ममता का कर्ज

वंदना का मन एक पल के लिए सिहर उठा, लेकिन माहौल की आपाधापी ऐसी थी कि वह आलोक की बात पर ज्यादा सोच नहीं सकी। शगुन की थालियां सजीं, बारात की अगवानी हुई, जयमाला के फूल बरसे और रात भर वेदी के सामने मंत्रोच्चार गूंजते रहे। वंदना ने पूरी निष्ठा से कन्यादान से लेकर कलेवा तक की सारी रस्में निभाईं। किसी मेहमान को पानी की कमी नहीं होने दी, ननद के हर जोड़े को सहेज कर रखा।

  अगले महीने वंदना की ननद श्वेता का ब्याह तय हुआ था। शादी समस्तीपुर के पुश्तैनी गांव से होनी थी, लेकिन खरीद-फरोख्त का सारा जिम्मा वंदना के ही कंधों पर था। शहर के बड़े बाजारों की खाक छानना, अच्छे कपड़े चुनना, बर्तनों के सेट बनवाना और गहनों की नक्काशी देखना—सबकी नजरों में यह काम सिर्फ वही सलीके से संभाल सकती थी।

वंदना ने डायरी के पन्नों पर बारीक अक्षरों में दर्जनों पन्नों की सूची बना रखी थी। बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजना, ससुर जी का काढ़ा बनाना, देवर के नाश्ते की व्यवस्था करना और पति आलोक के दफ्तर जाने के बाद वह खुद एक कप ठंडी हो चुकी चाय हलक से नीचे उतारती। इसके बाद थैला कंधे पर लटकाए वह बोरिंग रोड या हथुआ मार्केट के चक्कर काटने निकल पड़ती। जब भी कोई सामान पूरा होता, वह डायरी में उसके आगे छोटा सा सही का निशान लगा देती। निशान बढ़ते जा रहे थे, लेकिन उसके भीतर की थकान भी उसी रफ्तार से पांव पसार रही थी।

वंदना की ससुराल समस्तीपुर के पास एक बड़े रसूखदार गांव में थी। परिवार का नियम पक्का था—साल का कोई भी तीज-त्योहार हो, गर्मी या जाड़े में बच्चों की पंद्रह दिन की छुट्टियां हों, सबका ठिकाना गांव ही होता था। गांव में जब किसी चचेरे-ममेरे को कोई बीमारी घेरती या किसी दवा-इलाज की दरकार होती, तो पटना में रहने के कारण पहला फोन आलोक और वंदना के पास ही खटकता था। वंदना ने कभी उफ तक नहीं की। रिश्तेदारी के हर नातेदार का पटना आने पर उनके घर ही पड़ाव होता, उनका सत्कार करना, बिस्तरों की फिक्र करना और विदाई के समय उनके हाथ में मिठास थमाना वंदना की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था।

मगर इन तमाम जिम्मेदारियों के चक्रव्यूह में वंदना का अपना मायका कहीं बहुत पीछे छूट गया था। उसका मायका मुंगेर में था। बाबूजी के गुजर जाने के बाद वहां अब सिर्फ बूढ़ी मां जानकी देवी, छोटा भाई नीरज और इंटर में पढ़ने वाली छोटी बहन कोमल ही रहते थे। मां को बरसों से दमे और दिल की कमजोरी की शिकायत थी। नीरज अभी-अभी एक छोटी सी दुकान पर काम सीखने लगा था और कोमल पढ़ाई के साथ-साथ घर के चूल्हे-चौके को संभालती थी।

वंदना जब भी कभी साल-छह महीने में दो दिन के लिए मुंगेर जाने की बात उठाती, ससुराल में कोई न कोई ऐसा बहाना निकल आता कि उसका कदम दहलीज पर ही ठिठक जाता। कभी सासू मां कहतीं कि फलाने रिश्तेदार आने वाले हैं, कभी आलोक कहते कि अभी काम का बहुत दबाव है, फिर कभी चलेंगे। एक बार जब वह बिना बताए सिर्फ एक दिन के लिए मां की तीमारदारी करने मुंगेर चली गई थी, तो पीछे से गांव से आए एक फूफा जी को घर का ताला बंद मिला था। उस दिन के बाद ससुराल के हर बड़े-बुजुर्ग ने उसे ताने दे-देकर यह पाठ पढ़ाया था कि ब्याही हुई बेटी का पहला और आखिरी संसार उसकी ससुराल ही होती है, मायके का मोह अब उसे शोभा नहीं देता। उस अपमान के बाद वंदना ने मायके जाने की जिद ही छोड़ दी थी। वह केवल पड़ोस के एसटीडी पीसीओ से कभी-कभार मां से बात करके अपना दिल हल्का कर लिया करती थी।

