुआ, वह उसकी रूह को आज भी कंपा देता है। शादी वाले दिन जब बारात आने में कुछ ही घंटे बाकी थे, वंदना दुल्हन के कमरे में सामान व्यवस्थित कर रही थी। तभी नलिनी दीदी की जेठानी और कुछ दूर की रिश्तेदार वहां आ गईं। जगह थोड़ी कम थी, तो नलिनी दीदी ने बिना किसी संकोच के, भरी सभा में वंदना से रूखे स्वर में कह दिया, “अरे वंदना, तुम यहां क्या कर रही हो? यह कमरा तो खास रिश्तेदारों और ससुराल वालों के लिए है। बाहर का कमरा मेहमानों और बाहर वालों के लिए रखा गया है, तुम अपना सामान वहीं ले जाओ।”
‘बाहर वाले’—यह शब्द वंदना के सीने पर किसी तीर की तरह लगा था। उस कमरे में आलोक भी मौजूद था, पूरा परिवार वहीं खड़ा था। किसी ने नलिनी दीदी को यह नहीं टोका कि जिस औरत ने इस शादी की नींव में अपना सब कुछ लगा दिया, उसे तुम बाहर वाला कैसे कह सकती हो? उल्टे कुछ लोग धीमे से मुस्कुरा दिए, मानो उन्हें वंदना का अपमान देखकर एक अजीब सा सुकून मिला हो। वंदना की नजरें आलोक पर टिकी थीं, उसकी आंखें भीख मांग रही थीं कि आलोक अपनी बहन से कहे कि खबरदार जो मेरी पत्नी को बाहर का कहा। पर आलोक ने केवल अपनी नजरें चुरा लीं। बाद में जब वंदना ने अकेले में रोते हुए अपना दर्द बयां किया, तो आलोक ने सहानुभूति जताने के बजाय उल्टा उसी पर झल्लाते हुए कहा, “तुम हर बात का बतंगड़ क्यों बनाती हो? भाभी ही तो हो तुम, ननद के घर में भाभी का दर्जा मेहमान जैसा ही होता है। इतना दिल पर लेने की क्या जरूरत है?”
“भाभी ही तो हो…” आलोक के ये शब्द वंदना के कानों में बार-बार हथौड़े की तरह बज रहे थे। वह सोचती रही कि जब पैसे की जरूरत थी, जब त्याग की जरूरत थी, तब वह इस परिवार की सबसे सगी थी। पर जब मान-सम्मान और हक की बात आई, तो वह सिर्फ एक ‘भाभी’ और ‘बाहर वाली’ बनकर रह गई। आलोक यह भूल गए कि जिस मान-सम्मान की पगड़ी बांधकर वे अपनी बहनों के ससुराल में सीना चौड़ा करके घूमते हैं, उस पगड़ी की सिलाई उनकी पत्नी के चुपचाप सहे गए आंसुओं और त्याग से हुई थी।
आज वंदना का अंतर्मन विद्रोह कर रहा था। खिड़की से हटकर उसने आईने में खुद को देखा। सूजी हुई आंखें, चेहरे पर गहरी थकान और होठों पर अनकही पीड़ा। उसने खुद से सवाल किया—क्या एक स्त्री का जन्म केवल इसलिए होता है कि वह दूसरों के खोखले स्वाभिमान को सींचती रहे और अपने अस्तित्व को मिटा दे? क्या पति की खुशी के लिए हर बार अपने आत्मसम्मान की बलि देना ही पत्नी धर्म है? अगर मैं ही अपनी इज्जत नहीं करूंगी, तो कोई दूसरा मेरी इज्जत क्यों करेगा?