श्वेता की शादी में अब सिर्फ आठ दिन बाकी थे। घर में ट्रंकों और बोरियों में सामान बांधा जा रहा था। वंदना को शाम की गाड़ी से गांव के लिए निकलना था ताकि वहां जाकर शादी के रीति-रिवाजों और मंडप की सजावट का काम संभाल सके। वह कपड़ों की तह लगा रही थी कि तभी दरवाजे की सांकल बजी।

वंदना ने जाकर दरवाजा खोला, तो सामने का दृश्य देखकर उसके हाथ से साड़ी का पल्लू छूट गया। दरवाजे पर उसकी मां जानकी देवी खड़ी थीं, उनके चेहरे पर पीलापन था, होंठ सूखे हुए थे और वह अपने बेटे नीरज के कंधे का सहारा लिए बमुश्किल खड़ी थीं। सांसें उखड़ी-उखड़ी सी चल रही थीं।

“मां! आप इस हालत में यहां कैसे? तबियत बहुत ज्यादा खराब है क्या?” वंदना की आंखें भर आईं। उसने लपककर मां का हाथ थामा और सहारा देकर भीतर सोफे पर बैठाया।

नीरज ने थकी आवाज में कहा, “दीदी, मां दो दिन से बहुत कमजोर थीं, लेकिन जिद करने लगीं कि उन्हें पटना जाकर तुमसे मिलना है और श्वेता दीदी के लिए कुछ देना है। डॉक्टर ने सफर के लिए मना किया था, पर मां किसी की सुनती कहां हैं।”

जानकी देवी ने कांपते हाथों से अपनी सूती धोती के छोर में बंधी गांठ खोली। उन्होंने मखमली डिब्बी और कुछ मुड़े-तुड़े नोट वंदना की हथेली पर रख दिए। उनके चेहरे पर एक ममतामयी मुस्कान तैर गई, “बेटा, श्वेता की शादी है। वह भी तो मेरी बेटी जैसी ही है। समधन जी को लगना चाहिए कि समधिन ने भी अपनी तरफ से मान-सम्मान में कोई कमी नहीं छोड़ी। यह चांदी की पायल श्वेता के लिए है, और ये कुछ रुपये… इससे अपनी पसंद की कोई अच्छी सी साड़ी ले लेना। तू तो सबके लिए खरीदती रहती है, अपने लिए कभी कुछ नहीं लेती।”

वंदना का सीना भर आया। उसने मां के सीने से सिर टिका दिया। मां के शरीर से वही जानी-पहचानी ममता की महक आ रही थी, जिसे महसूस किए उसे बरसों बीत गए थे। “मां, आप इतनी दूर क्यों आईं? आपकी जान से बढ़कर कोई रस्म नहीं थी।”

“बेटी, जब तक सांस है, तब तक मां का मन तो संतानों के आंगन में ही भटकता रहता है। तू फिक्र मत कर, हम बस अभी निकलेंगे, शाम की ट्रेन से वापस मुंगेर चले जाएंगे ताकि तू भी अपने गांव जा सके।” जानकी देवी ने उसके माथे को चूमा, पानी का एक घूंट पिया और नीरज का हाथ पकड़कर विदा ले ली। वंदना खिड़की से उन्हें जाते देखती रही, मन में एक अजीब सी बेचैनी का साया गहराने लगा था, जैसे कोई अनजाना डर दिल को जकड़ रहा हो।

उसी शाम वंदना अपने परिवार के साथ समस्तीपुर के गांव पहुंच गई। गांव पहुंचते ही जिम्मेदारियों का समंदर उसके आगे था। सासू मां के निर्देश, जेठानियों की फरमाइशें, बारात के स्वागत की रूपरेखा और हल्दी-मेहंदी की तैयारियां। वंदना सुबह चार बजे से रात के बारह बजे तक बिना रुके काम में जुटी रहती।

जिस दिन श्वेता की बारात आनी थी, उस दिन गांव में बिजली गुल थी और उमस भरा माहौल था। घर के बाहर शहनाई की धुन गूंज रही थी। औरतें मंगलगीत गा रही थीं। उस जमाने में मोबाइल फोन का दौर नहीं था। पूरे गांव में सिर्फ मुखिया जी के घर पर ही लैंडलाइन फोन लगा हुआ था।

दोपहर के वक्त मुखिया जी का छोटा लड़का दौड़ता हुआ आया और उसने आलोक के कान में कुछ कहा। आलोक का चेहरा अचानक फक पड़ गया। वह बिना किसी को कुछ बताए सीधे मुखिया जी के घर की तरफ भागे।

लगभग आधे घंटे बाद जब आलोक लौटे, तो उनके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था और माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। वंदना उस वक्त समियाने के नीचे नाश्ते के डिब्बे लगवा रही थी। उसने आलोक की घबराहट भांप ली। वह तेजी से उनके पास पहुंची, “क्या बात है जी? किसका फोन था? सब ठीक तो है न?”

आलोक की नजरें वंदना से टकराकर झुक गईं। उन्होंने खुद को संभालते हुए एक बनावटी गंभीरता ओढ़ ली, “कुछ नहीं… वो दफ्तर से एक जरूरी फाइल के सिलसिले में फोन था। तुम इधर ध्यान मत दो, जाओ अंदर देखो, बारात के स्वागत के लिए शर्बत के गिलास तैयार हैं या नहीं। आज कोई चूक नहीं होनी चाहिए, पूरे खानदान की नाक का सवाल है।”

वंदना का मन एक पल के लिए सिहर उठा, लेकिन माहौल की आपाधापी ऐसी थी कि वह आलोक की बात पर ज्यादा सोच नहीं सकी। शगुन की थालियां सजीं, बारात की अगवानी हुई, जयमाला के फूल बरसे और रात भर वेदी के सामने मंत्रोच्चार गूंजते रहे। वंदना ने पूरी निष्ठा से कन्यादान से लेकर कलेवा तक की सारी रस्में निभाईं। किसी मेहमान को पानी की कमी नहीं होने दी, ननद के हर जोड़े को सहेज कर रखा।

अगली सुबह का सूरज चढ़ा। श्वेता की डोली उठी। पूरे आंगन में सिसकियों और आंसुओं का दौर चला। जब गाड़ी धूल उड़ाती हुई मोड़ से ओझल हो गई, तब जाकर वंदना ने राहत की सांस ली। उसकी कमर दर्द से टूटने लगी थी। वह आंगन में फैली कुर्सियों को समेटने लगी कि तभी आलोक उसके सामने आकर खड़े हो गए। उनकी आंखों के नीचे काले घेरे थे और आवाज में एक गहरा कंपन था।

“वंदना… सामान बांध लो। हमें अभी इसी वक्त मुंगेर निकलना है।”

वंदना चौंक गई। जिस पति ने पिछले पांच सालों में कभी मुंगेर जाने की बात खुद से नहीं की थी, वह आज शादी के ठीक बाद यह क्यों कह रहे हैं? “मुंगेर? इस वक्त? पर अभी तो घर समेटना बाकी है, सासू मां क्या कहेंगी?”

“मैंने मां से बात कर ली है। तुम बस चलो,” आलोक ने उसका हाथ पकड़ लिया। उनकी हथेली बर्फ की तरह ठंडी थी।

रास्ते भर बस की खिड़की से बाहर देखते हुए वंदना का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। आलोक बिल्कुल खामोश बैठे थे, उनकी आंखें बार-बार नम हो रही थीं। वंदना ने जब भी पूछा कि बात क्या है, आलोक ने यही कहा कि मुंगेर पहुंचकर पता चल जाएगा। अनहोनी की आशंका से वंदना की छाती फटने लगी थी।

दोपहर ढलते-ढलते जब तांगा मुंगेर वाली गली के नुक्कड़ पर रुका, तो वंदना के पैरों तले की जमीन खिसक गई। उसके मायके के छोटे से मकान के बाहर सफेद कपड़ों में दर्जनों लोग चुपचाप सिर झुकाए खड़े थे। दरवाजे के बाहर बांस और कफन का सामान रखा था। आंगन से कोमल के दहाड़ मारकर रोने की आवाजें आ रही थीं।

वंदना पागलों की तरह दौड़ती हुई अंदर घुसी। दलान के बीचों-बीच उसकी मां जानकी देवी सफेद चादर में लिपटी सो रही थीं। उनके चेहरे पर वही शांत, निश्चल भाव था, लेकिन शरीर बिल्कुल जड़ हो चुका था।

“मां…!” एक तीखी चीख वंदना के हलक से निकली और वह मां के पैरों पर गिर पड़ी। “मां, उठो ना! देखो तुम्हारी वंदना आ गई! तुमने कहा था ना कि मैं अपनी साड़ी नहीं खरीदती, देखो मैं आ गई… मां एक बार आंखें तो खोलो!”