उसी समय कमरे का दरवाज़ा खुला और आलोक तैयार होकर अंदर आया। उसने हाथ में घड़ी बांधते हुए कहा, “वंदना, दीदी के यहां शादी के लिए कपड़े पैक कर लो। कल सुबह की गाड़ी से हमें निकलना है। और हां, इस बार भी शगुन और गहनों का बंदोबस्त ठीक से कर लेना, आखिर मेरी भांजी की शादी है, कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।”
आलोक की बात सुनकर वंदना ने एक गहरी सांस ली। इस बार उसकी आंखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक शांत और दृढ़ चमक थी। उसने बहुत ही संतुलित और सहज आवाज में कहा, “आलोक जी, आप जाइए। मैं इस शादी में नहीं जा रही हूं।”
आलोक चौंक पड़ा। उसने मुड़कर वंदना को देखा, जैसे उसे अपने कानों पर यकीन न हुआ हो। “क्या मतलब नहीं जा रही हो? मेरी सगी भांजी की शादी है। पूरा खानदान वहां होगा। सब पूछेंगे कि तुम्हारी पत्नी क्यों नहीं आई, तो मैं क्या जवाब दूंगा? लोग कहेंगे कि मामी होकर नहीं आई।”
वंदना ने शांत भाव से कहा, “लोग वही कहेंगे जो वो कहना चाहते हैं। पिछली बार जब मैं गई थी, तो मुझे याद दिलाया गया था कि मेरा कमरा बाहर वालों के साथ है। जिस चौखट पर मुझे ‘बाहर वाला’ कहकर अपमानित किया गया, उस चौखट को मैं दोबारा अपने कदमों से नहीं लांघूंगी। और वैसे भी, आपके शब्दों में मैं सिर्फ एक ‘भाभी’ ही तो हूं, और बाहर वालों के न होने से घर के उत्सव रुकते नहीं हैं।”
“तुम पुरानी बातों को पकड़कर बैठी हो! दीदी ने बस ऐसे ही कह दिया था, तुम्हें रिश्तों की कोई कद्र ही नहीं है,” आलोक ने ऊंची आवाज में उसे दबाने की कोशिश की।
“कद्र मुझे ही थी आलोक जी, तभी तो पिछली बार अपनी खुशियों और बचत का गला घोंटकर सब कुछ न्योछावर कर दिया था,” वंदना की आवाज में कोई कंपन नहीं था, एक अजीब सा ठहराव था। “रिश्ते कभी एकतरफा त्याग से नहीं चलते। मैंने हर मोड़ पर आपके परिवार को अपना माना, पर बदले में मुझे सिर्फ उपेक्षा मिली। सबसे बड़ा दुख मुझे दीदी की बात का नहीं हुआ था, सबसे बड़ा दुख इस बात का था कि जिस पति को मैंने अपना सर्वस्व माना, वह मेरे अपमान पर तमाशबीन बना रहा। आपने एक बार भी नहीं कहा कि वंदना बाहर की नहीं, मेरा हिस्सा है।”
आलोक निरुत्तर हो गया। उसने पहली बार वंदना के चेहरे पर वह कठोर संकल्प देखा, जो उसने पिछले बारह सालों में कभी नहीं देखा था। हमेशा झुक जाने वाली, चुपचाप रो लेने वाली वंदना आज अडिग चट्टान की तरह खड़ी थी।
“और सुनिए,” वंदना ने आगे कहा, “इस बार मैंने तय किया है कि जो पैसे आपने भांजी के भारी-भरकम शगुन के लिए सोचे थे, उसमें से मेरी बचत का एक भी रुपया नहीं लगेगा। आप अपने सामर्थ्य से जितना देना चाहें दें, पर मेरे आत्मसम्मान की कीमत पर कोई दिखावा नहीं होगा। मैं घर पर रहूंगी।”
आलोक गुस्से में पैर पटकता हुआ कमरे से बाहर निकल गया, यह सोचकर कि थोड़ी देर में वंदना का गुस्सा शांत हो जाएगा और वह हमेशा की तरह मान जाएगी। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। अगले दिन सुबह आलोक को अकेले ही शादी के लिए रवाना होना पड़ा।
शादी के माहौल में जब आलोक पहुंचा, तो रिश्तेदारों ने स्वाभाविक रूप से पूछा, “अरे आलोक, वंदना बहू कहां हैं? वह नजर नहीं आ रहीं?”
शुरुआत में आलोक ने बहाना बनाया कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है। लेकिन जब नलिनी दीदी ने तंज कसते हुए कहा, “देखा, अपनी भांजी की शादी में भी नहीं आई। नखरे तो देखो ज़रा, आने का मन नहीं था तो बहाना बना दिया,” तब अचानक आलोक के दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। उसने देखा कि उसकी दूसरी भाभियां आराम से सोफे पर बैठी गपशप कर रही थीं, जिन्होंने शादी में कोई मदद नहीं की थी, फिर भी उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया जा रहा था। और वंदना, जिसने पिछली शादी में अपना तन-मन-धन सब झोंक दिया था, उसकी गैरहाजिरी में भी उसके लिए सिर्फ ताने थे।
उसी शाम जब शादी के शगुन का वक्त आया, तो आलोक ने देखा कि लोग केवल इस बात की चर्चा कर रहे थे कि किसने कितना दिया। किसी को इस बात की परवाह नहीं थी कि कौन कितने प्यार से आया है। नलिनी दीदी के ससुराल वाले खुलेआम नुक्स निकाल रहे थे। उस पल आलोक को समझ आया कि वंदना सही कह रही थी। रिश्तों का मान पैसों और दिखावे से नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान से होता है। वंदना ने उस घर के लिए क्या कुछ नहीं किया, और उसने खुद एक पति होकर अपनी पत्नी के त्याग का मोल कभी नहीं समझा। दूसरों को खुश करने की होड़ में वह उस इंसान को खोता जा रहा था जो सच में उसकी अपनी थी।
शादी की रस्में खत्म होते ही आलोक ने तुरंत घर लौटने का फैसला किया। वह एक पल भी वहां नहीं रुकना चाहता था। रास्ते भर उसकी आंखों के सामने वंदना का शांत, गंभीर चेहरा घूमता रहा। उसे याद आया कि कैसे हर त्योहार पर, हर मुसीबत में वंदना उसके साथ साए की तरह खड़ी रही, और उसने बदले में उसे क्या दिया? केवल दूसरों के सामने नीचा दिखाया।
घर पहुंचकर आलोक ने सीधे वंदना के कमरे का रुख किया। वंदना एक किताब पढ़ रही थी। आलोक को इतनी जल्दी वापस आया देख वह चौंक गई।
आलोक धीरे से चलकर उसके पास आया और बिना कुछ कहे उसके सामने बैठ गया। उसका सिर झुका हुआ था। कुछ पल की खामोशी के बाद जब आलोक ने अपना सिर उठाया, तो उसकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे।
“मुझे माफ कर दो वंदना,” आलोक की आवाज भर्रा गई। “मैं इतने सालों तक अंधा बना रहा। मुझे लगता था कि परिवार को जोड़े रखने का मतलब है कि तुम हर बार सहती रहो और मैं चुप रहूं। लेकिन उस शादी में जाकर मुझे अहसास हुआ कि जो इंसान अपनी पत्नी के स्वाभिमान की रक्षा नहीं कर सकता, वह कभी सच्चा जीवनसाथी नहीं कहला सकता। तुमने जो फैसला लिया, उसने मेरी आंखें खोल दीं। तुमने बिल्कुल सही किया था। जहां तुम्हारा मान नहीं, वहां मेरा भी कोई वजूद नहीं होना चाहिए।”
वंदना ने आलोक को देखा। उन आंसुओं में कोई दिखावा नहीं था, बल्कि एक सच्चा पश्चाताप था। बारह सालों में पहली बार आलोक ने अपनी गलती को स्वीकारा था।
आलोक ने वंदना के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और कहा, “मैं तुमसे वादा करता हूं वंदना, आज के बाद चाहे कोई भी हो, परिवार हो या समाज, अगर किसी ने तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने की कोशिश की, तो सबसे पहले आलोक उसके सामने खड़ा मिलेगा। तुम्हारा सम्मान ही मेरा सम्मान है।”
वंदना की आंखों से भी आंसू छलक पड़े, लेकिन इस बार ये आंसू दर्द या बेबसी के नहीं थे। ये आंसू उस सुकून के थे जो किसी तूफान के थमने के बाद महसूस होता है। उसने महसूस किया कि जब एक औरत अपने आत्मसम्मान के लिए खुद खड़ी होती है, तभी दुनिया भी उसकी कद्र करना सीखती है। समझौता रिश्तों की बुनियाद हो सकता है, लेकिन स्वाभिमान की बलि चढ़ाकर किया गया समझौता केवल घुटन देता है। आज उस घर में एक नए रिश्ते की शुरुआत हुई थी, जहां प्रेम के साथ-साथ सम्मान की बराबरी थी।
क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों को बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ एक इंसान की नहीं होनी चाहिए? अगर पति शुरू से ही अपनी पत्नी के आत्मसम्मान का साथ दे, तो क्या किसी रिश्ते में कभी कड़वाहट आ सकती है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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