नीरज ने वंदना को बाहों में भरकर रोते हुए कहा, “दीदी… मां कल दोपहर को ही हमें छोड़कर चली गईं। उनकी सांसें उखड़ रही थीं, वो बार-बार दरवाजे की तरफ देखकर सिर्फ तुम्हारा नाम ले रही थीं… ‘मेरी वंदना को बुला दो, मेरी बेटी को बुला दो’… मैंने कल ही जीजाजी को मुखिया जी के फोन पर खबर कर दी थी कि मां की हालत बहुत नाजुक है, वो तुम्हें लेकर तुरंत आ जाएं… लेकिन तुम नहीं आईं दीदी… मां तुम्हारा रास्ता देखते-देखते आंखें मूंद गईं।”

यह सुनते ही वंदना का रोना जैसे एक पल के लिए जम गया। उसके भीतर का रुदन एकाएक सन्नाटे में बदल गया। उसने पलटकर आलोक की तरफ देखा, जो सिर झुकाए दरवाजे की चौखट के पास खड़े कांप रहे थे।

वंदना धीरे-धीरे उठी। उसकी आंखों से बहते आंसू सूख चुके थे, उनकी जगह एक दहकती हुई ज्वाला ने ले ली थी। वह आलोक के करीब पहुंची। उसकी आवाज बेहद धीमी, मगर किसी खंजर की तरह पैनी थी।

“कल दोपहर को फोन आया था? जब आप मुखिया जी के यहां से लौटकर आए थे, तब आपको पता था कि मेरी मां आखिरी सांसें गिन रही हैं?”

आलोक ने थरथराते हुए कहा, “वंदना… मेरी बात समझो। वहां श्वेता का मंडप सजा था। अगर मैं तुम्हें सच बता देता, तो शादी का माहौल मातम में बदल जाता। बारात दरवाजे पर खड़ी थी… लोग क्या कहते? खानदान की क्या इज्जत रह जाती? मैंने सोचा कि शादी निपटते ही…”

“खानदान की इज्जत?” वंदना ने एक दर्दनाक हंसी के साथ दोहराया। “और मेरी मां की जान? उस ममता की कोई इज्जत नहीं थी? आलोक, पिछले सात सालों से मैंने आपके घर को अपना माना। आपके हर रिश्तेदार की सेवा को अपना धर्म समझा। आपके परिवार में किसी को जुकाम भी होता था, तो मैं रात-रात भर जागती थी। कभी आपके और अपने परिवार के बीच फर्क नहीं किया। पर आपने क्या किया?”

आलोक के पास कोई जवाब नहीं था। आसपास खड़े रिश्तेदार सन्न थे।

वंदना ने अपनी छाती पर हाथ मारा, “मेरी मां ने अपनी बीमारी के आखिरी दिनों में भी आपकी बहन के लिए पायल भेजी थी ताकि आपकी ससुराल में हेठी न हो। और आपने मुझे अपनी मां का आखिरी घूंट पानी पिलाने का अधिकार भी छीन लिया? क्या एक बेटी का अपनी मां के आखिरी पलों पर कोई हक नहीं होता? सिर्फ इसलिए कि मैं बहू हूं, मेरे सारे अधिकार आपके घर की दहलीज पर खत्म हो जाते हैं? क्या आपकी बहन की डोली मेरी मां की अर्थी से ज्यादा भारी थी?”

आलोक की आंखों से पछतावे के आंसू टपक पड़े। उन्होंने वंदना के आगे हाथ जोड़ दिए, “मुझे माफ कर दो वंदना… मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया। मैं समाज और लोक-लाज के डर में इतना अंधा हो गया कि तुम्हारा और तुम्हारी मां का दर्द नहीं देख पाया। मुझे लगा कि मैं सब संभाल लूंगा, लेकिन मैं इंसानियत हार गया।”

अंतिम संस्कार के बाद के दिन वंदना के लिए किसी भयावह अंधेरे की तरह थे। वह मुंगेर में ही रुक गई। आलोक भी वहीं ठहरे रहे। उन्होंने न तो लौटने की जिद की, न ही अपनी सफाई में कोई शब्द कहा। वह चुपचाप नीरज और कोमल के साथ घर के कामों में हाथ बंटाते, कभी चूल्हा जलाते, तो कभी रिश्तेदारों के बैठने की व्यवस्था करते। जिस आलोक ने कभी अपने घर में पानी का गिलास भी खुद नहीं उठाया था, वह आज मायके के हर छोटे-बड़े फर्ज को सिर झुकाकर निभा रहे थे।

तेरहवीं की रस्म पूरी होने के बाद जब समस्तीपुर से ससुर जी और सासू मां मुंगेर पहुंचे, तो माहौल तनावपूर्ण हो गया। सासू मां ने आते ही कहा, “बहू, जो होना था सो हो गया। अब सब विधि पूरी हो गई है, घर चलो। वहां बहुत काम बिखरा पड़ा है।”

वंदना ने शांत भाव से अपनी सासू मां की ओर देखा। उस नजर में कोई विद्रोह नहीं था, बल्कि एक ऐसा आत्मसम्मान था जिसे कोई झुका नहीं सकता था।

“मां जी,” वंदना ने सहज स्वर में कहा, “मैं ससुराल जरूर आऊंगी। मैंने जिस घर को सात साल तक सींचा है, उससे मेरा नाता इतनी आसानी से नहीं टूटेगा। लेकिन अब मैं उस घर में सिर्फ एक बेजुबान फर्ज निभाने वाली मशीन बनकर नहीं आऊंगी। वहां मेरी हैसियत एक जीते-जागते इंसान की होगी, जिसके अपने जज्बात हैं और जिसका एक मायका भी है।”

सासू मां ने अचरज से आलोक की तरफ देखा, यह सोचकर कि उनका बेटा हमेशा की तरह अपनी मां का पक्ष लेगा। लेकिन आलोक आगे आए। उन्होंने अपनी मां के सामने हाथ जोड़े।

“नहीं मां, वंदना बिल्कुल सही कह रही है,” आलोक की आवाज भारी थी लेकिन उसमें एक अटूट संकल्प था। “हमने हमेशा वंदना से उम्मीद की कि वह हमारे पूरे खानदान का ख्याल रखे, लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा कि उसका भी एक दिल है, उसके भी अपने लोग हैं। मैंने अपनी बहन की शादी बचाने के चक्कर में इसकी मरती हुई मां का हक छीन लिया। यह गलती नहीं, एक अपराध था। अगर आज वंदना मुझे छोड़ भी देती, तो मेरे पास शिकायत करने का कोई हक नहीं था। आज के बाद इस परिवार में वंदना के आत्मसम्मान और उसके मायके के अधिकारों से कोई समझौता नहीं होगा।”

आलोक ने मुड़कर नीरज और कोमल के सिर पर हाथ रखा, “कोमल अब आगे की पढ़ाई पटना में रहकर हमारे साथ करेगी। और नीरज की दुकान का विस्तार हम मिलकर करेंगे। वंदना जितनी इस घर की बहू है, उतनी ही इस मायके की बेटी और रीढ़ है।”

सासू मां की आंखें शर्म से झुक गईं। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो चुका था कि उन्होंने हमेशा बहू से त्याग की उम्मीद तो की, लेकिन उसे बेटी जैसा प्यार और अधिकार कभी नहीं दिया। उन्होंने आगे बढ़कर वंदना के सिर पर हाथ रख दिया।

वंदना ने दीवार पर टंगी अपनी मां की तस्वीर की ओर देखा। अगरबत्ती के धुएं के बीच जानकी देवी की तस्वीर मुस्कुराती हुई सी लग रही थी, मानो कह रही हो कि रिश्तों का असली संतुलन किसी की बलि देकर नहीं, बल्कि एक-दूसरे के वजूद का सम्मान करके ही बनता है।

एक बेटी जब बहू बनती है, तो वह ससुराल को अपना सब कुछ सौंप देती है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि उसके दिल से अपनी जन्मदात्री मां और मायके के अधिकार मिट जाते हैं। रिश्तों में संतुलन और संवेदनशीलता ही परिवार की असली ताकत है। क्या आलोक का लोक-लाज के डर से वंदना से उसकी मां की विदाई छुपाना सही था? या एक बहू को भी अपने मायके के सुख-दुख में खुलकर खड़े होने का बराबर अधिकार मिलना चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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